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वियोग पर उद्धरण

वियोग संयोग के अभाव

या मिलाप न होने की स्थिति और भाव है। शृंगार में यह एक रस की निष्पत्ति का पर्याय है। माना जाता है कि वियोग की दशा तीन प्रकार की होती है—पूर्वराग, मान और प्रवास। प्रस्तुत चयन में वियोग के भाव दर्शाती कविताओं का संकलन किया गया है।

परदेश जाते समय नायक, नायिका के स्तनों और जंघाओं पर स्मृतिस्वरूप जो तीन-चार रेखाएँ खींच देता है, उसे 'स्मारणीयक' नखक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन

प्रिय के प्रवास से प्रिया के प्रेमातुर हृदय में वेदना का उद्भव स्वाभाविक है।

मैनेजर पांडेय

शुद्ध वियोग का दुःख; केवल प्रिय के अलग हो जाने की भावना से उत्पन्न क्षोभ या विषाद है, जिसमें प्रिय के दुःख या कष्ट आदि की कोई भावना नहीं रहती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आत्मोत्सर्ग की पराकाष्ठा वहाँ समझनी चाहिए, जहाँ प्रेमी निराश होकर प्रिय के दर्शन का आग्रह भी छोड़ देता है। इस अवस्था में वह अपने लिए प्रिय से कुछ चाहना छोड़ देता है और उसका प्रेम; इस अविचल कामना के रूप में जाता है कि प्रिय चाहे जहाँ रहे, सुख से रहे—उसका बाल भी बाँका हो।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

राग मिलनेवाली वासना है, और द्वेष अलग करनेवाली।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

स्त्री तभी तक अमृतमय है कि जब तक नेत्र के सामने है, नेत्र से जैसे दूर हुई कि विष से भी अधिक कष्टकारी हो जाती है, अर्थात् विरह से संताप देती है।

भर्तृहरि

कालिदास के काव्य में विरह का संतुलित रूप वर्तमान है। उनका मेघदूत तो पुरूष की विरह-व्याकुल मनोदशा एवं भावोच्छ्वास का ललित निदर्शन हैं।

मैनेजर पांडेय

जुदाई का हर निर्णय संपूर्ण और अंतिम होना चाहिए; पीछे छोड़े हुए सब स्मृति-चिह्नों को मिटा देना चाहिए, और पुलों को नष्ट कर देना चाहिए, किसी भी तरह की वापसी को असंभव बनाने के लिए।

निर्मल वर्मा

प्रेयसी समीप में रहने पर बड़ी प्यारी लगती है। जब वह अलग हो जाती है, तो उसका वियोग बड़ा ही दुःख देता है।

भर्तृहरि

वियोगी रस्सी तुड़ाकर प्रेम के बाड़े के बाहर नहीं भागना चाहता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

नारी के जिस प्रेम, विरह और उसके सौंदर्य को लेकर साहित्य में कितना कुछ लिखा गया है और जाने कितना कुछ लिखना शेष है—उस नारी का प्यार आज टके सेर हो गया है।

विजयदान देथा

मीरा के विरह का रूप प्रधानतः प्रतीक्षा है। जिस प्रियतम के रूप ने उन्हें विह्वल कर रहा है, वह मिलता नहीं।

विश्वनाथ त्रिपाठी

उपासनीय कौन है? जो सरस है सरस कोन है? जो प्रेम का स्थान है। प्रेम क्या है? जिसमें वियोग हो। वह वियोग कौन सा है? जिससे प्रेमी जीवित नहीं रहते।

कवि कर्णपूर

मेघों से व्याप्त आकाश और प्रफुल्लित पृथ्वी, नए-नए अंकुरों पर ओस के जल से पूर्ण तथा नवीन कुटज और कदंब के पुष्पों के समूह की सुंगधित वाले, और मयूरों के झुंड की सुंदर वाणी से रमणीय वन के प्रांतभाग—ये पदार्थ वर्षाऋतु में सुखी और दुःखी पुरुषों को उत्कंठा प्रदान करते हैं।

भर्तृहरि

जब जगत् का वियोग निश्चित है, तब धर्म के लिए परिवार से स्वयं पृथक् हो जाना अवश्य श्रेष्ठ है।

अश्वघोष

पति के परदेश चले जाने पर पत्नी केवल सौभाग्य (सुहाग) के आभूषणों को धारण करे।

वात्स्यायन

संसार में उत्पन्न हुए प्राणियों के आपस में होनेवाले मिलनों का अंत निश्चय ही वियोग में होता है जैसे जल में बुलबुले प्रकट होते हैं और मिट जाते हैं।

वेदव्यास

मीरा की कविताओं में प्रतीक्षापुर आहत नयनों का बहुत चित्रण है।

विश्वनाथ त्रिपाठी

बिरहिन वर्षाऋतु में बहुतायत में पाई जाती हैं।

श्रीलाल शुक्ल

जो जुदाई सबसे ज़्यादा तकलीफ़देह होती है, अक्सर वही बेहतरीन रिश्ते जुड़ने का सबब भी बन जाती है।

साइमन गिलहम

मीरा का काव्य विरहप्रधान है।

विश्वनाथ त्रिपाठी

प्रेम अपनी गहराई को वियोग की घड़ी पहुँचने के पहले तक स्वयं नहीं जानता।

ख़लील जिब्रान

बिछड़ने से और हिस्से पैदा होते हैं।

शम्स तबरेज़ी

हे प्रिय! तू जैसा चाहे वैसा कर। चाहे तो मुझे विरह में रुला चाहे मिलन से प्रसन्न कर दे। मैं तुझसे यह नहीं कहूँगा, कि तू मुझे इस प्रकार रख। वह मनुष्य ही क्या है जो हृदय से इस प्रकार इच्छा करे कि मुझे इस प्रकार रख।

उमर ख़य्याम

वस्त्र, धन, भोजन, यश और विद्या—ये पाँचों जुए में हाथ डालने वाले के पास नहीं आएँगे। वियोग हो।

तिरुवल्लुवर