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पास्ट लाइव्स : जो था, जो है और जो रह जाएगा

साल 2023 में आई हुई एक दक्षिण कोरियाई फ़िल्म है—पास्ट लाइव्स। कोरियाई मूल की कनाडाई निर्देशक सेलीन सॉंग की इस फ़िल्म का बहुत नाम सुना। अनगिनत सिने-फ़ाइल्स यूट्यूब चैनलों, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक अकाउंटों पर इस फ़िल्म के स्क्रीनशॉट और दृश्य लहरा रहे थे। आख़िरकार यह फ़िल्म देख ली गई। ख़ूबसूरत फ़िल्म है।

कहानी कुछ इस प्रकार है—एक लड़की ना यंग और एक लड़का हाय संग है। उन्हें युगल कहना अनुचित होगा। मित्र कहना भी। क़रीब 12 वर्ष की उम्र तक दोनों सियोल शहर में साथ पढ़ते हैं। लड़की के माता-पिता संपन्न हैं। इसी कारण वह दक्षिण कोरिया छोड़कर कनाडा प्रवासित हो जाते हैं। लड़की अपना कोरियाई नाम बदलकर अँग्रेज़ी नाम नोरा रख लेती है। कहानी आगे बढ़ती है। कोरिया छोड़ने के 12 वर्ष बाद अब नोरा लेखन के अपने व्यावसायिक जीवन के लिए कनाडा से अमरीका के न्यूयॉर्क में जाकर रहने लगी है। एक रोज़ नोरा हाय संग से फ़ेसबुक के माध्यम से पुनः जुड़ जाती है। दोनों 12 वर्ष के इस विगत समय की स्मृतियाँ साझा करते हैं। निकटता बढ़ती है। आख़िर में नोरा उस लड़के से यह कहकर कुछ रोज़ के लिए संपर्क बंद कर देती है कि वह अपने काम पर ध्यान नहीं दे पा रही है। कुछ दिन के लिए बंद हुआ संपर्क खिंचकर 12 वर्ष का हो जाता है। इस बीच नोरा एक श्वेत अमरीकी लेखक से मिलती है। दोनों विवाह करके न्यूयॉर्क में ही रहने लगते हैं। ख़बर मिलती है कि हाय संग अमरीका घूमने आ रहा है। पर सत्यता आधे-पौने रूप में सभी को मालूम है कि वह नोरा से ही मिलने आ रहा है। वे लोग मिलते हैं। न्यूयॉर्क घूमते हैं। आख़िर में भावुक विदा लेते हैं। फ़िल्म नोरा के अपने पति के आलिंगन में फूट-फूटकर रोने के साथ समाप्त हो जाती है।

फ़िल्म मानवीय जीवन के कई पहलुओं को स्पर्श करती है। स्नेह, समर्पण, अभिलाषा, त्याग, प्रवास, नियति, पूर्व-पश्चिम के जीवन का द्वंद्व, संबंधों की जटिलता, स्मृति से मुक्त होने की अक्षमता आदि। इन सबके अतिरिक्त फ़िल्म एक और महत्त्वपूर्ण विचार को संबोधित करती है। इसे फ़िल्म में ‘ईन यन’ कहा गया है। असल में फ़िल्म इसी विचार के इर्द-गिर्द घूमती है। यहीं से फ़िल्म का नाम आया है। नोरा अपने पति आर्थर को बताती है कि कोरियाई लोग मानते हैं कि यदि दो लोग जीवन में एक-दूसरे से मिलते हैं तो वे किसी पिछले जीवन में एक-दूसरे से परिचित थे। यह मिलना रास्ते में चलते हुए एक-दूसरे के कपड़े रगड़ने की बारीकी तक जाता है। यानि कि रास्ते में किसी अपरिचित से कपड़े रगड़ने मात्र से यह बात उजागर होती है कि वह अपरिचित किसी पूर्वजन्म में परिचित था। यदि दो व्यक्ति एक-दूसरे से विवाह करते हैं तो यह पिछले आठ हज़ार जन्मों की ‘ईन यन’ की आठ हज़ार तहों का परिणाम होता है।

ईन यन—की यह कोरियाई मान्यता; जिसे नियति या भाग्य के रूप में समझा जा सकता है, असल में बौद्ध दर्शन से आया है। बौद्ध दर्शन में एक सिद्धांत है—प्रतीत्यसमुत्पाद। सरल शब्दों में कहें तो पारस्परिक निर्भरता। यानि किसी वस्तु के अस्तित्व का आधार, किसी अन्य वस्तु के अस्तित्व का होना। किसी वस्तु की अनुपस्थिति, किसी अन्य वस्तु की अनुपस्थिति के लिए उत्तरदायी।

हमारे कर्म हमें कहीं लाते हैं। इस जन्म के भी और पूर्वजन्मों के भी। हम जहाँ हैं, वो पूर्वनिर्धारित है—परंतु कर्म पर ही आधारित है। यह जीव का वृहत्तर संसार में पृथक न होकर बल्कि उस संसार का ही एक अंग होने की प्रस्तुति है। उसके कर्म समस्त संसार को प्रभावित कर रहे हैं और समस्त संसार के कर्म उसे प्रभावित कर रहे हैं।

प्राच्य दर्शनों में हर जगह इस कोटि के सिद्धांत उपस्थित हैं। भारत में नियतिवाद पर पर्याप्त काम हुआ है। एक बारगी को यह सब देखने पर मात्र खोखला नियतिवाद प्रतीत होता है। परंतु चाहे गीता हो, या मानस हो, या कोई अन्य पुस्तक, एक ओर नियति के पूर्वसंकल्पित होने की बात कहते हैं; वहीं दूसरी ओर कर्म की प्रासंगिकता पर भी निरंतर बोलते हैं। सत्य यह है कि पूर्व के दार्शनिक सिद्धांतों में नियति की संकल्पना कर्म के बाद की ही है। दूसरे शब्दों में, अपने काम निपटाकर परिणाम की स्वीकृति की। जो किया सो किया। जो करना था, सो कर दिया। अब जो परिणाम सम्मुख है, उसे सहर्ष स्वीकार करने की।

इसी सहर्ष स्वीकृति से फ़िल्म पर पुनः वापसी होती है। फ़िल्म में नोरा से उसका पति एक स्थान पर कहता है कि हमारी कहानी बहुत बोरिंग है। हम दोनों एक राइटर्स रेजिडेंसी में मिले, इसीलिए साथ सो गए क्योंकि दोनों अकेले थे, साथ इसीलिए रहने लगे ताकि किराया बच सके। तुमने मुझसे शादी इसीलिए कर ली ताकि तुम्हें ग्रीन कार्ड मिल सके। वह आगे प्रश्न करता है कि यदि वह किसी और व्यक्ति से मिलती जो न्यूयॉर्क का एक लेखक ही होता, जिसने वो सारी किताबें पढ़ रखीं होती और वो सारी फ़िल्में देख रखीं होती जो नोरा ने पढ़-देख रखीं हैं तो क्या वह उसके साथ होती? मुझे लगता है इस फ़िल्म का सबसे महत्त्वपूर्ण संवाद यही है। नोरा या हाय संग के मुँह से नहीं बल्कि आर्थर के मुँह से।

आर्थर सहर्ष स्वीकृति से वंचित है। परंतु तब भी उसका संशय स्वाभाविक है, बेहद मानवीय। वह जानता है कि साढ़े पाँच करोड़ कोरियाई लोगों में से हाय संग को विस्थापित नहीं किया जा सकता। परंतु उसकी जगह कोई और नोरा को मिला होता तो शायद वह विस्थापित हो सकता था। उसे नोरा के जीवन में अपनी उपस्थिति की प्रगाढ़ता से संशय है। हम अक्सर अपने प्रिय की दृष्टि से स्वयं को देखना चाहते हैं। आकलन करना चाहते हैं। इसी कारण हम प्रायः कमज़ोर होते हैं। कदाचित इसी कारण हमें सतत आश्वासन की आवश्यकता होती है।

आर्थर के चरित्र में जिस चीज़ की कमी है, वह वही है—नियति की सहर्ष स्वीकृति। हो सकता है कि नोरा और आर्थर की कहानी बहुत रोमांचक, बहुत सनसनीखेज़ न हो; परंतु है तो ठोस। तत्क्षण तो नोरा उसी के साथ है। भले ही वो आठ हज़ार जन्मों का परिणाम न हो। नोरा यहाँ अधिक परिपक्व प्रतीत होती है। वह आर्थर के संशय से भरे प्रश्नों के उत्तर में कहती है कि जीवन ऐसे नहीं काम करता। सत्य है। जीवन चिरकालीन संशय में नहीं बिताया जाता। न ये सोचते हुए कि यूँ होता तो क्या होता? जीवन की ऊर्जा इस दिशा में केंद्रित होनी चाहिए कि जो उपस्थित है, जो प्राप्त है, उसमें कितनी संतुष्टि है?

नोरा की यह परिपक्वता हाय संग के समक्ष भी प्रकट होती है। जब वह उससे कहती है कि 12 वर्ष की जिस लड़की को वह जानता था, वह यहाँ नहीं है। वह यहाँ नहीं से यह सिद्ध नहीं होता कि वह कभी थी नहीं। वह मिथ्या हो जाएगी। वह तुम्हारे साथ वहीं सियोल में छूट गई थी। सत्य है। एक मनुष्य एक जीवन में एक नहीं, कई जीवन जीता है। एक ही जीवन में उसे लगता है, जैसे वह कई पिछली ज़िंदगियों की स्मृति भोग रहा है। इसीलिए मनुष्य को अपने किए प्रेम पर प्रायश्चित नहीं होना चाहिए। लोग बदल जाते हैं। इससे यह सिद्ध नहीं होता है, उनके प्रति किया गया प्रेम अनर्गल हो जाएगा। जिस प्रेम की सीमा जितनी थी, उसे उतना भी सँजो के रखा जा सकता है।

बहरहाल, हाय संग भी अपनी परिपक्वता प्रकट करता है। नोरा के यह कहने पर उसे शांति से सहर्ष स्वीकार करता है। वह आर्थर को भी अपने ईन यन में सम्मिलित करता है। नियति की पारस्परिक निर्भरता में। अपनी पास्ट लाइव्स में।

फ़िल्म आख़िर तक आते एक तनाव को खींचती है। आर्थर, नोरा, हाय संग और दर्शकों का तनाव; जो नोरा के रोने से टूट जाता है। आख़िर में सबको यह आशा प्राप्त होती है कि भले ही जीवन मक्खन जैसा न हो। भले ही सबको सब कुछ प्राप्त न हो। परंतु अपने प्राप्त के साथ समन्वय बिठा लिया जाएगा। उसी से संतुष्ट हुआ जाएगा। कदाचित यही है जिसे फ़्रेदरिक नीत्शे ने आमोर फ़ाटी [Amor Fati] कहा है। कदाचित सब पहले ही निर्धारित हो। कदाचित सब कर्म ही हो। हमें खोजते रहना होगा। प्रयास तो करते ही रहना होगा।

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आशीष कुमार शर्मा को और पढ़िए : प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के ‘परफ़ेक्ट डेज़’झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना | बारहमासी के फूल | विश्वविद्यालय के प्रेत | ‘गुनाहों का देवता’ से ‘रेत की मछली’ तक | जीवन को धुआँ-धुआँ करतीं रील्स

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