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शनिवारेर चिट्ठी : डेंटिस्ट का पति और अन्य प्रकरण

पहली सीटिंग

अह, यह कैसी आपद-कथा रही! वहाँ जाना आसान था तो मैं गया। पड़ोस में ज़रूरी चीज़ों की उपस्थिति को हम एक क़िस्म का सामाजिक सौभाग्य ही कहें। पड़ोस था मन में तो मिलते ही उससे कह भी दिया, “पड़ोसी हूँ आपका।” यह वाक्य जैसे ही कहा गया, परिचय की एक स्वीकार्य दूरी कम हो गई थी। वह मुस्कुराई थी। शिष्टाचार वाली मुस्कान। उसमें सहजता थी और आदत। “शुक्रिया, कहें, क्या परेशानी है।” 

वह डेंटिस्ट है। मुझे दाँतों की सफ़ाई करानी थी। मुझे लगता रहा है कि दाँतों की सफ़ाई अपने मुँह के भीतर के इतिहास को सार्वजनिक सेवा में सौंप देने जैसा होता है। और मैं आतंकित था इसलिए। सहज होने की कोशिश करते हुए कह पड़ा, “दाँत साफ़ हों तो आदमी कम-पसंद लोगों की ओर भी बेशी मुस्कुरा सकता है।” वह हँसी। कहूँ, उसने हँसने का निर्णय लिया—यह पहले से तय नहीं था। “और मुँह अधिक खोलकर कविताएँ पढ़ी जा सकती हैं।” वह जान गई होगी कि मैं कविजीव हूँ। मुखर भी। उसने भी कुछ मुखरता दिखाई। फिर हमने कुछ और बातें की। दाँतों के बारे में और जीवन के बारे में। फिर उसने कहा, “चार सीटिंग लगेंगी।” और यह “चार” अचानक समय का एक नया माप बन गया—दिन नहीं, सप्ताह नहीं, चार मुलाक़ातें।

पहली सीटिंग अच्छी रही। वह कुशल थी। उसके हाथों में अपने पेशे का आत्मविश्वास था। ऐसी पेशेवर स्थिरता जो उसके काम के लिए पर्याप्त हो। सब ठीक था। लेकिन सब ठीक होना एक अधूरी भविष्यवाणी है। अगली बार गया तो वहाँ एक नया तत्त्व उपस्थित था। डेंटिस्ट का पति। वह भी डेंटिस्ट। उसकी उपस्थिति किसी सूचना की तरह नहीं आई, पूर्व-घोषित सत्य की तरह आई। उसने अभिवादन नहीं किया, मुस्कुराया भी नहीं। वह जगह अब कुछ बदल गई थी। मैंने कुछ भी नहीं कहा। मैं अक्सर ऐसे क्षणों में कुछ नहीं कहता। संकोच मेरा गुण है और अवगुण भी। मैं कहना चाहता था कि मुझे मेरी डेंटिस्ट दो, लेकिन इस वाक्य में ‘मेरी’ मौजूद था, मेरा वाक्य मेरे भीतर ही विघटित रहा। वह अपने काम में जुट गया था। काम वही—दाँतों की सफ़ाई, लेकिन अब उसमें एक अतिरिक्त तीव्रता थी; जैसे कोई चीज़ केवल साफ़ नहीं की जा रही हो, सिद्ध की जा रही हो कि वह कितनी साफ़ की जा सकती है। प्रकट था कि यह किसी प्रतिस्पर्द्धा का शांत संस्करण था या कोई प्रतिशोध जो बीते दिन की मुखरता के लिए मुझसे लिया जा रहा हो। मेरे होंठ और भीतरी गाल जल रहे थे। उसने बीच-बीच में मेरे दाँतों पर आवारा फ़ब्तियाँ भी कसीं। मेरी डेंटिस्ट बीच-बीच में सकारात्मक टिप्पणियाँ करती हुई, मामले को तनु करती रही। मैं लेटा था, इसलिए दुनिया का कोण थोड़ा असहाय था। इस कोण से व्याख्याएँ हमेशा अधिक तीव्र हो जाती हैं। पैंतालीस मिनटों की मशक़्क़त के बाद डेंटिस्ट के पति डेंटिस्ट ने घोषणा कर दी कि उसने सारे दाँत उच्चतम सीमा तक साफ़ कर दिए हैं और आगे अब किसी और सीटिंग की आवश्यकता नहीं रह गई है। मैंने झूठ-मूठ उसके काम की तारीफ़ की और झूठ-मूठ ही उससे कहा कि दूसरी दंत-सेवाओं के लिए फिर आऊँगा और उसे और पैसे दे जाऊँगा। मुझे अनुमान है कि मेरी डेंटिस्ट जान गई थी कि अब मैं उस राह नहीं आऊँगा। उसने भी हथियार धर दिए। मेरे लौटते; उसने मेरे दाँतों के बारे में कुछ नहीं कहा, जीवन के बारे में भी नहीं। 


दूसरी सीटिंग

कितनी लिजलिजी है यह कवयित्री कैसे स्वर में इनके-उनके सामने रेंकती है ऐसे जैसे इसके पास रीढ़ की हड्डी ही नहीं कि समय के साथ बदली तो ऐसे कैसे कि तन कर खड़ी भी नहीं और यह विनम्रता तो क़तई नहीं यह लिजलिजापन है झुक-झुक यूँ दुहरी हो रही और इसका यह दिखावा दिख रहा मुझे ज़रूर औरों को भी दीखता ही होगा लेकिन मुझे क्या मेरा तो इससे कोई सरोकार नहीं संबंध नहीं कोई बस जानता भर हूँ इसे यहीं यहाँ और मुझे इससे कम उससे अधिक चिढ़ महसूस हो रही (क्योंकि घृणा कुछ कठोर शब्द है) उससे वह जो बगुली-सी लगती रही है मुझे और मैं सौ कवयित्रियों की भी सूची बनाऊँ तो इसे उसमें न लाऊँ कि इसमें इतनी प्रतिभा भी नहीं कि इस सूची में भले ही मैं कुछ फूल-पत्ती कवयित्रियों तक को ले आऊँ इस छूट पर कि वे अपने प्रेमियों और पतियों को गाली बकती हैं अपनी कविताओं में और इस आदमी से तो मुझे ऊब होती है कि कैसा आदमी है कि जिन लोगों ने वाक़ई अच्छा काम किया है या समझ रखते हैं वे भी स्वयं गाल नहीं बजाते और यह किस निर्लज्जता से ख़ुद को आलोचक पर्यावरणविद् इतिहासकार सब पुकार लेता है जबकि इसकी रचनात्मक दिनचर्या दो पंक्तियों वाले ऐसे सस्ते वक्तव्यों में व्यतीत है जैसा मैंने ख़ुद आरंभिक दिनों में किया और आज भी शर्मिंदा होता हूँ और ये बंटी-बबली ये तो प्रतिभाशाली हैं कुछ ये क्यों वहाँ वारियाँ करते हैं और यह वह जिन्हें मैं ठीक समझता था और ये अधिक प्रतिभाशाली नहीं हैं लेकिन फिर भी औसतों की भीड़ से एक ग्राम अलग रखे जा सकते हैं और ठीक है कि मैं पहचान लेता हूँ औसतता को और औसतता अकेली नहीं आती उसके साथ उसका आत्मविश्वास आता है उसका गिरोह आता है उसका पुरस्कार आता है उसकी पारस्परिक प्रशंसाएँ आती हैं उसकी वह अजीब-सी भाषा जिसमें किसी चीज़ के सुंदर होने से पहले यह देख लिया जाता है कि उसे सुंदर कहना उपयोगी होगा या नहीं लेकिन मैं क्यों देख रहा हूँ यह सब कैसी आदिम जिज्ञासा है सड़ाँध की गंध के लिए आमादा मैं क्यों क्यों मैं भीतर ही भीतर तपता हुआ जबकि मेरे पास हैं दुनिया भर के ज़हीन लोग जहाँ कोई किसी की चापलूसी नहीं कर रहा यह दो सौ साल पहले मरा हुआ कवि भी उतनी ही निर्ममता से तुम्हारी आत्मा में उतरता है जितना कल लिखा हुआ कोई वाक्य और वहाँ किसी समिति की सदस्यता नहीं कोई अभिनंदन नहीं सिर्फ़ भाषा और मनुष्य और अचानक याद आती है वह फ़िल्म जिसमें बारिश के बाद खिड़की पर पानी की बूँद देर तक अटकी रहती है और मैं उसे देखता रह गया था कथानक भूला सिर्फ़ वह बूँद याद रही और फिर उसका चेहरा जिसकी तरफ़ देखना किसी भी साहित्यिक गोष्ठी से बड़ा अनुभव है क्योंकि वहाँ मुझे अपने होने का प्रमाण नहीं देना पड़ता प्रेम कभी प्रमाणपत्र नहीं माँगता और मेरी मेज़ जिस पर इस क्लर्क की डायरी खुली पड़ी है और इतनी रिक्तता और यह रिक्तता भी इन सबकी सब उपस्थितियों से ज़्यादा सच्ची और मुझे अब ख़ुद पर हँसी आ रही है कि मैंने अपने समय का कोई भी हिस्सा इन लोगों को क्यों दिया और अब ग्लानि यह कि मेरे भीतर ही कुछ है जो समय-समय पर इन औसतताओं और इनकी भीड़ को पकड़ लेता है कि शायद आत्ममुग्ध घृणा का कोई काँटा जो मछली के काँटे से भी गहरा धँसता है कि प्रेम से निकल आना भले आसान होता हो घृणा से नहीं क्योंकि घृणा बार-बार अपना औचित्य सिद्ध करती रहती है कि देखो मैंने कहा था न वे ऐसे ही हैं और मैं हर बार उसे सही साबित करने पहुँच जाता हूँ जैसे मुझे अपनी ही क्षुब्धता से प्रेम हो गया हो और तभी कहीं भीतर कोई बहुत धीमी आवाज़ आती है (शायद वह तुम्हारी आवाज़ है) वह जो हमेशा सबसे बाद में सुनाई देती है कि अच्छा सोचो अच्छा बोलो और अच्छा लिखो कि भीड़ और औसतताओं से फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए तुम्हारे निज-संसार को और जब मैं सचमुच किसी अच्छी कविता या सद् उपस्थिति के भीतर होता हूँ तब ये सारे चेहरे ग़ायब हो जाते हैं कि उन उत्कृष्ट पूर्वजों का घर ही मेरा मूल घर है जहाँ लौटते ही इन औसतताओं का आकार सिकुड़ जाता है और मैं बचने लगता हूँ वहीं स्वयं अपनी औसतताओं से और अपनी घृणा से और अपनी उपस्थिति से।  

तीसरी सीटिंग

मैं नवीं मंज़िल से नीचे आया तो रास्ता कुछ देर के लिए तो सरल लगा, फिर अपनी सरलता खो बैठा। एक ओर पार्क था, दूसरी ओर पार्किंग—दोनों ही दिशाएँ अपने-अपने ढंग से सही थीं और यही समस्या थी। मैंने सोचा कि बाहर का रास्ता प्रकट दिशा में होगा, लेकिन उधर की इमारतें सहमत नहीं थीं। 

फिर वह स्त्री दिखी। वह वहाँ ऐसे खड़ी थी जैसे वह पहले से जानती हो कि कोई आएगा जो नहीं जानता कि कहाँ जाना है। मैंने उससे बाहर का रास्ता पूछा। यह प्रश्न जितना साधारण था, उसका उत्तर उतना निश्चित नहीं था। उसने साथ आने का इशारा किया और यह इशारा किसी निर्देश जैसा नहीं था। यह ऐसा था कि रास्ता स्वयं वहाँ से बाहर निकलना चाहता हो और हमें बस उसके साथ होना हो। हम चलते रहे। उसके आगे चलने में एक दक्षता थी कि जैसे वह तय कर अपने घर से निकली हो कि बाहर जाने का रास्ता पार कर वह अंततः कहाँ पहुँचेगी।  

बाहरी गेट आ गया था। वहाँ पहुँचकर उसने कहा, “यहाँ से जाइए।” यह इतना सरल वाक्य था कि उसमें कोई व्याख्या नहीं होनी थी। वह मुड़ी थी और लौट रही थी। यह असामान्य नहीं था कि वह मेरे साथ आई थी, लेकिन मेरे साथ बाहर नहीं निकली थी। यह सामान्य भी नहीं था। तर्क कह रहा था कि मार्गदर्शक और यायी एक ही दिशा में जाएँगे। 

उसने हाथ के इशारे भर से भी मुझे उधर का रास्ता दिखा दिया होता। बाद में तुमने बताया कि तुम्हें कोई स्त्री मिली और तुम्हारा उससे अभिवादन हुआ तो उसने छूटते ही तुम्हें बताया कि उसने आज तुम्हारे पति को बाहर का रास्ता दिखाया है कि तुम्हारे परिवार में बस तुम ही दो हो कि हम आज ही यहाँ आए हैं। तुम्हारे कहने से मुझे याद आया कि मुझे बाहर ले जाती वह भली स्त्री यही बातें तो मुझसे पूछ रही थी। मैं हैरानी से बेहोश हो जाऊँगा यदि इस गद्य की प्रसिद्धि पर इसके नीचे उसकी टिप्पणी आ जाए कि मैं आपको जानती हूँ और यह प्रकरण निश्चय ही मुझसे संबंधित है। मैं यक़ीन रखना चाहता हूँ कि वह एक वास्तविक भली स्त्री थी और फिर हमें वहाँ आस-पास दिखेगी। 

चौथी सीटिंग

मैंने घर की भीतरी दीवारों के लिए कुछ रंगों से मुलाक़ात की। टोप—जैसे कमरे की दीवारों पर कोई दुपहर थक कर बैठ गई हो और अब उसके कमज़ोर घुटने उठ नहीं पा रहे हों। वह न पूरी तरह भूरा है, न ग्रे—बस दोनों के बीच एक ऐसा मौन जो किसी निर्णय तक नहीं पहुँचता, पहुँचने की इच्छा भी नहीं रखता। ग्रेज—जैसे दो पुराने रंगों ने एक लंबी बहस के बाद हाथ मिला लिया हो और अब उस समझौते में एक तरह की आधुनिक शांति बस गई हो, जिसमें न उत्साह है न असहमति, बस रहने की सुविधा है। ऑफ़ व्हाइट—जैसे सफ़ेद ने थोड़ा पीछे हटकर कहा हो कि मुझे इतना भी उजला मत बनाओ, दैवीयता नहीं मुझे थोड़ी मनुष्यता दो। आइवरी—पुराने घर की अलमारी में रखा कोई पीला पड़ चुका पत्र, जिसमें अब भी किसी की लिखावट उष्ण है। क्रीम—सुबह की हल्की धूप जो खिड़की से अंदर आती है और किसी चीज़ को छूकर दोष नहीं देती। बेज—रेत का वह विस्तार जहाँ हर पदचिह्न थोड़ी देर रहता है और फिर मिट जाता है, जैसे किसी को याद रखने की कोई ज़रूरत नहीं हो। लिनन—धुले बिना भी साफ़, जैसे किसी कपड़े ने समय के साथ विनम्र होना सीख लिया हो। मशरूम—नमी और छाया का रंग, जैसे दीवारों ने अपने भीतर पुराने मौसम जमा कर रखे हों। स्टोन—पत्थर की वह उदासीनता जिसमें संस्वीकृति भी है और दूरी भी। सेज ग्रीन—जैसे किसी पेड़ ने अधिक देर सोचने के बाद तय किया हो कि वह हरा रहेगा... लेकिन चुपचाप, बिना किसी घोषणा के। ओलिव—थोड़ा गहरा, थोड़ा थका हुआ, जैसे अनुभव ने रंग पकड़ लिया हो। फ़ॉरेस्ट ग्रीन—जहाँ हरा अब रंग नहीं रह जाता, एक पूरा जंगल बन जाता है जिसमें विचार खो सकते हैं। डस्टी ब्लू—जैसे आसमान ने धुँध को याद रखा हो। नेवी ब्लू—रात का वह हिस्सा जहाँ शब्द धीमे पड़ जाते हैं और केवल गहराई बचती है। टील—नीला और हरा एक-दूसरे से मिलकर भी अलग रहने की कोशिश करते हुए—एक दुनिया समानांतर! टेराकोटा—पकी हुई मिट्टी की वह गर्माहट जिसमें घर बनने से पहले ही जीवन बसने लगता है। रस्ट—समय का छोड़ा हुआ निशान, सचाई का दस्तावेज़। ओकर—धूप का वह रूप जो दीवारों पर टिक जाता है तो शाम तक अपने घर नहीं लौटता। मोचा—कॉफ़ी का रंग नहीं, कॉफ़ी की स्मृति। चारकोल—सब रंगों के पीछे खड़ा वह मौन जो बाक़ी सबको परिभाषित करता है। डव ग्रे—हल्का दुःख, पीड़ादायी नहीं। ऐश ग्रे—जले हुए समय की बची हुई राख? 

और अंत में व्हाइट, अपना वही सुफ़ेद—जो सबको शुरू करता है और सबको अपने भीतर वापस बुला लेता है। 

हर रंग अंततः किसी न किसी तरह फिर से मौन हो जाने की चाहना रखता है और घर उसी मौन की धीमी आँच पर बनी हुई संरचना है; जहाँ रंग केवल दीवारों पर नहीं रहते, वे दिन के भीतर साँस लेते हैं और रात में धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं।

पाँचवी सीटिंग

“ये डिब्बा इधर रखो, टूट न जाए।”
(चीज़ें टूटने से पहले ही टूट जाती हैं क्या? या टूटना सिर्फ़ बाद में दिखता है?)
“हाँ, सँभाल के।”
(मैंने इस घर को सँभालकर रखा, यह घर मुझे सँभालता रहा।)
“कुर्सी ले जानी है?”
(कुर्सी नहीं, उस पर बैठने की आदत ले जाई जा सकती है क्या?)
“नहीं, रहने दो।”
(रहने दो... कितना आसान वाक्य है, जैसे छोड़ना भी कोई विकल्प हो।)
“लाइट बंद कर दी?”
(लाइट बंद करने से कमरे अँधेरे में चले जाते हैं या हमारी यादें?)
“कर दी।”
(लेकिन जो रोशनी अंदर रह गई है उसका क्या?)
“यहाँ आख़िरी बार देख लो सब?”
(आख़िरी बार जैसा कुछ होता भी है या हर बार हम झूठ बोलते हैं?)
“हाँ... देख लिया।”
(लेकिन क्या सच में? या बस देखने का निर्वाह किया?)
“चाबी दे दो।”
(चाबी देना आसान है पर उस दरवाज़े की आदत कैसे दी जाए जो मेरे आने की आवाज़ पहचानता था?)
“लो।”
(कितना छोटा शब्द है और कितना बड़ा अंत!)
“चलो फिर।”
(चलना हमेशा आगे ही क्यों होता है? पीछे क्यों नहीं?)
“हाँ।”
(यह ‘हाँ’ सहमति है या हार?)
“लॉक हो गया।”
(हाँ, बाहर से। अंदर से नहीं।)

सीढ़ियाँ उतरते हुए आवाज़ बदल जाती है। पहले यह घर लौटने की आवाज़ थी। अब यह यहाँ से निकलने की आवाज़ है।

“सामान सब ले लिया न?”
(सामान तो ले लिया पर जो चीज़ें नहीं दिखतीं, वे कहाँ हैं?)
“सब है।”
(झूठ नहीं, बस अधूरा सच।)

गली में आते ही हवा अलग लगती है।

“टैक्सी बुला लें?”
(टैक्सी कहीं भी ले जाएगी, लेकिन यहाँ से मुझे कौन ले जाएगा?)
“आ रही है।”
(कुछ चीज़ें आती हैं, कहीं और ले जाने के लिए।)

पीछे मुड़कर देखना होता है।

“एक बार देख लो।”
(देखना और छोड़ना—दोनों एक साथ कैसे संभव हैं?)

हम देखते हैं। वह जगह वहाँ है। वह घर अब वहाँ नहीं है।

बस एक और सीटिंग

नया! इस विस्मयादी में सुख है या पीड़ा, कैसे तय करें? और इस प्रश्नवाचक में उपाय की माँग है या अभिव्यक्त न हो सकने की विवशता!  

चाबी घूमती है। एक साधारण-सी आवाज़। लेकिन उसमें अजीब-सी असहजता है, जैसे यह काम पहले कभी नहीं हुआ। जैसे पहले कभी हमने कहीं और का ताला यों नहीं खोला। नया दरवाज़ा खुलते ही पहले प्रश्न नहीं आए, पहले हवा आई—बिना इतिहास के, बिना किसी व्याख्या के। हम अंदर आते हैं। यहाँ पहली राहत यह है कि चीज़ें मुझे तुरंत पहचानने की कोशिश नहीं कर रहीं। दीवारें सफ़ेद हैं या ऑफ-व्हाइट या अभी पूछूँगा तुमसे कि उन्हें क्या कहा जाए। यह अनिर्णय मुझे अच्छा लगता है कि इसमें फिर तुम्हारी उपस्थिति निर्णीत हो जाती है। इसमें कोई दबाव नहीं है।

घर अभी ख़ाली है। लेकिन यह वैसा ख़ाली नहीं है जो किसी कमी-सा लगे। मैं खड़ा हूँ और सोच रहा हूँ कि ‘नया’ कोई वस्तु नहीं है, एक अनुमति है। यह घर मुझे आने दे रहा है और खिड़कियों से रोशनी आ रही है। हमने एक दरवाज़े पर साथ हाथ रखा है। यह छोटी-सी क्रिया है, लेकिन इसमें एक हल्का-सा समापन है और एक नया आरंभ। मैं एक कमरे के कोने में आ गया हूँ। कोई ‘मेरा कोना’ अभी नहीं है यहाँ, लेकिन यह ठीक है। हर कोने को अभी धीरे-धीरे अपना नाम सीखना है। इसमें समय लगता है। मैं इसी क्षण कोई नई कविता सोचना चाहता हूँ। इसमें भी समय लगता है। एक खिड़की के पास खड़ा हो गया हूँ। बाहर वही दुनिया है, लेकिन अंदर पहली बार एक नई तरह की शांति है—जहाँ चीज़ें शुरू हो सकती हैं, बिना यह साबित किए कि वे क्यों शुरू हुईं। यही ‘नया’ है : अधिक चमकदार बदलाव नहीं, बस एक साधारण-सा अवसर... जब जीवन नई गति से आगे दौड़ना चाहेगा।

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