शनिवारेर चिट्ठी : छाया और छायेच्छाएँ
शायक आलोक
02 मई 2026
छायालीन
यह दृश्य है या एक ठहरा हुआ उच्चारण! जैसे समय ने अपनी जीभ बाहर निकाल शब्द को अधूरा छोड़ दिया हो। क्षितिज पर शहर कोई ठोस आकृति नहीं, धुंध का अभ्यास है। वह अपने होने को सिद्ध नहीं करता, संकेत देता है। हुगली इस अनिश्चितता का प्रवाह नहीं करती, उसे सुदीर्घ खींचती है। जल यहाँ दर्पण नहीं, स्मृति का विलंब है। मध्य में खड़ा है पेड़, लेकिन वह केंद्र नहीं है। वह एक विराम-चिह्न है, वाक्य नहीं। उसकी छाल में समय ने नाख़ून गड़ाए हैं। उसकी पत्तियाँ हवा को नहीं, धरा-गगन के बीच के अवकाश को को छू रही हैं। एक माई है तस्वीर में। वह खड़ी नहीं, टिकाई गई है इस फ़्रेम में—अपनी पीठ से उपस्थित। दृश्य की आधी संधानकर्ता। शेष आधा संधान माई की पीठ के पीछे से। गाय है पेड़ के पीछे आधी दिखती हुई। आधा शरीर, आधी सचाई, आधा साक्ष्य। फ़िल-वक़्त एक निष्क्रियता का पूर्णत्व। वह एक प्रश्न है जो भविष्य में पूरा धड़ बाहर निकाल सम्मुख आएगा। देवी-प्रतिमाएँ तट पर नहीं, एक अस्थायी अमरत्व के खूँटे पर छोड़ी गई हैं। ...और एक नौका है। तिरती नहीं, टँगी हुई पानी पर। इस दृश्य में गति की परिभाषा स्थगित रखी गई है। यह दृश्य एक प्रयोग है। यहाँ अर्थ लगातार बनता और टूटता रहता है। हर अभीष्ट अपने होने और न होने के द्वंद्व में है।
मैं रघु राय को जानता हूँ ऐसे। उनसे सबसे अधिक आत्मीयता रखता हूँ ऐसी एक तस्वीर से। उन्हें यहीं से पढ़ना शुरू करता हूँ, लेकिन यह पढ़ना सीधा नहीं चलता। उनकी कितनी ही, जाने कितनी तस्वीरों में वही दृष्टि अलग-अलग रूपों में खुलती हुई। कहीं भीड़ के भीतर प्रच्छन्न एकांत की तरह तो कहीं ख़ालीपन के भीतर गूँजती उपस्थिति की तरह। कहीं आस्था और विडंबना के बीच अटकी हुई एक अनिश्चय-रेखा की तरह। गत रविवार वह प्रकाश में विलीन हो गए। मैं कहता हूँ कि वह छाया में भी विलीन हुए। वह कमाल के फ़ोटो-जर्नलिस्ट रहे, बेमिसाल पोर्ट्रेट-मेकर, शानदार स्ट्रीट फ़ोटोग्राफ़र। उन्होंने शहरों को क़ैद किया, घटनाओं को, लोगों को और लोक को... गली-सड़क-संसार। उन्होंने हमारे समय को दर्ज किया तस्वीरों में। उन्हें सहृदयों ने सम्यक् ही फ़ोटोग्राफ़ी में भारतीय आत्मा का चितेरा कहा है। मैंने उनके लिए श्रद्धांजलि के शब्द नहीं कहे, बुदबुदाता रहा—आभार! आभार!! यही गुज़रा यह हफ़्ता। रोज़मर्रा के दृश्यों से गुज़रते विराम लेता रहा—अनगिन दृश्यों पर और कहता रहा शुक्रिया-शुक्रिया!
छाया-चित्र
तुम दृश्य-कलाओं में रुचि रखती हो तो तुम्हें छाया-चित्रों पर भी फ़ोकस करना आना चाहिए। ‘इन प्लेटोज़ केव’ में सूज़न सॉन्टैग ने फ़ोटोग्राफ़ी के संबंध में अलहदा एंगल से विचार किया है। उन्हें फ़ोटोग्राफ़ की गई छवियाँ संसार-संबद्ध कथन कम, उसके अंश अधिक प्रतीत हुईं। माने कि छाया-चित्र यथार्थ की वे सूक्ष्म प्रतिकृतियाँ हैं, जिन्हें कोई भी सृजित कर सकता है या अपने पास रख सकता है। वह सोचती हैं कि जब फ़ोटोग्राफ़र यथार्थ को प्रतिबिंबित करने के प्रति सबसे अधिक प्रतिबद्ध होते हैं, तब भी वे स्वाद और अंतःकरण की अनकही अनिवार्यताओं से आक्रांत ही बने रहते हैं। फ़ोटोग्राफ़र सदा ही अपने मानदंड अपने विषयों पर आरोपित करते हैं। किसी तस्वीर को कैसा दिखना चाहिए, यह तय करते हुए, एक एक्सपोज़र को दूसरे पर वरीयता देते हुए। उन्हें दीखता है कि फ़ोटोग्राफ़ी को अधिकांश लोगों द्वारा कला के रूप में नहीं बरता जाता। वह तो जैसे बस एक सामाजिक अनुष्ठान है, चिंता के विरुद्ध एक कवच और शक्ति का एक उपकरण। वह ‘पर्यटक’ पर चिंता रखती हैं कि वे किसी भी उल्लेखनीय दृश्य के बीच कैमरा रख देने के लिए लगभग बाध्य ही होते हैं। वे अन्य प्रतिक्रियाओं के प्रति अनिश्चितता के भाव से तस्वीरें उतारते हैं और अपने अनुभव को एक ढाँचा सौंपते हैं। ठहरो, तस्वीर लो, और आगे बढ़ जाओ। सूज़न जहाँ से देखती हैं, वहाँ एक फ़ोटोग्राफ़ किसी घटना और फ़ोटोग्राफ़र के बीच मुठभेड़ का परिणाम नहीं होता। तस्वीर लेना स्वयं में एक घटना है जो दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक आदेशात्मक अधिकार बनता जा रहा है। हस्तक्षेप करने, अतिक्रमण करने या जो कुछ घट रहा है... उसे अनदेखा कर देने का अधिकार। यह विडंबना ही है कि परिस्थितियों की हमारी समझ कैमरे के हस्तक्षेपों के द्वारा व्यक्त होती है।
वह देखती हैं कि तस्वीर लेना वस्तुओं को वैसा ही बने रहने देने में एक रुचि रखना है। तस्वीर लेना अपने भीतर एक शिकारी-तत्त्व समाहित रखता है। लोगों के चित्र लेना उनके निज की भंगता है। उन्हें उस रूप में देखना जैसा वे स्वयं को कभी नहीं देखते। उनके बारे में वह जानना जो वे कभी नहीं जान सकते। यह प्रतीति उन्हें वस्तुओं में बदल देती है, जिन्हें फिर प्रतीकात्मक रूप से अपने अधिकार में लिया जा सकता है।
फ़ोटोग्राफ़ चलती छवियों की अपेक्षा अधिक स्मरणीय हो सकते हैं। वे समय का एक सुस्पष्ट खंड होते हैं, प्रवाह नहीं। तस्वीरों को देखने के अनुभव में एक सौंदर्यात्मक दूरी अंतर्निहित प्रतीत होती है। तुरित रूप से नहीं तो समय के साथ अवश्य। समय तस्वीरों को, चाहे वे कितनी ही साधारण क्यों न हों, कला के स्तर पर प्रतिष्ठित भी कर सकता है।
सूज़न के नज़दीक फ़ोटोग्राफ़ी सामाजिक यथार्थ को अनगिनत सूक्ष्म इकाइयों के रूप में देखने की एक नामवादी दृष्टि को सुदृढ़ करती है। उन्हें लगता है कि यथार्थ की पुष्टि और अनुभव को तस्वीरों के माध्यम से अधिक तीव्र बनाने की आवश्यकता एक ऐसा सौंदर्यात्मक उपभोक्तावाद है, जिसकी लत अब सभी को लग चुकी है।
छवि-क्षण
छवि-क्षण—मैंने यह शब्द बनाया और इसने मुझे बनाया। जैसे ही उँगली शटर को छूती है, समय अपनी चाल भूल जाता है और एक खाई खुल पड़ती है। न यह पूरा समकाल है, न पूरी स्मृति। मैं वहाँ खड़ा भर नहीं हूँ, घटित हो रहा हूँ। इस क्षण में देखना, बस देखना नहीं है। आँख एक उपकरण नहीं, एक संदेह बन जाती है। यह दृश्य सच है या मैं इसे सच बना रहा हूँ? जो सामने है; क्या वह उतना ही मेरा है, जितना मैं उसका हूँ? फ़्रेम बनाते हुए मैं दुनिया को काट नहीं रहा, उससे कट रहा हूँ। एक अंश को चुनते ही शेष सब अनुपस्थित नहीं हो जाता। वह तीव्रतर पीछे खड़ा रहता है। अदृश्य, किंतु निर्णायक।
इस छवि-क्षण में नैतिकता ठहरती नहीं। मैं इस चेहरे को इसकी अनुमति से देख रहा हूँ या बस अपनी जिज्ञासा के बल पर? यह रोशनी मेरी है या किसी और के जीवन पर गिरती हुई एक आकस्मिक कृपा? मैं निर्णय लेता हूँ और उसी क्षण निर्णय मुझ पर लौट आता है। मेरा कैमरा बाह्य संसार ही नहीं देख रहा, मेरे भीतरी ढूह को भुरभुरा भी कर रहा।
कितना अलग होता है कि यह छवि-क्षण। जितना सूक्ष्म है, उतना ही विस्तीर्ण। एक क्लिक में अतीत की परछाइयाँ, भविष्य की संभावनाएँ और वर्तमान की अस्थिरताएँ एक साथ जमा हो जाती हैं। यह कोई स्थिर बिंदु नहीं, एक कंपित संतुलन है। अर्थ बनता है और टूटने लगता है। संभव है कि यह छवि-क्षण वह जगह है जहाँ मैं छवि-ग्रहण नहीं करता, स्वयं एक अस्थायी छवि बन जाता हूँ। देखता हुआ और देखा जाता हुआ। देखने के दो बिंदुओं के मध्य एक वस्तु। क्या मेरी धुंधली तस्वीरें मेरी कला का दोष या मेरे उपकरण की फ़ैक्ट्री-सेटिंग निर्दोषता नहीं, मेरे अस्तित्व की अपनी यातना की परिणति है?
छाया-क्षय
फ़ोटोग्राफ़ी से विरक्ति हुई सिनेमा के कारण। किसी मनःस्थिति में कही मैंने यह अधूरी बात। भीतर की थकान का नहीं, अंतर की टूटन का वाक्य। जैसे अपने छवि-क्षण पर भरोसा कम पड़ गया हो। फ़ोटोग्राफ़ी एक स्थिर निर्णय नहीं लगी, लगी एक अधूरा निष्कर्ष। कुछ घटित हुआ दृश्य में, लेकिन वह अपने आगे-पीछे अपूर्ण रह गया। और फिर मेरे सामने सिनेमा है, सिनेमैटोग्राफ़ी। एक ही दृश्य में अनंत दृश्यों का बहाव और उनमें गति है। अब दृश्य रुकता नहीं, खुलता है। एक चेहरा है, पर वह एक ही नहीं है। वह बदलता है क्षण-क्षण अपनी ही छवि को संशोधित करता हुआ। एक चाल, जो एक एक फ़्रेम में संकेत भर थी, यहाँ वह प्रक्रिया बन गई है। ऐसा लगता है कि हर स्थिर छवि अपने भीतर छिपी गति को देर तक दबा नहीं पाती और सिनेमा उसे मुक्त कर देता है।
लेकिन यह विस्तार सरल नहीं है। इस विस्तार में एक नई अनिश्चितता पैदा होती है। पहले एक छवि को थाम लेना संभव था, अब नियति है उसे छूटते हुए देखना। यहाँ नई उलझन जन्म लेती है। मैं स्थिरता की तीव्रता खोता जाता हूँ और गति की जटिलता पाता जाता हूँ।
छायेच्छाएँ
मेरी उतारी हर छवि देखे हुए का प्रमाण न हो, अनदेखे का संकेत हो। यह कैमरा मेरे संदेह का उपस्कर बन जाए कि जो सम्मुख है, वह अपर्याप्त है। मैं क्षण को पकड़ना नहीं चाहता, उसके भीतर रुकना चाहता हूँ। वह वाक्य बनना चाहता हूँ जो अपने अर्थ से पहले कुछ देर रुकता है। फ़्रेम मेरे लिए सीमा नहीं, एक व्यवस्थित चुप्पी हो। रोशनी बस चीज़ों को उजागर न करे, बाहर के अँधेरे को साथ लेकर आए। सब्जेक्ट पर मेरे निर्णय से अधिक मेरे संदेह दर्ज हों। निर्णय अंतिम होते हैं और मैं अंतिमता को अपना भरोसा नहीं सौंपना चाहता। चेहरे मुझे आकर्षित करते हैं; लेकिन मैं उन्हें नहीं, उनके बीच की दूरी को देखना चाहता हूँ। समय मेरी छवियों में ठहरे नहीं, वह धीमे-धीमे रिसता रहे। मैं स्मृतियों पर पूरी पकड़ का आकांक्षी नहीं रहा कभी। मैं दृश्य में प्रवेश करना चाहता हूँ, उसे भंग किए बिना। मेरी उपस्थिति हो दृश्य में एक असुविधा की तरह। साधारण मेरे लिए इतना पर्याप्त हो कि असाधारण की घोषणा में खो न जाऊँ। दृश्य इतना अदेखा रहे कि कभी न कह सकूँ कि मैंने उसे पूरी तरह देख लिया है। मैं जो देखता हूँ, वह मेरे देखने को बदल दे। और अंत में, माक़ूल यह होगा मैं धीरे-धीरे स्वयं एक छवि-क्षण में बदल जाऊँ। अनुपस्थित और लगातार उपस्थित।
छाया-पथ
मेरे पास जयपुर के पुराने शहर में पुरानी तस्वीरों के साथ पुराने पड़ते एक आदमी की तस्वीर है। उसकी सुंदरता उसके सेपिया में है। वह तुम्हें डाक से भेज रहा हूँ। कैसी लगी, लिखना...
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