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शनिवारेर चिट्ठी : क्रिस्टोफ़र नोलन, अमृता शेर-गिल, मंगलेश डबराल और अन्य मुलाक़ातें

समय

वह किसी सीधी बहती हुई नदी की तरह नहीं। वह लौटता हुआ और मुड़ता हुआ। समय अपनी ही दिशा पर संदेह करता हुआ। समय बंद वृत्त है और ‘इन्वर्ज़न’ समय की स्मृति के विखंडन के रूप में। भविष्य और अतीत एक-दूसरे में उलझ जाएँ तो मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा कहाँ बचती है। एक दूसरी जगह समय भारी है। गुरुत्वाकर्षण से दमित। क्रूर और उदास। तीसरी जगह समय स्वप्न की परतों में घुल जाता है। हर परत उसे और धीमा करती जाती है। समय स्मृति है, अनुताप और इच्छा। समय मनुष्य के भीतर अपनी जगह रखता हुआ अदृश्य घाव है...

ये क्रिस्टोफ़र नोलन की कुछ फ़िल्मों के पाठ हैं। सम्यक् ही मैं उन्हें समय का कवि पुकारना चाहता हूँ। तुम चाहोगी तो हम उनकी नई फ़िल्म साथ देखेंगे। पुरानी फ़िल्में देखते हुए मुझे पढ़ना पड़ा। वे फ़िल्में दुबारा देखनी पड़ीं। वे फ़िल्में मेरा एकांत माँगती थीं। 

उनकी नई फ़िल्म ‘ओडिसी’ पर आधारित बताई जा रही है। तुम जानती ही हो कि यह प्राचीन यूनानी कवि होमर द्वारा रचित महाकाव्य है। इसमें ट्रॉय-युद्ध के बाद नायक ओडीसियस की अपने घर इथाका लौटने की लंबी और कठिन यात्रा की कथा है। नई फ़िल्म के बारे में प्रचारित कुछ बातों ने मुझे आकर्षित किया है। ‘साइक्लोप्स’ के प्रदर्शन को वैभव देने में बिल इरविन की प्रमुख भूमिका रही है। ‘ओडीसियस’ और ‘टेलीमेकस’ के किरदार टॉम हॉलैंड निभा रहे हैं जबकि सामंथा मॉर्टन के किरदार को अधिक मानवीय रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। फ़िल्म में लुपिता न्योंगो दो भूमिकाएँ निभाएँगी—हेलेन ऑफ़ ट्रॉय की और क्लाइटेमनेस्ट्रा की। क्लाइटेमनेस्ट्रा अगामेम्नॉन की पत्नी है। अगामेम्नॉन का किरदार बेनी सैफ़्दी निभा रहे हैं। 

नोलन ने बताया है कि उनकी टीम ने पारंपरिक यूनानी कवच की सामान्य कल्पना से अलग कुछ रचने की कोशिश की है। उन्होंने मिनोअन शैली के काले और कांस्य ख़ंजरों का उल्लेख करते हुए कहा कि संभव है उस युग में कांस्य को काला करने की तकनीक मौजूद रही हो। संगीत को लेकर भी प्रयोग किए जा रहे हैं। संगीतकार लुडविग गोरान्सन से कहा गया है कि वह ऑर्केस्ट्रा का प्रयोग न करें कि उस काल में ऑर्केस्ट्रा जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में थी नहीं। मैंने सुना कि गोरान्सन ने पैंतीस कांस्य गोंग किराए पर लिए ताकि उत्फुट ध्वनि उस प्राचीन युग की अनुभूति दे सके। फ़िल्म में ट्रैविस स्कॉट को एक बार्ड के रूप में शामिल करना उच्चतम प्रयोगशील निर्णय कहा जा सकता है। नोलन का तर्क है कि ओडिसी जैसी कथाएँ पीढ़ियों तक मौखिक काव्य परंपरा के माध्यम से जीवित रहीं और आधुनिक ‘रैप’ उसी मौखिक परंपरा का समकालीन रूप है। यह देखना दिलचस्प होगा कि नोलन यूनानी देवताओं को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस प्रश्न में नोलन की भी रुचि रही है कि देवता वस्तुतः कहाँ मौजूद हैं? प्रकृति में, मनुष्य की कल्पना में या उसके भय और आस्था में?

बेला

मंज, मैं कवि होना चाहता हूँ और तुम चित्रकार! यह हमारी इच्छाओं की एक कविता है और फ़िल-वक़्त जीवन अपने गद्य-प्रवाह में है। मुझे प्रेम है तुमसे तुम्हारी कला के कारण भी। कला-कारणों से कुछ प्रेम है अमृता शेर-गिल से भी। तुमने वह काल्पनिक चिट्ठी पढ़ी होगी जो अमृता ने मुझे लिखी थी। उसने पत्र का आरंभ ही इस वाक्य से किया था कि मैं कविताएँ नहीं लिखती और तुम चित्र नहीं बनाते। यह विलक्षण अपरिचय रहा है हमारे बीच। बहुत सी-बातों के बीच उसने लिखा था कि उसके शिक्षक लूसिएं साइमन ने शुरू में ही उसे कह दिया था कि उसे पश्चिम नहीं पूरब भाएगा, क्योंकि उसकी कला वहीं अपनी जड़ें रखती है। आदमी जेनेटिकली भी अपनी मिट्टी से जुड़ा होता है जो अनायास भी उभरता ही है उसमें। “यूरोप पिकासो, मेतिस और बराक का है—मेरे लिए भारत है...” कहा था उसने।

अमृ! मीरा नायर अमृता शेर-गिल पर एक फ़िल्म बना रही हैं, नाम रखा है ‘अमृ’। इसे अमरी पढूँ तो भी यह एक सुंदर शब्द है। अमरी का अर्थ है देवता की स्त्री। मुझे इस शब्द से कच्चे आम की गमक आ रही है। जारी पोस्टर में अंजलि सिवारामन तुरंत से ध्यान खींचती हैं। उन्हें चुना गया है अमृता की भूमिका निभाने के लिए। एमिली वॉटसन उनकी माँ मैरी-अंतोआनेत गॉटेसमैन के रूप में, जयदीप अहलावत उनके पिता उमराव सिंह शेर-गिल की भूमिका में, क्रिस्ज़्तियान चाकवारी विक्टर एगन के रूप में, अंजना वासन इंदिरा शेर-गिल के रूप में, जिम सर्भ कार्ल खंडालावाला के रूप में और प्रियंका चोपड़ा रहस्यमय मैडम अज़ूरी की भूमिका में दिखाई देंगी। उमराव सिंह शेर-गिल में भी मेरी रुचि रही है, उनके फ़ोटोग्राफ़र होने के कारण। उनका न्यूड सेल्फ़-पोर्ट्रेट मुझे पसंद है। अमृता के न्यूड्स में से एक इंदिरा की प्रतीत होती है।   

मीरा नायर कहती हैं कि अमृता शेर-गिल की कला पिछले कई दशकों से उनकी हर फ़िल्म के भीतर किसी गुप्त धारा की तरह बहती रही है। “उन्होंने मुझे केवल चित्रों को नहीं, संसार को देखना सिखाया।” वह मानती हैं कि यूरोपीय प्रशिक्षण की परिष्कृत दृष्टि को भारतीय आत्मा की गहन संवेदना में इस तरह रूपांतरित कर देने का साहस उनसे पहले शायद किसी कलाकार में नहीं था। उनकी कला में रंग केवल रंग नहीं थे; वे स्मृति, मौन और मनुष्य की आंतरिक गरिमा के विस्तार बन जाते हैं। “साधारण भारतीय स्त्री-पुरुषों को उन्होंने जिस करुणा, ठहराव और आत्मीय प्रकाश में देखा, वही दृष्टि मेरी सिनेमाई भाषा की आरंभिक प्रेरणा बनी और आज तक मेरे भीतर एक बेचैन, जीवित कंपन की तरह उपस्थित है।”

काल

मंगलेश डबराल याद आते रहते हैं अपनी कविताओं की सघन उपस्थिति से। उन्हें दूर से ‘डबराल सैप’ पुकारता था। वह 2014 से पहले की दुनिया के लोकतांत्रिक कवि-लेखक थे। सदैव अपने आस-पास कहने-सुनने का अवसर बनाए रखते थे। तब हमें भय नहीं हुआ कभी कि कोई टिप्पणी करो और कोई अमुख-विमुख व्यक्ति अभियान के रास्ते आएगा। तब ह्यूमर भी एक साहित्यिक विधा थी। मैंने बार-बार हँसी में कहा, “मंगलेश डबराल मुझसे तीन बार टकराए। तीनों बार पूछा कि आप कहाँ रहते हैं और क्या करते हैं? तीनों बार उन्होंने मंच से ‘टॉर्च’, ‘अटैची’ (!) और ‘मोबाइल’ कविता सुनाई।” तुम्हारा उनसे परिचय है—उनकी एक कविता ‘उस स्त्री का प्रेम’ से, जो मैंने बार-बार तुम्हें गद्यांतर करके चिट्ठी में भेजी। एक और बार भेजना चाहता हूँ इस शनिवार के डाक से : 

“वह स्त्री पता नहीं कहाँ होगी जिसने मुझसे कहा था वे तमाम स्त्रियाँ जो कभी तुम्हें प्यार करेंगी मेरे भीतर से निकलकर आई होंगी और तुम जो प्रेम मुझसे करोगे उसे उन तमाम स्त्रियों से कर रहे होगे और तुम उनसे जो प्रेम करोगे उसे तुम मुझसे कर रहे होगे। यह जानना कठिन है कि वह स्त्री कहाँ होगी जो अपना सारा प्रेम मेरे भीतर छोड़कर अकेली चली गई और यह भ्रम बना रहा कि वह कहीं आस-पास होगी और कई बार उसके आने की आवाज़ आती थी हवा उसके स्पंदनों से भरी होती थी। उसके स्पर्श उड़ते हुए आते थे। चलते-चलते अचानक उसकी आत्मा दिख जाती थी उतरते हुए अँधेरे में खिले हुए फूल की तरह। बाद में जिन स्त्रियों से मुलाक़ात हुई उन्होंने मुझसे प्रेम नहीं किया शायद मुझे उसके योग्य नहीं समझा। मैंने देखा वे उस पहली स्त्री को याद करती थीं उसी की आहट सुनती थीं उसी के स्पंदनों से भरी हुई होती थीं उसी के स्पर्शों को पहने रहती थीं उसी को देखती रहती थीं अँधेरे में खिले हुए फूल की तरह।” 

यह शनिवार उनकी जन्मतिथि का शनिवार है। यह शनिवार उनकी कविताओं के साथ बीतेगा और यह उदास कर देने वाला तथ्य याद करते हुए भी कि जिस अधिनायकवाद और तानाशाही के विचार से वह उम्र भर अपने जीवन-लेखन में लड़ते रहे, उसके ही एक प्रतिनिधि ने इस देश के प्रधानपद की शपथ पहली बार इस तिथि को ही ली—16 मई (2014) 


अवधि


वह एक होड़ थी। बड़ी परीक्षाएँ पास कर कुछ बड़ा बन जाने की होड़। ख़ूब किताबें पढ़ी। विफल रहा तब भी। किताबों से मन उचाट हो गया। मैं फ़िल्में देखने लगा था साहित्यिक भूख की तृप्ति के लिए। इन कुछ वर्षों से फिर किताबों की ओर लौट रहा हूँ। मैंने बीते दो-तीन वर्षों में कविताओं के सौ संग्रह पढ़े। दस हज़ार कविताएँ पढ़ीं। गद्य अभी भी कुछ दूर रहा है मुझसे। नए परिवेश में अविनाश की सजग उपस्थिति है मेरे आस-पास, यह शुभ है। वह हमेशा मित्रवत और शुभेच्छु रहा है, यह तुम जानती हो। उसने अभी ही मुझे कृष्ण बलदेव वैद और विजयदान देथा जैसे बड़े लेखकों से आरंभिक परिचय हेतु कुछ पुस्तकें दी हैं। शेखर से फिर मिला इन्हीं दिनों। ‘नए शेखर की जीवनी’ अविनाश का हाल के वर्षों में प्रसिद्ध हुआ उपन्यास है जो दो खंडों में आया है। इसके पहले खंड से मैंने तुम्हारे लिए कुछ गद्यांश सगृहीत किए हैं, भेजूँगा तुम्हें। ‘बिज्जी’ में मेरी आत्मीय उत्सुकता को देखते हुए राजेंद्र देथा ने मुझे ‘बातां री फुलवाड़ी’ का एक खंड पढ़ने को दिया है। मैं पिछले दिनों बांग्लादेशी कवि शम्सुर रहमान का प्रशंसक हुआ। जोशना का अनुराग उसने मुझे उनकी गद्य किताबें मूल बांग्ला में पढ़ने को दी हैं। ‘कवि का गद्य’ गद्य की एक ख़ास विधा ही है, ऐसा मैं देखता हूँ। मन भीग गया। उस नमी में मैंने उस रात भात पकाकर खाया। जोशना को मैं नेह से भात-कवयित्री के रूप में ही याद भी रखता हूँ। 

दरमियान

चिल्ला गाँव के क्रो’ज़ नेस्ट (यह मेरी रिहाइश है और यह दिल्ली जानती है) में इस शाम देर तक ‘द थ्रिल इज़ गॉन’, ‘क्रॉस रोड ब्लूज़’, ‘आइ’म योर हूची कूची मैन’, ‘बॉर्न अंडर अ बैड साइन’, ‘कॉल इट स्टॉर्मी मंडे’, ‘स्मोकस्टैक लाइटनिन’, ‘मैनीश बॉय’, ‘डस्ट माई ब्रूम’, ‘डार्क वॉज़ द नाइट, कोल्ड वॉज़ द ग्राउंड’ और ‘स्वीट होम शिकागो’ जैसे ब्लूज़ देर तक गूँजते रहे। यह पृष्ठभूमि तैयार की गई थी—एक कवि को पढ़ने के लिए। ज़ेहन में मैल्कम एक्स, सीली हैरिस, एरिक किलमॉन्गर, जेंगो फ़्रीमैन, एबिलीन क्लार्क, क्रिस वॉशिंगटन, मूकी, प्रेशस जोन्स, शिरॉन और टी’चाला जैसे किरदार आ-जा रहे थे। मैं वीरू सोनकर की नई कविताएँ पढ़ रहा था। मैं उन्हें अस्मिता के सबसे बड़े हिंदी कवि के रूप में चीन्हने लगा हूँ। उनके कविता-आग्रह में नामदेव ढसाल का आक्रोश और ‘मुर्दहिया’ का संवाद-उन्मेष दोनों पाया जा रहा है। मुझे मेरे प्रिय कवियों करंदीकर और पणिक्कर के कई किरदार वीरू के ‘मैं’ में बोलते हुए दीखने लगते हैं। किसी क्षण पाता हूँ कि उनकी तेज़ कटार की नोक पर स्वयं मेरी अस्मिता है, लेकिन ख़ुद उस कटार में कुछ और धँस इस कवि के और क़रीब जाना चाहता हूँ। अदावत के एक लंबे संबंध के बाद इस तरह वीरू सोनकर की कविताओं के प्रेम में पड़ना मेरे ‘मैं’ को दंग कर रहा है। 

कभी-कभार

मुझे उन्होंने सुरुचिपूर्ण ढंग से छपी सौ किताबें दिखाई हैं। उन्होंने किताबों पर सौ वाक्य कहे हैं। वह किताबें दिखाते एक बाल-सुलभ उल्लास से भरे हैं। किताबें ज़रा समय एक जगह रह जाती हैं तो वह उनकी जगह हो जाती है। वह उस जगह को एक ज़रा के लिए याद करते हैं, एक किताब उठा लाते हैं। अब उस किताब की उप-कथा बताते हैं। हमने हिकमत की बातें की हैं और नेरूदा की। काफ़्का, रिल्के, पेसोआ की। शिम्बोर्स्का आईं हैं और यीव बोनफ़्वा आए हैं। एक चरवाहा अपनी बकरियाँ ढूँढ़ता हुआ आया। उन्होंने अब स्मृति के सौ वाक्य कहे हैं। कभी-कभार ऐसा मिलना कितना अच्छा मिलना है। मैं लौटकर अशोक वाजपेयी से मिला।

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शनिवारेर चिट्ठी में यह भी पढ़ सकते हैं : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए | कल से रवैया फ़र्क़ होगाअनुशोचना और बाक़ी गल्प | छाया और छायेच्छाएँ | वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद

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