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स्वार्थ पर उद्धरण

जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।

हरिशंकर परसाई

हिंदी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है—अपनों की प्रशंसा और परायों की निंदा।

हरिशंकर परसाई

राजनीतिक दाँव-पेंच में पड़कर; हमें कम-से-कम इतना तो भूलना चाहिए कि वर्तमान काल ही सब कुछ नहीं है—भूत और भविष्य काल भी कोई वस्तु है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है—यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।

हरिशंकर परसाई

श्रद्धा का मूल तत्त्व है—दूसरे का महत्त्व स्वीकारना। अतः जिनकी स्वार्थबद्ध दृष्टि अपने से आगे नहीं जा सकती, अथवा अभिमान के कारण जिन्हें अपनी ही बड़ाई के अनुभव की लत लग गई है—उनकी इतनी समाई नहीं कि वे श्रद्धा ऐसे पवित्र भाव को धारण करें।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

एक वर्ग ऐसा रहा है, जो आदमी को हमेशा इस्तेमाल करता रहा है। पहले वह फ़िंक्शन के जरिए उसे एक्स्प्लायट करता था। उस के बाद फ़ेथ (विश्वास) के जरिये इस्तेमाल करता रहा, और अब फ़ैक्ट (तथ्य) के नाम पर इस्तेमाल कर रहा है।

धूमिल

समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।

जॉन स्टुअर्ट मिल

सरकार का विरोध करना भी, सरकार से लाभ लेने और उसमें संरक्षण प्राप्त करने की एक तरक़ीब है। लेखक अब 'बेचारा' रह गया है, भोला। वह जानता है कि सरकार का विरोध करने से कभी-कभी समर्थन से अधिक फ़ायदे मिलते हैं।

हरिशंकर परसाई

साहित्य में बंधुत्य से अच्छा धंधा हो जाता।

हरिशंकर परसाई

जिस तरह स्वार्थ और शिकायत से मन रोगी और धुँधला हो जाता है, उसी तरह प्रेम और उसके उल्लास से दृष्टि तीखी हो जाती है।

हेलेन केलर

लोकरुचि अथवा लोक-उक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन-यापन करते हैं, वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ, पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्‌गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्‌गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।

श्रीमद् राजचंद्र

जहाँ रुपए-पैसे का संबंध है, वहीं भ्रम होने की संभावना है।

स्वामी विवेकानन्द

उत्पीड़क संपूर्ण समुदाय की उन्नति के पक्ष में नहीं, बल्कि उसके कुछ गिने-चुने नेताओं की उन्नति के पक्ष में होते हैं।

पॉलो फ़्रेरा

विज्ञापन के अनुसार सुसंस्कृत होने का मतलब है—किसी भी विवाद से दूर रहना।

जॉन बर्जर

मतार्थी जीव को आत्मज्ञान नहीं होता है।

श्रीमद् राजचंद्र

जो केवल अपने विलास या शरीर-सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढ़ा करते हैं, उनमें रस रागात्मक 'सत्त्व' की कमी है, जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके, हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

चारों ओर सब प्रकार के अस्थायी अनुभवों से घिरे रहकर हम सोचते हैं कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है? प्यार भी स्वार्थ से भरा है।

स्वामी विवेकानन्द

एक का स्वार्थ दूसरे पर निर्भर है, इसका विशेष रूप से ज्ञान होने पर सब लोग ईर्ष्या को त्याग देंगे। आपस में मिल-जुलकर किसी कार्य को संपादित करने की भावना, हमारे जातीय चरित्र में सुलभ नहीं है। अतः इस प्रकार की भावना को जाग्रत करने के लिए, तुम्हें अत्यधिक परिश्रम करना पड़ेगा तथा उसके लिए हमें धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा भी करनी होगी।

स्वामी विवेकानन्द

मनमुटाव वे नहीं फैलाते, जो प्रेम से वंचित हैं; बल्कि वे फैलाते हैं, जो प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं से ही प्रेम करते हैं।

पॉलो फ़्रेरा

गृहस्थी के संचय में, स्वार्थ की उपासना में, तो सारी दुनिया मरती है। परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कार वालों को ही प्राप्त होता है।

प्रेमचंद

समस्त अज्ञान का आधार यही है कि हम अविनाशी, नित्य शुद्ध पूर्ण आत्मा होते हुए भी सोचते हैं कि हम छोटे-छोटे मन हैं; हम छोटी-छोटी देह मात्र हैं— यही समस्त स्वार्थपरता की जड़ है।

स्वामी विवेकानन्द

ईश्वर का स्मरण स्वार्थी मनुष्य को नहीं रहता।

स्वामी विवेकानन्द

मनुष्य जिस तरह से जगत् के संबंध में भयानक स्वार्थपरक मीमांसा करता है, उसे ग्रहण करना एक भीषण भूल होगी।

स्वामी विवेकानन्द

राजा से लेकर रंक तक सभी लोग; करारों के ख़ुद को अच्छे लगने वाले अर्थ करके, दुनिया को, ख़ुद को और भगवान को धोखा देते हैं।

महात्मा गांधी

जो लोग स्वार्थवश, व्यर्थ की प्रशंसा और ख़ुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं—वे सरस्वती का गला घोंटते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

प्रेम यज्ञ में स्वार्थ और कामना का हवन करना होगा।

जयशंकर प्रसाद

इज़्ज़तदार आदमी, ऊँचे झाड़ की ऊँची टहनी पर दूसरे के बनाए घोंसले में अंडे देता है।

हरिशंकर परसाई

कामकाजी दृष्टि मनुष्य के स्वार्थ के साथ दृश्य वस्तु को जोड़कर देखती है और एक भावुक की दृष्टि अधिकतर निःस्वार्थ भाव की वस्तुओं का स्पर्श करती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

जो आदमी सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो सकता।

प्रेमचंद

जिस तरह दानशीलता मनुष्य के दुर्गुणों को छिपा लेती है, उसी तरह कृपणता उसके सद्गुणों पर पर्दा डाल देती है।

प्रेमचंद

मनुष्य की मानसिक मनोवैज्ञानिक स्वार्थ-बुद्धि, ऊँचे आदर्शों को आगे करके उनके झंडे के नीचे काम करती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

न्याय और निष्काम कर्मयोग हृदय का है। बुद्धि से हम निष्कामता को नहीं पहुँच सकते।

महात्मा गांधी

अस्तेय और अपरिग्रह में बहुत थोड़ा भेद है। जिसकी हमें आज आवश्यकता नहीं है, उसे भविष्य की चिंता से संग्रहकर रखना परिग्रह है।

महात्मा गांधी

भक्ति और प्रेम से मनुष्य निःस्वार्थी बन सकता है। मनुष्य के मन में जब किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा बढ़ती है तब उसी अनुपात में स्वार्थपरता घट जाती है।

सुभाष चंद्र बोस

निःसंदेह स्वार्थ भी त्याग की अपेक्षा रखता है, किंतु स्वार्थी व्यक्ति बाधित होकर ही त्याग करता है। प्रेम में त्याग स्वेच्छा से होता है, वहाँ त्याग में भी आनंद है।

रवींद्रनाथ टैगोर

जो मोहवश अपने हित की बात नहीं मानता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य अपने स्वार्थ से भ्रष्ट होकर केवल पश्चाताप का भागी होता है।

वेदव्यास

अमेरिका जब किसी विकासशील देश से औद्योगिक और व्यापारिक सहयोग करता है या सहायता करता है, तो उसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुनाफ़े का उद्देश्य होता है।

हरिशंकर परसाई

सभी पुरुष स्वार्थी, क्रूर और अविवेकी हैं—और मैं चाहती हूँ कि मुझे उनमें से कोई मिल जाए।

शुलामिथ फ़ायरस्टोन

क्षमा और उदारता वही सच्ची है, जहाँ स्वार्थ की भी बलि हो।

जयशंकर प्रसाद

'ईसप' की एक कहानी है जिसमें एक काणा हिरन है। जिस दिशा में उसकी फूटी आँख है, वहीं से बाण उस पर लगता है। वर्तमान मानव-सभ्यता का 'काणा' पक्ष है उसकी विषयलोलुपता।

रवींद्रनाथ टैगोर

डर यही है कि अपनी श्रेष्ठता, पुण्य या धन के अभिमान से हमारा दान अपमानित हो, अधर्म में परिणत हो। इसीलिए उपनिषद् में कहा है ‘भ्रिया देयम्’—भय करते हुए दान दो।

रवींद्रनाथ टैगोर

मालिक और मज़दूर के स्वार्थ, एक-दूसरे के विरोधी हैं।

महात्मा गांधी

जो मनुष्य स्वार्थ-प्रधान अहंकारी होता है, वह अन्य सब वस्तुओं का हीनतम् मूल्यांकन करता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

साहित्य का काम, अच्छी दूकान की अच्छी नौकरी लगने तक ही होता है।

हरिशंकर परसाई

जहाँ स्वार्थ की लेशमात्र भी गंध है, वहाँ पूर्ण अहिंसा संभव नहीं है।

महात्मा गांधी

जो अपनी आत्मा के साथ तो क्या, प्रकृति के साथ भी सामंजस्य में नहीं जीते और इस के विपरीत निसर्गविरुद्ध जटिलताओं में उलझते हुए; शरीर और मन में प्रकृति द्वारा प्रदत्त मधुर स्वस्थताओं को आघात पहुँचाते जाते हैं, ऐसे लोगों के लिए दस लाख़ वर्षों की दुगुनी अवधि भी मुक्ति के लिए अपर्याप्त है।

परमहंस योगानंद

अस्तेय और अपरिग्रह का आदर्श रखनेवाला मनुष्य, दूसरे के परिश्रम का लाचार दशा में ही उपयोग करेगा।

महात्मा गांधी

अपने या अपने बाल-बच्चों के काम आने के ख़याल से जो एक चिथड़ा ही बटोरकर रखता है और दूसरे को ज़रूरत होते हुए भी इस्तेमाल नहीं करने देता, वह परिग्रही है। जो ऐसी वृत्ति से रहित है, लाख रुपए की पूँजी रखता हुआ भी, वह अपरिग्रही है।

महात्मा गांधी

कंजूसी काला रंग है जिस पर दूसरा कोई रंग, चाहे कितना ही चटख क्यों हो, नहीं चढ़ सकता।

प्रेमचंद