नवोदित रचनाकारों के लिए सलाह
बाबू सुथार
01 जून 2026
1. आपको जिस विषय पर लिखने की अपनी इच्छा हो, उसी पर लिखें। यह देखकर न लिखें कि फ़लाँ पत्रिका आजकल किस विषय पर लेख छाप रही है। केवल इसलिए किसी विषय को न पकड़ें कि वह ‘चलन’ में है।
2. कहानी लिखनी है या कविता—यह फ़ैसला आप ख़ुद लें। किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं। और अगर ग़लती से किसी से पूछ भी लिया हो, तो भी उसकी बात न मानें। हर अच्छा साहित्य वहीं से जन्म लेता है जहाँ लेखक किसी की मानता नहीं, सिर्फ़ अपनी सुनता है।
3. लिख लेने के बाद अगर कोई ‘मठ’ या ‘मठाधीश’ आकर कहे कि “ये कविता तो बनी ही नहीं” या “ये कहानी कहानी जैसी नहीं बन पाई”—तो उसकी बात बिल्कुल मत सुनिए। उसे सीधा कहिए : Hell with you. याद रखिए—जो व्यक्ति सचमुच साहित्य को समझता है, वह कभी भी, कभी भी और कभी भी ऐसा नहीं कहेगा कि “यह कहानी/कविता/X नहीं बनी।”
3.1 वह यह भी नहीं कहेगा कि यह कविता/कहानी/X है ही।
3.1.1 वह केवल—और केवल—उसके भीतर के साहित्य तत्व को देखेगा।
4. याद रखिए, साहित्यिकता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे दाल में नमक की तरह नापा जा सके—कि कोई ‘सेठ’ या ‘साहूकार’ कहे कि इसमें साहित्य कम या ज़्यादा है।
5. लिखो, लिखो, लिखो। किसी की सुनो मत। पर, अगर संभव हो तो लिखने से पहले साहित्य का ‘अध्ययन’ कर लो।
5.1 यहाँ ‘अध्ययन’ का अर्थ विश्वविद्यालय जाकर पढ़ना बिल्कुल नहीं है। याद रखिए विश्वविद्यालय आपकी सहज सृजनशीलता को नष्ट कर सकता। मैंने बहुत पढ़ा है, पर वह अध्ययन मेरे सृजन में कोई विशेष काम नहीं आता।
5.1.1 अगर आपने मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की एक प्रमुख गुजराती कवयित्री गंगासती के पद पढ़े हों, तो उन पदों में ‘अध्ययन’ शब्द आता है। वही वाला अध्ययन करो।
6. आपको किसी एक विश्व-स्तरीय साहित्यकार का गहरा अध्ययन करना चाहिए; उसी तरह एक भारतीय साहित्यकार का अध्ययन करना चाहिए; उसी तरह किसी एक गुजराती साहित्यकार को अच्छी तरह पढ़ना चाहिए। साथ ही, कम से कम एक लोक कला में भी आपकी दिलचस्पी होनी चाहिए। और हाँ—एक क्लासिक रचनाकार तो आपके अध्ययन में ज़रूर होना चाहिए। इतना सब सीखने के लिए आपको किसी विश्वविद्यालय में जाने की ज़रूरत नहीं है। अगर आपके पास ज़्यादा समय हो, तो विश्वविद्यालयों की जगह चिड़ियाघरों में जाना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा।
7. अगर कोई पत्रिका आपकी रचना स्वीकार न करे, तो उदास मत होना। हर पत्रिका के अपने मानदंड और अपनी पसंद-नापसंद होती है। जैसे मैं ‘ऊहापोह-2’ में कुछ प्रकार की रचनाएँ स्वीकार नहीं करता। इन मानदंडों को शब्दों में समझाना अक्सर मुश्किल होता है।
7.1 इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको हर पत्रिका की ‘ज़रूरत’ या ‘माँग’ के हिसाब से लिखना है। नहीं। अपनी पहचान आप ही बचाकर रख सकते हैं—दूसरे नहीं।
8. अपने किसी भी लिखे हुए पर यह प्रश्न अवश्य उठाएँ कि क्या यह आपकी किसी दृष्टि (vision) को अभिव्यक्त करता है। आप कहेंगे कि यह मेरी भावना व्यक्त करता है, ठीक है—यदि उसमें कोई दृष्टि (vision) नहीं होगी, तो आगे कठिनाई होगी। (यदि आपने ऊपर कहा गया अध्ययन किया होगा, तो दृष्टि (vision) का अर्थ आप स्वयं समझ जाएँगे।)
8.1 गंगासती ने कितने ही पद लिखे, फिर भी हर पद में उनकी दृष्टि (vision) झलकती है। अपनी दृष्टि (vision) के बारे में सोचिए।
9. लिखने के बाद अपनी रचना किसी ‘सीनियर’ या ‘जूनियर’ साहित्यकार को न सुनाएँ। सीनियर अक्सर अपने ‘गुट’ में जगह देने के लिए आपको तुरत स्वीकार कर लेंगे और जूनियर—यदि आपने अच्छा लिखा होगा—तो ईर्ष्या करेंगे, और यदि बुरा लिखा होगा—तो आपको नीचा दिखाएँगे।
9.1 फिर भी अगर बहुत इच्छा हो, तो अपनी रचना किसी पेड़-पौधे या जानवर को ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाओ। जैसे-जैसे तुम पढ़ते जाओगे, तुम्हें अपनी कमज़ोरियाँ ख़ुद दिखने लगेंगी।
10. बस, एक बात का ख़ास ध्यान रखना—भाषा का। अगर तुम्हारी भाषा में ग़लती होगी, तो वही भाषा तुम्हें नुक़सान पहुँचाएगी। याद रखो, रचनाकार सिर्फ़ ख़ुद को व्यक्त नहीं करता, वह भाषा की भी देखभाल करता है—उसे सँभालता है।
11. आख़िर में, एक बार फिर : अगर कोई यह कहे कि यह कविता ‘कविता नहीं’ है या यह कहानी ‘कहानी नहीं’ है, तो उसे कहो : Hell with you. अगर अँग्रेज़ी में न कहना हो, तो गुजराती/हिंदी में भी कह सकते हो : ‘तेल लेने जा।’ याद रखना—जो व्यक्ति साहित्य को सच में समझता है, वह कभी यह नहीं कहेगा कि यह कविता, कविता नहीं है, या…
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गुजराती से हिंदी अनुवाद : राकेश कुमार मिश्र
साभार : बाबू सुथार का फ़ेसबुक पोस्ट, 10 नवंबर 2024।
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