नश्वर पर दोहे

मानव शरीर की नश्वरता

धार्मिक-आध्यात्मिक चिंतन के मूल में रही है और काव्य ने भी इस चिंतन में हिस्सेदारी की है। भक्ति-काव्य में प्रमुखता से इसे टेक बना अराध्य के आश्रय का जतन किया गया है।

देउल देउ वि सत्थु गुरु, तित्थु वि वेउ वि कब्बु।

बच्छु जु दोसै कुसुमियउ, इंधणु होसइ सब्बु॥

देवल (मंदिर), देव, शास्त्र, गुरु, तीर्थ, वेद, काव्य, वृक्ष जो कुछ भी कुसुमित दिखाई पड़ता है, वह सब ईंधन होगा।

जोइंदु

थोड़ा जीवण कारनै, मत कोई करो अनीत।

वोला जौ गल जावोगे, जो बालु की भीत॥

संत लालदास

काग आपनी चतुरई, तब तक लेहु चलाइ।

जब लग सिर पर दैइ नहिं, लगर सतूना आइ॥

हे कौए! तू अपनी चतुरता तब तक दिखा ले जब तक कि तेरे सिर पर बाज पक्षी आकर अपनी झपट नहीं मारता। भाव यह है कि जब तक मृत्यु मनुष्य को आकर नहीं पकड़ लेती, तभी तक मनुष्य का चंचल मन अपनी चतुरता दिखाता है।

रसनिधि

सदा नगारा कूच का, बाजत आठों जाम।

रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम॥

आठों पहर कूच करने का नगाड़ा बजता रहता है। यानी हर वक़्त मृत्यु सक्रिय है, कोई कोई मर ही रहा है। यही सत्य है। रहीम कहते हैं कि इस नश्वर संसार में आकर कौन अमर हुआ है!

रहीम

हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जले ज्यूँ घास।

सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥

हे जीव, यह शरीर नश्वर है। मरणोपरांत हड्डियाँ लकड़ियों की तरह और केश घास (तृणादि) के समान जलते हैं। इस तरह समस्त शरीर को जलता देखकर कबीर उदास हो गया। उसे संसार के प्रति विरक्ति हो गई।

कबीर
  • संबंधित विषय : देह

चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ।

दोइ पट भीतर आइकै, सालिम बचा कोई॥

काल की चक्की चलते देख कर कबीर को रुलाई जाती है। आकाश और धरती के दो पाटों के बीच कोई भी सुरक्षित नहीं बचा है।

कबीर

सैना रोऊँ किण सुमर, देख हूँसू किण अब्ब।

जो आए ते सब गये, हैं सो जैहें सब्ब॥

सैन कहते हैं—मैं किसे याद करके रोऊँ और किसे याद करके हँसूँ? जो आए थे, वे सब चले गए। जो हैं, वे सब चले जाएँगे।

सैन भगत

कबीर ऐसा यहु संसार है, जैसा सैंबल फूल।

दिन दस के व्यौहार में, झूठै रंगि भूलि॥

यह जगत सेमल के पुष्प की तरह क्षण-भंगुर तथा अज्ञानता में डालने वाला है। दस दिन के इस व्यवहार में, हे प्राणी! झूठ-मूठ के आकर्षण में अपने को डालकर स्वयं को मत भूलो।

कबीर

पाणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति।

एक दिनाँ छिप जाँहिगे, तारे ज्यूं परभाति॥

यह मानव जाति तो पानी के बुलबुले के समान है। यह एक दिन उसी प्रकार छिप (नष्ट) जाएगी, जैसे ऊषा-काल में आकाश में तारे छिप जाते हैं।

कबीर

गर्व भुलाने देह के, रचि-रचि बाँधे पाग।

सो देही नित देखि के, चोंच सँवारे काग॥

मलूकदास
  • संबंधित विषय : देह

सुंदर देही पाय के, मत कोइ करैं गुमान।

काल दरेरा खाएगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान॥

मलूकदास

इस जीने का गर्व क्या, कहाँ देह की प्रीत।

बात कहते ढह जात है, बारू की सी भीत॥

मलूकदास
  • संबंधित विषय : देह

यौं मति जानै बावरे, काल लगावै बेर।

सुंदर सब ही देखतें, होइ राख की ढेर॥

सुंदरदास

असु गज अरु कंचन 'दया', जोरे लाख करोर।

हाथ झाड़ रीते गये, भयो काल को ज़ोर॥

दयाबाई

सुंदर ग़ाफ़िल क्यौं फिरै, साबधान किन होय।

जम जौरा तकि मारि है, घरी पहरि मैं तोय॥

सुंदरदास

मेरै मंदिर माल धन, मेरौ सकल कुटुंब।

सुंदर ज्यौं को त्यौं रहै, काल दियौ जब बंब॥

सुंदरदास

सुंदर देही देखि के, उपजत है अनुराग।

मढी होती चाम की, तो जीबत खाते काग॥

मलूकदास
  • संबंधित विषय : देह

बलि किउ माणुस जम्मडा, देक्खंतहँ पर सारु।

जइ उट्टब्भइ तो कुहइ, अह डज्झइ तो छारु॥

मनुष्य इस जीवन की बलि जाता हैं (अर्थात् वह अपनी देह से बहुत मोह रखता है) जो देखने में परम तत्व है। परंतु उसी देह को यदि भूमि में गाड़ दें तो सड़ जाती है और जला दें तो राख हो जाती है।

जोइंदु

रावन कुंभकरण गये, दुरजोधन बलवंत।

मार लिये सब काल ने, ऐसे 'दया' कहंत॥

दयाबाई

भाई बंधु कुटुंब सब, भये इकट्ठे आय।

दिना पाँच को खेल है, 'दया' काल ग्रासि जाय॥

दयाबाई

‘लालू’ क्यूँ सूत्याँ सरै, बायर ऊबो काल।

जोखो है इण जीव नै, जँवरो घालै जाल॥

लालनाथ

जैसो मोती ओस को, तैसो यह संसार।

बिनसि जाय छिन एक में, 'दया' प्रभू उर धार॥

दयाबाई

सुंदर मुख मैं हाड सब, नैन नासिका हाड।

हाथ पांव सब हाड के, क्यौं नहि समुझत रांड॥

सुंदरदास

'दया कुँवर' या जक्त में, नहीं रह्यो थिर कोय।

जैसो बास सराँय को, तैसो यह जग होय॥

दयाबाई

जागो रे अब जागो भैया, सिर पर जम की धार।

ना जानूँ कौने घरी, केहि ले जैहै मार॥

मलूकदास

तात मात तुम्हरे गये, तुम भी भये तैयार।

आज काल्ह में तुम चलो, 'दया' होहु हुसियार॥

दयाबाई

जा गुलाब के फूल कौं, सदा रंग ठहराइ।

मधुकर मत पच तू अरे, वासौं नेह लगाइ॥

रसनिधि

जेते सुख संसार के, इकट्ठे किए बटोर।

कन थोरे कांकर घने, देखा फटक पछोर॥

मलूकदास

जैसो मोती ओंस को, तैसो यह संसार।

बिनसि जाय छिन एक में, ‘दया’ प्रभू उर धार॥

दयाबाई