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वियोग पर उद्धरण

वियोग संयोग के अभाव

या मिलाप न होने की स्थिति और भाव है। शृंगार में यह एक रस की निष्पत्ति का पर्याय है। माना जाता है कि वियोग की दशा तीन प्रकार की होती है—पूर्वराग, मान और प्रवास। प्रस्तुत चयन में वियोग के भाव दर्शाती कविताओं का संकलन किया गया है।

प्रिय के प्रवास से प्रिया के प्रेमातुर हृदय में वेदना का उद्भव स्वाभाविक है।

मैनेजर पांडेय

स्त्री तभी तक अमृतमय है कि जब तक नेत्र के सामने है, नेत्र से जैसे दूर हुई कि विष से भी अधिक कष्टकारी हो जाती है, अर्थात् विरह से संताप देती है।

भर्तृहरि

कालिदास के काव्य में विरह का संतुलित रूप वर्तमान है। उनका मेघदूत तो पुरूष की विरह-व्याकुल मनोदशा एवं भावोच्छ्वास का ललित निदर्शन हैं।

मैनेजर पांडेय

प्रेयसी समीप में रहने पर बड़ी प्यारी लगती है। जब वह अलग हो जाती है, तो उसका वियोग बड़ा ही दुःख देता है।

भर्तृहरि

जुदाई का हर निर्णय संपूर्ण और अंतिम होना चाहिए; पीछे छोड़े हुए सब स्मृति-चिह्नों को मिटा देना चाहिए, और पुलों को नष्ट कर देना चाहिए, किसी भी तरह की वापसी को असंभव बनाने के लिए।

निर्मल वर्मा

नारी के जिस प्रेम, विरह और उसके सौंदर्य को लेकर साहित्य में कितना कुछ लिखा गया है और जाने कितना कुछ लिखना शेष है—उस नारी का प्यार आज टके सेर हो गया है।

विजयदान देथा

उपासनीय कौन है? जो सरस है सरस कोन है? जो प्रेम का स्थान है। प्रेम क्या है? जिसमें वियोग हो। वह वियोग कौन सा है? जिससे प्रेमी जीवित नहीं रहते।

कवि कर्णपूर

मेघों से व्याप्त आकाश और प्रफुल्लित पृथ्वी, नए-नए अंकुरों पर ओस के जल से पूर्ण तथा नवीन कुटज और कदंब के पुष्पों के समूह की सुंगधित वाले, और मयूरों के झुंड की सुंदर वाणी से रमणीय वन के प्रांतभाग—ये पदार्थ वर्षाऋतु में सुखी और दुःखी पुरुषों को उत्कंठा प्रदान करते हैं।

भर्तृहरि

जब जगत् का वियोग निश्चित है, तब धर्म के लिए परिवार से स्वयं पृथक् हो जाना अवश्य श्रेष्ठ है।

अश्वघोष

संसार में उत्पन्न हुए प्राणियों के आपस में होनेवाले मिलनों का अंत निश्चय ही वियोग में होता है जैसे जल में बुलबुले प्रकट होते हैं और मिट जाते हैं।

वेदव्यास

बिरहिन वर्षाऋतु में बहुतायत में पाई जाती हैं।

श्रीलाल शुक्ल

प्रेम अपनी गहराई को वियोग की घड़ी पहुँचने के पहले तक स्वयं नहीं जानता।

ख़लील जिब्रान

बिछड़ने से और हिस्से पैदा होते हैं।

शम्स तबरेज़ी

जो जुदाई सबसे ज़्यादा तकलीफ़देह होती है, अक्सर वही बेहतरीन रिश्ते जुड़ने का सबब भी बन जाती है।

साइमन गिलहम

हे प्रिय! तू जैसा चाहे वैसा कर। चाहे तो मुझे विरह में रुला चाहे मिलन से प्रसन्न कर दे। मैं तुझसे यह नहीं कहूँगा, कि तू मुझे इस प्रकार रख। वह मनुष्य ही क्या है जो हृदय से इस प्रकार इच्छा करे कि मुझे इस प्रकार रख।

उमर ख़य्याम

वस्त्र, धन, भोजन, यश और विद्या—ये पाँचों जुए में हाथ डालने वाले के पास नहीं आएँगे। वियोग हो।

तिरुवल्लुवर