रविवासरीय 4.0 : सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़
अविनाश मिश्र
15 मार्च 2026
• एक ख़ाकसार मनुष्य के एक ख़ाकसार पुल पर एक ख़ाकसार उपन्यासकार से गए सोमवार टकराना हुआ। ख़ाकसार उपन्यासकार काफ़ी लोकप्रिय पुकारे जाते हैं। वह इतने ज़्यादा ख़ाकसार और लोकप्रिय हैं कि चेतन भगत और अमीश त्रिपाठी उनसे थोड़ी-सी ख़ाक और लोकप्रियता गाहे-ब-गाहे उधार माँगने आया करते हैं।
• ‘लोकप्रिय’—जिसे ‘गंभीर’ के पहले सामान्यतः ‘बनाम’ लगाकर बरता जाता है—का इस्तेमाल ‘साहित्य’ के साथ करने वालों को यह बहुत गंभीरता से समझना चाहिए कि ‘साहित्य’ शब्द का प्रयोग ही सब कुछ स्पष्ट करने को काफ़ी है।
यहाँ लोकप्रियता के साथ एक सपाट समस्या यह है कि वह तुलनाएँ करना नहीं जानती है। वह सब बार बहुत खट-खप चुके तुलनाशास्त्र में ख़ुद को ग़र्क़ कर देती है। उसके मसाले बहुत पुराने होते हैं। उनमें न महक होती है, न तासीर। उनसे कुछ भी कारआमद और लज़्ज़तदार पकाया नहीं जा सकता, पर पकाया जाता है... क्योंकि सब चीज़ों के कहीं न कहीं बाज़ार और कहीं न कहीं कुछ लेने वाले हैं। बाज़ार जब उठ जाता है; तब भी वहाँ बहुत कुछ इस प्रकार का पड़ा रहता है, जिससे बहुतों का गुज़ारा चलता है।
इंटरनेट, अनलिमिटेड 5G और OTT वग़ैरा के बाद लोकप्रिय उपन्यास वग़ैरा का बाज़ार अब पहले जैसा नहीं रह गया है। अब इस तरह के चालू उपन्यास केवल इसलिए मुमकिन हो रहे हैं कि वे बेहद बदतर हिंदी सिनेमा की शर्तों के अनुसार कहीं इस्तेमाल हो सकें। इस ग़म ने ही ख़ाकसार उपन्यासकार को क्षतिग्रस्त कर रखा है। वह हिंदी साहित्य-असाहित्य के गंभीर-अगंभीर सब प्रकाशकों की धूल फाँक रहे हैं और जहाँ पाँच सौ रुपये भी ऊपर मिल रहे हैं, वहाँ अपनी आत्मकथा या कॉन्सपिरेसी वग़ैरा बेच दे रहे हैं। तिस पर ताने वह हिंदी के उन बेहतर कवियों-लेखकों को दे रहे हैं जो अपने इस्तेमाल की वजह, तरीक़ा और मानदेय पूछकर आगे बढ़ना चाहते हैं। ख़ाकसार उपन्यासकार उनकी तुलना एक सेक्सवर्कर के काम से कर रहे हैं, जबकि ख़ाकसार को—एक सेक्सवर्कर और एक लेखक—दोनों ही के काम की जटिलताओं, तकलीफ़ों और मजबूरियों का चंदा इल्म नहीं है।
• आज के समय की लोकप्रियता सिनेमा से एक सौ साल और साहित्य से एक हज़ार साल पीछे है। इस अर्थ में लोकप्रियता इस्तेमाल करने की चीज़ है और गंभीरता धारण करने की।
• ख़ाकसार उपन्यासकार यह स्वीकार करते हैं कि उनका प्रेरणा में कोई यक़ीन नहीं है :
हज़रात, लेखक को अपनी ज़िंदगी में दो ही काम होते हैं—या लिखता है या लिखने लायक़ सोचता है। इसमें प्रेरणा का क्या रोल है? सिवाय इसके कि काम न करने का इज़्ज़तदार बहाना है। नल खोलो तो पानी बहता है। प्रेरणा आके नल नहीं खोलती।
अपनी सरकारी मुलाज़मत के दौर में आपका ख़ादिम मजबूरन संडे राइटर था। प्रेरणा के सम्मान में मैं एक इतवार चूक जाता था तो लेखन में दो हफ़्ते का गैप आ जाता था। प्रेरणा फिर जलवाअफ़रोज़ होना भूल जाती थी तो तीन हफ़्ते का, चार हफ़्ते का। कैसे मैं प्रेरणा के हिलाए ही लिखना अफ़ोर्ड कर सकता था। सच पूछें तो ये लग्ज़री सिर्फ़ बड़े लेखकों के हिस्से में आती है जो एक पुस्तक लिखते हैं तो प्रेरणा की सत्ता के वशीभूत पाँच साल कुछ लिखना ज़रूरी नहीं समझते, महज़ एक किताब की आन-बान-शान की धूप सेंकते हैं।
यहाँ ख़ाकसार उपन्यासकार को यह समझना चाहिए कि साहित्य-सृजन के लिए प्रेरणा अनिवार्य है, साहित्य-उत्पादन के लिए नहीं। ख़ाकसार उपन्यासकार ने प्रेरणावंचित उपन्यास-उत्पादन के लिए ही सरकारी मुलाज़मत नहीं छोड़ी, क्योंकि एक सुरक्षित जीवन साहित्य-उत्पादन के लिए अनिवार्य है, साहित्य-सृजन के लिए नहीं।
प्रेरणा के अभाव में कल्पना का अभाव समाया रहता है। कल्पना के अभाव में विचारशीलता का अभाव समाया रहता है। विचारशीलता के अभाव में दर्शन का अभाव समाया रहता है। इतने सारे अभावों के बाद उपन्यास के नाम पर शेष बचती है लुगदी, भले ही उपन्यास स्टोरा 60 GSM पर क्यों न छपा हुआ हो।
• सस्ते पाश्चात्य साहित्य के लोकप्रिय लेखक लुइस लामूर से एक बार एक इंटरव्यू में पूछा गया कि वह इस तथ्य के पीछे छिपा हुआ अर्थ बताएँ कि उनकी सैकड़ों पुस्तकों में से किसी में भी खलनायक कभी भी पहली गोली से नहीं मरा।
इंटरव्यू करने वाले ने सोचा था कि इसके पीछे ज़रूर कोई बहुत बड़ी बात होगी।
पर उपन्यासकार का जवाब था, ‘‘क्योंकि उन दिनों हमें शब्दों के हिसाब से पैसे मिलते थे।”
• ‘हम साहित्य में क्यों आते हैं?’ ख़ाकसार उपन्यासकार के पास इस प्रश्न का एक ही उत्तर होता है—माल कमाने! वह मंडी का मिज़ाज देखकर लिखता है, वहीं पहुँचता है, वहीं पुजता है और मानता है कि जो लिखता है; वो लेखक होता है। इस बयान के पीछे लिखने का तवील तजुर्बा है और अगर पढ़ने में सहलाने-सी कोई चीज़ होती हो तो ख़ाकसार ने अपने लेखन से अब तक यही किया है। उन्होंने पाठकों को भौंकने नहीं दिया है।
• ख़ाकसार उपन्यासकार के उपन्यास कल्पनानुगामी नहीं होते हैं। वे सस्ती सूचनाओं, पास-पड़ोस से सुनी-उड़ाई गई बातों-कहानियों और ख़राब सिनेमा से असरअंदाज़ होते हैं। वे देखने में कितने ही चहलपहलदार क्यों न नज़र आएँ; वे दीर्घकालव्यापी कभी नहीं हो सकते, चाहे कोर्स में ही क्यों न लग जाएँ!
• ख़ाकसार उपन्यासकार आजकल ख़ाकसार और विनोद कुमार शुक्ल एक साथ होना चाहते हैं। उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि मुख्यधारा के गंभीर और श्रेष्ठतम हिंदी साहित्य में भी इस प्रकार के लेखक हैं जिन्होंने अमरत्व और रॉयल्टी का एक साथ वरण किया है। ये ख़ाकसार बेचारे चूक गए! अब पछताए होत क्या... ना कोई बैरी, ना कोई बेगाना... हम नहीं चंगे, बुरा न कोय... निंदक नियरे राखिए... पानी केरा बुदबुदा... एक सीस का मानवा... पैंसठ लाख की डकैती... एक करोड़ का जूता... एक ही अंजाम...
• ख़ाकसार उपन्यासकार कथा शुरू करने से पूर्व भूमिका में मैंमियाते हैं। इस मैंमियाहट में पाठक का ही नहीं, पाठकों का भी का पतन नज़र आता है—अगर वे सच में अस्तित्व रखते हों तो; वैसे रखते ही होंगे, क्योंकि ख़ाकसार उपन्यासकार के व्यक्तित्व और कृतित्व में कल्पना की क्या स्थिति है, इसका वर्णन-ओ-विश्लेषण यहाँ यथास्थान हो चुका है।
• ख़ाकसार उपन्यासकार के गद्य में पाठ की यातनाएँ नहीं, पाठ की सनसनी होती है। यह गद्य अब तक हो चुके गद्य को नए आईने नहीं देता। यह हृदयहारी नहीं होता। यह न ठीक से हँसा सकता है, न ठीक से रुला सकता है, न ठीक से बदल सकता है। इस प्रकार का गद्य मानसिक अभ्यास को व्यर्थ करता है। इस प्रकार का गद्य पाठक को सतही बनाता है। इस प्रकार का गद्य सुरुचि का सर्वनाश करता है।
• ख़ाकसार उपन्यासकार टीका-टिप्पणियों में क़िस्से-कहानियाँ दर्ज करना पसंद करते हैं, इसलिए इस प्रसंग का अंत एक क़िस्से से ही करना मुनासिब रहेगा। यह क़िस्सा कामंदक के नीतिसार, सोमदेव सूरि के नीतिवाक्यामृतम्, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, महाभारत के शांतिपर्व, राजानक महिमाचार्य के व्यक्तिविवेक, मनुस्मृति के सातवें खंड और हर्षचरितम् के सातवें अध्याय में नहीं मिलेगा; इसके लिए ‘सूफ़ीनामा’ देखना होगा। ख़ैर, क़िस्सा यह है :
एक बार हज़रत शाह अज़ीज़ अहमद इलाहाबादी से मिलने चाँद साहब उनकी ख़ानक़ाह में पटना से तशरीफ़ लाए। उन्होंने देखा कि हज़रत के बग़ीचे में बड़े-बड़े अमरूद लगे हुए हैं। चाँद साहब ने हज़रत से अर्ज़ किया, ‘‘इलाहबाद के अमरूद तो बड़े प्रसिद्ध हैं। लोगों का कहना है कि इनकी मिठास की बराबरी देश के किसी प्रांत में उगने वाला अमरूद नहीं कर सकता।’’ यह सारी बड़ाई इसलिए की गई कि जाते समय हज़रत उन्हें तोहफ़े में कुछ अमरूद दे दें... लेकिन इस पर हज़रत शाह अज़ीज़ अहमद इलाहाबादी ने फ़रमाया, ‘‘अगर आप इतनी तारीफ़ कर रहे हैं तो ठीक है, जाते वक़्त इन अमरूदों के कुछ बीज लेते जाइएगा!’’
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