मणि कौल की ‘बादल द्वार’ : कविता को पर्दे पर संभव करने का सलीक़ा
विपिन शर्मा
06 जुलाई 2026
मणि कौल की फ़िल्म ‘बादल द्वार’ उन क्लासिक अप्रतिम फ़िल्मों में से है, जिसे हिंदी सिनेमा के दायरे से बाहर भी अतीव प्रशंसा मिली। पश्चिम जगत में सराहा जाना कोई उत्कृष्ट कृति का पैमाना नहीं है। मगर ‘बादल द्वार’ पश्चिम एवं देशज दोनों ही समीक्षकों को हतप्रभ एवं विस्मित करती है। मणि कौल की फ़िल्में अपनी धीमी गति एवं ठहराव की वजह से समीक्षकों के लिए धैर्य की परीक्षा है। यह बात उनकी अन्य फ़िल्मों ‘नौकर की क़मीज़’, ‘उसकी रोटी’ से भी सिद्ध हो चुकी है।
पश्चिमी कला जगत वैश्विक स्तर पर सत्यजित रे, अन्य कारणों से मीरा नायर, गुरिंदर चड्ढा आदि की ही चर्चा करता है। मगर भारत में ऋत्विक घटक, विमल राय, मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ख़्वाजा अहमद अब्बास, जाहनु बरूआ जैसे उत्कृष्ट निर्देशकों की एक लंबी परंपरा है। समानांतर सिनेमा ने भारतीय सिनेमा के पैर्टन को परिवर्तित किया। नए विषय, विषयों का नया ट्रीटमेंट यह इस कला आंदोलन की विशेषता है। फ़्रांस, इटली के कला आंदोलनों ने समानांतर सिनेमा आदोलन को गहरी प्ररेणा दी। काव्यात्मक शैली और बिंबो की सूक्ष्मता इस कला आंदोलन की विशेषता हैl मणि कौल इस कला आंदोलन की उपज हैं।
साहित्य की कितनी कहानियाँ, क़िस्से-मिथक जो अभी तक किताबों अथवा लोक में प्रचलित थे, वह इस सिनेमा का विषय बने। संस्कृत साहित्य जिसे अभी तक पश्चिम जगत केवल दाशर्निक एवं पांडित्य, आध्यात्मिक विषयों तक केंद्रित मानता था। पश्चिम के अनुवादकों ने जब ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’, ‘मेघदूतम्’, वात्स्यायान के ‘कामसूत्र’, भास के ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ को अनुवाद के माध्यम से जाना तो उनके लिए यह अलग संसार था। ऐंद्रिक, दैहिक जहाँ कामनाओं का अपार विस्तार था। भारतीय जहाँ आध्यात्मिक एवं धार्मिक ही नहीं थे, बल्कि वह प्रेम में आकंठ डूबे, आसक्ति से पगे कामनाओं का अपूर्व संसार रचते नज़र आए। यह प्रेम का उत्सव मनाते लोग थे।
प्राचीन वास्तुकला ने मंदिरों-महलों पर कमनीय चित्रों को अंकित कर हमेशा के लिए अमर कर दिया। स्त्री-पुरूष आकर्षण एवं प्रेम के दायरों का एक ऐसा वितान रचा जो रूह ओर देह का अद्भुत मिलन था। मणि कौल की ‘क्लाउड डोर’ (1994) फ़िल्म इंडो-जर्मन प्रोजेक्ट के तहत बनी फ़िल्म है। जर्मन निर्माता रेगिना सीगलर ने ‘इरोटिक टेल्स’ के नाम से दुनियाभर में प्रेम, देह और मन के अंतरंग की कहानियाँ जो सदियों से कभी लोक के अवचेतन में छिपी रही, को मुखरता को दृश्य मान किया। रिचर्ड बर्टन ने ‘कामसू़त्र’ जैसे प्रेम और स्त्री-पुरूष संबंधों और जीवन पद्धति के ग्रंथ को दुनिया के सामने नए संदर्भो में रखा। भारत आख्यानों क़िस्से-कहानियों का देश है, प्रेम यहाँ केंद्रीयता पाता है।
‘बादल द्वार’ की इतनी कलात्मक संवदेनशील निर्मिति के पीछे रेगिना सीगलर को भी श्रेय जाना चाहिए। उन्होंने ऐसी विषयवस्तु को चुना, जिसे अभिव्यक्त करने के अपने ख़तरे थे। मगर एक कलाकार जिसे शिद्दत से रचने की चाह हो, वह जोखिम उठाता है। रेगिना ने जर्मन सिनेमा को नई अवधारणा दी। यह कुछ चुनिंदा ‘प्रेम और यौन जीवन के वृतांत’ पर आधारित शृंखला थी। अपने आकार में संक्षिप्त है। देश-दुनिया में फ़िल्म ने अत्यंत चर्चा प्राप्त की। फ़िल्म महान् सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ का मानसरोदक खंड एवं संस्कृत के अप्रतिम रचनाकार भास के ‘अविमारक’ नामक नाटक से ‘बादल द्वार’ की कथा बुनी गई है। शास्त्रीयता एवं लोक, प्रेम, यौवन, देह की अनित्यता में भी नित्यता तलाशने का अविस्मरणीय प्रयास। यह अविमारक की नायिका कुरंगी एवं जायसी के ‘पद्मावत’ के नायक रतनसेन के कथ्य की सिनेमा में अपने तरीक़े से पुनः प्रस्तुति है। इसकी पटकथा लिखी है मणि कौल ने।
‘बादल द्वार’ अपनी संरचना में एक जटिल फ़िल्म है। मणि कौल की गूढ़ता और कहानियों को अपने तरीक़े से रचने का तरीक़ा उन्हें कला-सिनेमा का महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर बनाता है। फ़िल्म की शुरुआत में हीरामन तोता एक रूप गर्विता नायिका को अभिसार के लिए प्रेरित कर रहा है। नायिका के चेहरे पर यौवन से उत्पन्न ‘सेल्फ़’ का भाव उसे अन्य से अलहदा करता है। एक कमनीय कल्पना के माफ़िक़ कुरंगी के चरित्र को रचा गया है। फ़िल्म अनु अग्रवाल के अभिनय का एक विराट पड़ाव है। एक कलाकार के जीवन में ऐसे पल कभी-कभी आते हैं, जब वह अपने सुरक्षित एवं सहज दायरों से बाहर निकलकर चुनौतीपूर्ण मार्ग पर निकलता है। ‘स्वयं’ को शिद्दत के साथ अनुभव करता है। गहन संवेदनशीलता भी इसी एकांत से उत्पन्न होती है। स्वयं में डूबना गहरी अनुभूतियों से साक्षात्कार पाना है।
भास के ‘अविमारक’ नाटक को तो गिने-चुने सुधीजनों ने ही पढ़ा होगा, मगर मणि कौल ने इस नाटक और रूप गर्विता नायिका को इस फ़िल्म में इंटेंसिटी के साथ उतार दुनियाभर के दर्शकों के सामने कुरंगी का ऐसा रूप गढ़ा, जिसकी दुनियाभर में चर्चा हुई। यह अतीत में काम और प्रेम की परंपरा का संधान करती है, हीरामन (तोता) नायिका को प्रेम का पाठ पढ़ाता है। कुरंगी के जीवन को जीती अनु अग्रवाल अपनी मुख भंगिमाओं से हीरामन के शब्दों को दृश्यों का जामा पहनाती है। चेहरे के प्रेमिल, कुछ-कुछ मांसल भाव का उभार, जादुई है। आँखो में मन के उत्ताप का उभरता बिंब। जैसे हीरामन वाक्य बोलता है, कुरंगी अपनी स्मित मुस्कान, गहरी काली आँखों के मूक अभिनय से एक गहरी अपील की निर्मिति करती है, कुरंगी का पिता हीरामन की बतकही सुनकर कुपित होता है। वह कुरंगी के लाख मना करने के बावजूद हीरामन के पंख काट देता है, इस हादसे की प्रतिक्रिया को हीरामन की फड़फडाहट में मत सुनिये। एक जीने भर के आसमान से जो वंचित किए जाने की यंत्रणा है, दुख है, उसके एहसास की चीत्कार कुरंगी की आँखों में उभरते हुए देखिए। जैसे त्वरित घटित दुख से हृदय का विर्दीण हो जाना। कैमरा कुरंगी के चेहरे पर उभरने वाले दुख के भाव को उभारते हुए, बारीक महीन भावों को भी पकड़ता है, जैसे यह शॉक्ड हो जाने की स्थिति है। कैमरे लॉन्ग शॉट से नायिका को कवर करता है, फिर स्थिर गति से उसके चेहरे पर ठहर जाता है। चेहरे को पार करता हुआ, धीरे-धीरे आँखों में उभरते हुए ग़ुस्से और प्रतिकार पर स्थिर हो जाता है, एक मैटाफ़र यह भी उभरता है—यह पंख हीरामन के नहीं कटे बल्कि अपनी कामनाओं में डूबी, इस सपाट दुनिया के बरक्स स्वनिर्मित दुनिया का प्रतिसंसार रचती स्त्री के पंख काट दिए गये हैं, उसके प्रेमिल संसार को उजाड़ दिया गया है। उसका ठहरा चेहरा एक बिम्ब है, जिसे अनिल मेहता का कैमरा रचता है। यह एक स्वतंत्र विचार की निर्मिति है। जायसी के ‘पद्मावत’ में ज्ञानी तोते हीरामन की विशेष भूमिका है, मणि कौल की ‘बादल द्वारा’ में हीरामन, नागमती पद्मावती एवं रत्नसेन के बीच संदेशवाहक और प्रेम के भाव को जाग्रत तो करता है, मगर यहाँ पद्मावत से रत्नसेन और भास के अविमारक से कुरंगी है।
‘बादल द्वार’ (क्लाउड़ डोर) दृश्यों में कहानी रचती है। धीमी गति के साथ कैमरा अब जिस दृश्य को अपनी जद में लेता है, वह है ‘पद्मावत’ का मानसरोवर (मानसरोदक खंड) में स्नान एवं जल क्रीड़ा करती युवतियाँ। एक खीची हुए रस्सी पर कुशल नट की तरह चला है निर्देशक। हल्की-सी फिसलन पूरी कृति को विनिष्ट कर सकती थी। अनावृत्त देह, गहरी मांसलता, मादकता मगर जायसी की कविताई के आप क़रीब जाते हैं—सखी-सहेलियों का संसार नहीं बल्कि पूरी प्रकृति एक साथ चली आई है। ‘बादल द्वार’ में स्नान करती स्त्रियों के बीच मोतियों के हार के खोने का प्रसंग है, मोतियों के जल में बिखरने को बेहद तल्लीनता से कैमरे ने फ़िल्माया है, बचता इस जीवन में कुछ नहीं। हर पल, हर भाव अनित्य है—यह जो आधिपत्य का सवाल है, वह बड़ा जटिल है, स्त्री-पुरूष संबंधों में भी वर्चस्व की राजनीति है। चाहे वह गहरे प्रेम में ऐकांतिक पल में ही हो।
हीरामन एक सूत्र है ‘बादल द्वार’ के आंतरिक सूत्रों को समझने का। वह रत्नसेन से उसकी प्रिया की विह्वल स्थिति का बखानकर उसमें उत्सुकता उत्पन्न करता है। रत्नसेन नाम पूछता है, हीरामन शांत। रत्नसेन मुक्ति का प्रलोभन देता है। हीरामन यहाँ पर केवल संदेशवाहक तोता ही नहीं एक ख़ुद्दार प्राणी के रूप में उभरता है, ‘ख़रीदने की कोशिश मत करो रत्न सेन’। हीरामन, रत्नसेन को कुरंगी तक पहुँचा ही देता है, कई उपाख्यानों को बेहद क़रीने से पैबस्त किया है मणि कौल ने। विरह में डूबी प्रेम के लिए प्रतीक्षारत एक सौंदर्य संपन्न स्त्री। दैहिक, मांसल एक गहरी कमनीय अपील से भरी स्त्री के रूप में कुरंगी ‘बादल द्वार’ में प्रकट होती है। जब सरोवर का दृश्य आता है, मन उसे कुरंगी से ज़्यादा पदमावती ही मानने को ‘विद्रोह’ कर बैठता है। बाबा जायसी याद आते हैं—
लागी सब मिलि हेरै बूडि-बूडि एक साथ
कोई उठी मोती लेई, काहू घोंघा हाथ
जब कविता फ़िल्म का रूप लेकर पर्दे पर मूर्तिमान होती है, तब शब्द साकार दृश्यों के रूप में एक अन्य प्रभाव ईजाद करते हैं, मणि कौल ने इस संभावना को और ज़्यादा कलात्मकता के साथ संभव बनाया है। एक अनकहे खिंचाव में खींचा जाता हीरामन, कुरंगी का प्रेमिल दैहिक अनुभूतियों को रूह तक जी लेने की अदम्य इच्छा के बावजूद एक कोमल-सा अभिमान। मगर जब कुरंगी और रत्नसेन का पर्दे पर अभिसार रचा जाता है, वह इतना दैहिक, अनावृत्त होने के बावजूद अश्लीलता से कोसो दूर है। बस प्रेम की अंतिम परिणिति जैसा। जैसे मानव सभ्यता स्त्री-पुरूष के उस पार से लेकर इस पार प्रगाढ़ एकमेव हो जाने का कोई विकल्प अभी तक नहीं तलाश पाई। बस एकात्म हो जाने की विवशता। विवशता से परे सहज कामना। फ़िल्म की एक ख़ास विशेषता उसका दृश्यांकन है। मणि कौल दृश्यों को बेहद धीमे-मंथर गति के साथ रचते हैं। एक विराट शिल्पी की तरह वह प्रत्येक भाव को सघनता के साथ उकेरते हैं। सरोवर में सखियों का स्नान करते हुए जलक्रीड़ा के दृश्य में कुरंगी का जल में मंथर गति से प्रवेश करना, मगर दृश्य इतना नहीं है—उसके हाथ पर हीरामन बैठा है, वहाँ एक संवाद है—‘तू पक्षी है, मैं मनुष्य’; यह संवाद एक अंतराल का निर्माण करता है, ‘तू पक्षी, मैं मनुष्य’ जैसे कुरंगी कहना चाह रही हो ‘आज़ादी दोनों के लिए जीने की अनिवार्य शर्त’ है।
पूरी फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान एक दृश्य में हैं, जिसमें पीछे पिंजरा है। गहरी निंद्रा में तल्लीन। एक ठहराव। दुनिया से गाफ़िल मगर पिंजरा खुलता है, हीरामन निकल जाता है, रत्नसेन के नज़दीक। उसे कुरंगी को पाने के लिए आकुल करता। बसंत का आगमन और देह पर काम का प्रभाव। एक धुँआ चारों और तारी है। कुरंगी भीगी हुई देह के बावजूद विरह में तप्त। कई मनःस्थितियों को दृश्य उत्पन्न करते हैं। उदासी का आलम, फिर अट्टहास में बदलती हँसी। ‘आवन कह गए, अवहू ना आए’ कुछ काव्यात्मक लफ़्ज़ों के साथ कुरंगी एवं रत्नसेन एक प्रगाढ़ अभिसार को जीते हैं, मगर वह जैसे ही कुरंगी के गहन सान्निध्य में आता है, वह अदृश्य हो जाता है। लोग उसे ढूँढ़ते हैं, मगर उसके लिए सभी अदृश्य, वह भी सबके लिए अदृश्य। यह एक युक्ति है, प्राचीन संस्कृत साहित्य की। साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं, पश्चिम का सिनेमा तो विज्ञान फ़ंतासी का प्रयोग करता ही रहा है।
‘बादल द्वार’ समांतार सिनेमा के विचार को तीव्रता के साथ आगे बढ़ाती है—अर्थवत्ता, सांकेतिकता। फ़िल्म का बाद का हिस्सा विदूषक ब्राह्मण का स्त्री से संवाद, ‘मैं बाह्मण पुरुष मुझे कोई नहीं कहता, मैं स्त्री हूँ। वस्त्र-विवस्त्र होकर श्रमण भी बन सकता हूँ। ‘सेल्फ़’ के संकट को फ़िल्म महीन शिल्प में बुनती है। मछली खाने का प्रस्ताव। स्त्री मछली को देखने से भी इंकार कर देती है। मछली का अचानक मुस्काना। यह मणि कौल का संकेतों में कहानी को रचने का अंदाज़ है। फ़िल्म हमारे सौंदर्यबोध को विस्तार प्रदान करती है।
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