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रविवासरीय 4.0 : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’

रविवासरीय की तीसरी ऋतु की समाप्ति [27 अप्रैल 2025] और चौथी ऋतु की शुरुआत [1 मार्च 2026] के बीच की सारी सूचियाँ आ चुकी हैं। सारे मेले निपट चुके हैं। मेले की सारी किताबें आ चुकी हैं। नामचीन-प्राचीन-प्रभाहीन सारे साहित्योत्सव/लिट्-फ़ेस्ट् और उन पर चर्चा ख़त्म हो चुकी है। भविष्य के सारे स्वर सुने जा चुके हैं। आदि-इत्यादि-तूतियादि सारे पुरस्कार दिए-लिए-लौटाए-नकारे-फेंके जा चुके हैं या स्थगित या रद्द किए जा चुके हैं। अनंत विजय और अन्य भगवों के मार्ग पर चलकर अचूक-अद्भुत अवसरवादी अंजुम शर्मा ‘संसार’ [रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह] में बतौर श्रोता आमंत्रित बीस हज़ारिया बँधुओं के बहाने अशोक वाजपेयी के विरुद्ध क्षणभंगुर माहौल बना चुके हैं। इस वातावरण में अब आश्चर्यजनक ढंग से वाम-आम-संतरे सब एकजुट होकर अशोक वाजपेयी की श्रोता-ख़रीद पर पक्ष-विपक्ष में मुखर हैं या चुप हैं या मज़े ले चुके हैं। अट्ठाईस दिन में उनतीस कविताएँ हो चुकी हैं। युद्ध प्रारंभ हो चुका है। अब आप अविनाश मिश्र से आगे के समाचार सुनिए।

• आक्रामकता के तत्काल बाद विनम्रता का प्रदर्शन धूर्तता को प्रकाशित करता है।

• अरचनात्मक रूप से आक्रामक या रक्षात्मक दोनों ही प्रकार की टिप्पणियों में नाम लिए बग़ैर बात करने का बहुशः बहुत अर्थ नहीं होता। दस देशों से आए तेरह कवियों वाले कथित अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह—‘संसार’—में आवेदन करवाकर श्रोता ख़रीदने के प्रसंग पर अशोक वाजपेयी के बचाव में आई ज़्यादातर टिप्पणियाँ इस प्रकार की ही थीं। इस प्रकार से यह होता ही है कि अशोक-समर्थक भी ख़ुश और [अंततः] अशोक-विरोधी भी ख़ुश।

• इस संसार में वैसे इस वक़्त अशोक-समर्थकों से ज़्यादा दयनीय, करुण और हास्यप्रद अन्य कोई नहीं है। वे बहुत सदिच्छापूर्ण मूर्खता के साथ उस ‘संसार’ का गुणगान कर रहे हैं, जिसमें आमंत्रित तेरह में से महज़ आठ ‘संसार’-कवि ही ‘अशोक-सभा’ [इंडिया इंटरनेशनल सेंटर] पहुँच पाए हैं। ये आठों भी अत्यंत सामान्य कोटि के कवि-लेखक-कलाकार हैं और कहीं से भी समकालीन अंतरराष्ट्रीय/विश्व कविता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। यह सब कुछ वैसे ही है जैसे इन्हें बुलाने वाले, इन्हें सुनने के लिए पहुँचने वाले या न पहुँचकर भी इनके समर्थन में जुटे हिंदी के महाMediocre [अशोक वाजपेयी के ही अनुसार] समकालीन हिंदी साहित्य का प्रतिनिधित्व करने की हैसियत नहीं रखते हैं, लेकिन फिर भी बाहैसियत पेरिस आदि आते-जाते रहते हैं।

दरअस्ल, यह सब कुछ एक कुटीर-स्तर की आनंदोत्सुक अंतरराष्ट्रीय साहित्याभासी सौदेबाज़ी का सैंपल है। वगरना यह क्यों है कि इस इतने सूक्ष्म ‘संसार’ का तनिक विरोध होते ही इसके हिस्से में दो-चार रोज़ में जितनी व्यापक सराहना, समर्थनप्रियता, पोस्टरबाज़ी आई है; आठ-दस वर्षों से सतत कोलकाता में चेयर पोएट्री इवनिंग्स [अंतरराष्ट्रीय कविता उत्सव] कर रहे तुषार धवल और सॉनेट मंडल के हिस्से अब तक नहीं आई है!

वस्तुतः इसके पीछे वह अंकगणित है जिससे रज़ा फ़ाउंडेशन हिंदी के महाMediocre चरित्रों को बार-बार और बेशुमार भिन्न-भिन्न प्रकार के लाभ पहुँचा सकता है। इसकी एवज़ में वह माँगता भी क्या है—कभी-कभार समर्थन, जन्मदिन पर पोस्ट और अवसरानुकूल पोस्टरबाज़ी... बस्स!

केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं

केवल अशोक सिर झुकाए हुए है
और सब
विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल अशोक के कानों में
चीख़ गूँज रही है और सब
हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं
केवल अशोक
लड़ रहा था।

— श्रीकांत वर्मा

• एक वर्ष बीतने में जब दस-ग्यारह रोज़ शेष रह जाते हैं, तब हिंदी साहित्य से संबंधित सालाना सर्वे आने शुरू हो जाते हैं। ये सर्वे आने में जब दस-ग्यारह से भी कम रोज़ शेष रह जाते हैं, तब इस बारे में सोचने और इस पूरी प्रक्रिया में उतरने के लिए उससे भी कम रोज़ शेष रह जाते हैं। शेष जब अशेष हो जाता है, तब ये सर्वे भरपूर नज़र आने शुरू हो जाते हैं। इस आगमन में सर्वेकर्ता उन किताबों को इस साल की उपलब्धि बताते हैं, जिन्हें पढ़ना तो दूर उन्होंने हाथ में लेकर भी नहीं देखा होता।

इस संसार में सर्वेकर्ताओं के लिए किताबें अब हाथ में लेने की चीज़ नहीं रह गई हैं। इसके बावजूद उनका प्रताप देखिए कि उन्होंने सारा रचनात्मक हिंदी साहित्य या इधर के पच्चीस-छब्बीस सालों का सारा कथेतर पढ़ लिया है। वे बेहद आराम से इस साल आई किसी किताब को अब तक आई सभी किताबों में सबसे आकर्षक, विलक्षण और शक्तिशाली बता देते हैं। वे उन किताबों को भी कालजयी या सालजयी या स्टॉलजयी घोषित कर देते हैं, जो साप्ताहिक या दैनिक या क्षणिक महत्त्व की भी नहीं हैं।

‘‘हिंदी साहित्य में नई सोच का अभाव दिखाई देता है।’’
‘‘हिंदी के लेखक अब पहले जैसी प्रभावशीलता नहीं रखते।’’
‘‘हिंदी में शोध और आलोचना का स्तर गिरता जा रहा है।’’
‘‘हिंदी के पाठकों की संख्या लगातार कम हो रही है।’’
‘‘हिंदी साहित्य अब केवल पुरस्कारों तक सिमटकर रह गया है।’’
‘‘हिंदी में प्रयोगधर्मी लेखन बहुत कम हो रहा है।’’
‘‘हिंदी के युवा लेखक सिर्फ़ सोशल मीडिया तक ही सीमित हैं।’’
‘‘हिंदी में गंभीर विषयों पर पर्याप्त लेखन नहीं हो रहा।’’
‘‘हिंदी प्रकाशन-जगत में गुणवत्ता से ज़्यादा बाज़ारवाद हावी है।’’
‘‘हिंदी साहित्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में पीछे है।’’

...वर्ष भर इस प्रकार के बयान सुनने में आते रहते हैं, बावजूद इसके यह इन सर्वेकर्ताओं की दया नहीं तो और क्या है प्रभु कि साल ख़त्म होते-होते हिंदी के अँधेरे में चार चाँद लगाने वाली चार से ज़्यादा किताबें अख़बारों, चैनलों, पत्रिकाओं और वेब-सोशल साइट्स पर झिलमिलाने लगती हैं!

यहाँ आकर कोई भी सोच में पड़ सकता है कि भला यह सब मुमकिन कैसे होता होगा! लेकिन यह सब इतना मुश्किल भी नहीं है। दरअस्ल, हिंदी साहित्य में सर्वे अब एक ऐसा व्यंजन है जिसे कोई भी आसानी से पका सकता है। इसे पकाकर सबको पकाने की विधि यहाँ दस पंक्तियों में बताई जा रही है, देखिए :

~ सबसे पहले अपने नज़दीकी हिंदी-प्रेमी से हिंदी के कुछ प्रकाशकों के नाम पूछिए।

~ इन प्रकाशकों के नंबर निकालिए।

~ इन प्रकाशकों का नंबर मिलाइए।

~ इन प्रकाशकों से पूछिए कि साहित्य-सर्वे हेतु बात करने के लिहाज़ से आपके यहाँ सही व्यक्ति कौन है।

~ सही व्यक्ति से पूछिए कि आप अपने यहाँ से इस वर्ष आई किन किताबों को श्रेष्ठ मानते हैं।

~ सही व्यक्ति द्वारा बताई गई किताबों की एक सूची बनाइए।

~ इसके बाद किसी नज़दीकी लेखक को पकड़िए और उससे इस सूची में से उसकी पसंदीदा किताबें पूछिए।

~ इस नज़दीकी लेखक की समझ पर भरोसा कीजिए।

~ सर्वे तैयार करके जहाँ भेजना हो भेज दीजिए।

~ सर्वे प्रकाशित होते ही फ़ेसबुक/इंस्टाग्राम/एक्स आदि पर कटिंग/इमेज/लिंक आदि में संबंधित व्यक्तियों-लेखकों-मित्रों आदि को टैग/मेंशन/व्हाट्सएप आदि करके परोसिए...

• रचना तत्काल नहीं है।

• संशय से भरी हुई आत्मा ही एक उज्ज्वल वाक्य लिख सकती है।

रविवासरीय की चौथी ऋतु की इस शुरुआत और निकट भविष्य में होने वाली समाप्ति के बीच यहाँ सब तरफ़ एक साथ बहुत कुछ होता रहेगा—जन्मदिन से लेकर मुंडन तक और सुन्नत से लेकर अन्नप्राशन तक और विवाह से लेकर ब्रेकअप-पार्टियों तक और वैवाहिक वर्षगाँठ से लेकर तलाक़-समारोह तक और अंतिम संस्कारों से लेकर शोक-सभाओं तक और शोक-सभाओं से लेकर अशोक-सभाओं तक और कीर्तन से लेकर जागरण तक और स्टैंड-अप कॉमेडी से लेकर ओपन-माइक तक और हास्य कवि-सम्मेलनों-मुशायरों से लेकर निर्द्वंद्व-बेजोड़-अखंड अहमक़ों के वर्चस्व वाले लिट्-फ़ेस्ट् तक और विरोध-प्रदर्शनों से लेकर आंदोलनों तक और चित्र-प्रदर्शनियों से लेकर हस्तशिल्प मेलों तक और घरेलू साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर बेघरेलू असाहित्यिक गोष्ठियों तक और फ़ूड-फ़ेस्टिवल्स से लेकर फ़िल्म-फ़ेस्टिवल्स तक और कार-व्यापार-मेलों से लेकर पुस्तक-मेलों तक और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कविता-संगीत-समारोह से लेकर रंग-महोत्सव तक... यहाँ सब तरफ़ एक साथ बहुत कुछ होता रहेगा—एक अंतवंचित नाटक!

• मैं आगामी भारतीय नव वर्ष में तीन क़समें खाऊँगा, इससे शायद धोखे कम खाऊँ—

~ कुत्तों से दूर रहूँगा।
~ कलाकारों को सिर्फ़ कला में बर्दाश्त करूँगा।
~ क़समें नहीं खाऊँगा।

• अंत में दाग़ :

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूटी क़सम से आपका ईमान तो गया

दिल लेके मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया

डरता हूँ देखकर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया

क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया

देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया

इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं
लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया

गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझको वो मेरे नाम से पहचान तो गया

बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा
गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया

होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ ‘दाग़’ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

•••

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