संत बाबालाल की संपूर्ण रचनाएँ
दोहा 5
हिंदू तो हरिहर कहे, मुस्सलमान खुदाय।
साँचा सद्गुरु जे मिले, दुविधा रहे ना काय॥
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आशा विषय विकार की, बध्या जग संसार।
लख चौरासी फेर में, भरमत बारंबार ॥
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जाके अंतर वासना, बाहर धरे ध्यान।
तिहँ को गोविंद ना मिले, अंत होत है हान॥
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जिन्ह को आशा कछु नहीं, आतम राखे शून्य।
तिहँ को नहिं कछु भर्मणा, लागे पाप न पून्य॥
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देहा भीतर श्वास है, श्वासे भीतर जीव।
जीवे भीतर वासना, किस बिधि पाइये पीव॥
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