किसी के बारे में सब कुछ जान लेना, उसे फिर से अजनबी बना देता है।
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अँधेरे में संगीत दो व्यक्तियों को कितना पास खींच लाता है!
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एक कलाकृति की सतह; उसकी भाषा के दृश्य-संकेत, उतना ही बड़ा सत्य है—जितनी उसके अर्थ की गहराई। दोनों अभिन्न रूप से कला के सम्मुख सत्य के साथ जुड़े हैं; बिना एक को जाने दूसरे को जानना असंभव है। दरअसल कला का रहस्य दोनों के अंतर्निहित रिश्ते में वास करता है।
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एक कलाकृति जो सत्य हमें सम्प्रेषित करती है, वह अपने में चाहे कितना अद्वितीय और अनूठा क्यों न हो; उसका मूल्य अन्ततः उन रिश्तों में उद्घाटित होता है, जो वह अब तक के हमारे अर्जित किए अनुभूत सत्यों के साथ जोड़ पाती है।
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एक महान आलोचक अपनी संस्कृति का भी आलोचक होता है। वह कलाकृति के स्वायत्त अनुभव को मानवीय संस्कृति की निरंतरता में—जिसे हम परंपरा कहते हैं—उसके भीतर परिभाषित करता है।
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