पत्र : प्रकाश के साक्षी सेबास्टिओं सालगाडो के नाम
संदीप रावत
17 फरवरी 2026
प्रिय सेबास्टिओं,
प्रेरणा के अमिट स्रोत
शांति और सामंजस्य के दूत
विविधता के उपासक, प्रकृति के अद्भुत सहचर
आज से 12 साल पहले मेरे एक फ़ोटोग्राफ़र मित्र अमन ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था। एक बार तुम्हारी खींची हुई श्वेत-श्याम तस्वीरें देख लेने के बाद मेरे लिए उनको भूलना असंभव था। 12 वर्ष पूर्व देखी गईं तस्वीरों का प्रभाव आज भी मुझपर है। न जाने कितनी बार तुम्हारी तस्वीरों की तरफ़ फिर-फिर लौटा हूँ। किसी से बात करते हुए जब भी फ़ोटोग्राफ़ी शब्द आता है तो तुम्हारा नाम भी संग-संग आता है और उनका नाम भी जिनका काम तुम्हें पसंद था।
तुम मेरे जन्म से एक वर्ष पहले मेरे देश भारत आए, फिर दुबारा आए तो मैं शायद पाँच वर्ष का हो चुका था और आज तुम यह पृथ्वी छोड़कर चले गए। तुम उस स्वर्ग को पीछे छोड़ गए जो तुमने खोजा था। तुम्हारी आत्मा इस पृथ्वी के विराट रहस्यमयी सौंदर्य के साथ-साथ यहाँ के खंडहरों, शरणार्थियों, शिविरों, मज़दूरों, कटते जंगलों, अंधी खदानों,भूख से मरते लोगों के दृश्यों से मिले ज़ख्मों को भी अपने साथ ले गई।
तुम्हारी ‘वर्कर्स’, ‘आर्कियोलोज़ी ऑफ़ इंडस्ट्रियल एज’, ‘माइग्रेशंस’ और ‘जेनेसिस’ जैसी गंभीर, भावपूर्ण, मार्मिक तस्वीरों की शृंखलाएँ अविस्मरणीय हैं। इस पृथ्वी पर मनुष्य तथा जीव-जंतुओं के अस्तित्व को, उनके आवास को, उनकी कठोर तथा विविध परिस्थितियों को, संघर्ष को, अतुलनीय सुंदरता को, दृष्टि से अक्सर छिपे रहने वाले संसार को बहुत गहराई और करुणा के साथ प्रस्तुत करती हुई तुम्हारी ये फ़ोटो शृंखलाएँ किसी भी महाकाव्य से कम नहीं हैं। ऐसा लगता है जैसे चीज़ों के भीतर का प्रकाश तुम्हारा पीछा करता है। ऐसा लगता है जैसे तुम अंधकार में प्रकाश को जन्मते हुए देख रहे हो।
पिछले वर्ष जब मैं अमिताभ घोष की पुस्तक ‘महापर्वत’ पढ़ रहा था, तब पढ़ते हुए मेरे मन में, ब्राज़ील की सेरा पेलादा गोल्ड-माइन की तुम्हारी वे झकझोर देने वाली ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें भी चल रही थी और तुम्हारी ‘जेनेसिस’ भी जिसे तुम अपना पवित्र प्रेमपूर्ण स्वप्न कहते हो। मैंने दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों को वो कहानी और तुम्हारी तस्वीरें दिखाईं। मुझे एक छात्रा का अवाक् चेहरा और आँखें याद हैं, जब मैंने तुम्हारी कुछ तस्वीरों को उसके आगे रखा था।
तुम्हारी आठ-दस तस्वीरें ही उस एक किताब के बराबर हैं जो किताब पर्यावरण, औद्योगिकरण, मानव श्रम और विस्थापन पर लिखी हो, जो शरणार्थियों, आदिवासियों की भूमि छीने जाने पर तथा पृथ्वी की भव्यता और उसकी नाज़ुकी पर लिखी गई हो।
जैसा कि तुम हमेशा चाहते थे सेबास्टिओं कि तुम्हारी तस्वीरें दुनिया में हो रही घटनाओं पर चर्चा को जन्म दें सो मैंने दो बच्चों के साथ इन घटनाओं पर चर्चा के बीज बोये। इससे पहले भी हम दोस्तों ने चर्चाएँ कीं और तुम्हारी तस्वीरों में झाँका, तुम्हारी तस्वीरों में आईने की तरह झाँका, तुम्हारी तस्वीरों को हमने अपने वर्तमान अतीत और भविष्य की तरह देखा, बुरे सपनों की तरह देखा, रास्तों की तरह देखा, विरोध की तरह देखा, अनसुनी आवाज़ की तरह देखा। कुछ को देखा संगीत, प्रकाश, प्रार्थना और स्वर्ग की तरह।
सेबास्टिओं, तुम्हारे क्लोज़अप्स मुझे मज़दूरों, शरणार्थियों, आदिवासियों और जीव-जंतुओं के हृदय में ले गए। उनकी चुप्पियों में ले गए। उनके संघर्षों की कहानियों में ले गए।
मैंने अपने भीतर एक इगुआना, एक एलिफ़ेंट सील, एक पक्षी और एक आदिवासी की आँखें महसूस कीं। वे आँखें मेरे भीतर फैलते शहर की ओर निराशा और हताशा से देख रही थीं, वे आँखें मेरे भीतर बसे हिमालय की ओर बड़ी अबोधता और भरोसे से निहार रही थीं। मुझे अपने कंधे पर इगुआना का दोस्ती भरा, छोटे-छोटे शल्कों से ढका पंजा महसूस हुआ। मुझे अपनी आत्मा में आदिवासियों का नृत्य महसूस हुआ। विशाल भू-दृश्य मेरे सपनों में आते रहे।
अपने संवेदनशील, निर्भीक और तटस्थ लेंस से तुमने मुझे हिंसा, क्रूरता, लोभ और भूखमरी के दानव भी दिखाए और साथ ही पत्थरों, पहाड़ों, वर्षा वनों के हृदय की अछूती गुफ़ाएँ भी। प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन व्यतीत करने के दृश्य दिखातीं तुम्हारी तस्वीरों ने मेरे भीतर विस्मय के साथ-साथ करुणा को भी जन्म दिया। अस्तित्व की विविधता के प्रति अपार श्रधा को जन्म दिया।
कभी-कभी मैं कल्पना किया करता हूँ सेबास्टिओं, कि दृश्य को क़ैद करने के क्षण तुम्हारी उपस्थिति उन जगहों पर कैसी रही होगी। अजनबियों के बीच तुम किस तरह प्रवेश करते होगे? कैसे सामना करते होगे?
जिस तरह कविता को पंक्तियों के बीच पढ़ा जाता है, उसी तरह मैं तुम्हारी तस्वीरों के आस-पास के अदृश्य को देखने की कोशिश करता हूँ और सोचता हूँ कि उन खदान मज़दूरों के बीच तुम कैसा महसूस कर रहे थे? तुमने मज़दूरों के गीत सुने होंगे, संघर्ष में डूबे किसी मज़ाक़िये और क़िस्सागो मज़दूर की आँखों को देखा होगा। उनके क्या सपने थे? उनके ईष्टदेव कौन थे? सोने तथा कोयले की उन खदानों ने कितनों को निगल डाला? कोयले पुते मज़दूरों के मुखड़े, ऑइल फ़ील्ड में धँसे आदमी, खदानों में चींटी की कतार सरीखे चढ़ते-उतरते मज़दूर... क्या उनके सामने एक पल को तुम ठिठके खड़े रह गए थे? क्या किसी मज़दूर ने तुमसे कभी मालिकों की शिकायत की? वे कौन-सी तस्वीरें थीं जिन्हें खींचने से तुमको रोका गया?
हज़ारों वर्ष पूर्व के शिकारियों ने अपने पहाड़ और पेड़ जैसे देवताओं का लयबद्ध आवाह्न करते हुए, क्या तुम्हें अपने सम्मोहन में वैसे ही क़ैद नहीं किया जैसे तुम क्षणों को क़ैद करते हो? क्या तुमने किसी आदिवासी स्त्री को अपने बच्चे को लोरी सुनाते देखा या सुना? क्या उनके पंखों वाले मुकुट तुम्हारे सपने में आए? तुम किन-किन नदियों में अपनी कश्तियाँ ले गए? कहाँ-कहाँ तुम्हारे भीतर नृत्य फूटा? कौन-सी तस्वीरें तुम्हारे लिए सब से कठिन रहीं? कितनी तरह के प्रकाश में तुमने तस्वीरें खिंची? मनुष्यों की आंतरिक पीड़ा को प्रकट होने के लिए कितना प्रकाश और कितना अंधकार चाहिए? किन तस्वीरों में बादलों ने तुम्हारी मदद की? कब डूबते सूरज की किरणें तुमको दूर तक खींच कर ले गईं।
वे कौन से क्षणिक दृश्य रहे जिनके सामने तुम अपना नाम और काम भूल गए? वे दृश्य कौन से थे, जिनसे तुम्हारी आँख में आँसू छलक उठे? किन दृश्यों ने तुम्हें आंतरिक शक्ति और प्रेरणा दी सेबास्टिओं? वे रेगिस्तान, वे ऊँचे स्वर्गीय झरने, जानवरों की आँखें, मालिक का विद्रोह करता एक मज़दूर, प्रवास करते प्राणियों के विशालकाय झुंड, भूखे लोगों की जिजीविषा या शामन जनजातियों का स्वर्ग? कौन-सी छवियाँ तुम्हारे मन में बरसों तक छपी रहीं? अपनी इन यात्राओं में किन दृश्यों ने तुम्हें घृणा और क्रोध से भरा? क्या-क्या देख तुम्हें बहुत हताशा और निराशा हुई?
मैं जानता हूँ मानवीय हिंसा, क्रूरता और भयानक त्रासदियों के दृश्यों पर काम करते हुए जब तुम बिल्कुल टूट गए और अंततः बीमार हो गए थे। तब तुम प्रकृति की तरफ़ मुड़े। पेंग्विंस, पक्षियों, हिरणों, बैलों के विशाल समूहों के दृश्य ने, कल्पना से लंबी नदियों ने तुम्हें गहरे विस्मय, आस्था और करुणा भरे मौन से भर दिया। अलास्का के फैले भूदृश्य पर बरसते अलौकिक प्रकाश तले क्या तुमने कोई कविता भी लिखी सेबास्टिओं? तुम्हें कब और कहाँ बचपन की पढ़ी हुई कविताएँ याद आईं?
अमेज़न की वे आदिवासी जनजातियाँ जहाँ तुम 48 बार गए, काश वहाँ के क़िस्से मैं तुमसे सुन पाता।
यकीनन तुम्हारी तस्वीरें सिर्फ़ विनाश, अमानवीयता और विस्थापन की पीड़ा की ही नहीं हैं। वे तस्वीरें केवल एंथ्रोपोसिन के पर्यावरण पर पड़ते कुप्रभाव की ही नहीं बल्कि पृथ्वी के विविधतामय अस्तित्व के हृदय की भी हैं—एक बारीक, साँस लेता एक पारिस्थितिक तंत्र।
तुम जानते थे कि मनुष्य जब सौंदर्य देखता है तो उसके मन में उस सौंदर्य की रक्षा करने का, उसका सम्मान करने का भाव भी सहज ही जन्म ले लेता है। अपनी जन्मभूमि में तुमने अपनी पत्नी के साथ बीस साल तक निरंतर वृक्षारोपण करके जिस सुंदर अभ्यारण्य को जन्म दिया है, वह तुम्हारी सबसे विशाल तस्वीर है सेबास्टिओं। एक ऐसी जीवंत तस्वीर जो अब कई प्राणियों का आवास है और इस जंगल के रहवासी पशु-पक्षी-हवा-धूप-पानी, उस तस्वीर को—पृथ्वी की जो तस्वीर तुम्हारे मन में है उसे—और विस्तार देते रहेंगे।
हम तुम्हारी मृत्यु को नहीं तुम्हारे जीवन को सदा याद रखेंगे सबेस्टिओं।
तुम्हारा
संदीप
•
धरती के अछूते हिस्सों का प्रकाश
[ब्राज़ील के महान् फ़ोटोकार सेबेस्तिओं सालगाडो को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित। यह रचना उनकी फ़ोटो-शृंखलाओं, साक्षात्कार और उनपर बनी डोक्युमेंट्री से प्रेरित है।]
कोई सड़क नहीं थी उसके बचपन के इर्द-गिर्द
प्रकृति के सामूहिक गान में लीन असंख्य आत्माएँ
वर्षा वनों के प्राचीन पेड़ मेघमालाओं की भव्य रचनाप्रक्रिया में डूबे,
संतुष्टि की जड़ें हर हृदय को अपनी गोद में भरे हुए
खेत, नदी, नक्षत्र और हर पर्वत को घेरे
कांतियाँ क़िस्से-कहानियों की
और एक बच्चे की लयबद्ध खुली आत्मा पर
जन्मभूमि की एक अविस्मरणीय गहरी छाप जिसे ताउम्र
लेकर भटकता खोजता रहता
जन्मभूमि से उखड़ा हुआ वह फूल
पहाड़ से टूटा हुआ वह पत्थर।
जलधाराओं, खेतों और नीलाकाश बिना उसकी किताबें नींदें समय दुख और सुख
पेड़ों चरागाहों और सितारों के पथों के बिना उसकी किताबें नींदें समय दुख और सुख
सैकड़ों करवटों रास्तों सीढ़ियों और सिक्कों के बाद अचानक एक दिन
‘लेलिया’ लेकर आई तुम्हारे लिए प्रकाश
और अंधकार को पढ़ने वाली वह मशीन जिससे पहली बार
खिड़की से आती धूप और अपने प्रेम को क़ैद किया तुमने... धूप और ‘लेलिया’...
फिर आईं लंबी यात्राएँ और भी लंबी होती हुई
तुम्हारे पैरों से घुँघरू-सा छनकता भूगोल
रास्तों के बाद रास्ते
आँखों के बाद आँखें और पैरों के बाद पैर
संस्कृतियों के बाद संस्कृतियाँ
मज़दूरों के बाद मज़दूर
मृतकों के बाद और मृतक
और अंत में
आरंभ जैसी अनछुई पृथ्वी के बाद और भी अनछुई पृथ्वी
मगर प्रकृति के अछूतेपन की रोशनी से पहले
तुम्हारी आत्मा को भीतर तक जकड़ लिया इतिहास की भयानक त्रासदियों के विशाल दृश्यों ने
नक़्शों से खदेड़ी हुई मातृभूमियाँ
विस्थापन की बंजर ज़मीन पर उगते
असंख्य ज़ख्मों के तंबू, दीवारें, सीमाएँ
और उजड़े आंगनों जैसे लोगों के मुखड़े
रेत धूल अनिद्रा थकान भूख और उम्मीद से भरी आँखें
और कहीं-कहीं एक अदृश्य सहनशीलता,
एक गरिमा
किसानों और मज़दूरों के शरीरों से छलकती हुई
जिनके बीच तुम उपस्थित रहे करुणा के साथ और
उन्होंने खोले अपने हृदय
और प्रस्तुत किया ख़ुद को तुम्हारे कैमरे से निकलती किरणों के आगे
दक्षिणी अमेरिका के सुदूर गाँव में एक पुजारी
तुम्हें ले गया ‘ईश्वर’ शब्द के साथ
रेशों की तरह एकदूजे के क़रीब रहने वाले किसानों
और जनजातियों के बीच
तीन हज़ार मीटर ऊँचा वो आनंद अविस्मरणीय
और सरगुरोस नाम का वह गहरे कुएँ-सा आदमी जिसकी संगत में बेहद धीरे चलता था समय
सोचने की एक अलग ही शैली दे गया तुम्हें वह—मेघ जैसा मनुष्य
मगर आह! साहेल की सूखी हुई नदियाँ
और सेरा पेलाडा की सोने की अंधी खदानें
उपनिवेशों और बाज़ारों का अंतहीन शोषण
हर जगह खंडहरों मृतकों बंदूक़ों और हिंसाओं को जन्म देता हुआ
अमेरिका और यूरोप के बाज़ारों का न भरने वाला पेट
प्रकाश में लेकर आये तुम
प्रकाश में लेकर आये तुम अँधेरे के अछूते हिस्से
कोयले, मिट्टी, तेल धुएँ और सीमेंट में सना हुआ
शोर और धमाकों में धंसा हुआ मानव
अपमानित और असहाय मानवश्रम के भूदृश्य
शिक्षा की असमानता के विशाल भूदृश्य
रोटी की असमानता के विशाल भूदृश्य
भूमि की असमानता के विशाल भूदृश्य
प्रकाश में लेकर आए तुम
भूख-प्यास से बुझती आँखें
तेल के कुओं से उठती आग और धुएँ के भयानक विषैले बादल
और हर जगह कंधों और सिरों पर पोटलियों जैसे घर
भटकते हुए असहाय
जलवायु परिवर्तन से बनते-बसते अकाल के विशाल निर्मम भूदृश्यों पर
एक छोटी-सी लौ बनकर उतरा
तुम्हारे कैमरे का प्रकाश सदियों के अँधेरों में
बहुत कुछ जो नहीं आ सकता था शब्दों में आख़िर आया प्रकाश में
न जाने कितने प्रकाश और कितने अंधकार की ज़रूरत होती है मानव त्रासदियों को स्पष्ट रूप से प्रकट होने के लिए
न जाने कितनी उखड़ी हुई जड़ों के भू-दृश्य चाहिए होते हैं सरकारों और तानाशाहों को
कितना दुःखद है घृणा और हिंसा को फैलते हुए देखना
गर्वीले किसानों वनवासियों बंजारों की टोलियों को
तंबुओं की शरणों में
पेड़ों की छायाओं को याद करते उनके बच्चे
वे नन्हे बीज जिनकी जड़ों से छीन ली गई मिट्टी
और आँखों के आगे
युद्ध क्षेत्रों के बाद जन्मते और युद्ध क्षेत्र
फ़ौजी छावनियों और उपनिवेशों के पदचिह्नों से बने खंडहर
और उन खंडहरों में छिपे हुए
युद्धों में धकेले जाने से बचे कुछ बच्चे
हर तरफ़ से पृथ्वी की आत्मा पर त्रासदियों का आक्रमण
और एक सन्नाटा
मरती हुई मातृभाषाओं के सीनों से चिपटी लोरियों के सूखे कंठों से उठता हुआ
और आत्मा मुर्झाती हुई फूल और किरण के साथ
नदी के साथ सूखती हुई
ढहती हुई पहाड़ के साथ
और गिद्ध की सी तेज़ी से उतरता हुआ पृथ्वी के दिल में इक सन्नाटा जैसे प्रेमिकाएँ देखती हैं युद्ध के बाद अपने मृत वीरों के मुखड़े
लंबा वक़्त लेती है पीड़ाएँ प्रकाश में आने में
लंबा वक़्त लेती हैं लोककथाएँ अपना मर्म प्रकट करने में
लंबा वक़्त लेती हैं विस्थापितों की राहें वापस मुड़ने में
जन्मभूमियाँ घाव बन चुकी होती हैं तबतक
भीड़ हो चुका होता है इंसान अपनी ज़मीनों अपने समंदरों और खेतों के बिना
अपने मौसमी फूलों और फलों के बिना खो देता है वह अपने होने का उत्सव
सो जाता है संगीत पशुधन के बग़ैर
अपने सूर्योदय और चाँद रातों से दूर उम्र भी तो घटती जाती है उसकी
और लंबे वक़्त तक शिविरों और सड़कों पर जड़-विहीन भटकन
जिसके बाद जूतों रोटियों
दवाइयों क़मीज़ों और कुछ किताबों के लिए
विज्ञापनों से भरे शहरों की तरफ़ भागती है भीड़
मगर स्कूलों की कौन-सी किताबों के कौन-से पाठों ने हमें याद दिलाया है लौटना
हर तरफ़ प्रतिनिधित्व करता एक बाज़ारू शोर और उसके हाथों की कठपुतलियाँ
आह! वैश्वीकरण का फैलता यह कैंसर
निगल गया मेरे तुम्हारे पहाड़ों और मैदानों को
निगल गया सवालों को इसका शोर
सभी दिशाओं में बजरी उड़ाता हुआ
निगल गया हर स्थान के किसानों को
मेक्सिको का वो छोटे मोती-सा चमकता समूह
जहाँ हर किसी के पास संगीत की दौलत थी
गीतों से जिनके झरता था एक शुद्ध मानवीय प्रकाश और आभा संतुष्टि की
लंबी दूरी के धावकों का प्राचीन गाँव
अब कहीं नहीं है आत्माओं की वो विविधताऐं
अब दृश्य में खंडहर हर तरफ़ से आते हुए
हर तरफ़ घृणा की समानता के विशाल भू-दृश्य
सीमेंट की समानता के विशाल भू-दृश्य
एक जैसी कहानियों अनुभवों के विशाल भू-दृश्य
अकेलेपन, अवसाद और अ-संवेदनशीलता की समानता के विशाल भू-दृश्य
एक जैसी गाड़ियों वस्त्रों जूतों और कमरों में क़ैद हो चुके क़ैदियों के विशाल भूदृश्य
ओह! पृथ्वी की आत्मा पर इतने गहरे सैकड़ों घाव
खरोंचों का लंबा स्याह पेचीदा इतिहास
इस अँधेरे के बहुत भीतर भी आख़िर
चली आती है बचपन की तरफ़ से एक प्राचीन अंतःप्रेरणा धुली हुई
अपने साथ लिए हुए
जंगलों के आगे जंगल
जलधाराओं के आगे और जलधाराएँ
पर्वतों के बाद और पर्वत
घेर लेते हैं आकर आत्मा की चोटों को
घेर लेती हैं पशु-पक्षियों की अछूती दुनियाएँ आत्मा को
पहाड़ और पेड़ जैसे देवताओं का लयबद्ध सामूहिक आह्वान
भीतर के आगे और भीतर
आरंभ के बाद और आरंभ
विस्मय के आगे और विस्मय में ले जाते हुए
एकांत के कोमल, करुणा भरे प्रकाश में
धरती ने दिखाए तुम्हें अपने अ-छूते हिस्से
भव्य वर्षा वनों के हृदय की गुफ़ाएँ
सागर में तैरते क़दीम गिरिजाघरों जैसे धवल हिमखंड
और विकास यात्रा में समय की गहराइयों से उपजा
इगुआना का वो पंजा
हमारे हाथों की समानताओं को
सह-अस्तित्व के प्रकाश में लाता हुआ
प्रेम करुणा शांति और आरम्भ के प्रकाश में लाता हुआ
लाता हुआ प्रकाश में प्रकाश के कुछ और रंग
तुम्हारी आत्मा के सामने
जो कुछ उनके भीतर था उसे अपने मुखड़े पर लेकर आए पेड़ पहाड़ पानी बादल बर्फ़ और जानवर
सुदूर अछूते वन-प्रदेशों में हरे स्वर्ग की झलकियाँ
सितारे चलते हैं जहाँ मातृसत्ताओं की प्राचीन धुरियों पर
पंखों, जड़ों और कोमलताओं के रेशों से बने
सपनों जैसे मुकुट और मुकुट जैसे गीत और मंत्रोचार
घनी लोरियों और गीतों के भीतर बसी हुई पशु-पक्षियों के रंगों और कीटों की आत्माएँ
स्वर्गीय झरने निश्छल आँखें और जड़ें ही जड़ें
तुम्हारी आत्मा के गिर्द
तुम्हारी आत्मा के गिर्द अब
नहीं है कोई सड़क
केवल अदृश्य पथ हैं पक्षियों के
केवल है पवित्रता और रहस्य का विस्तार
अंतहीन...
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