सौंदर्य

सौंदर्य सुंदर होने की अवस्था या भाव है, जो आनंद और संतोष की अनुभूति प्रदान करता है। सौंदर्य के मानक देश, काल, विषय और प्रसंग में बदलते रहते हैं। प्रस्तुत चयन में उन कविताओं को शामिल किया गया है; जिनमें सुंदरता शब्द, भाव और प्रसंग में प्रमुखता से उपस्थित है।

गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।

चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

जमाल

तेरी मुख-समता करी, साहस करि निरसंक।

धूरि परी अरबिंद मुख, चंदहि लग्यौ कलंक॥

हे राधिके, कमल और चंद्रमा ने तुम्हारे मुख की समता करने का साहस किया, इसलिए मानो कमल के मुख पर तो पुष्परज के कण रूप में धूल पड़ गई, और चंद्रमा को कलंक लग गया। यद्यपि कमल में पराग और चाँद में कलंक स्वाभाविक है तथापि उसका यहाँ एक दूसरा कारण राधा के मुख की समता बताया गया है।

मतिराम

रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल।

ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति, मोल रहीम बिसाल॥

रहीम कहते हैं कि किसी की रूप-माधुरी, कथा का कथानक, कविता, चारु पट, सोना, छंद और मोती-माणिक्य का ज्यों-ज्यों सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो इनकी ख़ूबियाँ बढ़ती जाती है। यानी इन सब की परख के लिए पारखी नज़र चाहिए।

रहीम

सुबरन बेलि तमाल सौं, घन सौं दामिनी देह।

तूँ राजति घनस्याम सौं, राधे सरिस सनेह॥

सोने की बेल तमाल वृक्ष से और बादल से बिजली का शरीर जिस प्रकार शोभित होता है, हे राधिका! सदृश स्नेह के कारण तू वैसे ही घनश्याम से शोभित होती है। भाव यह है कि तमाल वृक्ष, बादल और कृष्ण, इन तीनों श्याम वर्ण वालों से स्वर्णलता, बिजली और राधिका ये तीनों गौर वर्ण वाली अत्यंत सुशोभित होती हैं।

मतिराम

जुवति जोन्ह मैं मिलि गई, नैंक होति लखाइ।

सौंधे कैं डोरैं लगी अली, चली सँग जाइ॥

अभिसार के लिए एक नायिका अपनी सखी के साथ चाँदनी रात में जा रही है। आसमान से चाँदनी की वर्षा हो रही है और धरती पर नायिका के शरीर का रंग भी चाँदनी की तरह उज्ज्वल और गोरा है। ऐसी स्थिति में नायिका का शरीर चाँदनी में लीन हो गया है। सखी विस्मय में पड़ गई है कि नायिका कहाँ है? ऐसी स्थिति में वह केवल नायिका के शरीर की गंध के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए बिहारी कह रहे हैं कि नायिका अपने गौर और स्वच्छ वर्ण के कारण चाँदनी में विलीन हो गई है। उसका स्वतंत्र और पृथक् अस्तित्व दिखलाई नहीं दे रहा है। यही कारण है कि उसके साथ चलने वाली सखी नायिका के शरीर से आने वाली पद्म गंध का सहारा लेकर साथ-साथ चली जा रही है।

बिहारी

जमला एक परब्ब छवि, चंद मधे विविचंद।

ता मध्ये होय नीकसे, केहर चढ़े गयंद॥

एक अवसर पर यह दिखाई पड़ा कि चाँद के बीच दो चाँद हैं और इसी बीच हाथी पर चढ़ा हुआ एक सिंह निकला। गूढ़ अभिप्राय यह है कि नायिका के चंद्र-मुख पर जो दो नेत्र शोभित हैं, उनमें नायक के चंद्र-मुख का प्रतिबिंब पड़ रहा है इस प्रकार नायिका के चंद्र-मुख में दो चंद्र और दीख पड़े। नायिका वहाँ से हटी तो हाथी के समान उसकी जाँघों पर सिंह की-सी पतली कमर को देखकर कवि ने इस दृश्य को गूढ़ार्थ में अंकित किया।

जमाल

गोरी-मुह-निज्जिअउ बद्दलि लुक्कु मियंकु।

अन्नु वि जो परिहविय-तणु सो किवँ भवइँ निसंकु॥

देख! गोरी के मुँह (की सुंदरता) से पराजित होकर चंद्रमा बादल में छिप गया। और जो कोई हारे हुए तन वाला है वह निःशंक कैसे भ्रमण कर सकता है!

हेमचंद्र

राते पट बिच कुच-कलस, लसत मनोहर आब।

भरे गुलाब सराब सौं, मनौ मनोज नबाब॥

विक्रम

नील वसन दरसत दुरत, गोरी गोरे गात।

मनौ घटा छन रुचि छटा, घन उघरत छपि जात॥

विक्रम

कुंभ उच्च कुच सिव बने, मुक्तमाल सिर गंग।

नखछत ससि सोहै खरो, भस्म खौरि भरि अंग॥

जसवंत सिंह
  • संबंधित विषय : देह

मुग्धा तन त्रिबली बनी, रोमावलि के संग।

डोरी गहि बैरी मनौ, अब ही चढ़यो अनंग॥

जसवंत सिंह
  • संबंधित विषय : देह

ऐसी आजु कहा भई, मो गति पलटे हाल।

जंघ जुगल थहरत चलत, डरति बिसूरति बाल॥

कृपाराम

सेत कंचुकी कुचन पै, लसत मिही चित चोर।

सोहत सुरसरि धार जनु, गिरि सुमेर जुग और॥

विक्रम

सुनियत कटि सुच्छम निपट, निकट देखत नैन।

देह भए यों जानिये, ज्यों रसना में बैन॥

रसलीन
  • संबंधित विषय : देह

तरल तरौना पर लसत, बिथुरे सुथरे केस।

मनौ सघन तमतौम नै, लीनो दाब दिनेस॥

विक्रम
  • संबंधित विषय : केश

कहँ मिसरी कहँ ऊख रस, नहीं पियूष समान।

कलाकंद-कतरा कहा, तुव अधरा-रस-पान॥

विक्रम

तन सुबरन के कसत यो, लसत पूतरी स्याम।

मनौ नगीना फटिक में, जरी कसौटी काम॥

रसलीन
  • संबंधित विषय : आँख

उठि जोबन में तुव कुचन, मों मन मार्यो धाय।

एक पंथ दुई ठगन ते, कैसे कै बिच जाय॥

रसलीन
  • संबंधित विषय : देह

गोरे मुख पर तिल लसत मेटत है दुख द्वंद।

मानहु बेटा भानु को रह्यो गोद लै चंद॥

मुबारक

अति सुढार अति ही बड़े, पानिप भरे अनूप।

नाक मुकत नैनानि सौं, होड़ परि इहिं रूप॥

इस सुंदरी के नाक के आभूषण के मोती और नैनों में मानो होड़-सी लग गई है, क्योंकि दोनों ही सुंदर, अनुपम और कांति से परिपूर्ण हैं। मोती भी सुंदर है आँखें भी। मोती भी सुडौल है, आँखें भी वैसी ही हैं। अत: मानों दोनों में होड़-सी लगी है कि कौन किस से सुंदर है।

मतिराम

सब जगु पेरत तिलन को, थके इहि हेंरी।

तुव कपोल के एक तिल, डार्यो सब जग पेरि॥

रसलीन

मोर-मोर मुख लेत है, ज़ोर-ज़ोर दृग देत।

तोर-तोर तर लाज कौ, चोर-चोर चित लेत॥

विक्रम

गोरे मुख पर तिल लसे ताहि करौ परनाम।

मानहु चंद बिछाइकै बैठे सालिगराम॥

मुबारक

विधि कपोल टिकिया करी, तहँ तिल धरो बनाय।

यह मन छधित फकीर ज्यों, रहैं टकटकी लाय॥

मुबारक

ससि सौं अति सुंदर मुष, अंग सुंदर जान।

प्रीतम रहे बस भयौ, ऐसो प्रेम प्रधान॥

दौलत कवि

ऐसे बड़े बिहार सों, भागनि बचि-बचि जाय।

सोभा ही के भार सों, बलि कटि लचि-लचि जाय॥

रामसहाय दास
  • संबंधित विषय : देह

कढ़ि सर तें द्रुत दै गई, दृगनि देह-दुति चौंध।

बरसत बादर-बीच जनु, गई बीजुरी कौंध॥

दुलारेलाल भार्गव
  • संबंधित विषय : आँख

मोरि-मोरि मुख लेत है, नहिं हेरत इहि ओर।

कुच कठोर उर पर बसत, तातै हियो कठोर॥

विक्रम

झीनें अंबर झलमलति, उरजनि-छबि छितराइ।

रजत-रजनि जुग चंद-दुति, अंबर तें छिति छाइ॥

दुलारेलाल भार्गव

तिय निहात जल अलक ते, चुवत नयन की कोर।

मनु खंजन मुख देत अहि, अमृत पोंछि निचोर॥

मुबारक
  • संबंधित विषय : केश

झलकनि अधरनि अरुन मैं, दसननि की यौं होति।

हरि सुरंग घन बीच ज्यौं, दमकति दामिनि जोति॥

रामसहाय दास

छूटो चंदन भाल तें, अलक ऊपर छबि देत।

डसी उलटि मनु नागिनी उदर बिराजत सेत॥

मुबारक

लोललोचनी कंठ लखि, संख समुद के सोत।

अरु उड़ि कानन कों गए, केकी गोल कपोत॥

रामसहाय दास

मुकुत-हार हरि कै हियैं, मरकत मनिमय होत।

पुनि पावत रुचि राधिका, मुख मुसक्यानि उदोत॥

श्रीकृष्ण के हृदय पर पड़ा हुआ सफ़ेद मोतियों का हार भी उनके शरीर की श्याम कांति से मरकत मणि-नीलम-के हार के समान दिखाई देता है। किंतु राधा के मुख की मुस्कराहट की श्वेत-कांति से नीलम का-सा बना हुआ वह मोतियों का हार फिर श्वेत-वर्ण कांति वाला बन जाता है।

मतिराम

सोहत गोल कपोल पर, हृद रद-छद-छबि वेस।

जनु कंचन के नगन में, मानिक जढ़े सुदेस॥

विक्रम

ललन कृसन की अरुनई, जुरि अधरन मैं आइ।

कामिनि के तन की दमक, दामिनि मैं दरसाइ॥

रामसहाय दास

रीझ लैन पिय पैं चली, लिय सषिगन कौं गैल।

चहूँ ओर मुखचंद की, रही चाँदनी फैल॥

दौलत कवि

अंग-अंग-नग जगमगत दीप-सिखा सी देह।

दिया बढाऐं हूँ रहै बड़ौ उज्यारौ गेह॥

दूती नायक से कह रही है कि देखो, नायिका की देह आभूषणों में जड़े हुए नगों से दीप-शिखा के समान दीपित हो रही है। घर में यदि दीपक बुझा दिया जाता है तब भी उस नायिका के रूप के प्रभाव से चारों ओर प्रकाश बना रहता है। दूती ने यहाँ नायिका के वर्ण-सौंदर्य के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व में उदित होने वाली शोभा, दीप्ति और कांति आदि की अतिशयता को भी व्यक्त कर दिया है।

बिहारी

अपने अँग के जानि कै जोबन-नृपति प्रवीन।

स्तन, मन, नैन, नितंब कौ बड़ौ इजाफा कीन॥

यौवन रूपी प्रवीण राजा ने नायिका के चार अंगों पर अपना अधिकार कर लिया है। उन अंगों को अपना मानते हुए अपनी सेना के चार अंग स्वीकार कर उनकी वृद्धि कर दी है। ऐसा उसने इसलिए किया है कि वे सभी अंग उसके वश में रहे। ये चार अंग यौवन रूपी राजा की चतुरंगिणी सेना के प्रतीक हैं। ये अंग हैं−स्तन, मन, नेत्र और नितंब। स्वाभाविक बात यह है कि जब यौवनागम होता है तब स्वाभाविक रूप से शरीर के इन अंगों में वृद्धि होती है। जिस प्रकार कोई राजा अपने सहायकों को अपना मानकर उनकी पदोन्नति कर देता है, उसी प्रकार यौवनरूपी राजा ने स्तन, मन, नेत्र और नितंब को अपना मान लिया है या अपना पक्षधर या अपने ही अंग मानते हुए इनमें स्वाभाविक वृद्धि कर दी है।

बिहारी

कटि सों मद रति बेनि अलि, चखसि बड़ाई धारि।

कुच से बच अखि ओठ भों, मग गति मतिहि बिसारि॥

हे सखी! यदि तू अपने प्रिय से मान करती है तो अपनी कटि के समान क्षीण (मान) कर, यदि प्रीति करती है तो अपनी चोटी के समान दीर्घ (प्रीति) कर, अगर बड़प्पन धारण करती है तो अपने नेत्रों-सा विशाल कर। पर अपने कुचों के समान कठोर (वचन), ओठों के समान नेत्रों की ललाई (क्रोध), भृकुटी के समान कुटिल (मार्ग पर गमन) और अपनी गति के समान (चंचल) मति को सदा के लिए त्याग दे।

दयाराम

अमी हलाहल मद भरे, सेत स्याम रतनार।

जियत-मरत झुकि-झुकि परत, जिहि चितवन इकबार॥

रसलीन
  • संबंधित विषय : आँख

पत्रा ही तिथि पाइयै वा घर कैं चहुँ पास।

नितप्रति पून्यौईं रहै आनन-ओप-उजास॥

नायिका के घर के चारों ओर इतना प्रकाश रहता है कि केवल पंचांग की सहायता से ही तिथि का पता लग सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि नायिका का मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर है। इसलिए नायिका के घर के चारों ओर हमेशा पूर्णिमा ही बनी रहती है, परिणाम स्वरूप तिथि की जानकारी ही नहीं हो पाती है। यदि कोई तिथि जानना चाहता है तो उसके लिए उसे पंचांग से ही सहायता लेनी पडती है।

बिहारी

कटाछ नोक चुभी कियों, गडे उरोज कठोर।

कें कटि छोटी में हितू, रुची नंदकिशोर॥

हे सखी! प्रिय के कहीं मेरे कटाक्षों की नोक तो नहीं चुभ गई है? कहीं मेरे कठोर उरोज तो उनके नहीं गड़ गए हैं? अथवा मेरी कटि ही छोटी है जिसके कारण मैं नंदकिशोर को पसंद नहीं आई, बात क्या है?

दयाराम

मंगल बिंदु सुरंगु, मुखु ससि केसरि आड़ गुरु।

इक नारी लहि संगु, रसमय किय लोचन-जगत॥

नायिका के मुख पर लाल बिंदु तथा केसर की पीली आड़ देखकर नायक को आँखें प्रेम से परिपूर्ण हो जाती हैं। वह अपनी दशा को नायिका की सखी से स्पष्ट कर रहा है। नायक कहता है कि नायिका का मुख चंद्रमा के समान है। उसके मस्तक पर लगा हुआ रोली का बिंदु मंगल है और केसर का तिरछा तिलक बृहस्पति है। इन तीनों ने एक ही राशि पाकर संपूर्ण जगत के नेत्रों को जलमय अर्थात् रसमय कर डाला है। कहने का तात्पर्य यह है कि नायिका के सौंदर्य को देखने से दर्शकों के नेत्रों में आनंद के आँसू जाते हैं और देखने से दुःख के। जिस प्रकार से तीन ग्रहों−चंद्रमा, मंगल और बृहस्पति के मिलने से जल-वृष्टि होती है और समस्त संसार जलमग्न हो जाता है उसी प्रकार नायक से नायिका के मुख में लाल बिंदी एवं केसर का टीका लगाने से नायक के नेत्र स्नेह-सिक्त हो जाते हैं। भाव यह है कि उसके नेत्रों में बरबस प्रेम उमड़ आता है।

बिहारी

झीनैं पट मैं झुलमुली झलकति ओप अपार।

सुरतरु की मनु सिंधु मैं लसति सपल्लव डार॥

झीने आवरण में लिपटी हुई नायिका के सौंदर्य पर मुग्ध नायक कह रहा है कि महीन वस्त्रों के अंदर से नायिका के शरीर की कांति इस प्रकार झिलमिलाती हुई शोभा दे रही है मानो समुद्र के अंदर कल्पवृक्ष की कोई डाली पत्तों सहित झिलमिलाती हुई दिखाई पड़ रही हो।

बिहारी

चितई ललचौहैं चखनु डटि घूँघट-पट माँह।

छल सौं चली छुवाइ कै छिनकु छबीली छाँह॥

नायक कह रहा है कि नायिका ने मुझे घूँघट में से ललचाई हुई आँखों से निर्मिमेष दृष्टि से देखा। इसके पश्चात् वह किसी बहाने से अपनी छबीली छांह का स्पर्श कराकर चली गई। ऐसा करके नायिका ने अपने रूप का स्पर्शाभास दिया है। उस स्पर्शाभास से मुझे परम सुख प्राप्त हुआ है। व्यंजना यह है कि जब उस स्पर्शाभास से मुझे सुख प्राप्त हुआ है तो मेरा मन अब पूर्ण स्पर्श-सुख प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो उठा है।

बिहारी

सनि-कज्जल चख-झख-लगन उपज्यौ सुदिन सनेहु।

क्यौं नृपति ह्वै भोगवै लहि सुदेसु सबु देहु॥

सखी नायिका से कह रही है कि काजल रूपी शनिग्रह के नेत्र रूपी मीन राशि में स्थित होने से शुभ मुहुर्त में जो स्नेह रूपी शिशु उत्पन्न हुआ है, वह राजा होकर संपूर्ण शरीर रूपी सुदंर प्रदेश को क्यों नहीं भोगेगा? कहने का तात्पर्य यह है कि वह अवश्य भोगेगा। तुम्हारे स्नेह ने उसके सर्वांगों पर अधिकार जमा लिया है। इस दोहे में सखी अपनी चाक्-चातुरी द्वारा नायिका के हृदय में नायक के प्रति प्रेम उत्पन्न करने का प्रयास करती है। यह दोहा बिहारी के ज्योतिष ज्ञान का प्रतीक है। कहा जाता है कि शनि ग्रह जब मीन राशि में हो उस समय जिस शिशु का जन्म होता है वह शिशु ज्योतिष के अनुसार कीर्तिमान राजा होता है। सखी ने यही कहा है कि हे नायिका, तुम्हारे नेत्र मछली को तरह हैं। (मीन राशि) उनमें लगा हुआ काजल शनि ग्रह जैसा है। ऐसे नेत्रों से जब तुमने नायक की ओर देखा तो उसके हृदय में स्नेह रूपी शिशु उत्पन्न हो गया। ऐसे मुहूर्त में उत्पन्न शिशु प्रसिद्ध राजा होता है, अतः तुम्हारा स्नेह भी प्रसिद्ध और स्थाई होगा।

बिहारी

ससि, खंजण, माणक, कँवल, कीर बदन एक डाल।

भवंग पुँछ तें डसत है, निरखत डर्यो जमाल॥

एक ही डाल पर मैंने चन्द्रमा, खंजन, मोती, कमल, कीर, शुक आदि को देखा। उसमें लिपटा एक सर्प पूँछ की ओर से डसता था, यह सब देखकर तो मैं भयभीत हो उठा। कूटार्थ यह है कि वह स्त्री (डाल) अपने हाथ (कमल) पर अपना मुँह रखे थी। उसके नेत्र खंजन के समान थे। दंतावली मोती के समान उज्ज्वल और नासिका शुक की चोंच की तरह नुकीली और उसकी वेणी नागिन सी थी।

जमाल

सोना बया नीपजै, मोती लगै डाल।

रूप उधारा नां मिले, भूलै फिरौ जमाल॥

सोना बोने से उपजता नहीं, मोती किसी डाल में नहीं फलता, रूप (लावण्य) कहीं से उधार नहीं मिल सकता; इनको प्राप्त करने के हेतु भ्रमवश भटकना नहीं चाहिए।

जमाल

सकल क्षत्रपति बस किये, अपणे ही बल बाल।

सबल कुँ अबला कहै, मूरख लोग जमाल॥

सुंदर स्त्री अपने लावण्य के बल पर बड़े-बड़े महाराजाओं को वश में कर लेती है। इतने पर भी इस प्रकार की सबला (स्त्री) को अबला कहना, अज्ञानियों का काम है।

जमाल