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कहानी : एक पापी की डायरी

इस तथ्य को बतौर ढाल के रूप में प्रयोग करते हुए, ताकि अपनी अंतरात्माओं के हमलों से हम स्वयं को बचा सकें कि इन शब्दों को लिखने वाला अब इस दुनिया में नहीं है, कि एक दशक पहले अगस्त महीने की एक बरसती शाम एक पहाड़ी पर चढ़कर उसने अपनी खोपड़ी में गोली मार ली, कि उसकी पीड़िता (और उसकी मुक्ति का रास्ता भी) की भी उसी वर्ष के आख़िरी महीने में किन्हीं अस्पष्ट परिस्थितियों में मृत्यु हो गई, हम स्वर्गीय विवेक राठौर वल्द घनश्याम सिंह राठौर की निजी डायरी के एक अंश को सार्वजनिक कर रहे हैं।

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20 अप्रैल

मैंने आज उसको देखा। पहली बार नहीं, पर पहली बार की तरह। आज शाम पहाड़ियों पर सैर के दौरान मेरी निगाह उस पर ठीक वैसे ही ठिठक गई, जैसे हमारे रोज़ के आने-जाने वाले रास्ते के किनारे खड़े किसी पुराने दरख़्त या उजाड़ इमारत पर अचानक हमारी नज़र पड़ती है और हम आश्चर्यचकित हो उठते हैं, हम स्वयं से पूछ बैठते हैं कि इतने दिनों तक अमुक चीज़ कैसे हमारी आँखों से बची रही?

मैं पहाड़ी पर था, डूबते सूरज को निहारता, जब गाँव से बाज़ार को जोड़ने वाली पथरीली सड़क पर मैंने देखा कि हाथ में झोला लटकाए वह सधे क़दमों से चली आ रही थी। उसकी चाल में वह अल्हड़पन नहीं था जो आमतौर पर अट्ठारह-उन्नीस बरस की युवती में होता है। उसमें एक गंभीरता थी। उसके साँवले और गोरे के बीच कहीं अटकी दुबली-पतली उसकी काया में।

टीलेनुमा पहाड़ों से घिरे पथरीले इस गाँव में—जहाँ पिछले एक वर्ष से अपने होने की सज़ा काट रहा हूँ—वह मेरी पड़ोसी है, यह बोध मुझे थोड़ी देर बाद हुआ। थोड़ी देर बाद मुझे एहसास हुआ कि वह रामप्रसाद की बेटी है।

कितना कुछ होता है हमारे आस-पास और हम दूर देखते रह जाते हैं...

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21 अप्रैल

मेरे जैसे इंसान के लिए अच्छा सपना भी उतना ही बुरा होता है जितना कि बुरा सपना। बीती रात मैंने एक सपना देखा और आज पूरे दिन उसके प्रभाव में रहा।

पत्थरों को चीर उग आई किसी पहाड़ी फूल-सी वह पथरीले रास्ते पर मेरे आगे-आगे चली जा रही है, वही धीर-गंभीर चाल। मैं उसके पीछे-पीछे उसके किसी अदृश्य अपरिभाषित बंधन में बँधा घसीटता जा रहा हूँ।

शाम घिर आई है और वह बेपरवाह चलती चली जा रही है—झील के किनारे-किनारे, ज़ंग खाए लोहे के एक पुराने पुल को पार करती, जंगली पेड़-पौधों के पतली टहनियों को हटाती, चढ़ती चढ़ाई, ढलानों पर उतरती।

चलते-चलते वह गाँव से बहुत दूर चली जाती है। वहाँ जहाँ पहाड़ तोड़े जाते हैं, जहाँ धमाके होते हैं, जहाँ ट्रकों का रेलम-पेल लगा रहता है।

एक खदान के मुहाने पर वह खड़ी है। मैं उसके पीछे उससे चंद मीटर के फ़ासले पर हूँ—भयभीत! कुछ देर वह खड़ी रहती है फिर छलाँग लगा देती है...

क्या सपनों का कोई अर्थ होता है? दुनिया को हज़ारों फ़्रायडों की दरकार है।

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25 अप्रैल

अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले तमाम उपक्रमों के अलावा, यदि कोई कुछ करता है, तो उसका केवल एक ही उद्देश्य है और वह है उसके ख़ालीपन को भरना।

मैं ख़ाली हो चला था। जर्जर होकर वे सारे पुल ढह चुके थे, जिनसे होकर कभी मैं अपने अतीत के देश घूम-फिर आया करता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है।

आजकल मैं उसे देखता रहता हूँ, या देखने का प्रयास करता हूँ। मैं उस खिड़की को—जो रामप्रसाद के घर की तरफ़ खुलती है, और जिसे मैं पहले दिन के समय आमतौर पर बंद रखता था—आजकल न केवल खुली छोड़ देता हूँ, बल्कि जब-तब उसके बाहर भी झाँकता रहता हूँ। इस देखने में, देख पाने की लालसा में प्रेम नहीं है, वासना भी नहीं... यह देखना महज़ इसलिए है क्योंकि मेरे पास इससे बेहतर देखने के लिए और कुछ नहीं।

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29 अप्रैल

पिछले दिनों तबीअत नासाज़ रही। बुखार चढ़ आया था। पूरे दिन बिस्तर में पड़ा ऊल-जलूल सोचता रहा। बार-बार किसी का कहा (याद नहीं किसका?) दिमाग़ में चक्कर काटता रहा कि शरीर का तापमान यदि 103 डिग्री पहुँच जाए, तो जान चली जाती है। जान नहीं गई—फिर नहीं गई। बार-बार काँपते हाथों से थर्मामीटर उठाता रहा और हर बार तापमान 100 डिग्री के नीचे ही पाया।

कई दिनों बाद आज शाम टहलने के लिए अपने दड़बे से बाहर निकला और जब अपने बरामदे में बैठे रामप्रसाद ने मुझे टोका तो इस ख़याल से चकित रह गया कि इतने दिनों तक मैं एक बार भी अपनी खिड़की पर नहीं आया। उसकी बेटी को देख पाने की इच्छा तो दूर, एक बार उसका ख़याल तक मुझे नहीं आया। क्या केवल इसलिए कि मैं अपनी मृत्यु की कामना में लीन रहा? क्या मेरे लिए अपने अंत की इच्छा इतनी गाढ़ी है, इतनी स्याह है कि मैं उसके पार कुछ देख नहीं सकता?

ख़ैर, मैं रामप्रसाद के बग़ल में चौकी पर बैठ गया। हाल-चाल के बाद उसने वही बातें शुरू कीं जो ऐसी जगहों पर ऐसे लोग करते हैं। घुटने की तकलीफ़, गर्मी, महँगाई...

थोड़ी देर बाद वह बाहर आई, दोनों हाथों में चाय के दो कप लिए हुए और अबकी मेरा उसे देखना...

आज मैंने पहली बार उसको इतने क़रीब से और इतना ग़ौर से देखा। उसकी गहरी काली आँखों को, उसकी तीखी नाक को, उसके पतले होंठों को; उसकी पतली गर्दन और उसके गाढ़े हरे सूट के पीछे छिपी बैठी दो छोटी गोलाइयाँ और उसकी टाँगों के बीच की फाँक—किसी ने उसे नहीं छुआ है, मेरे दिल ने कहा। वह अनछुई है, लेकिन अनचाही नहीं। मैं उसे चाहता हूँ।

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1 मई

इस देश में जिसके अधिकांश नागरिक जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की जद्दोजहद में मर खप जाते हैं, यदि आपने थोड़ी-सी संपत्ति भी अर्जित कर ली, तो आप शक्ति-संरचना में काफ़ी ऊपर पहुँच जाते हैं। इस पदानुक्रम में बहुतों से ऊपर, मुझ जैसे अधेड़ का हस्तमैथुन करना अच्छा नहीं लगता होगा।

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6 मई

टहलने का अपना सुख है, अपना दर्शन। आज शाम टहलते हुए, मेरे आगे अचानक किसी चमत्कार की मानिंद वह रास्ता बिछ गया, जिसकी तलाश में मैं पिछले पाँच दिनों से बदहवास भटक रहा था। अचानक मुझे रामप्रसाद की कही वह बात याद आई, जिसमें उसने पड़ोस के गाँव के उस हरामख़ोर का ज़िक्र किया था, जिससे उसने कुछ पैसे उधार ले रखे हैं और चुकाने में फ़िलहाल असमर्थ है।

कल ही मुझे उसे हरामख़ोर से मिलकर उसे अपने लिए काम पर लगा देना है।

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7 मई

कुछ ही देर की मुलाक़ात में मुझे एहसास हो गया कि रामप्रसाद ने उसके विषय में जो कुछ भी कहा था, वह अतिशयोक्ति नहीं थी। वह वाक़ई हराम का जना है और यह मेरे लिए अच्छा ही है।

मैंने उसके सामने पैसे रखें एक छोटे काम के एवज़ में ढेर सारे पैसे और उसकी आँखें चमक उठीं। उसे रामप्रसाद से अपने पैसे वापस माँगने और उसे डराने-धमकाने का एक मामूली काम देकर मैं वापस लौट आया। पहले-पहल उसने मेरे ऐसा करने (या करवाने) के पीछे का कारण जानना चाहा, लेकिन यह देखकर कि यह राज़ उस पर खुलने से रहा, ज़र्दे से लाल-पीले हो चुके उसने अपने दाँत निपोर दिए।

मैं रामप्रसाद के घर आवाजाही बढ़ा रहा हूँ, मगर एहतियात से। मैं ऐसे समय अपने दड़बे से निकलता हूँ, जब वह अपने घर के बाहर होता है; मुझे देखता है और बैठने का आग्रह करता है।

कभी वह दिखती है, कभी नहीं दिखती।

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9 मई

तीन दिन हो चुके हैं, पर अब तक रामप्रसाद ने मुझसे एक बार भी क़र्ज़ के विषय में बात नहीं की। मैं उससे पिछले तीन दिनों से मिलता रहा हूँ, लेकिन एक बार भी उसे मारे चिंता के पसीने से तरबतर नहीं देखा, न ही उसके माथे की लकीरों में मुझे परेशानी दिखी, और न ही उसकी आँखों में जागकर गुज़ारी गई रातों की परछाईं।

मैं फ़ोन का आदमी नहीं हूँ और यह मुझे सुरक्षित भी नहीं लगता। एक बार फिर मुझे उस कमीने सूदख़ोर से मिलना होगा, एक बार फिर उसके मुँह पर पैसे फेंकने होंगे। अब जो काम मैं उसे दूँगा, वह थोड़ा मुश्किल होगा।

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14 मई

चूँकि मुझे पता था कि आज रामप्रसाद शहर जाने वाला था, आज का दिन तय किया गया था।

अँधेरा घिर आया था जब मैंने रामप्रसाद को सहारा देकर जैसे-तैसे उसे उसके घर लाया। मेरा काम हो गया था। शहर से लौटते वक़्त सूदख़ोर के कुछ लफ़ंगों ने उसे गाँव से थोड़ी दूरी पर, घनी झाड़ियों के बीच से होकर गुज़रने वाले खड़ंजे पर, यह कहते हुए पीट दिया था कि वह जल्द से जल्द सेठ का पैसा लौटा दे। उसका माथा फूट गया था और निचला होंठ फट गया था, जिससे बहती ख़ून की धारा उसके मुँह के लार में घुल-मिलकर उसकी दाढ़ियों को लाल रंग में रँग चुकी थी। उसके दाहिने पैर का घुटना बुरी तरह सूज आया था। शायद उन्होंने उसे पर लाठी से वार किया था।

दरवाज़ा उसी ने खोला, जिसके लिए मैंने रामप्रसाद की यह हालत कराई थी। अपने बाप को ख़ून में लथपथ, खड़े रह पाने में असमर्थ पाकर वह सिहर गई और उसके मुँह से अनायास ही “बाबू” निकल आया। लपक कर उसने रामप्रसाद को थाम लिया। हम उसे अंदर ले गए और बरामदे में पड़ी चारपाई पर लिटा दिया। इस तमाम उपक्रम में मैंने अधखिले उस फूल का हाथ तीन बार छुआ और एक दफ़ा अपनी बाँह उसकी पसलियों से छुआ दी।

वह बार-बार मुझसे पूछती रही कि उसके बाप को क्या हुआ था। मैंने नहीं बताया। मैं वाज़िब वक़्त की तलाश में था। घायल की देखभाल के लिए उसे छोड़कर मैं गाँव के एक झोलाछाप डॉक्टर के घर की तरफ़ दौड़ पड़ा।

जब वापस लौटा तब तक पूरा गाँव रामप्रसाद के घर उमड़ पड़ा था। मुझे नहीं पता उसके घायल होने की ख़बर कैसे और क्यों चारों तरफ़ फैली।

ख़ैर, डॉक्टर—जो साँवले रंगत का नाटा और भारी पेट वाला एक हँसमुख आदमी है—ने दनादन रामप्रसाद के कमर में दो तथा उसकी बाँह में एक सुई घोंप दी, फिर माथे तथा होंठ पर मरहम-पट्टी की। सूजे घुटने के विषय में उसका कहना था कि आज रात उस पर हल्दी-प्याज़ का लेप लगाकर बाँध दिया जाए और कल शहर के किसी हड्डी के डॉक्टर को दिखाया जाए।

थोड़ी देर बाद जब वह चलने को हुआ, रामप्रसाद की बेटी (उसका नाम सरस्वती है और यह आज शाम मुझे पता चला जब गाँव की एक स्त्री ने उसे पुकारा) जो तब से मेरे क़रीब थी, उस चारपाई के उस पार जिस पर हमने राम प्रसाद को लिटाया था—इतनी क़रीब कि लालटेन के उजियारे में उसके झुकने पर मैं उसके वक्षों के बीच की घाटी देख सकता था, उस कमरे में चली गई जिसका दरवाज़ा बरामदे में खुलता है। मैंने भाँप लिया कि वह पैसे के लिए अंदर गई है; और इससे पहले कि वह बाहर आती, डॉक्टर को पैसे देकर विदा किया।

धीरे-धीरे भीड़ छँटने लगी। मैं रामप्रसाद की चारपाई के बग़ल में पड़े अनाज के बोरी पर बैठा रहा—वार करने के ठीक समय के इंतज़ार में, अपने ख़यालों में खोया। थोड़ी देर बाद जब मेरी तंद्रा टूटी तो पाया कि सभी लोग जा चुके थे, मेरे सामने चारपाई पर रामप्रसाद सो रहा था और उसके पास ज़मीन पर सरस्वती बैठी अपने नाख़ून से मिट्टी खोद रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे।

पल भर को मुझे उस पर तरस आया। मुझे आश्चर्य भी हुआ कि अब वह यह क्यों नहीं पूछ रही थी कि उसके “बाबू” की यह हालत कैसे हुई थी? मैं धीरे-धीरे उठा। मेरे उठने का उसे एहसास हुआ और उसने अपना दुपट्टा—जो उसके दाहिने कँधे से ढलक गया था—ठीक किया। लेकिन उसने अपनी नज़रें नहीं उठाईं। “खाना बना लो... कल अस्पताल ले चलेंगे।” इतना कहकर मैं बरामदे से बाहर निकल आया, जब उसने पीछे से आवाज़ लगाई, “आप भी यहीं खा लीजिएगा।”

क्यों कहा था उसने यह? क्या इसलिए कि मैं उसके, उसके परिवार के काम आया था? आने वाला था? क्या वह ख़ुद को मेरे क़र्ज़ तले दबा पा रही थी? अगर हाँ, तो फिर उसका तब क्या होगा, जब वह उससे गुज़रेगी जिसके लिए मैंने यह सब किया, करवाया?

रात के साढ़े आठ बजने वाले हैं। लगभग पूरा गाँव सो चुका है। वह शायद खाना बना रही है... और मैं यह लिख रहा हूँ। क्यों लिख रहा हूँ? क्योंकि आजकल बिना लिखे चैन नहीं मिलता। जब तक नहीं लिख लेता, मेरे विचार मुझे इस तरह काटते रहते हैं, जैसे—जैसा कि मैंने सुना है— मादा बिच्छू के पेट में पलने वाले उसके बच्चे उसे अंदर ही अंदर काटते रहते हैं, उसे खाते रहते हैं। उसी पर पलते हैं जिससे उन्हें प्रश्रय मिलता है।

मैंने सरस्वती से कहा है कि एक ज़रूरी काम निपटा कर आता हूँ। जा रहा हूँ। यही समय है, इसका ही इंतज़ार था मुझे।

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15 मई

आज पूरे दिन दौड़-भाग लगी रही। अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने से लेकर एक्स-रे कराने के लिए लगी लंबी क़तार, लंबा इंतज़ार।

आज सुबह, थोड़ी दूरी पर रहने वाला रामप्रसाद का एक रिश्तेदार आया था। हम तीनों—रामप्रसाद, उसका रिश्तेदार और मैं—उसकी मोटरसाइकिल से शहर गए थे। हम सुबह ही निकले थे और लौटते–लौटते साँझ हो गई। रामप्रसाद को गंभीर चोट नहीं आई है... मैं नहीं समझ पा रहा कि यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है या दुःख की।

आज सुबह जब हम शहर के लिए निकल रहे थे, मैंने देखा कि सरस्वती मेरे सामने आने से बच रही थी। पल भर को मुझे उसकी आँखें दिखी थीं, और उनमें मेरे लिए घृणा थी, केवल घृणा।

इस घृणा का बीज कल रात उसके हृदय में फूटा था। कल रात बेहद जल्दबाज़ी में यह लिखने के बाद, जब मैं खाना खाने रामप्रसाद के घर गया तो पाया कि सरस्वती उसे खाना खिला रही थी। वह उसी चारपाई पर लेटा था, जिस पर हमने उसे शाम को लिटाया था। मैं एक बार फिर उसकी चारपाई के पास पड़े बोरी पर बैठ गया, और उससे वही सब पूछने लगा जो हम आमतौर पर उस घायल या बीमार व्यक्ति से पूछते हैं जिसे हम देखने जाते हैं। मुँह में खाने का निवाला लिए वह हाँ-हूँ में उत्तर देता रहा।

जब वह खा चुका था, तब सरस्वती ने उसका मुँह पोंछकर उसे बिस्तर पर लिटा दिया और जूठे बर्तन लेकर अंदर चली गई। मैं रामप्रसाद से बेमतलब की बातें करता, इस प्रतीक्षा में था कि वह मुझे खाने के लिए अंदर बुलाएगी। पर मेरी उम्मीद पर तब पानी फिर गया जब मैंने उसे थाली लेकर बरामदे में आते देखा।

मैंने बेहद धीरे-धीरे खाना खाया। मैं रामप्रसाद के सो जाने की प्रतीक्षा में था। इस बीच वह कभी घर के अंदर जाती, कभी बाहर आती रही। उसकी उपस्थिति-अनुपस्थिति दोनों मुझे असहज करते रहे।

मेरे खा चुकने के बाद उसने मेरे हाथ से थाली ले ली और अंदर चली गई। रामप्रसाद तब तक सो चुका था। यही वह समय था जब घात लगाए बैठा बाघ अपने शिकार की तरफ़ दौड़ पड़ता है। मैं उसके बाहर आने की राह देखने लगा, लेकिन काफ़ी समय तक जब वह बाहर नहीं आई तो आख़िरकार मुझे उसे पुकारना पड़ा।

उसके हाथ गीले थे। शायद वह बर्तन धो रही थी। मैं उसके क़रीब बढ़ गया। उसने अपनी आँखें झुका लीं। मैंने उससे पूछा कि क्या उसने खाना खा लिया? उसने न में सिर हिला दिया। उसे खाने के लिए कहने की बजाय मैंने उससे पूछा कि क्या अब वह यह नहीं जानना चाहती थी कि उसके “बाबू” की ऐसी हालत कैसे हुई? उसने कुछ नहीं बोला। पूर्व की ही भाँति उसने अपना सिर झुकाए रखा। थोड़ी देर बाद मैंने उससे पूछा कि क्या उसे क़र्ज़ के बारे में जानकारी थी जो रामप्रसाद ने लिया था? उसने एक बार फिर न में शब्दहीन उत्तर दिया।

अपने बाप की इस हालत के पीछे का कारण वह समझ चुकी थी। उसने अपना चेहरा उठा लिया था और अपनी दाईं तरफ़ खड़ी दीवार का पलस्तर अपने नाख़ूनों से खुरच रही थी। शायद घबराहट से निपटने का यह उसका अपना तरीक़ा है—नाख़ून से मिट्टी, पलस्तर खोदना, उखाड़ना। मैं उसके चेहरे को देखता रहा, उसकी रोनी सूरत को, उसकी आँखों को जिनमें आँसू भर आने की वजह से वे बल्ब की रोशनी में चमक रही थीं।

पलस्तर खुरचते उसके हाथ को मैंने अपने हाथ में ले लिया (उसकी गर्म-नाज़ुक हथेली को मैं अब तक महसूस कर सकता हूँ।) उसने विरोध नहीं किया। मैंने उसकी हथेली को धीरे से दबाया और आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगा। एक बार फिर उसने नज़रें झुका ली थीं। मैंने धीरे से उससे कहा कि मेरे पास क़र्ज़ भरने का एक रास्ता है। इतना सुनते ही उसने अपना चेहरा उठा लिया, और तब मैंने अपना दाँव चला। मैंने अपने दड़बे की तरफ़ इशारा कर दिया।

रात सन्नाटे में बिजली के चमकने के बाद की बादलों की अचानक तेज़ गड़गड़ाहट-सी थी। उसने अपना हाथ खींच लिया और मुझसे थोड़ा पीछे सरक गई। त्वरित झटके ने उसके दुपट्टे को उसके कंधे से ढलक जाने दिया। मैं उसके अनछुए वक्षों का उतार-चढ़ाव देख रहा था, उसके गले और छाती के बीच उभर आए गड्ढे को। कुछ देर बाद वह तेज़ी से अंदर चली गई। मैं थोड़ी देर वहाँ बुत-सा खड़ा रहा, फिर पाँव घसीटते अपने दड़बे में वापस लौट आया। जाने क्यों मुझे गहरी उदासी ने घेर लिया था।

कल पूरी रात मैं सो नहीं सका। बावजूद इसके कि मेरे तन-मन, दोनों पूरी तरह थक चुके थे। भर रात मुझे यह डर भी सालता रहा कि कहीं उसने रामप्रसाद को यह बात बता दी तो? लेकिन आज सुबह रामप्रसाद से मिलने के बाद मुझे विश्वास हो गया कि उसने ऐसा नहीं किया था। मुझे यह भी विश्वास हो चला है कि वह ऐसा नहीं करेगी। नहीं कर सकती।

मैं कल रात उसकी प्रतीक्षा करता रहा। हल्की-सी आहट से भी मुझे लगता है कि वह आ रही है और अब मेरा दरवाज़ा खटखटाने ही वाली है। कई बार मैंने अपनी खिड़की से बाहर देखा। वह एक बार भी नहीं दिखी।

मैं आज भी उसकी प्रतीक्षा में हूँ। मेरे हाथ उसकी दो नन्हीं अनछुई गोलाइयों को थाम लेने की प्रतीक्षा में हैं।

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19 मई

प्रतीक्षाएँ अर्थहीन नहीं होतीं, न ही ख़ाली। एक मीठा दर्द होता है उनमें; लेकिन हर चीज़ की तरह, इसकी भी एक सीमा होती है। प्रतीक्षा के लंबा खिंचने पर; एक समय बाद, उसकी जगह कड़वाहट, क्रोध, झल्लाहट आदि ले लेते हैं; जिसका बोध आमतौर पर इंसान को अचानक होता है— ब्रश करते हुए, खाना खाकर हाथ धोते हुए या कंघी करते हुए।

एक बार फिर मुझे उस हरामी सूदख़ोर का मुँह देखना होगा। एक बार फिर मुझे पैसे ख़र्च करने होंगे।

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28 मई

रामप्रसाद अब शारीरिक रूप से ठीक हो चला है, मगर ज़ेहनी तौर पर परेशान है। वह पैसे जुगाड़ने के चक्कर में लगा है। इस बीच में लगभग रोज़ ही उससे मिलता रहा हूँ, उसके घर जाता हूँ। जब तब वह मेरा शुक्रिया अदा करता है जिसके प्रति उत्तर में मैं वही बकता हूँ जो ऐसे मौक़ों पर लोग बरसों से बकते आ रहे हैं।

सरस्वती मेरे सामने नहीं आती। उसके बरामदे में बैठे, उसके बाप से बेमतलब की बातें करते हुए मैं, कपड़ों की दो तहों के बीच हाँफ़ती उसकी दो सुडौल गोलाइयों में अपना मुँह धँसा देता हूँ, उसके काले तिकोने पर अपने खुरदरी उँगलियाँ फिराता हूँ, अपनी गोद में उसे पलटकर देखता हूँ कि उसकी देह के निचले मांसल हिस्से पर मेरे नाख़ूनों की खरोंच है... फिर मैं हड़बड़ी में रामप्रसाद से विदा लेकर अपने दड़बे में आता हूँ, और अपने दाहिने हाथ को, अपनी कल्पना के घोड़े को थकाकर निढाल हो जाता हूँ।

मुझे नहीं पता ऐसा कब तक चलेगा। मैं इसके अनंत काल तक चलते रहने की कल्पना से भय खाता हूँ। मैंने अपना आख़िरी दाँव चल दिया है। मैंने सूदख़ोर को क्या करना है, समझा दिया है। केवल इतना कि उसके दो-चार लौंडों को सरस्वती को कहीं सुनसान में घेरना है और उससे केवल इतना ही कहना है कि यदि उनके मालिक को जल्दी से पैसे नहीं मिलें तो वे उसे उठा ले जाएँगे।

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4 जून

रात के बारह बजने वाले हैं, वह अभी-अभी गई है। मैं अभी तक अपने बिस्तर पर अर्धनग्न बैठा उसका जाना देख रहा हूँ—उसके बमुश्किल चल पाने को, उसके गीले-रक्तिम तिकोने को, उसकी नाभि तक पहुँच जाने को आतुर उसके उलझे बालों के गुच्छे को।

सुंदर चीज़ों को केवल सहेजने का सुख नहीं होता, उन्हें मसल डालना भी सुख देता है। कुछ तो होगा जो एक रोमन सम्राट अपनी दासियों के वक्षों में पिन चुभोता था!

11:13 पर मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। उछलकर मैंने दरवाज़ा खोला। वह मेरे सामने खड़ी थी—हमेशा की तरह अपनी आँखें झुकाए, लकड़ी के मेरे दरवाज़े को अपने नाख़ून से खुरचती। मुझे अपने सामने इसलिए खड़ा पाकर, मुझे लगता था कि वह सिहर उठेगी, उसके पाँव काँपने लगेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पल भर मेरे सामने खड़ा रहने के बाद, पूर्ववत् अपनी आँखें झुकाए, वह अंदर चली आई और बिस्तर के पास आकर खड़ी हो गई। वह हथियार डाल चुकी थी। उस वक़्त, एक बार फिर, मुझे बहुत पहले पढ़ी एक पंक्ति सही साबित होती नज़र आई कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है।

मैंने खिड़की बंद की मगर बत्ती नहीं बुझाई। आँखें मूँदकर फूल को मसलने का क्या तुक! उसकी छटपटाहट, उसके भीतर ही दम तोड़ती उसकी चीख़ें, मुझे रोकने के लिए मेरे पेट पर टिकी उसकी दो हथेलियाँ...

कल मैं रामप्रसाद को कुछ पैसे दूँगा। पूरे नहीं। केवल एक वक़्त खाना खाने के लिए कोई पूरा डाइनिंग सेट नहीं ख़रीदता! कल रामप्रसाद मेरे एहसान तले दब जाएगा। वह मुझे एक मसीहा की तरह देखेगा और जैसा कि मानव-इतिहास में हमेशा से होता आया है, जिसने वास्तविक क़ुर्बानी दी, जिसने अपने आपको न्योछावर कर दिया उसकी कहानी अलिखित रहेगी—अनकही, अनसुनी, अनाभिव्यक्त...

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5 जून

आज उसके कपड़े उतारते हुए मैंने पाया कि उसकी देह बुख़ार से तप रही थी। इस गर्मी में भी मेरे बिस्तर पर नग्न लेटी वह काँप पर रही थी।

वह जा चुकी है और उसके जाने के बाद से ही मैं सोच रहा हूँ कि क्या इन दिनों वह अपने ईश्वर से यह प्रश्न नहीं करती होगी कि यह बेबसी, यह ज़िल्लत उसके हिस्से क्यों? और यदि उसे वही घिसा-पिटा, पिछले जन्म के पापों वाला उत्तर मिलता होगा तो क्या वह पलटकर पूछती होगी उससे कि उसने उसे इतना कमज़ोर ही क्यों बनाया कि बग़ैर वह सब किए जो वर्जित था, जो पाप था, वह एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा सकती थी?

लेकिन यह एक बात है, दूसरी ठीक इसके उलट बात यह है कि यदि वह पाप-पुण्य, पुनर्जन्म, ईश्वर आदि में यक़ीन नहीं करती तो क्या किसी रात मेरे सीने में चाक़ू नहीं उतार देती?

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10 जून

पिछले छह दिनों से वह हर रात मेरे पास आती रही है और इन छह दिनों में मेरी उँगलियों ने, मेरी आँखों ने उसके शरीर का एक भी अंग अनछुआ-अनदेखा नहीं छोड़ा है। मैंने उसके भीतर वहाँ भी पहुँचने की कोशिश की है, जहाँ पहुँचना असंभव था और इस प्रयास में मैंने उसे दर्द दिया है।

प्रत्येक संवेदनशील आदमी का एक गुप्त रास्ता होता है, जिस पर सधे क़दमों से चलता वह अपने संताप की नज़रों से बच निकलने का प्रयास करता है। यह वही रास्ता है—मेरा अपना!

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13 जून

आज शाम मैंने रामप्रसाद को तीसरी और आख़िरी किस्त थमा दी। मारे कृतज्ञता के उसकी आँखें छलछला आई थीं। मुझे अपने आपसे शर्म आई, ख़ुद से घृणा हुई, लेकिन पल भर में मैंने उन भावनाओं को अपने होने से परे झटककर; पहाड़ों की तरफ़ बढ़ चला।

आज रात सरस्वती फिर आई थी, बावजूद इसके कि कल रात मैंने उसे बता दिया था कि अगले दिन—यानी आज—मैं रामप्रसाद को बाक़ी पैसे दे दूँगा और वह क़र्ज़मुक्त हो जाएगा। मेरे दरवाज़े पर खड़े होकर उसने मेरी बातें सुनी थीं, पलटकर पल भर मेरी तरफ़ देखा था, फिर दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गई थी।

मुझे यक़ीन नहीं था कि वह आज आएगी, न ही मुझे उसका इंतज़ार था। सच्चाई तो यह है कि मुझे उसका आना अखर रहा था। वह मेरे बिस्तर पर बैठी थी और मैं देर तक ख़ुद को रोके नहीं रख सका। 

उसके ऊपर पड़े, हाँफ़ते हुए मैंने सोचा कि इसके एवज़ में मैं उसे कुछ रुपए थमा दूँगा, पर मेरा यह विचार तब बदल गया जब मैंने पाया कि मेरे उससे अलग होने के कुछ देर बाद उसने मेरी बाईं कलाई अपनी तरफ़ खींची और उन निशानों पर अपनी आँखें धँसा दी, जिन्हें मैंने बरसों पहले ख़ुद को दिया था—जब अपनी कलाई को किसी धारीदार हथियार से रेत देने में, फ़र्श पर टप-टप गिरते लहू की लाल बूँदों में मुझे सुकून मिलता था।

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16 जून

पिछली तीन रातों से मैं उसे देखता रहा हूँ, उसके जिस्म के साथ-साथ उसकी आत्मा में गहरे उतरकर यह टटोलने का प्रयास करता रहा हूँ कि वहाँ मेरा क्या स्थान है और मैं कितनी जगह घेरता हूँ।

यह स्वीकारना मुझे असहज कर रहा है कि तीन रातों के गहन विश्लेषण के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि वह स्वयं मुझे पिछली कई रातों से टटोल रही थी और आख़िरकार वह उन स्याह जगहों पर न केवल पहुँच चुकी है, बल्कि अपने कदमों से रौंद दिया है जिन्हें मैं बरसों से न केवल दुनिया से बल्कि अपने आप से भी छुपाता-बचाता आया हूँ।

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18 जून

मुझे उससे डर लगने लगा है; उसका मेरे क़रीब आने से, मेरे दाग़ों के छूने से, चोरी-छिपे अपनी बड़ी और कातर आँखों से मुझे देखने से। उसको छूते ही मेरी उँगलियाँ झुलसने लगती हैं। उसे छूना तो दूर, अब मैं उसे देखना भी नहीं चाहता—घृणा के नहीं, शर्म के मारे। यह अपने एकांत में, अपने अतीत में, अपने सड़े-गले अस्तित्व में किसी के घुस आने का और सब कुछ उलट-पलट देने का ख़ौफ़ है।

वह क्या जानना चाहती है मेरे बारे में? क्या जानती है? मेरी नींद की जगह अब मेरी शर्म है।

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23 जून

वह मेरे पास आती है... हर रात, तब भी जब उसका तिकोना ख़ून से सना रहता है। यह उसकी देह नहीं बल्कि उसका मन है जो उसे मेरे दड़बे की तरफ़ धकेलता है।

काफ़ी देर तक मैं दरवाज़ा नहीं खोलता। हर बार सोचता हूँ कि वह खटखटाते-खटखटाते थक कर लौट जाएगी और हर बार मैं ग़लत साबित होता हूँ। कभी ख़ीझकर तो कभी करुणा के मारे जब खोलता हूँ तो पाता हूँ कि खड़ी-खड़ी वह मेरा दरवाज़ा खुरच रही है। 

मैं उससे भय खाता हूँ। मुझे लगता है कि यदि किसी रोज़ मैं भर रात अपना दरवाज़ा न खोलूँ तो वह मेरे दरवाज़े को इतना खुरचेगी कि उसके नाख़ून उखड़ जाएँगे। 

मुझे उसके दुःख से डर लगता है, उसकी चाल-ढाल की गंभीरता से, उसके हाव-भाव की कातरता से, उसकी आँखों के सूनेपन से, उसके भींचे होंठों से जो कभी नहीं मुस्कुराते...

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2 जुलाई

एक अजीब तरह की भावना—जो दुःख, भय, शर्म का मिश्रण है—मेरे अंदर रिस रही है, मैं भर रहा हूँ और जितना भरता हूँ, उतना ही ख़ुद से दूर भागता हूँ। मैं अपने होने से बचता हूँ, अपने विचारों से, अपने अतीत और भविष्य से। मैं दिन भर अपने बिस्तर पर लेटा रहता हूँ, जब तक संभव होता है सोता रहता हूँ। रात को वह आती है। मैं कुछ कर नहीं पाता, कुछ करने की मेरी इच्छा ही नहीं होती। कई बार वह मेरे पैर के पास बिस्तर पर बैठी रह जाती है और मैं लेटा रहता हूँ। वह मेरे कमरे के ख़ालीपन को टुकुर-टुकुर ताकती है, कभी-कभी सोता जानकर मुझे भी। 

काश उसकी आँखों में—जो जब मेरे जिस्म पर पड़ती हैं तो उसे भेद देती हैं—मेरे लिए घृणा होती! 

वह ऐसी क्यों है? उसका ऐसा होना मेरे लिए बोझ है—मेरे अपने होने से कहीं अधिक भारी। 

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21 जुलाई

रामप्रसाद नहीं रहा।

उस शाम बारिश हुई थी। बरसाती कीड़ों की उदास कर देने आवाज़ से उदास हो चुका मैं, अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे वह शाम काटी थी। 

साँझ रात में तब्दील हो चुकी है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे दरवाज़े को किसी ने ज़ोर से पीटा। रात के लगभग आठ बज रहे थे। यह उसके आने का समय नहीं है, यह उसके आने के समय से पहले का समय है—अपने सामने सरस्वती को पाकर मुझे ये सब सोचने का न अवकाश मिला और न ही इसकी आवश्यकता महसूस हुई। 

उसके तन पर दुपट्टा नहीं था और न ही उसके पैरों में चप्पल थी। समेटकर पीछे की तरफ़ रबर से बाँधे गए उसके बाल ढीले हो जाने के कारण उसके चेहरे के दोनों तरफ़ झूल आए थे और उसके गालों को छू रहे थे। उसके हाथ में एक कामचलाऊ फ़ोन था। घबराए स्वर में उसने मुझे बताया कि शहर से किसी पुलिस वाले का फ़ोन आया था, रामप्रसाद सरकारी अस्पताल में भर्ती है और उसे जाना होगा। एक झटके में मैं मकान मालिक के घर की तरफ़ लपका और उसकी मोटरसाइकिल माँग लाया, इतने में सरस्वती अपना दुपट्टा लेकर, चप्पल पहनकर और घर में ताला लगाकर आ चुकी थी। 

हल्की ठंडी पुरवाई को चीरते हुए, हम रात की उदासी भरे सन्नाटे में, घुमावदार पहाड़ी रस्ते पर आगे बढ़ रहे थे। बादल फिर घिरने लगे थे। दूर रह-रहकर बिजली चमक जाती। वह देह जिसके भूगोल से मैं भली-भाँति परिचित था, रह-रह काँप जाती। मैं उसका कँपना महसूस कर रहा था, उसका घबराना। उन आँखों से—जिनसे मुझे डर लगता था—झरते आँसुओं के कतरे जब-तब मेरी गर्दन के पिछले हिस्से पर पड़ते, मैं सिहर जाता। कितना असहाय था मैं उस वक़्त, कितना लाचार कि किसी खाई में कूद नहीं सकता था या किसी पत्थर पर अपना सिर नहीं पटक सकता था! वह मेरे पास आई थी—एक ऐसे आदमी के पास जो ख़ुद से दूर भाग रहा था। 

कोने में पड़े एक बेड पर रामप्रसाद बेहोश पड़ा था। उसे बेहोश ही रह जाना था। उस रोज़ सुबह-सवेरे गाँव के ठाकुर से चल रहे किसी ज़मीनी विवाद के सिलसिले में उसे कचहरी जाना पड़ा था और उसके लौटने तक साँझ घिर आई थी। एक तीव्र मोड़ पर सामने से आ रही एक तेज़ दुपहिया को बचाने के चक्कर में सवारी जीप डगमगाई और काट कर रास्ता बनाए गए पहाड़ से जा टकराई। जीप चालक के बग़ल वाली सीट पर बैठे रामप्रसाद का माथा पत्थर के एक नुकीले हिस्से से जा टकराया था। 

रामप्रसाद को देखने लोग आए और गए—रिश्तेदार, गाँववाले, उसके परिचित... लेकिन हम दोनों तीन रात और दो दिन उसी अस्पताल में रहे—सरस्वती और मैं, मैं और...

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25 जुलाई

सरस्वती के घर—मेरे अनुमान से ठीक उलट—मुर्दा शांति नहीं पसरी है, बल्कि दिन में दो स्त्रियों की तथा रात में दो स्त्रियों और एक मर्द (कभी–कभी दो) की कर्कश आवाज़ें मुझ तक आती रहती हैं। 

फ़िलहाल उसके घर उसकी दो मामियाँ रह रही हैं। उसका एक मामा (शायद छोटा वाला) रात में केवल सोने आता है। बीच-बीच में उसका बड़ा मामा और अन्य रिश्तेदार घंटे-दो घंटे के लिए आते रहते हैं। 

आख़िरी सफ़र के लिए किए जाने वाले तमाम उपक्रम किए जा रहे हैं। कुछ ही दिन बाद मृत्युभोज होगा; मुझसे जो बन पड़ेगा, करूँगा। 

सरस्वती इन दिनों नहीं दिखती। आख़िरी दफ़ा मैंने उसे तब देखा था जब रामप्रसाद की लाश उठ रही थी। उसका रोना-बिलखना बंद हो चुका था। अब दुःख इतना भारी हो चला था कि वह आँखों में नहीं, बल्कि आत्मा की किसी अँधेरी खोह में दाख़िल हो चुका था। घर के बरामदे में दीवार से पीठ टिकाए वह घुटने मोड़े बैठी थी। उसके गिर्द एक ऐसा ख़ालीपन पसरा था जो भरा नहीं जा सकता था, कभी नहीं। तब भी नहीं जब भगवान—यदि वह है तो—उस रिक्तता में अपनी चारपाई डाल लेट रहता। 

सरस्वती नहीं दिखती और मैं उसे देखना भी नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि वह मेरे सामने आए और मेरा पूरा वजूद भरभराकर उसके क़दमों में गिर पड़े! 

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3 अगस्त

आज भोज था। सब नौ बजे तक खा-पीकर जाने वाले जा चुके थे। साढ़े दस तक डोमों का झुंड रामप्रसाद को उसके ठिकाने लगा चुका था। इन सबके डेढ़ घंटे बाद मेरे दरवाज़े पर वह आई। उसने दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन पहले कि तरह खटखटाती नहीं रह गई। पाँच-सात मिनट बाद वह लौट गई। 

आज रात मैंने दरवाज़ा नहीं खोला। मैं उसे नहीं देख सकता। वह इतनी-सी बात क्यों नहीं समझती कि उसे देखना मेरे लिए ख़ुद को देखना है? 

मेरी देह पर हज़ारों बिच्छू रेंग रहे हैं—काले, भयावह! अपनी पूँछ हवा में उठाए। एक हल्का झटका... और मारे दर्द के मेरी देह ऐंठ जाएगी। अबकी कुछ काम नहीं आएगा। कुछ नहीं।

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4 अगस्त

कल रात मैंने अपने कमरे की खिड़की बंद कर दी थी, इस भय से की कहीं सरस्वती उसके पीछे न नुमायाँ हो जाए। मैं कल रात बिल्कुल सो नहीं सका। बिस्तर पर पड़े करवट बदलते-बदलते सुबह के लगभग चार बजे जाकर कहीं नींद आई। आँख देर से खुली—आठ-सवा आठ तक। खिड़की खोली तो पाया कि अपने मामा की दुपहिया पर बैठी सरस्वती गाड़ी का फटा सीट कवर नोच रही थी। थोड़ी देर मैंने उसे देखा—उसकी धँस आई आँखों को, उसके रूखे होंठों और बालों को, उसकी मुरझाई काया को—फिर खिड़की बंद कर दी और वापस बिस्तर पर आकर लेट गया। 

दुपहर में मूसलाधार बारिश होने लगी। मैंने खिड़की खोली और पाया कि रामप्रसाद के घर पर एक बड़ा-सा ताला लटक रहा था। वहाँ कोई नहीं था सिवाय भीगते घर के, जूठे पत्तलों और गिलासों के और एक ऐसे दुःख के जिसकी एक प्रति यहाँ छोड़ सरस्वती हमेशा के लिए अपने मामाओं के घर जा चुकी थी। 

यह बात मुझे शाम को पता चली—गाँववालों से, गाँववालों की बतकहियों से। कोई कह रहा था कि उसके मामाओं और उनकी बीवियों की नज़र रामप्रसाद के मकान पर है। 

मेरी शर्म और गाढ़ी हो आई। जिस तरह मैंने न चाहते हुए भी हर रात दरवाज़ा खोला, काश कल भी खोल दिया होता। वह मुझे अलविदा कहने आई थी। 

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7 अगस्त

उसे गए तीन दिन हो चुके हैं। इन दिनों ख़ूब बारिश होती है। खेतों में धान रोपे जा रहे हैं, पहाड़ों पर हरियाली लौट आई है, सिर के ऊपर दिन-रात काले बादल मँडराते रहते हैं। कितनी भयावह है यह सुंदरता! 

मुझे लगता है कि मैं एक मुर्दा गाँव में जी रहा हूँ। मेरे आस-पास लाशें रह रही हैं, घूम रही हैं, बारिश में भीग रही हैं। या शायद सब कुछ जीवित है और मैं जिजीविषा से भरे लोगों के बीच एक लाश की भाँति अपने अस्तित्व का बोझ ढोए जा रहा हूँ। 

सोचता हूँ सरस्वती कैसी होगी, क्या कर रही होगी? यदि ईश्वर है और सर्वशक्तिमान है तो उसे मुझ जैसे कमीनों से बचाए। 

कल शाम मैंने देखा कि उसका मामा एक लौंडे के साथ आया था। रामप्रसाद के मकान का ताला खोलकर वे अँधेर में घुसे और आधे घंटे बाद बाहर निकल आए। लौंडे के हाथ में एक बड़ा-सा झोला था। शायद वे धीरे-धीरे काम के सामान ले जा रहे हैं। ये काम के सामान सरस्वती के कितने काम आएँगे?

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12 अगस्त

जितना सोचना था, मैंने सोच लिया है। ज़्यादा सोचना निर्णय से डिगना होगा। 

मैं सरस्वती के मामाओं से उसका आधार, उसके बैंक-खाते की पासबुक, रामप्रसाद का मृत्यु-प्रमाणपत्र तथा अन्य उपलब्ध दस्तावेज़ यह कहकर माँगूँगा कि मेरे परिचय का एक सरकारी मुलाज़िम है, और चूँकि सरस्वती अब अनाथ है, उसके प्रयास से उसे सरकार की तरफ़ से कुछ आर्थिक सहायता मिल सकती है। मुझे पूरा विश्वास है कि पैसे का आगम देख उसके दोनों मामा झट से तैयार हो जाएँगे और फिर कुछ रोज़ बाद मैं उसके खाते में अपने सारे पैसे ट्रांसफ़र करा दूँगा। 

मुझे मालूम है कि कुछ ही दिन गुज़रेंगे जब उसके दोनों मामा उस पैसे को हड़पने के लिए उसे प्रताड़ित करना शुरू कर देंगे, लेकिन मेरे पास इसका भी उपाय है। मैं उन्हें डरा दूँगा। मैं उनसे कहूँगा कि यदि उन्होंने कभी भी किसी से भी पैसे का ज़िक्र किया या उसे हड़पने की कोशिश की तो मेरे लोग उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे—तब भी नहीं जब मैं नहीं होऊँगा। मैं उन्हें अपने किसी गैंग या किसी सरकारी गुप्त एजेंसी से जुड़े होने का हवाला दूँगा।

मुझे भय का खेल मालूम है और मैं इस खेल का माहिर खिलाड़ी हूँ। मुझे पता है कि यह दुनिया कैसी है और कैसे काम करती है : ताक़त होना उतना आवश्यक नहीं जितना उसका प्रदर्शन—चाहे वो झूठा ही क्यों न हो। 

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23 अगस्त

अब मेरे पास कुछ नहीं सिवाय इस देह के—काले बिच्छुओं से ढका यह जिस्म! कल तक मेरे पास जो पैसे थे, आज वह भी नहीं हैं। मुझे अब उनकी आवश्यकता भी नहीं थी। जिसे थी अब वह उसके पास हैं।

बारिश हो रही है। बहुत बारिश हो रही है। वह घर जिसमें सरस्वती पली, बढ़ी, जवान और बर्बाद हुई—भीग रहा है। दो-दो अनुपस्थितियाँ भीग रही हैं।

मैं सरस्वती को देखना चाहता हूँ—उसके होने में उसके न होने को। मैं जा रहा हूँ, वहाँ जहाँ वह रहती है। जाकर मैं उसे न सही, कम से कम उस जगह को तो देख ही पाऊँगा जहाँ वह रहती है, जहाँ उसका होना रहता है।

बारिश नहीं रुकेगी। बारिश रुकनी भी नहीं चाहिए। हर दाग़ को मिट जाना होगा। हर शै को धुलना होगा—पेड़, पहाड़, सड़क, देह, आत्मा!

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