शनिवारेर चिट्ठी : अनुवाद का सप्ताह
शायक आलोक
06 जून 2026
मं.,
यह सप्ताह अनुवाद का सप्ताह था। अभी यह बात जब तुम्हें लिख रहा हूँ तो लगता है कि मैंने इस सप्ताह के बारे में सबसे कम महत्त्वपूर्ण बात पहले ही वाक्य में कह दी है। यह श्लील नहीं है। यह ग्लानि, बेतरतीबी, विस्मृति, बद-चाहतों या मुझे गर्त में खींचने को आतुर सतत प्रयत्नशील अति-सोच का सप्ताह भी था। यह रसोई पकाने और जीभ को बाज़ार से खींचकर घर की चहारदीवारी में लाने का सप्ताह था। दूसरे तरीक़े से शुरू करूँ तो मैंने अनुवाद नहीं किए। मैंने भाषाओं के बीच रखे हुए कुछ फ़र्नीचर इधर-उधर खिसकाए और मेरे मतलब की चीज़ों की शनाख़्त की। हमारा यह सप्ताह फ़र्नीचरों पर बातचीत में गुज़रा था। कैसा हँसी का क्षण बना कि तुम किसी एक फ़र्नीचर की बात करती और मैं उसके इर्द-गिर्द घूमता हमेशा इस अंत-वाक्य तक पहुँच जाता कि “और हम उसमें रतन लगवा देंगे।” रतन से आजकल मेरी वैसी ही आत्मीयता है जैसी सीमस हीनी की उनकी कविताओं में उनके पिता के श्रम से या शिम्बोर्स्का की उनकी पंक्तियों के बीच के निरंतर आगत पूर्णविरामों से है। अनूदित कविताओं या गद्य में मुझे कहीं कोई कुर्सी दिख जाती तो मैंने उसमें भी रतन लगवा दिया होता!
इस सप्ताह अनुवाद के लिए ट्रांसटोमर और ग्लुक से दूसरी बार मिला। डिलेन को सुना कई बार। आधी मुलाक़ातें जून जॉर्डन, नताली दिआज़, आइलीन माइल्स, एंड्रिया गिब्सन से हुई—ये कवि इसी माह मेरे संकलन में आ जाएँ तो सुखकर होगा। इस सप्ताह ही पहली बार मिला डॉम मोरेस से। वह भारतीय अँग्रेज़ी कवि हैं और उनकी कविताओं ने मुझे आकर्षित किया है। फ़र्नांदो पेसोआ से कुछ ढंग से मिला इसी सप्ताह। पढ़ता रहा और स्व के भीतर उतरता रहा। मुझे अच्छी लगी है उनकी अस्तित्ववादी उदासी और दो उदासियों के बीच का आवेश। यह उदासी उस व्यक्ति की उदासी है, जिसने अपने भीतर बहुत देर तक देखा है। सप्ताहांत के डाक से पेसोआ के गद्य के कुछ अनुवाद भेज रहा हूँ।
— शा.
मंशा
मैंने जीवन से बहुत थोड़ा ही माँगा था और वह थोड़ा भी मुझे नहीं मिला। घर के पास कोई मैदान, धूप की एक किरण, थोड़ी-सी शांति और रोटी का एक टुकड़ा, अपने अस्तित्व के बोझ से दबा हुआ महसूस न करना, दूसरों से कोई अपेक्षा नहीं करना और दूसरों का मुझसे कोई अपेक्षा न करना—बस इतना ही। लेकिन यह भी मुझे नहीं मिला, उस तरह जैसे हम किसी भिखारी को छुट्टे पैसे देने से इसलिए नहीं बचते कि हम निर्दय हैं, बल्कि इसलिए कि जेब में हाथ डालने की मंशा नहीं होती। अभाग्य से, मैं अपने शांत कमरे में बैठ लिखता हूँ—अकेला, जैसा हमेशा रहा हूँ और जैसा हमेशा रहूँगा। और मैं सोचता हूँ कि क्या मेरी यह नगण्य-सी लगने वाली आवाज़ वास्तव में हज़ारों आवाज़ों का सार नहीं है, क्या इसमें उन असंख्य जीवनों की आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा नहीं बोल रही, उन लाखों आत्माओं का धैर्य नहीं धड़क रहा जो मेरी ही तरह अपने दैनिक भाग्य, अपने व्यर्थ के सपनों और निराश आशाओं के साथ समझौता कर चुकी हैं। ऐसे क्षणों में मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता है, क्योंकि मैं उसके प्रति सजग हूँ। मैं इसे अधिक जीता हूँ क्योंकि मैं एक तरंग में जीता हूँ। अपने भीतर मुझे एक धार्मिक शक्ति का अनुभव होता है—प्रार्थना जैसी कोई चीज़, सार्वजनिक पुकार जैसा कोई स्वर। लेकिन तभी मेरा विवेक मुझे फिर मेरी औकात याद दिला देता है... मुझे याद आता है कि मैं रुआ दोस दोउरादोरेस की एक इमारत की चौथी मंज़िल पर बैठा हूँ और उनींदी निगाह से स्वयं को देखता हूँ। इस आधे लिखे पन्ने से सिर उठाकर मैं जीवन को देखता हूँ—निरर्थक और सौंदर्यहीन जीवन को—और उस सस्ती सिगरेट को जिसे मैं मेज़पोश के उधड़े किनारे के पास रखी राखदानी में बुझाने वाला हूँ। मैं इस चौथी मंज़िल के कमरे में बैठा हुआ जीवन से प्रश्न करता हुआ! बताता हुआ कि आत्माएँ क्या महसूस करती हैं!, किसी प्रतिभाशाली या विख्यात लेखक की तरह गद्य लिखता हुआ! मैं? यहाँ? एक जीनियस!...
अर्थ
व्यर्थताओं से भरा और अत्यंत संवेदनशील होने के कारण, मैं तीव्र और सर्वग्रासी आवेगों का अनुभव कर सकता हूँ—चाहे वे अच्छे हों या बुरे, उदात्त हों या नीच—लेकिन कभी किसी ऐसी भावना का अनुभव नहीं कर पाता जो टिक सके, किसी ऐसे भाव का नहीं जो मेरी आत्मा की गहराइयों में उतरकर स्थायी हो जाए। मेरे भीतर हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ में बदल जाने को उतावली रहती है। मेरी आत्मा स्वयं से ही अधीर है जैसे किसी शरारती बच्चे के प्रति हुआ जाता है, इसकी बेचैनी लगातार बढ़ती रहती है और फिर भी हमेशा वैसी ही बनी रहती है। हर चीज़ मुझे आकर्षित करती है, लेकिन कुछ भी मुझे बाँध नहीं पाता। मैं हर बात पर ध्यान देता हूँ, जबकि उसी समय सपनों में भी खोया रहता हूँ। जिस व्यक्ति से मैं बात कर रहा होता हूँ, उसके चेहरे की सबसे सूक्ष्म हरकतों को भी देख लेता हूँ, उसकी आवाज़ की सबसे हल्की कंपन तक दर्ज कर लेता हूँ। लेकिन मैं सुनता हुआ भी वास्तव में नहीं सुनता, मेरा मन कहीं और भटक रहा होता है और बातचीत में जो बात सबसे कम पकड़ पाता हूँ, वह है कही गई बात का वास्तविक अर्थ—चाहे वह मैंने कही हो या उसने। इसलिए मैं लोगों से वही बात दुबारा कह देता हूँ जो पहले ही कह चुका हूँ या उससे वही प्रश्न फिर पूछ बैठता हूँ जिसका उत्तर वह दे चुका है। लेकिन मैं चार तस्वीर जैसे शब्दों में उसके चेहरे की उन मांसपेशियों का वर्णन कर सकता हूँ, जिनका प्रयोग उसने वह बात कहते समय किया था जिसे मैं अब याद नहीं कर पाता या कि उसने अपनी आँखों से किस प्रकार मेरे कहे वे शब्द सुने थे जो अब मुझे याद नहीं। मैं दो व्यक्तियों में बँटा हुआ हूँ और दोनों एक-दूसरे से दूरी बनाए रखते हैं—ऐसे सियामी जुड़वाँ बच्चों की तरह जो वास्तव में जुड़े हुए ही नहीं हैं।
पूर्ति
हो सकता है हमें मालूम हो कि जिस काम को हम लगातार टाल रहे हैं, वह बुरा काम होगा। लेकिन उससे भी बुरा होता है वह काम जो हम कभी करते ही नहीं। जो काम पूरा हो चुका है, कम से कम पूरा तो हुआ। वह भले ही घटिया हो, लेकिन उसका अस्तित्व तो है—ठीक वैसे ही जैसे मेरी अपंग पड़ोसन के अकेले गमले में लगा वह मुरझाया-सा पौधा। वह पौधा उसकी ख़ुशी है और कभी-कभी मेरी भी। मैं जो लिखता हूँ, चाहे वह कितना ही ख़राब क्यों न हो, शायद किसी दुखी या आहत आत्मा को कुछ क्षणों के लिए उसकी अपनी पीड़ा से राहत दे सके। मेरे लिए इतना ही काफ़ी है या शायद काफ़ी नहीं है, लेकिन इससे कोई न कोई उद्देश्य तो पूरा होता है और जीवन के साथ भी ऐसा ही है। एक ऊब, जिसके भीतर केवल और अधिक ऊब की ही प्रतीक्षा है; अभी एक पछतावा, उस पछतावे के लिए जो मुझे कल होगा, आज पछतावा महसूस करने के लिए। भारी उलझनें, जिनका कोई उद्देश्य नहीं, कोई सत्य नहीं—भारी उलझनें... जहाँ किसी रेलवे-स्टेशन की बेंच पर सिकुड़कर बैठा मेरा तिरस्कार मेरी निराशा के लबादे में ऊँघ रहा है... स्वप्निल छवियों से बना वह संसार, जो मेरे ज्ञान का भी योग है और मेरे जीवन का भी... वर्तमान क्षण पर ध्यान देना कभी मेरा वृहत् या स्थायी सरोकार नहीं रहा। मैं समय को उसकी पूर्ण व्यापकता में चाहता हूँ और मैं बिना किसी शर्त के ‘मैं’ होना चाहता हूँ।
रिक्ति
अक्सर ऐसा होता है कि रोज़मर्रा की चीज़ें और भ्रम मुझे अपना शिकार बना लेते हैं और मैं एक साधारण मनुष्य जैसा महसूस करने लगता हूँ। तब मुझे संसार में होना अच्छा लगता है और मेरा जीवन पारदर्शी-सा प्रतीत होता है। मैं अस्तित्व में बना रहता हूँ। अपनी तनख़्वाह पाकर घर लौटने में मुझे आनंद मिलता है। मौसम को देखे बिना भी मैं उसे महसूस करता हूँ और कोई सहज जैविक अनुभूति मुझे प्रसन्न करती है। यदि मैं चिंतन में होता हूँ तो वास्तव में सोचता नहीं हूँ। ऐसे दिनों में मुझे विशेष रूप से बाग़ बहुत प्रिय लगते हैं। सार्वजनिक बाग़ों के स्वरूप में ही कुछ अजीब और करुण है, जिसे मैं तभी गहराई से महसूस करता हूँ जब मैं स्वयं के प्रति बहुत सजग नहीं होता। बाग़ सभ्यता का संक्षिप्त रूप है—प्रकृति का एक अनामिक रूपांतरण। वहाँ पौधे होते हैं, लेकिन रास्ते भी—हाँ, रास्ते। पेड़ उगते हैं, लेकिन उनकी छाया के नीचे बेंचें भी रखी होती हैं। शहर की चारों दिशाओं की ओर खुलने वाले चौड़े मार्गों पर बेंचें बड़ी होती हैं और लगभग हमेशा भरी रहती हैं। मुझे क़तारों में सजे फूल देखने से गुरेज़ नहीं, लेकिन फूलों के सार्वजनिक उपयोग से घृणा है। यदि फूलों की क्यारियाँ बंद उद्यानों में होतीं, यदि पेड़ किसी सामंती एकांत को छाया देते, यदि बेंचें ख़ाली होतीं, तब शायद बाग़ों का मेरा निष्फल चिंतन मुझे सांत्वना दे पाता। लेकिन शहरों के बाग़—जो उपयोगी भी हैं और सुव्यवस्थित भी—मेरे लिए पिंजरों जैसे हैं, जिनमें पेड़ों और फूलों की रंगीन स्वाभाविकता को बस उतनी ही जगह मिली है कि वे मौजूद रह सकें, भाग न सकें और उनकी सुंदरता नितांत अकेली मौजूद होती है, उस जीवन से वंचित जो सुंदरता का होता है। लेकिन कुछ ऐसे दिन भी होते हैं जब यही वह भू-दृश्य होता है जो मेरा होता है और मैं इसमें किसी दुखांत-हास्य नाटक के अभिनेता की तरह प्रवेश करता हूँ। उन दिनों मैं भ्रम में होता हूँ, लेकिन किसी अर्थ में अधिक सुखी भी।
जब मेरा ध्यान बँटता है, तब मैं कल्पना करने लगता हूँ कि सचमुच मेरी कोई रिहाइश है या मेरा कोई घर है जहाँ मैं लौट सकता हूँ। जब मैं भूल जाता हूँ, तब मैं एक सामान्य मनुष्य बन जाता हूँ, किसी उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखा गया व्यक्ति और मैं अपना दूसरा सूट झाड़ता हूँ और अख़बार को पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने तक पढ़ जाता हूँ। लेकिन यह भ्रम कभी अधिक देर नहीं टिकता—आंशिक रूप से इसलिए कि भ्रम टिकते ही नहीं और आंशिक रूप से इसलिए कि रात आ जाती है। और तब फूलों के रंग, पेड़ों की छाया, रास्तों और क्यारियों की ज्यामिति—सब धुँधली पड़ने लगती है और सिकुड़ने लगती है। और इस भूल—जिसमें मैं एक साधारण मनुष्य-सा महसूस करता हूँ—के ऊपर अचानक तारों का विशाल मंच प्रकट हो जाता है, मानो दिन का उजाला केवल एक परदा था जिसने उसे दृष्टि से छिपा रखा था। तब मेरी आँखें उस अनगढ़ दर्शक-समूह को भूल जाती हैं और मैं आरंभिक कलाकारों की प्रतीक्षा उस उत्साह से करने लगता हूँ जैसा सर्कस में बैठे किसी बच्चे में होता है। मैं मुक्त हूँ और खोया हुआ भी। मैं महसूस करता हूँ। मैं ज्वर से काँपता हूँ। मैं ‘मैं’ होता हूँ।
आँधी-तूफ़ान
स्थिर बादलों के बीच दिखाई देता आकाश का नीला रंग पारदर्शी सफ़ेद रंग से धुँधला गया था। दफ़्तर के पिछले हिस्से में बैठा लड़का, जो किसी अंतहीन-से लगने वाले पैकेट पर डोरी लपेट रहा था, एक क्षण के लिए रुक गया। “मैंने ऐसा मौसम बस एक बार और देखा है...” उसने सांख्यिकीय गंभीरता से टिप्पणी की। एक ठंडी निस्तब्धता छा गई। सड़क से आने वाली आवाज़ें मानो किसी चाक़ू से काट दी गई हों। फिर एक सुदीर्घ, ब्रह्मांडीय रूप से थमी हुई साँस—एक प्रकार का सर्वव्यापी भय। पूरा ब्रह्मांड जैसे एकदम ठहर गया था। क्षण... क्षण... क्षण... मौन ने अंधकार को और भी काला कर दिया था। और तभी अचानक, जीवित इस्पात-सी चमक... ट्रामों की धात्विक गड़गड़ाहट कितनी मानवीय! कितना सुखद लगा सड़क पर गिरती साधारण वर्षा का वह दृश्य, जो मानो किसी गहरी खाई से पुनर्जीवित होकर लौट आया हो!
ओ लिस्बन, मेरे घर!
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फ़र्नांदो पेसोआ के यहाँ प्रस्तुत गद्यांश अँग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद के लिए उनकी पुस्तक The Book of Disquiet से चुने गए हैं। इन गद्यांशों के पाँच उपशीर्षक किंचित अनुवादकीय छूट लेते हुए अनुवादक की तरफ़ से ही हैं। शनिवारेर चिट्ठी में यह भी पढ़ सकते हैं : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए | कल से रवैया फ़र्क़ होगा | अनुशोचना और बाक़ी गल्प | छाया और छायेच्छाएँ | वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद | क्रिस्टोफ़र नोलन, अमृता शेर-गिल, मंगलेश डबराल और अन्य मुलाक़ातें | घर की जगह | अजाने देशों में
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