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शनिवारेर चिट्ठी : घर की जगह

डेरा

मनुष्य अपने घर के बारे में सबसे कम तब सोचता है, जब वह अपने घर का निवासी होता है। तब घर की उपस्थिति इतनी स्वाभाविक होती है कि वह लगभग अदृश्य हो जाता है। बचपन में “हमारा अपना दो-मंज़िला घर है” वाक्य मेरे लिए किसी तथ्य से अधिक एक मानसिक संरचना था। उसमें अहं था। मैं उस वाक्य की छाया में बड़ा हुआ। लंबे समय तक ‘घर’ मेरे लिए इच्छा नहीं, स्थिति था। इच्छाएँ अक्सर वहीं जन्म लेती हैं, जहाँ किसी चीज़ की अनुपस्थिति शुरू होती है। दूसरे शहरों में गया तो इस बात से मिला कि हर छत घर नहीं होती। जहाँ रहा; वे रहने की जगहें थीं, घर नहीं। मेरी लोकभासा ने एक अलग शब्द ही बचाकर रखा था—“डेरा”। यह शब्द जितना साधारण दीखता है, उतना है नहीं। इसमें अस्थायित्व की पूरी दार्शनिकता छिपी है। घर जा रहे हो?—नहीं, डेरा। घर तो होली में जाऊँगा। डेरों में रहते हुए आदमी वस्तुओं से पूरी तरह प्रेम नहीं कर पाता। चीज़ें सजाता है, लेकिन इस तरह जैसे जल्द ही ये चीज़ें समेट लेनी होंगी। अपने घर की स्मृति प्रवास में और अधिक चमकने लगती है। दूर शहरों में आदमी घर को नहीं, अपने स्थायित्व को याद करता है। वह उस भावना को याद करता है, जिसमें जीवन अस्थायी नहीं लगता था। घर अंततः कोई वास्तु नहीं, समय के विरुद्ध मनुष्य का सबसे आत्मीय प्रतिरोध है।

घरौंदा

मेरे अंदर घर का नॉस्टेल्जिया फ़िल्मों ने क्रिएट किया होगा। एक फ़िल्म है—घरौंदा। छाया और सुदीप ब्याह करना चाहते हैं। वे एक ही दफ़्तर में काम करते हैं। फ़ाइलों, टाइपराइटरों और पंखों के बीच पनपता प्रेम। वे प्रेम में हैं और उनका प्रेम शाम के बाद किराये के कमरों में लौटता रहता है। छाया एक छोटे-से फ़्लैट में रहती है, जहाँ निजता लगभग असंभव है। रात को बिछते बिस्तर। सुबह फिर तह होते गद्दे। इधर अपना सुदीप है—तीन अन्य सुदीप-से के साथ साझा किए गए कमरे में। ये घर नहीं हैं, सोने की जगहें है। 

वे शादी के पहले घर लेना चाहते हैं। अधूरी इमारतों के बीच खड़े भविष्य की कल्पना करते हैं। वहाँ अभी सिर्फ़ सीमेंट, सरिये और धूल है। मध्यवर्ग अधूरी चीज़ों पर भी आस्था रखने की कला सीखकर बड़ा होता है। वे अपनी सारी जमा-पूँजी एक फ़्लैट में लगा देते हैं और बिल्डर भाग जाता है। फ़िल्म अचानक बदल जाती है और एक प्रेम कहानी से भारतीय मध्यवर्ग की सामूहिक त्रासदी में प्रवेश कर जाती है। अधूरी इमारत अब सिर्फ़ अधूरी इमारत नहीं रहती। वह उस वर्ग का स्मारक बन जाती है, जो जीवन भर बस थोड़ा और की प्रतीक्षा में अधेड़ होता जाता है। सुदीप का रूममेट आत्महत्या कर लेता है। शहर का असली चेहरा सामने आने लगता है। बंबई अब सपनों के शहर में नहीं; एक मशीन में बदल जाती है, जो मनुष्य की इच्छाओं को क़िस्तों में पीसती है। बहुत-से दृश्यों और संवादों के बाद अंतिम दृश्य रेलवे स्टेशन का है। विदाई और संभावना का स्टेशन। छाया के पति छाया को लेकर वहाँ आते हैं। अगर छाया तुम्हारे साथ जाना चाहती है, तो मैं उसे रोकूँगा नहीं... लेकिन तय यह पाया गया है कि सुदीप यहीं रहेगा। फिर से शुरू करेगा। 

घर

इस पूरे हफ़्ते ही ‘घर’ शब्द के इर्द-गिर्द घूमता रहा। घर पर कविताएँ पढ़ीं और गद्य। तुम्हारे लिए चमकती पंक्तियों का एक कोलाज तैयार किया। घर कैसा होता है, यह मैं लगभग भूल ही चुका था (बुकोव्स्की), यह अपरिचित कहाँ जाए? शायद सही प्रश्न यह है—वह कहाँ नहीं जाता? (महमूद दरवेश), घर वह जगह है, जहाँ अगर तुम्हें जाना पड़े तो उन्हें तुम्हें अपना ही लेना होगा (फ़्रॉस्ट), घर कोई जगह नहीं, आत्मा की एक अपरिवर्तनीय अवस्था है (जेम्स बाल्डविन), कोई भी घर इतना बड़ा नहीं होता कि उसमें मनुष्य की सारी स्मृतियाँ समा जाएँ (टेनेसी विलियम्स), हर मनुष्य की तरह, मैं भी जहाँ रहूँ, वहीं घर जैसा महसूस करना चाहती हूँ (माया एंजेलो), घर वह नहीं जहाँ तुम जन्म लेते हो; घर वह है, जहाँ से भागने की इच्छा समाप्त हो जाती है (नग़ीब महफ़ूज़), हम अपने भीतर ही घर को लिए चलते हैं (जॉन बर्जर), हर यात्री का अपना एक घर होता है और भटकने के बाद वह उसे और अधिक प्रेम से याद करता है (चार्ल्स डिकेन्स), रोशनी तुम्हें घर तक ले आती है और उसकी ऊष्मा तुम्हें वहाँ रोके रखती है (एली रोड्रिगेज़), घर—यह केवल एक शब्द नहीं, यह मनुष्य के भीतर की सबसे प्रबल पुकारों में से एक है (मार्गरेट एटवुड), सच्चे सुकून के लिए घर में रहने जैसा कुछ भी नहीं (जेन ऑस्टिन), मेरा घर कोई जगह नहीं, कुछ लोग हैं (लोइस बुजोल्ड), मकान दीवारों और शहतीरों से बनता है, घर प्रेम और स्वप्नों से (राल्फ़ इमर्सन), हमारी सारी भटकनों के अंत में हम वहीं पहुँचेंगे जहाँ से चले थे, और उस जगह को पहली बार सचमुच पहचानेंगे (एलियट) ।

अर्थ

क्या घर मनुष्य का सबसे सुंदर भ्रम है : वह पृथ्वी पर कहीं भी जन्म ले सकता है, किसी भी शहर में रह सकता है, असंख्य कमरों से गुज़र सकता है; फिर भी उसके भीतर जीवन भर एक अदृश्य दिशा बनी रहती है—लौटने की दिशा। यह विचित्र है, क्योंकि मनुष्य वास्तव में कभी लौट नहीं पाता। समय हर वापसी को असंभव बना देता है। बचपन का आँगन वहीं रहता है, उसमें खेलता हुआ बच्चा नहीं रहता। पुराने घर की दीवारें बची रहती हैं, उन्हें देखने वाली आँखें बदल चुकी होती हैं। फिर भी मनुष्य घर का स्वप्न देखता है। शायद इसलिए कि वह जानता है—जीवन मूलतः प्रवाह है और प्रवाह में रहने वाला हर प्राणी भीतर कहीं एक तट चाहता है।

घर केवल सुरक्षा नहीं है। घर का रहस्य कुछ और है। घर वह जगह है जहाँ समय केवल बीतता नहीं, जमता है। जहाँ एक कुर्सी पर वर्षों तक बैठने से उसमें शरीर की नहीं, उपस्थिति की आकृति बन जाती है। जहाँ सीढ़ियों पर चढ़ते हुए पाँव सोचते नहीं। जहाँ अँधेरे में भी हाथ फैलाकर चीज़ें टटोली जा सकती हैं। मनुष्य आदतों से इतना गहरा प्रेम क्यों करता है? शायद इसलिए कि आदतें समय को रहने योग्य बनाती हैं।

क्या हम सोच सकते कि अपने घर की इच्छा वास्तव में अपने जीवन को आकार देने की इच्छा है? किराये के घर में आदमी रहता है, अपने घर में वह अपनी उपस्थिति छोड़ता है। वहाँ वस्तुएँ उपयोग की चीज़ें नहीं रह जातीं। वे धीरे-धीरे जीवन की साक्षी बनती हैं। एक दरार, एक पुराना दाग़, एक खिड़की से आती रोशनी—ये मिलकर ही उस मौन इतिहास का निर्माण करते हैं, जिसे केवल वहाँ रहने वाले लोग पढ़ सकते हैं।

क्या हम मान सकते कि घर का सबसे गहरा अर्थ यह है कि वहाँ मनुष्य को स्वयं होने की अनुमति मिलती है। संसार हमें लगातार भूमिकाएँ देता है। हर जगह हम किसी न किसी अपेक्षा में उपस्थित होते हैं। केवल घर वह जगह है, जहाँ मनुष्य अंततः उपयोगी होने की अपेक्षा से मुक्त हो सकता है। वहाँ वह बिना किसी प्रयोजन के भी प्रिय बना रह सकता है।

शरण

तुम्हारे आने के साथ घर की इच्छा आई। घर की इच्छा मनुष्य को हमेशा प्रेम के बाद ही क्यों होती है—मैं इस बारे में सोच रहा हूँ। उससे पहले वह दुनिया में लगभग एक यात्री की तरह रहता है। अच्छे होटलों में। साफ़-गंदे कमरों में। मित्रों के घरों में। उसे कोई असुविधा नहीं होती। वह खाता है, सोता है, किताबें पढ़ता है, यात्राएँ करता है। जीवन ठीक चलता रहता है। फिर एक दिन कोई आता है... और अचानक एक जगह बस जगह नहीं रह जाती। उस पर किसी के बैठने का ढंग बस जाता है। शायद घर की शुरुआत यहीं से होती है।

किराये के घरों में हमेशा एक हल्की-सी अस्थायित्व की गंध रहती है। वहाँ रहते हुए आदमी चीज़ों से पूरी तरह प्रेम नहीं कर पाता। वह दीवार पर तस्वीर टाँगते हुए भी जानता है कि एक दिन यह तस्वीर उतार ली जाएगी, कील का छोटा-सा घाव पुताई के नीचे छिप जाएगा और कमरे में किसी दूसरे की आवाज़ रहने लगेगी। किराये का घर हमें आश्रय देता है, लेकिन इतिहास नहीं देता। अपने घर की इच्छा दरअस्ल इतिहास की इच्छा है। दो लोगों के साझा इतिहास की। एक मेज़, जिसे वर्षों तक एक ही जगह रखा जाए। एक कप, जिसके टूट जाने पर सचमुच दुःख हो। एक खिड़की, जिससे हर बरसात को साथ देखा जाए।

मनुष्य वस्तुओं से प्रेम नहीं करता। वह उन क्षणों से प्रेम करता है जिन्हें वस्तुएँ अपने भीतर जमा कर लेती हैं। मैंने जीकर देखा है कि प्रेम का सबसे सुंदर रूप साथ सोना नहीं, साथ बसना है। किसी कमरे को धीरे-धीरे अपनी आदतों से भर देना। किताबों को इस तरह रख देना कि दूसरा उन्हें खोज सके। रात को पानी का गिलास हमेशा एक ही जगह छोड़ना। यह जानना कि सुबह पर्दा कौन हटाएगा। ये बहुत छोटी बातें हैं। लेकिन मनुष्य का सुख हमेशा छोटी बातों से ही बना है। इस कारण अपना घर एक भौतिक स्वप्न नहीं, एक भावनात्मक भूगोल है। वहाँ दीवारों से अधिक स्मृतियाँ रहती हैं। वहाँ समय कैलेंडर में नहीं, चीज़ों पर जमता है। 

एक घर का दृश्य-बंध

दोपहर की धूप खिड़की के आधे खुले पर्दों से छनकर हाल में उतर रही है। हवा में नए पेंट की बहुत हल्की-सी गंध है। इसमें लकड़ी और धूप का मिला-जुला ताप घुला है। फ़र्श पर अभी भी कुछ खुले डिब्बे पड़े हैं। भूरे गत्ते के डिब्बे, जिनके किनारे बार-बार की उठ-रख से कुछ मुलायम हो गए हैं। ‘किताबें’, ‘रसोई’, ‘काँच का सामान’ जैसे मार्के से उनका वर्ग तय है। घर के बीचोबीच वह छोटी-सी लकड़ी की मेज़ रखी है, जिसे तुमने जाने कितनी दुकानों में घूमने के बाद चुना था। अभी उस पर केवल एक सफ़ेद कप रखा है। कप के भीतर आधी ठंडी हो चुकी चाय। कप के किनारे पर तुम्हारे होंठों द्वारा छोड़े गए पानी के निशान हैं।

तुम फ़र्श पर पालथी मारकर बैठी हो। तुम्हारे सामने अख़बार पर फैले हुए छोटे-छोटे शो-पीस हैं—पीतल की एक छोटी घंटी। मिट्टी का नीला फूलदान। लकड़ी की बनी एक चिड़िया, जिसकी पूँछ का रंग थोड़ा उतर गया है। तुम हर चीज़ को उठाकर देर तक देखती हो, जैसे उसकी सही जगह केवल तुम जानती हो। कहीं कोई रोज़ दिख जाने वाली चीज़ दिख रही है, कहीं काफ़ी दिनों से नहीं दिखी कोई चीज़ दिख गई है। बाहर से नए लोगों की नई आवाज़ें आ रही हैं। खिड़की के पास रखा छोटा पौधा हवा से बहुत हल्का हिल रहा है। मैं इसका नाम भूल गया हूँ। इसे एक नया नाम देना होगा। रसोई अभी पूरी तरह सजी नहीं है। स्टील के बर्तन धुले हुए सिंक के पास उल्टे रखे हैं। चाय की पतीली चूल्हे पर चढ़ी है। मसालों के डिब्बे अभी अख़बार में लिपटे हुए हैं। उनमें पैर लगा है और हल्दी की पीली गंध हवा में फैल गई है। यह घर अब अपने घर-सा गमक उठा है।

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