Font by Mehr Nastaliq Web

रविवासरीय 4.0 : रचनागत द्वंद्व और हार का संसार

• आज से लगभग सात बरस पहले जब 17वीं लोकसभा के लिए मतदान शुरू होने में कुछ ही दिन बाक़ी रह गए थे—1 अप्रैल 2019 को हिंदी-अँग्रेज़ी सहित भारतीय भाषाओं के 200 लेखकों ने भारतीय नागरिकों के नाम एक संयुक्त अपील जारी की थी। इस अपील में यह मानते हुए कि इस आम चुनाव में हमारा देश एक दोराहे पर खड़ा है, यह कहा गया था :


“हमारा संविधान यह सुनिश्चित करता है कि देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार, अपनी मर्ज़ी से खाने-पीने, पूजा-अर्चना करने की आज़ादी मिले, अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति जताने का अधिकार मिले। लेकिन पिछले कुछ सालों से हम यह देख रहे हैं कि कई नागरिक भीड़ की हिंसा में मारे गए, घायल हुए या उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि वे किसी विशेष समुदाय, जाति, लिंग या क्षेत्र से ताल्लुक़ रखते हैं। नफ़रत की राजनीति का इस्तेमाल कर देश को बाँटा जा रहा है, डर फैलाया जा रहा है और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पूर्ण नागरिक के तौर पर जीने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। लेखकों, कलाकारों, फ़िल्म-निर्माताओं, संगीतकारों और अन्य संस्कृतिकर्मियों को धमकाया, डराया और सेंसर किया जा रहा है। जो भी सत्ता पर सवाल उठा रहा है, वह उत्पीड़न या झूठे व बेहूदा आरोपों पर गिरफ़्तारी के ख़तरे झेल रहा है।

हम चाहते हैं कि यह स्थिति बदले। हम नहीं चाहते कि तर्कवादियों, लेखकों और कलाकारों को सताया जाए या मार दिया जाए। हम चाहते हैं कि स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ मौखिक या शारीरिक हिंसा करने वालों पर सख़्त कार्रवाई की जाए। हम चाहते हैं कि सबको आगे बढ़ने के समान अवसर दिए जाएँ और रोज़गार, शिक्षा, शोध तथा स्वास्थ्य के क्षेत्रों की बेहतरी के लिए संसाधन हों और क़दम उठाए जाएँ... और इस सबसे ज़्यादा, हम अपनी विविधता को बचाना और लोकतंत्र को फलते-फूलते देखना चाहते हैं।

हम यह सब कैसे कर सकते हैं? हम कैसे वे बदलाव ला सकते हैं, जिनकी हमें सख़्त ज़रूरत है? ऐसे बहुत से क़दम हैं, जो हम उठा सकते हैं और हमें उठाने चाहिए। लेकिन एक महत्त्वपूर्ण क़दम है, जो हमें सबसे पहले उठाना है। यह पहला क़दम है कि हम नफ़रत की राजनीति के ख़िलाफ़ वोट करें और ऐसा करने का मौक़ा हमें बहुत जल्द ही मिल रहा है। हम लोगों को बाँटने के ख़िलाफ़ वोट करें, असमानता के ख़िलाफ़ वोट करें; हिंसा, डर और सेंसरशिप के ख़िलाफ़ वोट करें। सिर्फ़ यही एक रास्ता है; जिससे हम एक ऐसा भारत बना सकते हैं, जो संविधान में किए गए वायदों के लिए प्रतिबद्ध हो। इसलिए हम सभी नागरिकों से अपील करते हैं कि वे एक विविधतापूर्ण और समान भारत के लिए वोट करें।”


इस अपील—जिसमें एजे थॉमस से लेकर ज़ोया हसन तक के हस्ताक्षर [नामों का क्रम अँग्रेज़ी वर्णमाला के अनुसार...] शामिल थे—को यहाँ पूरा उद्धृत करने का उद्धेश्य यह स्पष्ट करना है कि समकालीन भारतीय साहित्यकार अपनी सामर्थ्य भर सौहार्द, बदलाव और बेहतरी के पक्ष में रहे हैं और अब भी हैं। यहाँ यह एक अलग विमर्श का विषय है कि इस पक्ष की अपीलें जन-समुदाय के बीच इतनी बेअसर क्यों हैं? और क्यों सब तरफ़ सोचने-समझने वालों की हार का संसार बड़ा होता जा रहा है। इस व्यापकता में अब लोकतंत्र संदिग्ध है, मतदान भी, मतदाता भी... 

मैं इन सबके बीच रचने-पढ़ने का काम करता हूँ।

• एक ऐसे मुल्क में जहाँ असहमति की सारी आवाज़ें एक पराजित दृश्य में घट रही हैं; वहाँ मेरा संकट है कि मैं सहमतों को ही सहमत करने का संघर्ष कर पाता हूँ, ज़्यादातर उन्हें भी नहीं...  

• हमारे आज़ाद देश में कई बार ऐसे अवसर आए जिनमें लेखकों की प्रतिबद्धता को जाँचा जा सके; लेकिन गए ग्यारह-बारह वर्ष तो जैसे सब समय लेखक ही नहीं, किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की प्रतिबद्धता की परीक्षा लेने पर उतारू रहे हैं। इन वर्षों का अपना अतीत, अपना दुःख और अपना विस्तार है। यह निकट स्मृति सतत नाउम्मीद करती है, क्योंकि ये वर्ष भारतीय समयानुसार बुद्धि के परास्त होने के वर्ष हैं। वह समाज, संस्कृति, राजनीति... सब जगह पराजित है। इन वर्षों ने हमें हमारी खाल दिखा दी है और बता दिया है कि सैकड़ों वर्षों के तमामतर संघर्षों के बावजूद हम मूलतः कैसे हैं!

• हार के संसार में शिथिलता स्वाभाविक होती है। इस शिथिलता के साथ त्यागपत्र संलग्न रहते हैं, लेकिन उनका त्याग से कोई संबंध नहीं होता। इस संबंध में कभी-कभी त्यागपत्र देने से इनकार भी किया जाता है, लेकिन उनका नैतिक साहस से कोई संबंध नहीं होता।   

इस तरह की स्थितियों में बुद्धि तत्काल हार के विश्लेषण में सक्रिय हो जाती है, ताकि वह जल्द से जल्द बग़ैर प्रायश्चित के शिथिल हो सके। ये विश्लेषण उन बहसों को जन्म देते हैं, जो पहले भी बहुत बार हो चुकी हैं और मौक़े-बेमौक़े इनके बार-बार होते रहने की आशंका बनी रहती है।

मैं इन सबके बीच रचने-पढ़ने का काम करता हूँ।

• आज राजनीति, सिनेमा, साहित्य, पत्रकारिता और खेल से जुड़ी हुई बहसों को देखें; तब सब कुछ समय की बर्बादी नज़र आता है—उस समय की बर्बादी जो कुछ खो देने, ख़ाली हो जाने और हताश कर देने वाले अनुभवों से बन रहा है। इस समय में राजनीति में असफल लोग मौन के साधक हैं, सिनेमा में असफल लोग सिने-आलोचक हैं, साहित्य में असफल लोग क्रांतिकारी हैं, पत्रकारिता में असफल लोग ctrl+c और ctrl+v में सफल है और खेल में असफल लोग अब कोई भी खेल खेलने को तैयार हैं। अब सब कुछ इस क़दर प्रभावशाली भ्रम और व्यर्थताओं से गतिशील है कि ‘नव-साधारण’ और ‘उत्तर-सत्य’ जैसी अवधारणाएँ कालजयी लगने लगी हैं।

• अब ज़्यादातर बहसें किसी न किसी तरह की स्क्रीन पर चल रही हैं। अगर नहीं भी चल रही हैं, तब भी चलने के लिए उनका स्क्रीन पर चलना अनिवार्य हो चुका है। इन बहसों से गुज़रने पर यह बहुत साफ़ महसूस होता है कि इनमें नाटकीयता का तत्त्व पर्याप्त है। इन बहसों में जुटे व्यक्तियों को देखिए, उन्हें देखकर सरलता से यह समझा जा सकता है कि ये बहसें उनके और जन-जीवन के वास्तविक मुद्दों से संदर्भित नहीं हैं। हिंदी-अँग्रेज़ी के चिंतक-विचारक टाइप जीवों पर नज़र मारिए; क्या कहीं से लगता है कि वे जनता को समझते हैं या जनता जिन्हें चाह-चुन रही है, उन्हें समझते हैं? 

वैसे जहाँ तक हिंदी साहित्य का सवाल है, गए ग्यारह-बारह सालों में सबसे ज़्यादा सत्ता-विरोध की कविताएँ विश्व साहित्य में हिंदी-कवियों ने ही लिखी हैं। इन कविताओं में ‘राजा’, ‘हत्यारा’, ‘तानाशाह’, फ़ाशीवाद, ‘फ़ाशिस्ट’, ‘अत्याचारी’, ‘अन्यायी’, ‘आततायी’, ‘जन-शत्रु’, ‘लोकतंत्र-विरोधी’ जैसे शब्द की-वर्ड्स की तरह बार-बार आते रहे हैं। हिंदी के लेखक संगठन—प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और दलित लेखक संघ इस अवधि में एकजुट नज़र आए हैं। उन्होंने सत्ता के मार्फ़त जारी जन-विरोधी कार्रवाइयों के विरुद्ध तत्काल अपनी आवाज़ उठाई है और सड़कों पर भी उतरे हैं। वे लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना को बचाए-बनाए रखने के लिए ख़ुद को जहाँ अभिव्यक्त और प्रस्तुत कर सकते थे, निरंतर करते रहे हैं। 

लेकिन अब यह बहुत स्पष्ट है कि हिंदी-पट्टी कई दशकों से मूल रूप से एक बुद्धिविरोधी पट्टी है। इसे ऐसा बना देने में बुद्धिख़ोरों की भी एक बड़ी भूमिका है। बुद्धिख़ोर होना एक विचारपूर्ण व्यक्तित्व का अपनी जनबौद्धिक होने की संभावना को नकार कर बुद्धि-व्यवसायी हो जाना है। इस दृश्य में वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध हिंदी के एक साहित्यकार की स्थिति इस विडंबना से समझिए कि जिस भी ग़ैर-साहित्यिक व्यक्ति से उसका सामना रोज़ होता है, उसे वह सांप्रदायिक और राष्ट्रवादी उन्माद में डूबा हुआ पाता है। ये ग़ैर-साहित्यिक व्यक्ति अपनी बुनियादी संरचना में बुरे और हिंसक लोग नहीं हैं, ये किसी जन-विरोधी कार्रवाई में सीधे और मूर्त ढंग से शामिल भी नहीं हैं; लेकिन ये संतुलनवाद और तुष्टीकरण के स्वर से ग्रस्त तथा ढीली और शांत राजनीति से ऊबे हुए लोग हैं और इन्हें इनकी ऊब को उत्तेजना में बदल देने वाला प्रतिनिधि चाहिए, वह कौन है और कहाँ है और उसे कैसे चुनना है; यह अतिअश्लील रूप से भयानक प्रसार वाले ख़ूँख़ार अख़बार, न्यूज़-चैनल्स और उनके डिजिटल संस्करण इन्हें पल-प्रतिपल बताते आए हैं और बराबर बता रहे हैं।

मैं इन सबके बीच रचने-पढ़ने का काम करता हूँ।

• इस सबके बावजूद इधर के ग्यारह-बारह बरसों में साहित्य और संस्कृति के इलाक़े में यह बात बहुत ध्यान देने की है कि हिंदी साहित्यकारों की एक बहुत बड़ी संख्या अब भी दक्षिणपंथ से घृणा करती है। हिंदी साहित्य का वह संसार जहाँ अब तक वामपंथ का पथ ही सबसे सशक्त, संभावनाशील और उज्ज्वल है; वहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से संचालित और प्रभावित भारतीय जनता पार्टी अब तक कोई ख़ास घुसपैठ नहीं कर पाई है... जबकि इस काल और अवधि के दरमियान उसने स्वायत्त संस्थाओं, संस्थानों, अकादमियों और विश्वविद्यालयों पर क़ब्ज़े किए; उसने अपने उपक्रम, अपने आयोजन, अपने पुरस्कार शुरू किए और इस तरह नक़ली लेखक-कलाकार, जाहिल संपादक और भ्रष्ट निर्णायक पैदा किए... उसने जल की तरह धन बहाया और संसाधनों, सुविधाओं, यश-पद के प्रलोभन दिए; लेकिन कुछ लालची और ज़लील लोगों को छोड़ दें तो किसी बहुत महत्त्वपूर्ण हिंदी साहित्यकार को तोड़कर वह अपनी ओर नहीं कर पाई, वह उसका स्वर नहीं बदल पाई। वे जो बहुत प्रकट रूप से राजनीतिक नज़र नहीं आते, वे हिंदी लेखक भी अपने जीवन, विचार और लेखन में इस दक्षिणपंथी सत्ता के साथ अब तक नहीं गए हैं।

लेकिन चूँकि विवेक लगातार पराजित हो रहा है, इसलिए हार के इस संसार में साहित्य भी अब एक तमाशा हो चला है। वह भी राजनीति की तरह भ्रम पैदा कर रहा है। यहाँ सौदेबाज़ स्वर मुखर और लोकप्रिय हैं, धूर्तताएँ ही उपलब्ध और उपस्थित हैं। इस अँधेरे में चीज़ों को टटोलकर उनकी सचाई सामने ले आने वाली नज़रें और कामगार हाथ अब कहीं बेहद पीछे छूट गए हैं। साहित्य की वह आवाज़ जो बहुत कम लोगों के बीच, बहुत कम लोगों के ज़रिये, लगभग सब लोगों को संबोधित होती है; अब लगभग अपना वज़्न खो चुकी है। वह अब दूर से भी आती हुई नहीं लगती।  

चुनी हुई चुप्पियाँ चुनी हुई मुखरताओं में बदल गई हैं। सारे प्रतिबद्ध पक्ष, प्रतिकार, निर्णय और क़दम एक ही मंज़िल की ओर जाते हुए भी अलग-अलग राहें लेने को विवश हैं। सब साथी भटक-बिछड़ रहे हैं। सब तरफ़ परस्पर संशय विस्तारशील है।   


इस सबके समानांतर गए एक-डेढ़ दशक में साहित्य में सुविधाएँ अनावश्यक और अप्रत्याशित ढंग से बढ़ी हैं और इसलिए ग़ैर-ज़रूरी भीड़ और कोलाहल भी। यह भीड़ इस विचार से जाने-अनजाने अपरिचित है कि आधुनिक साहित्य का एक मुख्य कार्यभार अपनी मूल संरचना में सत्ता के लिए असुविधाजनक होना है। यह सत्ता सिर्फ़ राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक और साहित्यिक भी होती है।

• इस वक़्त साहित्योत्सवों, लिटरेचर फ़ेस्टिवल्स के नाम पर पूरे मुल्क में जो अभूतपूर्व गंदगी का आलम है; उसे अगर व्यंजना में समझें तब कह सकते हैं कि यह उत्सवधर्मिता भारतीय प्रधानसेवक के मार्फ़त धूम-धाम से शुरू हुए स्वच्छता-अभियान के लिए अत्यंत असुविधाजनक है। एक ही जैसे चेहरों से बार-बार संभव लगभग एक ही जैसे लिटरेचर फ़ेस्टिवल्स को ग़ौर से देखिए-जाँचिए, इनमें भारी नियमितता है। इस वजह से साहित्य-संस्कृति के संसार में जिसे भी देखो वह सब समय कहीं से आ रहा है या कहीं जा रहा है या कहीं जाने को है। एक भयावह हड़बड़ है और उसमें भयावह गड़बड़ियाँ हैं। यह साहित्य का स्वभाव नहीं है, साहित्योत्सवों का है।

मैं इन सबके बीच रचने-पढ़ने का काम करता हूँ।

लेकिन बुद्धि अब बहुत ऊब चुकी है और बहुत थक चुकी है और अब वह बेशतर काम AI से ले रही है। यह स्थिति इतनी अधिक भयानक है कि AI से काम लेने और न लेने दोनों ही स्थितियों में पिछड़ना तय है... और हालिया चुनाव-परिणामों तथा गए ग्यारह-बारह वर्षों की भारतीय राजनीति ने अब यह बहुत स्पष्ट कर दिया है कि पिछड़ों की एकमात्र शरण भारतीय जनता पार्टी है। मेरा आग्रह है कि यहाँ मेरे इस बयान को अभिधा में न लिया जाए... 

• हार के संसार में असंतोष, अराजकता और अचरज रोज़ की ज़रूरतें होनी चाहिए। पर बौद्धिकों की चाल इस संसार में कोई उथल-पुथल उत्पन्न नहीं कर रही, क्योंकि उनके लिए हार कोई नई बात नहीं है। उनकी हार में भी जली हुई रस्सी-सा बल होता है। ‘न उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई...’ टाइप बदरंग हो चुकीं फ़ैज़-पंक्तियाँ उनके बहुत काम आती ही रहती हैं। लेकिन अब इस पर सच में सोचने की आवश्यकता है कि आख़िर इतने अनुभवों के बाद भी इस मुल्क में प्रतिबद्ध व्यक्तित्वों के निशाने सही क्यों नहीं लगते, जबकि वे अपने सबसे बढ़िया दाँव आज़माते रहते हैं! 

• दरअस्ल, इस समय ने नायकों को पहचाने का शऊर खो दिया है। इसने नायकत्व की परिभाषा परिवर्तित कर दी है। इसने अर्थ के अर्थ नष्ट कर दिए हैं। अँगूठा-केंद्रित व्यवहार, ज्ञान और मनोरंजन से गतिशील इस समय में एक साहित्यकार-कलाकार अपना काम करता है; यह जानते हुए भी कि आज वह ज़मीन से कम अँगूठे से ज़्यादा जुड़ा हुआ है, वह अपने जुड़ाव और सरोकार को अँगूठे की मदद से जाँचता और व्यक्त करता रहता है। इनमें बहुत सारे रचनाकार वास्तविक होते हैं, बहुत सारे छद्म—फ़ॉरमूलों और फ़ैशन के दबावों से निकले हुए—हड़बड़ग्रस्त, अति उत्तेजित और त्वरित प्रतिक्रियाशील। कुल-मिलाकर धैर्यशीलता, विचारोत्तेजकता और सहिष्णुता सरीखे मूल्यों को अब लगभग विदाई दे दी गई है। आज अँगूठा-केंद्रित ऑनलाइन माध्यमों पर सक्रियता और इन मूल्यों का निर्वाह एक साथ असंभव है। निरर्थक किस्म की विवादमयता ने भी इस दृश्य को बहुत ख़राब अर्थों में असर-अंदाज़ किया है। अब कोई भी मुँह उठाकर हिंदी भाषा और साहित्य के बारे में निर्णायक राय दे सकता है। इसके लिए साहित्य-साधक या साहित्य-सेवक होना तो छोड़िए, अब साहित्य-रसिक होना भी ज़रूरी नहीं रहा।

• वे जिन्हें साहित्य से कोई विशेष सरोकार नहीं, वे जिन्होंने अपने जीवन और संस्थानों में सदैव साहित्य को ग़ैर-ज़रूरी बनाए रखा; वे जब आज हिंदी साहित्य की चिंता में दुबले होते प्रतीत होते हैं, तब सचमुच डोर से पतंग जब टूट जाती है, जैसा दृश्य नज़र आने लगता है।

और मैं इन सबके बीच रचने-पढ़ने का काम करता हूँ... 

क्यों करता हूँ? इस प्रश्न का एक रूढ़ और रोमानी उत्तर ही मेरे लिए अब तलक सबसे सच्चा और प्रासंगिक है। इस उत्तर पर इस सृष्टि के कई श्रेष्ठ सृजेताओं की छायाएँ हैं। मैं इन छायाओं से एक पल के लिए भी मुक्त नहीं हूँ। इस असर में—इस उत्तर में—कुछ रचना मेरे लिए साँस लेने जैसा है। मुझे लगता है कि रचना या रचना के बारे में सोचना बंद कर देने पर भी जीते चले जाने वाले व्यक्तित्व और चाहे जो कुछ हों, लेखक नहीं हो सकते।

•••

यहाँ प्रस्तुत कथ्य बहुत कम बदलाव के साथ ‘संगमन’-26 [22-24 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल] में ‘मेरी रचनात्मकता : मेरे द्वंद्व’ विषय पर रविवासरीयकार द्वारा दिया गया वक्तव्य है। यह वक्तव्य ‘अकार’ [संपादक : प्रियंवद] के 73वें अंक [अप्रैल 2026] में पूर्व-प्रकाशित और वहीं से साभार है। इसे यहाँ सुन भी सकते हैं : संगमन-26 में... अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़िए : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़ | साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है | सेवासूक्त | पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान | अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़ | मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर | नवीन सागर : एक बेसँभाल असमाप्त

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट