माया

कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम।

मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण देई राम॥

यह माया बड़ी पापिन है। यह प्राणियों को परमात्मा से विमुख कर देती है तथा

उनके मुख पर दुर्बुद्धि की कुंडी लगा देती है और राम-नाम का जप नहीं करने देती।

कबीर

हस्ती छूटा मन फिरै, क्यूँ ही बंध्या जाइ।

बहुत महावत पचि गये, दादू कछू बसाइ॥

विषय-वासनाओं और विकारों रूपी मद से मतवाला हुआ यह मन रूपी हस्ती निरंकुश होकर सांसारिक प्रपंचों के जंगल में विचर रहा है। आत्म-संयम और गुरु-उपदेशों रूपी साँकल के बिना बंध नहीं पा रहा है। ब्रह्म-ज्ञान रूपी अंकुश से रहित अनेक महावत पचकर हार गए, किंतु वे उसे वश में कर सके।

दादू दयाल

घर दीन्हे घर जात है, घर छोड़े घर जाय।

‘तुलसी’ घर बन बीच रहू, राम प्रेम-पुर छाय॥

यदि मनुष्य एक स्थान पर घर करके बैठ जाय तो वह वहाँ की माया-ममता में फँसकर उस प्रभु के घर से विमुख हो जाता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य घर छोड़ देता है तो उसका घर बिगड़ जाता है, इसलिए कवि का कथन है कि भगवान् राम के प्रेम का नगर बना कर घर और बन दोनों के बीच समान रूप से रहो, पर आसक्ति किसी में रखो।

तुलसीदास

असि माया मोपर करो, चलें माया ज़ोर।

माया मायारहित दिहू, निज पद नंदकिशोर॥

हे नंदकिशोर! मुझ पर ऐसी ममता रखिये, जिससे माया का कुछ भी ज़ोर चले। माया-रहित करके आप मुझे अपने चरण-कमलों का प्रेम दीजिए।

दयाराम

कबीर यहु जग अंधला, जैसी अंधी गाइ।

बछा था सो मरि गया, ऊभी चांम चटाइ॥

यह संसार अँधा है। यह ऐसी अँधी गाय की तरह है, जिसका बछड़ा तो मर गया किंतु वह खड़ी-खड़ी उसके चमड़े को चाट रही है। सारे प्राणी उन्हीं वस्तुओं के प्रति राग रखते हैं जो मृत या मरणशील हैं। मोहवश जीव असत्य की ओर ही आकर्षित होता है।

कबीर
  • संबंधित विषय : गाय

माया मुई मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।

आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर॥

कबीर कहते हैं कि प्राणी की माया मरती है, मन मरता है, यह शरीर ही बार-बार मरता है। अर्थात् अनेक योनियों में भटकने के बावजूद प्राणी की आशा और तृष्णा नहीं मरती वह हमेशा बनी ही रहती है।

कबीर

जप तप तीरथ दान ब्रत, जोग जग्य आचार।

‘भगवत' भक्ति अनन्य बिनु, जीव भ्रमत संसार॥

भगवत रसिक

भली बुरी दोनूँ तजो, माया जाणो ख़ाक।

आदर जाकूँ दीजसौ, दरगा खुलिया ताक॥

लालनाथ

सुरत रूप अति अचरजी, वर्णन किया जाय।

देह रूप मिथ्या तजा, सत्तरूप हो जायं॥

संत शिवदयाल सिंह

कनकु कनक तैं सौगुनौ मादकता अधिकाइ।

उहिं खाऐं बौराइ जग इहिं पाऐं हीं बौराइ॥

स्वर्ण और धतूरे दोनों में मादकता होती है। सोने में धतूरे से सौगुनी अधिक मादकता पाई जाती है। स्पष्ट शब्दों में सोना धातु होकर भी मनुष्य को उन्मत्त और पागल बना देता है तभी तो संसार में यह देखा जाता है कि लोग धतूरे को खाकर पागल होते हैं और सोने को प्राप्त करके ही उन्मत्त हो जाते हैं। जिस वस्तु की प्राप्ति-मात्र से उन्मत्तता बढ़ जाए वह निश्चय ही उस वस्तु की तुलना में अधिक मादक है जो खाने के पश्चात् मनुष्य की बुद्धि और विवेकशीलता को समाप्त कर देती है।

बिहारी