चेखव और वे 'कल्चर्ड' महिलाएँ
मेरे लिए बुरा दिन वह होता है; जब किसी कवियाए मनुष्य या घोर उत्साही साहित्यानुरागी से भेंट हो जाए, या किसी ऐसे ‘विचारक’ से जो विभिन्न वाद-विवादों में धैर्य से गहरे न पैठा हो, पर फिर भी इस क्षेत्र में अंधाधुंध अपनी गदा घुमाए रहता हो। घोर कलाहीन और ‘विचार-विरोधी’
ललित कार्तिकेय
मैंने कविता लिखना कैसे प्रारंभ किया
देश भक्ति के साथ मोहिनी मंत्र मातृभाषा का पाकर प्रकृति प्रेम मधु-रस में डूबा गूंज उठा अंगों का मधुकर फूलों की ढेरों में मुझको मिला ढँका अमरो का पावक युग पिक बनना भाया मन को, जीवन चिंतक, जन भू भावक! नैसर्गिक सौंदर्य, पुष्प-सा, खिला दृष्टि में निर्निमेष
सुमित्रानंदन पंत
श्री० सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
यदि सामयिक हिंदी में कोई ऐसा विषय है जो अन्य सब विषयों की अपेक्षा अधिक क्लिष्ट और दुरूह समझा जा सके तो वह पं० सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का विकास है। इस कवि के व्यक्तित्व और काव्य के निर्माण में ऐसे परमाणुओं का सन्निवेश हुआ है जिनका विश्लेषण हिंदी की