आशा भोसले : गीतों में बसी ज़िंदगी
विपिन शर्मा
15 अप्रैल 2026
आशा भोसले भारतीय संगीत जगत और भारतीय फ़िल्म जगत में पार्श्व गायन का एक विराट नाम हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, “मैं भारतीय फ़िल्म गायन की अंतिम मुग़ल हूँ।” यह बात उनके लंबे संगीत जीवन, भारतीय फ़िल्म जगत में उनकी मौजूदी और तमाम कलाकारों के साथ जुड़े रहने का सार है। आशा भोसले ने जो कहा वह अतिशयोक्ति नहीं है, उनके जाने के बाद एक गहरा सुनसान है, एक गहरा सूनापन है।
हर इंसान की अपनी एक यात्रा होती है, उनकी भी अपने जीवन की एक यात्रा थी; मगर उम्र की यात्रा से ज़्यादा, जो काम हमने किया होता है—वह यात्रा ज़्यादा रेखांकित की जाती है। हृदयनाथ मंगेशकर के परिवार में उनका जन्म हुआ। कहिए एक सुरीला कुनबा जिसमें भाई दीनानाथ मंगेशकर, बहन उषा मंगेशकर और एक वट वृक्ष लता मंगेशकर। कई बार जीवन की परिस्थितियाँ हमें निर्मित करती हैं। लता मंगेशकर ने अपने जीवन के शुरुआती दौर, बिल्कुल बचपन में ही गाना शुरू कर दिया था। उसी राह पर आशा भोसले चली। मगर उनके पीछे-पीछे चलते हुए उन्हें भी नहीं पता चला कि कब वह अपने आप में एक मुकम्मल स्वर हो गईं। यह सोचने और सीखने वाली बात है। रियाज़ पक्का, ज़िद पक्की और उससे ज़्यादा यक़ीन पक्का! आप यह तो कह सकते हैं कि एक संगीत घराने में उन्होंने जन्म लिया। मगर रास्ता तो उन्हीं का था जो उन्होंने तय किया। लता की परछाई में जीते हुए, अपनी ऊर्जा से बाहर आना और अपना मुक़ाम तय करना आसान नहीं था, मगर और उन्होंने किया।
लता और आशा दोनों टकराहट और अंतर्विरोध का नाम नहीं है—बल्कि दो रास्ते हैं। प्रतिभा अपना रास्ता तय करेगी आज नहीं तो कल। आशा होना हमें यह भी बताता है।
एक फ़िल्म है सई परांजपे की ‘साज’। फ़िल्म में दो गायिकाओं की कहानी है। कई बार यह लगता है, ज़रूर यह कहानी आशा भोसले और लता मंगेशकर की है। वहाँ एक प्रतिस्पर्धा का माहौल है और बड़ी बहन की छाया में छोटी बहन के घुटन का एहसास। मगर जितनी बारीकी से दो कलाकारों के संघर्ष को दिखाया जाना चाहिए था, उस प्रत्यंचा पर निर्देशक थोड़ा लड़खड़ाया। इस फ़िल्म ने लता और आशा के आपसी संबंधों के बारे में एक लोक में क़िस्से-कहानियों को तो जन्म दिया है, लेकिन उनमें एक-दूसरे के बीच आपसी सम्मान रहा। लता में एक कुलीन आभा थी, जो उन्हें जनसमूह से दूर करती थी; आशा में एक गहरी गर्म जोशी थी, जो लोगों को उनके नज़दीक लाती थी। दो लोग थे और दोनों के अपने स्वभाव और अपने योगदान। कुछ समय तक आशा, लता की परछाई बनकर रहीं, मगर बाद के समय में आशा भोसले एक स्वतंत्र आवाज़ थी और स्वतंत्र पहचान।
वेस्टर्न म्यूजिक से भी उतना ही गहरा लगाव जितना भारतीय शास्त्रीय संगीत से। गाते हुए हरकत करना, ज़िंदगी ऊर्जा से भरी हुई और उसमें गहरा चुलबुलापन—यही आशा की विशेषता रही। फिर ओ. पी नैय्यर जैसे संगीतकारों ने उन्हें घर-घर की आवाज़ बनाया। सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, रवि और ए. आर. रहमान जैसे संगीतकारों के साथ उनका सफ़र रहा।
एक श्रोता के रूप में उनकी आवाज़ प्रेम के विस्तार की आवाज़ है। खिड़कियों के खुलने की आहट है, रूढ़ियों के टूटने की और नई चीज़ों के बनने का क्रम है। उनको सुनते हुए हमें लगता है कि संगीत ऐसा भी हो सकता है—बिंदास, अल्हड़ और रोमानियत से भरा। कई गानों में वह गाना शुरू होने से पहले हँसती हैं। यह हँसी भी एक संगीत है और इससे पहले किसी ने सोचा नहीं था। हँसी जो मानव सभ्यता की सबसे ख़ूबसूरत ईजाद है, उसका सांगतिक प्रयोग किया जा सकता है और यह अद्भुत हो सकता है। एक गहरी आँच आशा की विशेषता है। वह तपिश जो लफ़्ज़ों में ढल जाती है। ‘आज रपट जाएँ…’ जैसे गीत कई पीढियों के साथी हैं, ये मित्र की तरह साथ निभाते आए हैं, ‘चिल’ करते आए हैं। इसमें सिर्फ़ आवाज़ का सवाल नहीं है, बल्कि जो गायन के आंतरिक व्याकरण से छेड़छाड़ है, वह कमाल है। ‘हाँ...’ जैसी आवाज़ और रपट शब्द को, अपनी रचनात्मकता के साथ प्रयोग करना—यही मौलिकता है।
कई बार यह आवाज़ आपको विस्मित करती है। आशा के गायन में विविधता और रेंज बहुत व्यापक है। जब ओ. पी. नैय्यर के साथ वह गाती हैं तो बिल्कुल जैसे एक गति होती है। उनके गायन में तेज़ बहती हुई नदी सुनाई पड़ती है। जब ‘यह रातें, यह मौसम और नदी का किनारा…’ गीत को गाते हुए सुनते हैं, आप आश्चर्य में पड़ जाते हैं। क्या यह वही आशा हैं, जिनको कैबरे सॉन्ग्स और मस्ती भरे गीतों में महारत हासिल है। ‘एक हसीना थी, एक दीवाना था...’ जैसे गीतों में एक कहानी है और इस कहानी को संगीत में ढालकर गीत बनाना आशा और किशोर के बिना संभव नहीं था। यहाँ लगता है जैसे यह दूसरी आवाज़ है और दूसरा कोई आदमी है।
‘उमराव जान’ फ़िल्म का संगीत और आशा की आवाज़ पर हम ठहर जाते हैं। यह ठहरकर लिखने का विषय भी है। उसे दौर में ‘पाकीज़ा’ के संगीत को रसिकों का प्रेम सुरक्षित था। ‘उमराव जान’ जैसी फ़िल्म आशा के लिए एक चुनौती थी और उन्होंने ख़ुद को एक अवसर दिया। एक नए तरीक़े से ख़ुद के गले का पुनर्सृजन किया। आज ‘उमराव जान’ के गीत और ग़ज़लें इतिहास हैं और लोगों की मोहब्बत का शबब! ख़य्याम के लिए उनका चुनाव, साहसिकता और प्रतिभा पर विश्वास का चुनाव था। ‘उमराव जान’ एक नया इतिहास बनी। इसमें आशा भोसले के गले का ठहराव विशिष्ट है। ठहरकर गाने का अंदाज़ कई बार हमें याद दिलाता है कि यह वही आशा हैं, जिन्होंने ‘चुरा लिया है…’ और कई तीव्र गति के गीतों को अपनी आवाज़ दी है। मैं मानता हूँ कि यह सच है—हम एक बार ही जन्म नहीं लेते, बल्कि हम कई बार जन्म लेते हैं और कई तरह से जन्म लेते हैं, ख़ुद का विस्तार करते हैं; ‘उमराव जान’ आशा भोसले के लिए एक ऐसा ही अवसर थी, स्वयं के विस्तार को समझने का। यहाँ वह अपने दूसरे रूप में हैं—जहाँ गहरा ग़म है, एक प्रतीक्षा है और एक ऐसी स्त्री की यंत्रणा है, जिसकी सामाजिक जीवन और प्रतिष्ठा की ख़्वाहिश उसकी चौखट पर आकर दम तोड़ देती है। यह बात दूसरी है और यह गला भी दूसरा ही है। शब्दों और भावों को अभिव्यक्त करने का एक अलग कौशल और एक भिन्न अंतर्दृष्टि और यह बाहर की आवाज़ को साधने से ज़्यादा अपने ख़ुद के अंदर की आवाज़ को महसूस करने से ही संभव हो सकता था। यहाँ पर आशा एक दरवेश के रूप में है। उनके गले का भारीपन, गले का ठहराव और निष्कंप बाती-सा स्वर, सब कुछ पूर्ण और सब कुछ अप्रतिम!
आशा भोसले की प्रतिष्ठा को और उनकी साधना को ‘उमराव जान’ फ़िल्म के गीतों ने जैसे स्थापित कर दिया। अब वह सिर्फ़ कैबरे और तीव्र बीट के गीतों की गायिका नहीं थीं, बल्कि एक विशिष्ट क्लास और विशिष्ट मयार की गायिका थीं। अब उन्हें कुछ सिद्ध करना नहीं था—बल्कि उनके सामने अब उनरे लहज़े का अनुकरण करने वाली पीढ़ी थी, इसलिए ‘उमराव जान’ के गीत हमारे मन की देहरी पर एक अमिट हस्ताक्षर हैं! एक लंबी लकीर, जो फ़िल्मी संगीत और पार्श्व गायन में आने वाले लोगों के लिए एक परीक्षा जैसे!
कितने सारे ऐसे गीत हैं, जिन्हें आप बिना रुके हुए सुन सकते हैं—‘रात बाक़ी बात बाक़ी, होना है जो, हो जाने दो’; ‘ढल गया दिन, हो गई शाम’; ‘ना बोले तुम, ना मैंने कुछ कहा’ जैसे गीतों की एक पूरी फ़ेहरिस्त है। ऐसे गीतों को आप अनवरत रूप से सुनते जाते हैं, आद्योपांत। ‘दीवाना हुआ बादल’; ‘प्यार का दर्द है, मीठा-मीठा, प्यारा-प्यारा’ ऐसे कितने सारे रूप हैं आशा की आवाज़ के।
राहुल देव बर्मन के साथ जो उनके गीतों की यात्रा है, वह बेहद मुकम्मल है। आशा भोसले की आवाज़ के आसमान को जो असीम विस्तार मिला, उसमें राहुल देव बर्मन का एक बड़ा योगदान है। उन्होंने उनकी आवाज़ की रेंज का बहुत सकारात्मक प्रयोग किया। उनका संगीत निषेध के पार का संगीत है। जहाँ ड्रम बीट है, बैंजो है और पूरा वेस्टर्न ताम-झाम। उस संगीत में आज़ादी की ठंडी बयार है। आशा भोसले ने अपनी रचनात्मकता से उन गीतों को एक सघन आनंद में तब्दील किया। 1960 और 1970 के दशक की पीढ़ी को उनके गीतों में अपनी आवाज़ सुनाई दी। यहाँ विद्रोह था, एक गहरी लापरवाही थी और ख़ालिस ज़िंदगी थी। भारतीय फ़िल्म संगीत में ऐसी जोड़ी दुर्लभ हैं, जिनके जीवन और संगीत की यात्रा इतनी सुरीली हो और जिसमें दोनों का विस्तार हुआ हो। जहाँ प्यार है, सम्मान है और उम्मीद है। राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की युति, इसी तरह की है। ‘मुझे तो यह लड़की दीवानी लगती है...’ गीत में यह प्रयोग एक जादू बनकर आता है। वाद्य यंत्रों के साथ प्रयोग और किशोर कुमार के साथ आवाज़ के साथ प्रयोग। आशा भोसले तभी प्रयोगधर्मी संगीतकारों की पहली पसंद रहीं। हम डूबते चले जाते हैं उस आवाज़ में, जो हमें बार-बार विश्वास दिलाती है कि यह हमारे जीवन की मैलोडी ही है।
‘क़तरा-क़तरा बहती है’; ‘छोटी-सी कहानी से, बादलों के पानी से, सारी वादी भर गई’ और ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’ जैसे गीत अलग मूड के गीत हैं। यह कहीं छूटे हुए लोगों की कहानियों को ज़ुबान देने का माध्यम हैं। इतनी तल्लीनता और अपने मन को खोल देने का भाव इसी आवाज़ से संभव था। यहाँ तीव्रता नहीं है, बल्कि स्थिरता है। थीर हो जाने का एहसास। जो अनकहा है, आग के बुझ जाने के बाद जो राख रह जाती है जो आग भी नहीं है, और बिल्कुल ठंडी भी नहीं है। इस भाव को अब कोई कैसे अभिव्यक्त करे। इसको एक यूनिक आवाज़ चाहिए। आशा ने कितने मन से जैसे इस बंद प्रेम पाती की गिरह खोली हैं। गुलज़ार के शब्द जैसे कहानी हैं। एक प्रोज़ और उसके अंदर कविता की टोन। अब इसको गाना है आशा को। उस गहरे ग़म को जीते हुए लोग मरते हैं। प्रेम के दुःख में भरे हुए लोग, जीने और मरने के बीच कहीं अटके होते हैं। किसी भी कलाकार के जीवन में यदि पीड़ा को ऑब्जर्व करने की अंतर्दृष्टि ना हो तो वह कलाकार हो ही नहीं सकता। यह जो आशा जी के गले में एकांत उतरता है, यह उनके ज़िंदगी की विरासत से आता है। वह भोक्ता रही हैं, टूटन की और उलझन की। जब यह गीत शुरू होता है, वह छोटा-सा आलाप कमाल है। जितनी बार एक सुधी श्रोता इस गीत को सुनता है, उतनी बार कुछ छूट जाता है और कुछ टूट जाता है। जब पतझड़ को ठहरकर बोलते हैं, पतझड़ है कुछ, फिर थोड़ा ठहर कर बोलना है ना, तो एक आश्वस्ति चाहती है। इस बोलने और गाने के बीच जो अंतराल है और उस भाव को साधने का सलीक़ा है, वह एक गायक की साध है। साधना की अंतिम निष्पत्ति। ऐसे गीत हमें एक अपूर्व संसार की ओर लेकर जाते हैं, जहाँ असंख्य लोगों के दुख हैं। उनके हाथों पर अपने प्रिय के हाथों के लम्स अभी सुरक्षित हैं। उन्हें इस बात की चिंता है, यदि यह दुःख और स्पर्श उनके जीवन से चले गए तो वह भी राख हो जाएँगे। यह दुःख के बारह मासे हैं, जिन्हें अनुभव किया जाना है और सहानुभूति की दरकार है। आशा भोसले की आवाज़ उन पर जैसे गुलाब जल में डूबी रुई के फाहे जैसी है। कितनी विविधताओं को अपने आप में समेटे है एक आवाज़।
आशा की आवाज़ में एक खनक है, रस है, एक गहरी पुकार है। ‘ओ मेरे सोना रे…’ जैसे गीत कैसे विस्मृति होंगे। एक पूरी यात्रा को गीतों के माध्यम से हम जीते हैं। जहाँ प्रेम है, वियोग है और मनुहार है। देर से पहचाने जाने की स्वीकारोक्ति है। इतनी ख़ूबसूरती से इस गीत को गया है कि यह गायक की अपनी पहचान से आज़ाद होकर भारत के बहुसंख्यक महिलाओं का गीत बन जाता है। एक दौर की महिलाएँ इस गीत में अपने रोमांस को आवाज़ देती रहीं।
कहते हैं इस देह की अपनी सीमा है, मगर सुर निस्सीम हैं। वह अमरता की निशानी है। यह देह एक दिन राख बन जाती है, मगर कहीं कोई गीत बजता है—‘दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी…’ और वह कई पीढ़ियों को अपने भाव को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन जाता है। हम अमर होते हैं अपने सृजन में और ख़र्च हैं रोज़-रोज़ के जीने में। इन दोनों के बीच का जो बिंदु है, वह जीवन है। उस जीवन से जो वक़्त हम बचा लेते हैं और जिस तरीक़े से बचाते हैं, वही तो हमारी कहानी है। आशा जब इस गीत को गाती हैं, जैसे वह इस ज़िंदगी को गले तक जीकर इसके पार जाने की कोशिश कर रही हैं और इस बिंदु पर आकर यह गीत मास्टरपीस में तब्दील होता है। आप जानते हैं वक़्त बदला, लोग बदले, सुनने की तकनीक बदली—मगर आशा के क़द्रदान और उनके संगीत के रसिक समय के साथ बढ़ते ही जाते हैं।
आशा भोसले ने फ़िल्मी गीतों से अलग भी कई प्राइवेट एल्बम्स किए। अदनान सामी के साथ ‘कभी तो नज़र मिलाओ’ गीत उनका बहुत लोकप्रिय रहा और ‘जब सामने तुम आ जाते हो, न जानिए क्या हो जाता है’ प्रेम में डूबी हुई पीढ़ी का प्रिय गीत था। आपको पता होगा कि ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज ब्रेट ली के साथ भी उन्होंने एक गीत गया—‘यू आर द ओनली फ़ॉर मी’ और संजय दत्त के साथ ‘आपके दिल में थोड़ी-सी जगह चाहिए’ गीत भी बड़ा मज़ेदार है। एक मैजिक, चुहूल और हल्की-सी मस्ती। एक गहरी सक्रियता और वक़्त के साथ क़दम-ताल उन्हें हर पीढ़ी की प्रिय कलाकार के रूप में तब्दील करता है, जितनी वह साधारण और सरल हैं और ऊर्जा से भरी हुई, उतनी ही वह उम्र के पार जाते हुए सब की प्रिय रहीं।
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