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देह पर उद्धरण

देह, शरीर, तन या काया

जीव के समस्त अंगों की समष्टि है। शास्त्रों में देह को एक साधन की तरह देखा गया है, जिसे आत्मा के बराबर महत्त्व दिया गया है। आधुनिक विचारधाराओं, दासता-विरोधी मुहिमों, स्त्रीवादी आंदोलनों, दैहिक स्वतंत्रता की आवधारणा, कविता में स्वानुभूति के महत्त्व आदि के प्रसार के साथ देह अभिव्यक्ति के एक प्रमुख विषय के रूप में सामने है। इस चयन में प्रस्तुत है—देह के अवलंब से कही गई कविताओं का एक संकलन।

भीतर के साथ बाहर का निश्चित विभाजन अगर बना रहे तो हमारा जीवन सुविहित, सुश्रृंखलित, सुसंपूर्ण हो जाता है, किंतु वही हमारे जीवन में नहीं हो पा रहा है।

रवींद्रनाथ टैगोर

पीड़ा जिस वजह से होती है वह एक दिन या एक वर्ष में नहीं बनती। देह हो या देश, उसकी पीड़ा पैदा होने और पकने में लंबा समय लेती है। पीड़ा एक सिलसिले का नाम है।

कृष्ण कुमार

कभी-कभी लगता है कि हमारा यह शरीर मानो नदी किनारे का एक गाँव है। ज्यों-ज्यों नदी आगे बढ़ती है, एक के बाद एक गाँव आते जाते हैं। उसी तरह अनेक देहों में से होती हुई जीवन-नदी आगे बढती जाती है। अंत में नदी समुद्र में मिल जाती है, आत्मा परमात्मा में मिल जाती है।

अमृतलाल वेगड़

शरीर एक बदलता हुआ प्रवाह है और मन भी। उन्हें जो किनारे समझ लेते है, वे डूब जाते है।

ओशो

मुझे लगता है कि व्यक्ति ईश्वर से आता है और ईश्वर के पास वापस जाता है, क्योंकि शरीर की कल्पना की जाती है और जन्म होता है, यह बढ़ता है और घटता है, यह मर जाता है और ग़ायब हो जाता है; लेकिन जीवात्मा शरीर और आत्मा का मेल है, जिस तरह एक अच्छी तस्वीर में आकार और विचार का अदृश्य संगम होता है।

यून फ़ुस्से

शरीर अंततः अवास्तविक है।

रघुवीर चौधरी

साधारण सही दिमाग़ वाले व्यक्तियों में भी वैयक्तिक महक; यौन-आकर्षण तथा विकर्षण का बहुत बड़ा भाग अदा करती है, इसी को कभी-कभी गंध-प्रधानतावाद कहा जाता है।

हेवलॉक एलिस

अगर हम 'अस्वस्थता के संकुचन' के बिना जीवनकाल बढ़ा देंगे, तो इससे हमारी मौजूदा समस्याएँ और बढ़ जाएँगी, लेकिन अगर शोधकर्ता उम्र बढ़ने को मात देने और अस्वस्थता के संकुचन में सफल रहते हैं, तो हम यह दृश्य देख सकते हैं कि लोग आमतौर पर सौ साल से ऊपर भी स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और संभवतः उम्र की लगभग एक सौ बीस साल की प्राकृतिक सीमा के पास पहुँच रहे हैं।

वेंकी रामकृष्णन

शरीर कोई चीज़ नहीं, बल्कि एक स्थिति है : यह दुनिया पर हमारी पकड़ है और हमारी योजना की रूपरेखा है।

सिमोन द बोउवार

शरीर से रोगग्रस्त होते हुए भी आध्यात्मिक दृष्टि से वह पूर्ण स्वस्थ होता है; भौतिक दृष्टि से ग़रीब होते हुए भी आध्यात्मिक दृष्टि से वह पूर्ण संपन्न होता है।

महात्मा गांधी

हे मेरे शरीर, मुझे ऐसा आदमी बनाओ जो हमेशा सवाल करता रहे!

फ्रांत्ज़ फ़ैनन

शरीर अंततः अवास्तविक है।

रघुनाथ चौधरी

बूढ़ा होता शरीर इतने अधिक तरीक़ों से बदलता है कि यह पता लगाना मुश्किल है कि उम्र किन कारणों से बढ़ रही है, और कौन-से केवल इसका परिणाम हैं; लेकिन वैज्ञानिकों ने उम्र बढ़ने के कुछ लक्षणों पर ध्यान केंद्रित किया है। इनमें तीन ख़ास गुण होने चाहिए : पहला, यह बूढ़े होते हुए शरीर में ज़रूर हो; दूसरा इस लक्षण की ज़्यादा मात्रा से बूढ़े होने की गति बढ़नी चाहिए; और तीसरा इसकी मात्रा कम करने या पूरी तरह रोक देने से बूढ़ा होने की दर घट जानी चाहिए।

वेंकी रामकृष्णन

स्वभाव से ही मनुष्य का मन बाहर की ओर प्रवृत्त होता है, मानो वह इंद्रियों के द्वारा शरीर के बाहर झाँकना चाहता हो।

स्वामी विवेकानन्द

वही शरीर है, वही रूप है, वही हृदय है; पर छिन गया अधिकार और मनुष्य का मान-दंड ऐश्वर्य। अब तुलना में सबसे छोटी हूँ। जीवन लज्जा की रंगभूमि बन रहा है।

जयशंकर प्रसाद

शरीर के महत्व को, अपने देश के महत्व को समझने के लिए बीमार होना बेहद ज़रूरी बात है।

राजकमल चौधरी

शरीर के संस्कार हेतु नागरक को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए, दूसरे दिन तेल-मालिश करनी चाहिए, तीसरे दिन साबुन लगाना चाहिए और चौथे दिन दाढ़ी-मूँछ के बाल और पाँचवें या दसवें दिन गुप्त अंगों के बाल बनवाने चाहिए। निरंतर कपड़ों से ढकी काँखों के पसीने को पोंछना चाहिए।

वात्स्यायन

मन की अस्थिरता के कारण शरीर भी पूरी तरह अस्थिर हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द

जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। विद्यमान जीव का अभाव नहीं हो सकता। देह भस्म हो जाता है, जीव नहीं।

दयानंद सरस्वती

आत्मा जिस शरीर को आश्रम बनाकर रहती है, उसी शरीर को उसे त्यागना पड़ता है। कारण, आत्मा शरीर से बहुत बड़ी है।

रवींद्रनाथ टैगोर

रसिक व्यक्ति को आकस्मिक रूप से, या अन्यथा देर-सवेर में यह मालूम हो ही जाता है कि सबसे अतरंग संबंध में अधिकांश लोगों के लिए महक या गंध, बहुत भारी महत्व रखती है।

हेवलॉक एलिस

आत्मा से संयुक्त एवं मन से अधिष्ठित श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण आदि पाँच ज्ञानेंद्रियों की अपने-अपने विषयों में जो अनुकूल प्रवृत्ति है—वही 'काम' है।

वात्स्यायन

हमारे बीच एक बहुत बड़े विभाजन के लिए स्थान है, वह है अंदर और बाहर का विभाजन।

रवींद्रनाथ टैगोर

जीन में मौजूद सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी में से एक यह है कि प्रोटीन का निर्माण कैसे किया जाता है। आमतौर पर हम प्रोटीन को केवल अपने खाने के ज़रूरी हिस्से के रूप में देखते हैं, और जानते हैं कि माँसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए यह उपयोगी है। वास्तव में हमारे शरीर में हज़ारों तरह के प्रोटीन होते है। वे शरीर को आकार और ताक़त ही नहीं देते, बल्कि उनमें जीवन के लिए ज़रूरी कई रासायनिक प्रक्रियाएँ भी होती हैं। वे कोशिका के भीतर और बाहर, अणुओं के बहाव को नियंत्रित करते हैं।

वेंकी रामकृष्णन

भारतीय चिंतन में शरीर का अंत जीवन का अंत नहीं है, जीवन के पराभौतिक आयाम भी हैं? जीव का चेतन-स्वरूप केवल अपना भौतिक रूप बदलता रहता है।

कुँवर नारायण

कर्तव्य तो एक व्यर्थ की बकवास है। मैं मुक्त हूँ—मेरे सारे बंधन कट चुके हैं। यह शरीर कहीं भी रहे या रहे, इसकी मुझे क्या परवाह।

स्वामी विवेकानन्द

हमारे शरीर की ज़्यादातर कोशिकाएँ, हमारे मरने से पहले कई बार मरती हैं और उनकी जगह नई कोशिकाएँ जाती हैं।

वेंकी रामकृष्णन

भगवती महामाया का निद्रा-रूप बड़ा शामक होता है। वह शरीर और मन की थकान पर सुधालेप करता है। वह जीवनी शक्ति को सहलावा देता है और प्राणों को नए सिरे से ताज़गी देता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी

दाँतों का सम होना, अधिक चिकना होना, रंगों को ग्रहण करने वाला, समान का होना ,सटा हुआ होना, अग्रभाग में तीक्ष्ण होना—ये दाँतों के गुण हैं।

वात्स्यायन

शरीर के अस्वस्थ होने पर मन भी अस्वस्थ हो जाता है, शरीर स्वस्थ रहने पर मन भी स्वस्थ और तेजस्वी रहता है।

स्वामी विवेकानन्द

जिन्होंने अपनी देह को देशसेवा में ही जीर्ण कर दिया, वे देहपात होने पर जन-मन से विस्मृत नहीं हो सकते, कभी नहीं मर सकते।

महात्मा गांधी

जब शरीर के किसी अंग पर नाख़ून से छोटी रेखा ख़ींची जाए, तो उसे 'रेखा' नामक नखक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन

जिसका शरीर होता है, वह सर्वव्यापी नहीं हो सकता।

रवींद्रनाथ टैगोर

यौन-मिलन स्वयं एक बड़ी हद तक विशेष ढंग की चार्मिक प्रतिक्रिया है।

हेवलॉक एलिस

प्रत्येक कोशिका में हमेशा व्यक्त रहने वाले जीव होते हैं, क्योंकि हर कोशिका को उनकी ज़रूरत होती है।

वेंकी रामकृष्णन

अँग्रेज़ी अनुवाद में प्राण शब्द का अर्थ किया गया है श्वास। इससे तुम्हें सहज ही संदेह हो सकता है कि श्वास से संपूर्ण शरीर को कैसे पूरा किया जाए। वास्तव में यह अनुवादक का दोष है। देह के सारे अंगों को प्राण अर्थात् इस जीवनीशक्ति द्वारा भरा जा सकता है, और जब तुम इसमें सफल होंगे, तो संपूर्ण शरीर तुम्हारे वश में हो जाएगा; देह की समस्त व्याधियाँ, सारे दुःख तुम्हारी इच्छा के अधीन हो जाएँगे।

स्वामी विवेकानन्द

खाओ, पिओ, जागो, बैठो अथवा खड़े रहे, पर दिन में एक बार भी यह सोच लो कि इस शरीर का नाश निश्चय है।

अप्पय दीक्षित

इस सुंदरी का शरीर मनोहर है, वाणी रम्य है तथा चरण-निक्षेप अलौकिक है।

बाणभट्ट

ज्योंही मैं अपने को एक क्षुद्र देह समझ बैठता हूँ, त्योंही मैं संसार के अन्यान्य शरीरों के सुख-दुःख की कोई परवाह करते हुए, अपने शरीर की रक्षा में उसे सुंदर बनाने के प्रयत्न में लग जाता हूँ।

स्वामी विवेकानन्द

दाँतों का छोटा-बड़ा होना, पंक्ति से उभरा हुआ होना, रूख़ापन, विषम होना, घिसे हुए और मोटे-मोटे तथा बिखरे हुए होना—ये दोषयुक्त दाँत के लक्षण हैं।

वात्स्यायन

जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी वस्तु के साथ संलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है, तो उसे धारणा कहते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

यदि श्वास-प्रश्वास की गति लयबद्ध या नियमित की जाए, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा में गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे।

स्वामी विवेकानन्द

शरीर तट है, मन है। उन दोनों के पीछे जो चैतन्य है, साक्षी है, द्रष्टा है, वह अपरिवर्तित नित्य बोध मात्र ही वास्तविक तट है। जो अपनी नौका की उस तट से बाँधते है, वे अमृत को उपलब्ध होते है।

ओशो

भारतवर्ष की पवित्र भूमि है, उत्तम कुल में जन्म मिला है, समाज और शरीर भी उत्तम मिला है। ऐसी अवस्था में जो व्यक्ति क्रोध कठोर वचन त्याग कर वर्षा, जाड़ा, वायु और धूप को सहन करता हुआ चातक-हठ से भगवान् को भजता है, वही चतुर है। शेष सब तो सुवर्ण के हल में कामधेनु को जोतकर विषबीज ही बोते हैं।

तुलसीदास

रोगों के आगार शरीर में किरायेदार के समान उपस्थित प्राण के लिए, मानो अभी तक कोई शाश्वत स्थान ही प्राप्त नहीं हुआ।

तिरुवल्लुवर
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हमारे जैसे लोगों को एकांत विध्वंसशील (नश्वर) इस शरीर के प्रति मोह नहीं होता।

कालिदास

जो शरीरधारियों को अकाल मृत्यु से बचाकर शरीर सुख देता है, उस परमात्मा के समान भी कोई नहीं है, फिर उससे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है क्योंकि इस संसार में जीवन दान से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

कणाद

शब्द—विचार का भोजन, शरीर, दर्पण और ध्वनि हैं। क्या अब आप उन शब्दों के ख़तरे को देखते हैं जो बाहर आना चाहते हैं, लेकिन ऐसा करने में असमर्थ हैं?

न्गुगी वा थ्योंगो

वेग के साथ घूमती हुई, चक्र का भ्रम उत्पन्न करने वाली काल-गति देखी नहीं जाती। कल जो शिशु था, आज वही पूर्ण युवा है और कल प्रात: वही जरा-जीर्ण शरीर वाला हो जाएगा।

क्षेमेंद्र

जो कार्य करने से तो धर्म होता हो और कीर्ति बढ़ती हो और अक्षय, यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?

वाल्मीकि