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शनिवारेर चिट्ठी : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए

सोमवार

मैं लौटने की आख़री सड़क पर हूँ। यह सोमवार की तेज़ भागती सड़क है। इसकी रफ़्तार को दो दिनों के घर-आराम के बाद ‘काम पर लौटने’ के पंख लगे हैं। घर से पश्चिम की ओर निकलती है पहली सड़क। वह रास्ता बदलती रहती है। पश्चिम-पश्चिम-पश्चिम, फिर दक्षिण। दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम और फिर उत्तर। मेरा मन जोड़ता रहता है और हर बार विस्मित होता है कि मैं अपनी जगह से अधिक हिला भी नहीं और रास्ते बदलती सड़कें मुझे एक जगह से दूसरी जगह ले आईं। दूसरी जगहें छाया होती हैं, उन पहली जगहों की जहाँ-जहाँ मेरा संसार रहा।

इस आख़री सड़क पर मेरी उनींद मानो छाती पर हथेली के धाड़ आघात की आवाज़ से हिली।

मोटरबाइक पर एक आदमी था। दूसरा आदमी दूसरी मोटरबाइक पर था। कार में पहली औरत थी। दूसरी औरतें दूसरी जगहों पर थीं। आकाश में चीलें थीं। मैं अपने आत्म की उनींद में था और लोग और चीज़ों की नींद में थे। कुछ नींद-उनींद से परे सड़क को ताड़ रहे थे। दूसरे आदमी ने एक भद्दी-सी गाली बकी थी। पहले आदमी ने पहली औरत की कार के बोनेट को ग़ुस्से से थपथपाया था। मैं इस गाली को जानता था। इस गाली से पहली बार इसी शहर में मिला था। यह इस शहर की सबसे अच्छी गाली थी और हर घर-नुक्कड़-चौराहे-सड़क पर औरतों के आगे-आगे या उनके पीछे, आवारा फिरती हुई, पाई जाती थी। यह इस शहर की भाषा के रोज़मर्रा का नमक थी। औरत ने कार का शीशा गिराया। उसके चेहरे पर पीड़ा थी। उसके होंठ सिहरे हुए-से। उन होठों को प्रार्थनाएँ बुदबुदाने की आदत रही होगी। उस नाक ने झुक कर रहना सीख रखा होगा। वह सबसे अच्छी गाली के लिए सबसे अच्छे प्रार्थना-शब्द नहीं ढूँढ़ पाई। उसने फिर शीशा ऊपर चढ़ा लिया। वह अपने कमरे में बंद हो गई। मैं अपने कमरे पर लौटने लग पड़ा था। मेरा तमाशबीन अब भी अपनी उनींद में था। वह न-चौंकने की हद तक मर चुका था।

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मंगलवार

कपड़े गंदे हो गए हैं। शहर की खेह उनके सायों को घिसने लगी हैं। देथा और पंप्र को गंदे कपड़ों में रोज़ मुझे देखने की आदत पड़ने लगी है। जूते को रोज़ कई देर मेरे साथ बने रहने की आदत अभी नहीं पड़ी है। उसने अपना असंतोष मेरे पैरों पर दाँत चुभाकर जताया है। पैरों का प्रतिरोध जूते उतार देने में है। तुम घर से दूसरे जूते लिए आओगी, उससे पूर्व पैरों और जूते की यह दाँताकसी अभी चलती रहेगी। तुम्हें भी तो कुछ साल लगे होंगे, फिर तुमने मेरी आदत पाल ली होगी। बढ़ी हुई दाढ़ी थोड़ी और बेतरतीब हो गई है। छपने के लिए भेजूँ, उससे पहले मुझे कविताओं की कुछ पंक्तियाँ बदल लेनी हैं। मैं इस कमरे से अब तक सहज नहीं हो पाया हूँ। इसकी मर्दानगी को कुछ कम करने और इसे एक मादा सौम्यता सौंपने के लिए मैं इसे बरसाती कहने लगा हूँ। बरसाती—माने छत का वह एकाकी कमरा जो ख़ाली पुरुषों और उदास कवियों को किराये पर दी जाती है, ताकि वे आस-पास की चीज़ों से प्रेम करना सीख सकें। मैं प्रेम करना सीख रहा हूँ। मैं देर शाम लौटता हूँ और यह बरसाती गर्म आक्रोश में मेरे लिए दरवाज़ा खोलती है। तीन-तीन, चार-चार घंटों की मणौनी के बाद वह कुछ नरम पड़ती है। सुबह ज़रूर अच्छी गुज़रती है। यह सुबह जल्दी जग पड़ने वाली बरसाती है। यह अब चाय बना लेती है। इसकी देह में एक ख़ुशबू है। अब इससे हक़ से पीने को पानी माँगा जा सकता है। इसके पास नर्म बाँहों से तकिये हैं। दर-ओ-दीवार और चद्दर इसके श्वेत जिस्म को बादामी समीज़-सलवार पिहनाते हैं।

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गुरुवार

दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए मैं अपने ढीले पड़ते अस्तित्व को कसने का अभिनय करने लगा हूँ। जो ठीक किया जा रहा है, वह बहुत-सी टूटनों का नवीन संज्ञाकरण है। व्यवस्था— अव्यवस्था का वह मुखौटा होती है, जिसे देखने का हम साहस करते हैं। भीतर का खिसकना ही एकमात्र स्थिरता है, सब बाक़ी दिखावे की एक पकड़ है! मैं जो थामता हूँ, वही मुझसे धीरे-धीरे छूटता रहता है। हर कसाव में एक अदृश्य ढील छिपी होती है, जो दैनंदिन में उजागर होती है। नई दिनचर्या अस्तित्व की दरारों पर चढ़ाई गई पतली-सी परत होगी। मैं जो सँभालता हूँ, वह मुझे सँभालने का भ्रम पैदा करता है। स्थिरता की माँग कोई अवस्था नहीं, एक निरंतर टलती हुई मेरी पुरानी आकांक्षा है। मैं टिक गया, इसलिए नहीं कि मज़बूत था, इसलिए कि गिरने से बच गया। मैं अपने विसंघटन को क्रमबद्ध करने की भली इच्छा रखता हूँ। हर दिन का श्रम किसी परिणाम के लिए हो, किसी परिणाम से बचने के लिए नहीं। भीतर जो ढह रहा है, वह बाहर के संतुलन को संभव बनाता है। चूलें कसते-कसते मैं यह भूल जाना चाहता हूँ कि दरवाज़ा किस ओर खुलता है। जीवन को थामने की कोशिश हाथों से उनकी फिसल का अभाग्य न पाए! जो अर्थ बने, वह अर्थहीनता का परिष्कृत रूप न हो। मैं अपने भीतर घटित होना चाहता हूँ। हर दिन एक सूक्ष्म संशोधन हो, किसी बड़ी स्क्रिप्ट के बिना। जीवन की आदत नहीं, जीना चाहता हूँ जीवन। चूलें बिठाते उस ढाँचे का हिस्सा नहीं बन, जिससे अब तक बचता रहा है, हे मन!

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शुक्रवार

उनकी कुछ माँगें हैं—देखने में मामूली, अनुभव में नितांतावश्यक। मनुष्यत्व के अनुकूल व्यवहार की अपेक्षा। दश-एकादश से विंशति तक पारिश्रमिक का विस्तार। जीवन निर्वाह सहन भर न हो, साध्य बने। अष्टघंटीय श्रम-नियम की शास्त्रीय निहितता भर नहीं, व्यवहार में प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा। अतिरिक्‍त श्रम का यथोचित प्रतिफल। न्यूनतम वेतन की ऐसी सीमा की स्थापना जो श्रम-दिन को गरिमा प्रदान करे। न्यूनतम तय राशि का एक सुनिश्चित अधिष्ठान। मानक सर्वत्र एकरूप हो, संस्था की मनमर्ज़ियों से अपरिवर्तित। आश्वासन केवल श्रुति में नहीं, लिपि में। लिखित, प्रमाणित, दायित्वबद्ध। वचन समय-संलग्न हों और समय अपने निर्वाह में सत्य हो। वे श्रम और जीवन के मध्य एक संतुलन की पुनर्स्थापना चाहते हैं। थकान ही एकमात्र परिणाम नहीं, अपितु अस्तित्व का कोई स्वीकृत अर्थ भी शेष रहे।

और उन्हें सड़कों पर दौड़ाया गया... उस श्रमिक स्त्री को पाँच पुलिस-पुरिसों और एक स्त्री-पुलिस द्वारा धक्के से गाड़ी में बिठाया गया। मैं चाहता था कि वह श्रमिक स्त्री खुली आवाज़ में सड़क के समक्ष अपनी माँगों का सुकंठ पाठ करे, लेकिन वह भयभीत थी। वह एक ही वाक्य पुनरावृत्त करती रही—मैंने कुछ नहीं किया, मुझे जाने दो। सड़क की दूसरी ओर खड़े दूसरे श्रमिक (वे टाई पहनते हैं, अँग्रेज़ी बोल लेते हैं, अपना परिचय अपने पदनाम से देते हैं न कि श्रमिक ही होने की अपनी मूल वस्तुस्थिति से) फ़ब्तियाँ कसते रहे। सड़क की तीसरी ओर कुछ कवि खड़े थे। उनके पास हर मौक़े की क़ाबिल कविताएँ थीं।

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बुधवार

वह हँसती है। तुमने पूछा कि बचपन की मेरी पहली याद! ओह, यह अबोध दुख की एक कथा है। सूची बनाऊँ तो मेरे कुछ दुख पहाड़ के दुख हैं और कुछ समतल मैदान के। कुछ दुखों की रंगत गहरी हरी है। कुछ दुख, कुछ पुराने हमजोलियों की तरह कहीं पीछे छूट गए। मैं तब पाँच की रही थी। बच्चों के बीच ख़बर फैली कि अमुक जगह लड्डू बँट रहे हैं। लड्डू! वह गोल-पीतवर्णी परसाद जिसके रंग-गंध-सुआद मुँह में रखते ही घुलने लगते हैं। खाण-पीण का कोई ख़ूब झरफर तो लगा नहीं था, अपने घर तो तुरत ही मुँह में पानी भर आया। ओईजा-बाज्यू का ठुल सहार कि कभी-कभी ऐसे लड्डू बँट जाते हैं। मैंने तेज़ दौड़ लगाई। गिरी-पड़ी-घुटने छिले। पहुँची तो पाया कि लड्डू बँट चुके, लोगबाग़ जा चुके। ततु ख़राब लगना यह भी था, जिसे आज भी किया करती हूँ याद। ख़ाली परात ज़मीन पर झाड़ी जा चुकी। मुनई टेक वहीं रोने लगी। देखा वहाँ चींटियों की क़ितार लगी हैं। वे भी लड्डू के मज़े ले रहे। अह अभाग्य! जोशी के दालान के पीले लट्टू को ताकते जीने का अँधेरा कम न था कि अब ये लड्डू भी हाथ से गए! ऊपर आकाश से पूछा—ज़रा देखो धैं सैबो! साहिब हमें भी देखिए तो सही! हम शुद्ध ग़रीब थे। मैंने अंगुल के पोर से उस भूमि पर मेरे हिस्से के दो लड्डू बनाए और खा लिए।

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शनिवार

इस खिड़की से रात की आख़री ट्रेन दिखती है। यह रात के पूरी तरह से उतर आने की बेला है। शहर ने अभी अपनी आँखें बंद नहीं की हैं। रोशनियों की एक पतली-थकी हुई परत अब भी सड़कों पर फैली है। वे जैसे दिन का कोई अधूरा वादा अभी भी पूरा कर सकने के दमखम से चूके नहीं हैं। यह ट्रेन सरकने लगी है। संतुलित, निश्चित, कोई हड़बड़ी नहीं। इस बात से बेपरवाह कि उसका जाना मैं उसके जाने के बाद भी घंटों तक सोच सकता हूँ। मैं सोच रहा हूँ। क्या सचमुच यह आख़री ट्रेन थी! आख़री स्त्री। आख़री प्रेम। आख़री, जिसे किसी मुक्त क्षण में एक किनारा दिया जा सकता है। चीज़ों को अंतिम मान लेने में एक सदाशय राहत है, एक ‘क्लोज़र’। जैसे अनिश्चितता को एक आश्वस्ति सौंप दी गई हो। मुझे ट्रेनों के बारे में थोड़ा और सोचना चाहिए। एक बार बाहर से उनके बारे में सोचना चाहिए, फिर एक बार अंदर बैठकर। उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जिनके साथ ट्रेनों में बैठा। उनके बारे में जिन्हें हाथ हिला विदा किया। स्टेशनों के बारे में मुझे अभी नहीं सोचना चाहिए। उनकी पीली रोशनियों में अतीत की अपनी पीड़ाएँ हैं। यह ट्रेन जा रही है और मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। मुझे दूसरे तरीक़े से ठहरना चाहिए। ज़रूरी नहीं कि यही मेरे हिस्से का सच हो। स्मृति का परस मुझे भी तो अदृश्य पटरियों पर लिए जा रहा है। ट्रेनें धीरे-धीरे आगे निकल गई हैं, उनकी रोशनी बनी रही हैं। वह मेरे अँधेरे में घुली रही हैं। मैं अब भी खिड़की पर हूँ। खिड़की से लौटने से पहले अब मैं यह सोचना चाहता हूँ कि आख़री वह ट्रेन नहीं थी जो गुज़री, आख़री वह क्षण था जब मैंने उसे देखा और उसे आख़री कहा।

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शनिवारेर चिट्ठी में यह भी पढ़ सकते हैं : कल से रवैया फ़र्क़ होगा

 

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