शनिवारेर चिट्ठी : पुलिसवाली है या लेस्बियन, उधर जो औरत है? कहाँ?
शायक आलोक
27 जून 2026
पूर्वग्रह
मुहल्ले में ‘मौग’ होना उपहास की बात थी। बसों-ट्रामों में हाथ बजाकर अपनी पहचान जताना किसी हीनता की निशानी। और मैदान के अँधेरे कोनों में खींच लिया जाता अथवा स्वेच्छा से ‘व्यभिचार’ में शामिल होता मेरा एक हमउम्र ‘बीमार’ था। भविष्य के किसी विमर्श के लिए मेरी ट्रेनिंग हुई थी ऐसे। वे अपनी पत्नियों के सबसे सुंदर प्रेमी थे जो मौग कहे जा रहे थे। छत पर पत्नियों के पेटीकोट और ब्लाउज़ सुखाते हुए। उनके लिए कैरी के अचार पसारते। शीला, सरला और कम्मो पेट पालने की किसी पारंपरिक कला की आज़माइश कर रही थीं। ‘बीमार’ हमउम्र को प्रकृति ने किया था बीमार। यह ज़रूर रहा होगा उसका दिमाग़ी फ़ितूर या होगा जिन्न-जिन्नात का असर।
यों बचपन को भविष्य की भाषा में पढ़ना हमेशा ज़रा ज़्यादती है। वहाँ विमर्श नहीं होता। बातें होती हैं, चेहरे, कुछ संबोधन और उनके बीच फैला हुआ एक विश्वास, जिसे किसी ने कभी सिद्ध नहीं किया। हम यक़ीन करते थे, क्योंकि हम उसे दुहराते थे। मुझे अब लगता है कि पूर्वग्रह किसी विचार का नहीं, किसी संबोधन का जन्म है। हम पहले शब्द सीखते हैं, फिर उन शब्दों के अनुरूप अपने मनुष्य गढ़ लेते हैं। भाषा कई बार वस्तुओं का वर्णन नहीं करती, उन्हें निर्मित करती है। जिस हमउम्र को 'बीमार' कहा गया, उसकी बीमारी मेरे लिए उसकी देह में नहीं, उस शब्द में बस गई थी। मैं उसे देखने से पहले उसके बारे में सुन चुका था। सुन लेना मेरे देख लेने की पहली भूल है।
दूसरी भूल यह है कि मैं पूर्व में स्मृति पर भी अधिक विश्वास करता था। संभव है कि मैदान का अँधेरा आज मुझे उस समय से अधिक घना दिखाई दे। संभव है कि जिन चेहरों पर मुझे अब करुणा दिखाई देती है, उन्हें मैंने तब सचमुच देखा ही न हो। स्मृति केवल घटनाओं को नहीं बदलती, वह हमारे नैतिक चेहरे को भी धीरे-धीरे संपादित करती रहती है। वह हमें निर्दोष बनाना चाहती है। भाषा ऐसा नहीं करती। वह हमारे भीतर उस यत्न ही पड़ी रहती है जिस यत्न पुरानी रसोई दीवारों में धुएँ की गंध।
उन मौगों का अपराध स्त्रैण होना नहीं था। उनकी ख़ता थी उस स्तर के साहचर्य और देखभाल को सार्वजनिक कर देना। मेरे समय को हिंसा से कम, कोमलता से अधिक असुविधा होती रही है। इसलिए कि हिंसा उसकी परिचित भाषा है जबकि कोमलता उसका अनुवाद माँगती है। उन ताली-दारों का गुनाह था उनकी अस्मिता। मानता हूँ कि मेरे बचपन की बड़ी भूल यह नहीं थी कि मैं उन लोगों को समझ नहीं पाया, यह थी कि मुझे लगा नहीं कभी कि उन्हें समझने का एक आशय होना चाहिए। मेरे उस पूर्वग्रह का स्थायी रूप घृणा में नहीं, जिज्ञासा के अभाव में पालित रहा।
सदानीरा
पूर्वग्रहों का बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि वे हमें दूसरों से दूर कर देते हैं। वे हमें अपने ही अनुभव से दूर करते हैं। हम जीवन नहीं देखते, पूर्व-प्रसिद्ध टीका पढ़ते रहते हैं। भला हुआ मेरा कि मेरे दो मित्रों प्रतुश और री ने मुझे मुक्त कराया।। वे मेरी दृष्टि के संशोधक अधिक थे। उन्होंने उन शब्दों को धीरे-धीरे अस्थिर करना शुरू किया जिन्हें मैं अंतिम सत्य समझकर बड़ा हुआ था। किसी बहस में नहीं, किसी घोषणा में नहीं—सिर्फ़ अपने होने की सामान्यता में। उनके पास यदि ऐसे प्रश्न थे कि किसी मनुष्य को समझने के लिए उसकी इच्छा को जानना ज़रूरी है या उसका दुःख पर्याप्त है तो मेरे पास उनके उत्तर नहीं थे। कितने मौक़े रहे कि मेरे सम्मुख आए प्रश्न अपने उत्तरों-अनुत्तरों से अधिक नैतिक रहे।
वह वर्ष दो हज़ार इक्कीस का वसंत अंक था। क्वियर पर केंद्रित ‘सदानीरा’ पत्रिका का विशेष अंक। समझ आया कि क्वियर होना पहचान भर नहीं, मनुष्य होने की जटिलता को स्वीकार करने का साहस भी है। यह किसी परिभाषा में समा जाने से अधिक परिभाषाओं पर संदेह करने की स्थिति है। आत्मीय मित्रों के उस सबल प्रयास ने मेरे पुराने संसार की दीवार में एक दरार खोल दी। अब मुझे लगा कि किसी मनुष्य को समझना उसके बारे में अधिक जान लेना नहीं, उसके बारे में कम निश्चित हो जाना है। वह मेरी भाषा का वह क्षण है, जहाँ निर्णय पहली बार संकोच में बदला... और संकोच धीरे-धीरे करुणा में।
अनन्या
इन्हीं दिनों सैफ़ो को पढ़ा। उसके कुछ फ़्रैगमेंट्स। 'लेस्बोस' इससे पूर्व मेरे भूगोल में नहीं था, न ही मेरी भाषा में। ईसा से छह सौ साल पहले एजियन सागर के उस द्वीप पर एक स्त्री प्रेम लिख रही थी—स्त्रियों के लिए, स्त्रियों के बारे में और यह तीव्रता कि ढाई हज़ार वर्ष में भी उसकी ताप ठंडी नहीं हुई। लिखा है कि सैफ़ो का जितना बचा है, उससे कहीं अधिक नष्ट हो गया है। शेष रह गई है कहीं कोई पंक्ति, कभी चार शब्द, कभी केवल एक नाम। मुझे इस बात ने उसके प्रेम से अधिक विचलित किया कि इतिहास ने उसकी कविताओं को भी उसी तरह टुकड़ों में छोड़ा, जैसे वह अक्सर उन जीवनों को छोड़ देता है जो उसके नैतिक व्याकरण में संगत नहीं बैठते। सैफ़ो की रिक्तियों में समुद्र है, समय है, ईसाई नैतिकता की लंबी छाया, अलेक्ज़ान्द्रिया के पुस्तकालयों की धूल और वे असंख्य हाथ हैं जिन्होंने उसकी किसी पांडुलिपि को नहीं बचाया।
मुझे अच्छा लगा सैफ़ो के पास देह की सबसे सूक्ष्म हरकतों का दर्ज होना। उसके यहाँ प्रेम जैसे कोई घोषणा नहीं, शरीर का व्याकरण है। यह भी संभव है कि मैंने सैफ़ो को अपनी इच्छाओं के अनुसार पढ़ा हो।
बहुवचन
इसने सिखाया कि प्रेम का पहला निर्वासन भाषा में होता है। उसने बताया कि देह भी लोकतंत्र की तरह लिखी जा सकती है। इसने बताया कि इच्छा जब डरती है, तब सबसे सुंदर रूपक जन्म लेते हैं। उसने जताया कि प्रेम को छिपाने में नहीं, उसे सार्वजनिक जोखिम बना देने में एक बात है। इसने समझाया कि प्रेम भी एक राजनीतिक निर्णय हो सकता है। उसने बताया कि मौन कभी निष्पक्ष नहीं होता। उसने बताया कि पहचान मनुष्य का घर नहीं, उसका संघर्ष है। इसे पढ़ते हुए लगा कि एक वाक्य भी किसी घायल देह की तरह साँस ले सकता है। उसे सुनते हुए लगा कि क्वियर कविता प्रेम की घोषणा कम, स्मृति की पुनर्प्राप्ति अधिक है। इनकी कविताओं में देह कभी अकेली नहीं आती, उसके पीछे इतिहास चलता हुआ आता है। उनकी कविताओं में भाषा अपने समय की भाषा से कुछ अधिक ईमानदार होती है।
इसने-उसने। इनकी-उनकी। यह-वह। ये-वे।
क्वियर कवियों को पढ़ते मैंने ख़ुद के कुछ वाक्य संभव किए हैं। उन्हें पढ़ते हुए मैंने उनके जीवन पर कम, अपनी भाषा पर अधिक संदेह किया। इन कविताओं ने मुझे सिखाया कि शब्द समझने से पहले अपनी दृष्टि बदलनी पड़ती है। कविता किसी समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती, वह एक अकेले मनुष्य की आवाज़ को असंभव होने से बचाती है। क्वियर कविता को मुझे किसी साहित्यिक परंपरा में नहीं, मनुष्यता के अधूरे इतिहास के सबसे ईमानदार हाशिये में रखकर देखना चाहिए।
अनुवाद
पुलिसवाली है या लेस्बियन
उधर जो औरत है?
—कहाँ?
क्वियर कविताओं का अनुवाद करते हुए मुझे शब्दों ने ही नहीं रोका, अर्थों ने भी रोका। वे शब्द, संज्ञाएँ और सर्वनाम हिंदी में पहुँचते अपना अर्थ भर नहीं, अपना इतिहास और अपना संकट भी साथ लिए आते थे। मैं शब्दों के अनुवाद तो कर देता था, लेकिन उसके पीछे खड़ी सामाजिक संरचना मेरी भाषा में उतरने से इनकार पर उतारू थीं। प्रेम और ईर्ष्या और देह के शब्द चुनना कठिन नहीं था, लेकिन दो शब्दों या दो पंक्तियों के बीच पसरे मौन या आक्रोश या प्रतिरोध के लिए कौन-से शब्द चुनता! अनुवाद शब्दों का ही नहीं, रिक्त स्थानों का भी होना चाहिए। आख़िर हर भाषा अपने मौन के अलग ढंग से सँभाल का यत्न चाहती है।
इस विपदा में मैंने पाया कि अनुवाद निष्ठा का नहीं, विनम्रता का काम है। दूसरी भाषा में कविता कभी पूरी नहीं आती। इस तरह, अनुवाद एक स्वीकारोक्ति है कि कुछ बचाया गया है और कुछ हमेशा के लिए छूट गया है। कुछ घंटे मैंने कुछ शब्दों को बदलने में बिताए। मालूम पड़ा कि कठिनाई शब्द में नहीं थी—वह मेरे भीतर थी। मैं अपनी भाषा से पूछ रहा था कि क्या उसमें इस तरह के प्रेमों के लिए पर्याप्त जगह है जिन्हें उसने इतने संकोच से देखा है। भाषा की बड़ी परीक्षा उसके शब्द-खोज में नहीं, उसकी आतिथ्य-क्षमता में होती है। यह प्रश्न कि कोई भाषा अपने से भिन्न जीवनों के लिए कितनी जगह बना सकती है? मैंने अंततः दूसरी भाषा में पहुँचने की नहीं, अपनी ही भाषा में सचमुच लौटने की क़वायद की।
सर्वनाम
इधर से देखें तो संज्ञाएँ प्रायः उदार होती हैं। वे चीज़ों के नाम रख देती हैं। सर्वनाम संबंधों के भीतर रहते हैं। वे किसी मनुष्य का नाम नहीं बताते, केवल यह बताते हैं कि हम उसे किस दूरी से देख रहे हैं। कभी लगता था कि सर्वनाम भाषा का एक छोटा अवयव है। अब लगता है कि सबसे भारी वही है। किसी मनुष्य को ‘वह’ कहना आसान है, उसे उसके चुने हुए ‘वह’ में स्वीकार करना कठिन। भाषा यहाँ केवल बोलती नहीं, अपना पक्ष भी चुनती है।
क्वीयर कविताओं का अनुवाद करते हुए बार-बार लगा कि हर कविता अपने साथ एक नया सर्वनाम लेकर नहीं आती। कुछ प्रेम अपने को छिपाना चाहते थे, कुछ पहली बार अपना नाम लेना चाहते थे। कुछ कविताएँ अपने प्रिय का लिंग जान-बूझकर टाल जाती थीं, जैसे प्रेम को व्याकरण से कुछ देर और बचाए रखना चाहती हों। हिंदी बार-बार उन्हें किसी न किसी ओर धकेल देती थी। मुझे दिखा कि अनुवाद केवल शब्दों के बीच नहीं, भाषाओं की नैतिक कल्पनाओं के बीच भी होता है। मुझे अनुभव हुआ कि मैं कविताओं का कम, अपनी हिंदी का अधिक अनुवाद कर रहा हूँ। जो भाषा बचपन में मेरे भीतर पूर्वग्रहों के साथ बसी थी, वही भाषा अब उन जीवनों के लिए जगह बनाने का अभ्यास कर रही थी। भाषा का बदलना किसी शब्द के बदलने से नहीं होना है, किसी मनुष्य के लिए उसमें जगह के निर्माण से होना है।
LGBTQIA+ विमर्श में सर्वनाम या ‘Pronouns’ अस्मिता-संबंधी प्रबल शब्द और माँग है। मैं अधिक दंग नहीं हुआ जब ‘प्राइड मंथ’ में अनूदित क्वियर कविताओं के संग्रह के लिए मुझे यह शीर्षक सूझा।
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‘हिन्दवी’ की विशेष प्रस्तुति ‘सर्वनाम’ यहाँ पढ़िए : LGBTQIA+ प्राइड विशेष पर कविताएँ
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