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शनिवारेर चिट्ठी : अजाने देशों में

यात्रा-कल्पना-स्मृति

तीन घंटे की एक बस-यात्रा किसी मनुष्य को क्या दे सकती है? वह कवि है तो अधैर्य। वह प्रेम में है तो प्रत्याशा। वह पुरानी होती स्त्री है तो पीठ की पीड़ा और वह ऊब रहा आदमी है तो... तो बहुत सारे शहर। मैं कह सकूँगा तो कहूँगा अपने मनुष्य की कथा। मैं खिड़की के पास बैठा हूँ। बस इस शहर से हमारे शहर जा रही है। सड़क के किनारे नई-पुरानी बातें हैं। वर्णन के लिए मेरे पास एक पुराना वाक्य है : इस दृश्य में कुछ भी असाधारण नहीं है। मेरे पास वियना की याद है। यह सूर्योदय से पहले का समय था। दो लोग बातें करते हुए इस शहर से गुज़र रहे थे। उनकी बातचीत शहर से बड़ी हो गई थी। हांगकांग की याद रोज़मर्रा की भागती हुई याद है, नियॉन रोशनियों और भागती हुई भीड़ के बीच चेहरे क्षण भर को दिखाई देते थे और फिर ग़ायब हो जाते थे। यह लोगों के लगातार एक-दूसरे से छूटते रहने की याद है। पेरिस में बारिश थी। किसी खिड़की में पीली रोशनी जल रही थी। रोम की याद उस रात की याद है, जिसमें फ़व्वारों, सड़कों और भटकते हुए लोगों का एक स्वप्न है। न्यूयॉर्क में रोशनियाँ थीं, धुआँ था और एक ऐसा अकेलापन जो भीड़ से पैदा होता है। मेरी टैक्सी भागी जा रही थी। टोक्यो मुझे ‘अनुवाद में जो खो जाती है वह है कविता’ की तरह याद है। ऊँची इमारतें, होटल की खिड़कियाँ और दो मनुष्यों के बीच विस्तृत एक अतिशय चुप्पी। उस चुप्पी में एक अदृश्य निकटता। वेनिस की याद उन गलियों की याद है, जहाँ मैं रास्ता भूल गया था। आज तक नहीं जानता कि फिर कहाँ पहुँचा। कहते हैं कि कुछ शहरों को समझने के लिए उनमें खो जाना ही एकमात्र मार्ग है। लिस्बन की कथा धूप की कथा है। दूसरी बार लौटता हूँ वियना तो वियना की याद एक तीसरे आदमी की याद है।

बस रुकी है और एक भागता हुआ आदमी यादों के मेरे इस कारबार में घुस आया है। वह अंदर आया है तो मैं बाहर आ गया हूँ। एक बार पिता मेरी कविता में आ गए थे तो मैं उनके जूते पहन कविता से बाहर निकल गया था। इस सोच में हैरत है कि स्मृति और कल्पना दोनों ही अनुपस्थित को उपस्थित, उपस्थित को अनुपस्थित बना सकती हैं। दोनों हमें उस जगह से दूर ले जा सकती हैं, जहाँ हम वास्तव में होते हैं। यह कारण कि तीन घंटे की मेरी यह यात्रा कभी तीन घंटे की नहीं होती। तुम तक आने के तीन घंटों में मैं पृथिवी के तीस फेरे लगा लेता हूँ। यों मैं थक भी जाता हूँ।

अजाने देशों में

क्या किताबों की अपनी यात्राएँ होती हैं? मुझे कानपुर में छपी एक दुर्लभ किताब सरदार शहर (बीकानेर) की एक पब्लिक लाइब्रेरी में मिली। इन दिनों जब दिल्ली में छपी किताबें नोएडा तक में भी इस तरह नहीं पहुँच पातीं, तब एक सुदूर शहर की लाइब्रेरी में इस किताब से मिलना सुयोग ही कहा जाएगा। मैं ‘अजाने देशों में’ की बात कर रहा हूँ। यह विमला कपूर का यात्रा वृत्तांत है, जो पत्र-शैली में विरचित है। ये पत्र उन्होंने अपने परिवार की एक बालिका प्रभा को संबोधित किए हैं, जिसने जहाज़-यात्रा के संबंध में उत्सुकता प्रकट की है। कृति का वितान बीस अध्यायों में है। वहाँ जहाज़ हैं, जाना है, स्त्रियाँ हैं, शहर हैं, दुनिया है, लोग हैं, सभ्यता है—संस्कृति है, द्वितीय विश्वयुद्ध के उत्तर की समय-समीक्षा है और लौटना है। वाचन पर त्वरित ही ध्यान उस ख़ासियत पर पड़ता है, जिस ओर राहुल सांकृत्यायन ने प्राक्कथन में इशारा किया है। साहित्य में पहिले-पहिल उतर रहीं विमला कपूर की लेखनी अनभ्यस्त-सी नहीं मालूम पड़ती। वह अपनी बातों को जैसे ढंग से कहती हैं, वैसे एक स्त्री ही कह सकती है। चूँकि यह कृति उन्होंने एक बालिका के नाम संबोधित पत्रों के रूप में संभव की है, उन्हें सरल और स्पष्ट शैली को अपनाना पड़ा :

“सबसे बड़ी बात यह है कि अनजाने देशों में कहीं उन्होंने अनात्मीयता का भाव नहीं अनुभव किया। वस्तुतः सभी जगह सत्य-शिव-सुंदर है, यदि आदमी स्वयं उसे उलटा समझने की कोशिश न करे।”

...हमारा ‘एस. एस. आस्ट्रेलिया’ जहाज़ जिसका वज़्न उन्यासी हज़ार टन है, बहुत सुंदर तथा नया पोत है। इसने पहली बार जल में प्रवेश किया है और आस्ट्रेलिया से जिनेवा तक की यात्रा इसकी प्रथम यात्रा है। केबिन और शाला की सफ़ाई और सजावट आदि में कमाल किया गया है। हर चीज़ चमाचम कर रही है। चमचमाते हुए काठ के फ़र्श पर मुँह तक देखा जा सकता है। हमें छियत्तर नंबर का केबिन मिला है। चारपाई, बिछौना और केबिन की भीतरी स्थिति बहुत साफ़-सुथरी है। भीतर ही ठंडे, गर्म पानी के नलों का बेसिन चमक रहा है। एक ओर दो तौलिए टँगे हैं, दूसरी ओर शीशे की छोटी-सी सुराही में ठंडा पानी पीने के लिए भरा हुआ है। पास ही शीशे के सुंदर गिलास रखे हैं। बिछौने के पास ही कलापूर्ण टेबुल-लैंप लगा हुआ है, जिससे रात में पढ़ने या तुम्हें पत्र लिखने में बहुत सुविधा रहती है। केबिन का रोशनदान समुद्र की तरफ़ खुलता है, जिससे दूर तक का दृश्य चारपाई पर बैठे-बैठे देख सकते हैं...

धौंस और ठप्पे

इसके समानांतर मेरी तात्कालिक मनःस्थिति का सम्मुख इस विषय-प्रसंग से हुआ है। ‘साखी’ पत्रिका के नवप्रकाशित 'साही अंक' में ‘लेखक बनाम प्रकाशक : धौंस और ठप्पे’ शीर्षक साक्षात्कार में कवि-आलोचक विजयदेव नारायण साही से केशवचंद्र वर्मा की पुरानी बातचीत नई हुई है। केशवचंद्र पूछते हैं कि “किताबों के फैलते हुए व्यापार में इस समय जब लेखक और प्रकाशक के बीच आपसी समझदारी और सामंजस्य में बढ़ती होनी चाहिए, वहाँ अजब विडंबना है कि इन दोनों पक्षों में उत्तरोत्तर एक दूसरे के प्रति अविश्वास और एक दूसरे को झाँसापट्टी देकर अधिक से अधिक वसूल कर लेने का एक माहौल बनता जा रहा है। इस तनाव के मूल में क्या है?” साही ने इसके उत्तर में कहा है कि “इसकी जड़ में केवल एक ही बात है—वह बहुत साफ़ दिखती है—यह कि प्रकाशक लेखक की रचना पर पूरी तरह से अपना स्वामित्व चाहता है। प्रकाशक किताब को 'मेरी है' मानकर रहना चाहता है। लेखक को वह एक तरह का ‘अनिवार्य पाप’—गुनाह बे-लज़्ज़त या ‘नेससरी इविल’ मानता है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह लेखक को समाप्त करने का ही उद्देश्य लेकर चलता है। किताब के मुनाफ़े में से वह प्रोफ़ेसर को या अफ़सर को पैसा भरना तो न्यायसंगत मान लेता है, लेकिन लेखक को एक डबल भी देना उसे खल जाता है। काग़ज़, छपाई, जिल्दसाज़ी सभी का पैसा समय पर दे देता है। सिर्फ़ लेखक का पैसा लटकाता है।”

संवाद में प्रकाशक द्वारा अपने आर्थिक हित में लेखक को ही बीच से हटा देने की शातिर योजना, लेखक की हैसियत और पैसे की चाह, ‘कोर्स बुक’ की दौड़ में लेखक की दुर्गति, परस्पर लिखित अनुबंध, सावधि प्रकाशनों से जुड़ी दलील, कॉपीराइट-क़ानून में संशोधनों की आवश्यकता, लेखक-अनुवादक-प्रकाशक-प्रश्न आदि पर विचार किया गया है। बीच के काम-मुनासिब संबंध के पक्ष में साही यह राय रखते हैं कि “समझौते ऐसे नहीं करने चाहिए जो कि सरीहन दूसरे की दुर्बलता का नाजायज़ फ़ायदा उठाता दिखाई पड़े, जैसा कि दुर्भाग्यवश प्रकाशक लेखक से आज कराता है।”

इनटू द वाइल्ड

सामान्य समझ तो यही कहती आई है कि आत्म-साक्षात्कार उधर जाता है और आत्म-विनाश इधर। एक तरफ़ बनना, दूसरी तरफ़ बिगड़ना। लेकिन कुछ लोग होते हैं—या कहूँ कुछ बेचैन आत्माएँ—जिनमें सच की खुजली इतनी गहरी, इतनी बेरहम हो जाती है कि वह जीते रहने की साधारण, देहगत समझ से ही उलझ पड़ती है। मैककैन्डलेस शायद ऐसा ही एक आदमी था। अपने ही पीछे पड़ा हुआ और अपने ही आगे भागता हुआ। उसकी भीतर की यात्रा किसी संतुलित साधना का रास्ता नहीं थी, जहाँ दीपक जलता रहे और हवा भी न लगे। वह तो किनारे तक जाने या कहें कि किनारे के पार झाँकने की ज़िद थी। वह एक-एक कर उन सब सहारों, उन सब पर्दों, उन सब बिचौलियों को उतार फेंकना चाहता था—परिवार, समाज, धन, नौकरी, संस्थाएँ—ताकि देख सके कि आख़िर बचता क्या है, जब मनुष्य से उसका लगभग सब कुछ छीन लिया जाए। मगर ऐसी तलाश अपने साथ एक महीन-सा ज़हर भी लाती है। आदमी अपने को खोजने निकलता है और रास्ते में उन्हीं सीढ़ियों को तोड़ने लगता है जिन पर खड़े होकर वह अब तक जीता आया था। इसीलिए मैककैन्डलेस की कहानी को न तो आत्मबोध का उजला आख्यान कहकर निपटाया जा सकता है, न ही मूर्खतापूर्ण रूमानीपन की एक असफल हरकत कहकर। वह वहाँ रहता है, उस धुँधले इलाक़े में, जहाँ आत्म-साक्षात्कार और आत्म-विनाश एक-दूसरे का चेहरा पहन लेते हैं। जितना वह अपने असली, अनगढ़, असुरक्षित स्वरूप के पास पहुँचता है, उतना ही उसकी देह, उसका जीवन, उसका सांसारिक होना दाँव पर चढ़ता जाता है। मैं अतिशय नहीं कहूँगा यदि उसकी यात्रा को एक किसम की ‘उग्र अंतर्यात्रा’ कहूँगा। वह भीतर की ओर जाती हुई ऐसी राह थी जहाँ खोज भी थी और गलना भी। उसकी त्रासदी यह नहीं थी कि वह मर गया, यह थी कि वह जिस सत्य को पकड़ना चाहता था, उसी सत्य ने उससे इतनी बड़ी क़ीमत वसूल की कि आत्म-खोज और आत्म-विनाश के बीच खिंची हुई रेखा धुँधली पड़ते-पड़ते लगभग ग़ायब हो गई।

लेकिन कथाएँ अपने अंत से नहीं बनतीं। ‘इनटू द वाइल्ड’ में अजीब-सी उदासी के साथ एक हल्की-सी रोशनी भी भीतर जलती रहती है। जीवन का अर्थ हमेशा तैयार नहीं मिलता, उसे खोजने का साहस भी करना पड़ता है। और यह साहस, चाहे जितना अधूरा हो, मनुष्य को थोड़ा अधिक जीवित, थोड़ा अधिक मानवीय बना देता है।

‘इची बूट्स’ और ‘तिंग—डेली लाइफ़ इन चाइना’

नोराली (इची बूट्स) के ट्रेवल वीडियोज़ देखते मेरे भीतर यह अनुभूति जगती है कि वह यात्रा नहीं करती, पृथ्वी को पढ़ती है। आरंभ में वह अपनी मोटरसाइकिल से सुदूर यात्राएँ करती कोई भी स्त्री दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे वाहन, दूरी और भूगोल की चकित कर देने वाली विशालता अप्रासंगिक होने लगती है। जो शेष रह जाता है, वह है एक सजग दृष्टि। देखने की, ग्रहण करने की और अपने को संसार के सम्मुख खुला छोड़ देने की दृष्टि। मुझे उसकी निष्क्रिय जिज्ञासा आकर्षित करती है। एक शांत, विनम्र जिज्ञासा जो संसार पर अपने अर्थ आरोपित नहीं करती, बस उसे उसके अपने रूप में समझना चाहती है। वह यात्रा को भोग नहीं रही, उसे सुन रही है। उसके यात्रा वृत्तांत में शब्द कम हैं, दृश्य अधिक। वह लगातार बोलती नहीं चलती, न ही हर अनुभव का अर्थ तत्काल उद्घाटित करती है। यह कितना सुखद है कि उसके पास एक कवि की भाषा या एक कवि की आँखें नहीं हैं! उसके कैमरे में दर्ज परिदृश्य समय, एकांत और मनुष्य की क्षणभंगुर उपस्थिति के दस्तावेज़ हैं। वह मुझे इस अनुभव के क़रीब लाती है कि यात्रा का अर्थ गंतव्य तक पहुँचना भर नहीं है। यात्रा अपने भीतर इतनी जगह बना लेना है कि संसार उसमें प्रवेश कर सके।

यात्रा के बारे में हमारी एक भ्रांति यह रहती है कि हम उसे स्थान-परिवर्तन से जोड़ते हैं। भ्रम होता है कि किसी दूसरे देश, किसी दूसरे भूगोल, किसी दूसरी भाषा तक पहुँचना ही यात्रा है। तिंग (तिंग—डेली लाइफ़ इन चाइना) मेरे लिए इस भ्रम को बार-बार तोड़ती रहती है। तिंग के वीडियोज़ किसी देश के बारे में कम और घरेलू जीवन की गरिमा के बारे में अधिक हैं। वे याद दिलाते हैं कि मनुष्य का अधिकांश जीवन उन क्षणों से निर्मित होता है जिन्हें इतिहास कभी दर्ज नहीं करता। भोजन बनाना, घर सँवारना, मौसम को महसूस करना, किसी प्रियजन की प्रतीक्षा करना—ये ही वे छोटे कर्म हैं जिनसे जीवन का वास्तविक ताना-बाना बुना जाता है। उसके वीडियोज़ देखते मेरे भीतर चीन की कोई भव्य छवि नहीं बनती, एक अबूझ निकटता जन्म लेती है। एक दूरस्थ समाज अचानक अमूर्त नहीं रह जाता।

एक रूमानी ख़याल

मैं बस में बैठा हूँ। मैं बस में बैठा हूँ कि खिड़की से बाहर की सड़क पर चल रहा हूँ। खिड़की से बाहर की सड़क पर चल रहा हूँ कि मन किसी अन्य सड़क पर आगे निकल पड़ा है। मन की गति तेज़ है और मैं लड़खड़ा गया हूँ। मैं लड़खड़ा गया हूँ कि मैं डर गया हूँ। मैं डर गया हूँ कि बस अपने पहियों पर नहीं, मेरे पैरों पर भागी जा रही है। अब अधिक सजग होता हूँ। अधिक सजग होता हूँ कि साक्षी होता हूँ। मन से कहता हूँ कि आज की यात्रा में तुम्हें बस सड़क पर रहना है। किसी जगह टिकना नहीं। किसी जगह टिकना नहीं कि बस सड़क पर बने रहना है। यह सड़क अब स्कूल को जा रही है। यह सड़क तीसरे पहर तक थक गई है। यह सड़क तीसरे पहर तक थक गई है कि थकी सड़क स्कूल से लौट रही है। उलटी सड़क नयनतारा के घर जा रही है। कट...कट... विराम। 

अनुताप से कहता हूँ तुमसे कि यात्राएँ मुझे असहज करती हैं। मैंने बरसों-बरस अपने बिस्तर पर लेटे एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा का कठिन अभ्यास किया है। मेरे अभ्यास में विघ्न अब तुम्हारी उपस्थिति से सृजित है। विघ्न अब तुम्हारी उपस्थिति से सृजित है कि तुम्हारे स्कूटर पर तुम्हारी पीठ पर टँगे दुनिया घूम आने का ख़याल कितना रूमानी ख़याल है!

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