शनिवारेर चिट्ठी : अजाने देशों में
यात्रा-कल्पना-स्मृति तीन घंटे की एक बस-यात्रा किसी मनुष्य को क्या दे सकती है? वह कवि है तो अधैर्य। वह प्रेम में है तो प्रत्याशा। वह पुरानी होती स्त्री है तो पीठ की पीड़ा और वह ऊब रहा आदमी है तो...
शनिवारेर चिट्ठी : घर की जगह
डेरा मनुष्य अपने घर के बारे में सबसे कम तब सोचता है, जब वह अपने घर का निवासी होता है। तब घर की उपस्थिति इतनी स्वाभाविक होती है कि वह लगभग अदृश्य हो जाता है। बचपन में “हमारा अपना दो-मंज़िला घर है”
16 मई 2026
शनिवारेर चिट्ठी : क्रिस्टोफ़र नोलन, अमृता शेर-गिल, मंगलेश डबराल और अन्य मुलाक़ातें
समय वह किसी सीधी बहती हुई नदी की तरह नहीं। वह लौटता हुआ और मुड़ता हुआ। समय अपनी ही दिशा पर संदेह करता हुआ। समय बंद वृत्त है और ‘इन्वर्ज़न’ समय की स्मृति के विखंडन के रूप में। भविष्य और अतीत एक-दूसर
09 मई 2026
शनिवारेर चिट्ठी : वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद
स्मृति के घर अँधेरा स्मृति के घर अँधेरा बहुत है। सिर्फ़ आँखें काम नहीं करतीं। नाक भी लगता है काज पर। शून्य को सुनना पड़ता है कानों को। हाथों को हवा को टटोलना पड़ता है। विस्मृति ने कोई शोर भी तो नहीं
शनिवारेर चिट्ठी : छाया और छायेच्छाएँ
छायालीन यह दृश्य है या एक ठहरा हुआ उच्चारण! जैसे समय ने अपनी जीभ बाहर निकाल शब्द को अधूरा छोड़ दिया हो। क्षितिज पर शहर कोई ठोस आकृति नहीं, धुंध का अभ्यास है। वह अपने होने को सिद्ध नहीं करता, संकेत
25 अप्रैल 2026
शनिवारेर चिट्ठी : अनुशोचना और बाक़ी गल्प
स्फुलिंग कमरा-तर, कमरा-कम या अ-कमरा जैसे शब्द भी कहीं होते हैं, कहो तो! तो फिर बहुत से कमरों के बारे में अंतर की कुछ-कुछ बातें कहने के लिए यो-वो शब्द न हो तो किस कार्य में लगेगा वह कवि के? अंतर की
शनिवारेर चिट्ठी : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए
सोमवार मैं लौटने की आख़री सड़क पर हूँ। यह सोमवार की तेज़ भागती सड़क है। इसकी रफ़्तार को दो दिनों के घर-आराम के बाद ‘काम पर लौटने’ के पंख लगे हैं। घर से पश्चिम की ओर निकलती है पहली सड़क। वह रास्ता बदलती
शनिवारेर चिट्ठी : कल से रवैया फ़र्क़ होगा
अथ कोई अलसकथा नहीं! रविवार के उस दुपहर-उष्ण में ऊँघने के स्वाँग में तुम्हारी पीठ पर श्वासों की सुदीर्घ कविताओं का पाठ नहीं कर सका, खमा करो। मुझे एक नए आरंभ की पहली सीढ़ी पर पाँव धरने थे। अभी कितना