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रविवासरीय 4.0 : अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़

मैं कैसा था?

अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि अविनाश मिश्र कैसा था, जब दिल्ली आया था?


अलमुस्तफ़ा ने कहा कि दिल्ली में अपना क्षरण पता नहीं चलता।

दिल्ली में बहुत काम करने के लिए एक स्कॉलर बहुत तैयार होकर अपने गाँव-क़स्बे-नगर-उपनगर-महानगर से आता है; लेकिन यहाँ विश्वविद्यालयों के विभागों में सिर्फ़ लैनयार्ड्स, कॉफ़ी-मग, डायरी-क़लम, फ़ोटो-फ़्रेम्स, प्लांट्स, अंगवस्त्रम् और झोले इकट्ठा करने में लग जाता है। यों एक रोज़—एक रोज़ में नहीं हुआ—उसे उसका क्षरण पता चलता है और वह लैनयार्ड्स, कॉफ़ी-मग, डायरी-क़लम, फ़ोटो-फ़्रेम्स, प्लांट्स, अंगवस्त्रम् और झोलों के बेहतरीन संग्रह के साथ एक झोलाछाप स्कॉलर में बदल जाता है। 

दिल्ली में अपने क्षरण से बचने का एक ही मार्ग है—अपना पर्याप्त क्षरण करके दिल्ली आइए।


मैं इस प्रकार ही दिल्ली आया था—यह सोचता हुआ कि कैसे भी करके सिर छुपाने को एक जगह और खाने को दो वक़्त का खाना मिल जाए और इसे अर्जित करने के बाद के बचे वक़्त में जो कुछ भी मिले मैं उसे पढ़ सकूँ, जैसे भी विचार आएँ मैं उन्हें लिख सकूँ, जो कुछ भी महसूस करूँ मैं उसे समझ सकूँ, मैं चोरी और भीख से बच सकूँ... ये सुविधाएँ देने वाली एक मामूली नौकरी मुझे जल्द ही मिल गई। आज सोचता हूँ कि उस नौकरी को मामूली, मुझ जैसा मामूली व्यक्ति ही कह सकता है। 

दरअस्ल, वह नौकरी असाधारण थी। उसने मुझे बहुत मोहलत दी और दिल्ली को जमकर देखने दिया। उसने मुझे वह अज्ञातवास दिया जिसमें मैं था और संसार का श्रेष्ठतम साहित्य था और मेरे और मेरी किताब के बीच कोई नहीं था—न कोई मास्टर, न कोई आलोचक, न कोई लेखक संगठन, न कोई संस्थान, न कोई सोशल नेटवर्किंग साइट, न कोई डेडलाइन, न कोई संपादक...

फिर एक रोज़ दिल्ली में मिली मेरी वह पहली नौकरी चली गई। सात साल एक महीने मैंने वह नौकरी की और जब उससे आज़ाद हुआ तो मालिकों ने कहा कि आज़ादी जो नई ग़ुलामी जैसी ही होगी; अगर बेहतर न लगे तो लौट आना, तुम्हारे लिए दरवाज़े सब वक़्त खुले हैं। वे अपने घोड़ों पर शहर की सरहद तक मुझे छोड़ने भी आए। मेरी कमर की हड्डी में उनकी तलवार की मूठ गड़ रही थी। मैं उनकी पीठ से चिपका हुआ था। हवाओं में कुछ नमी-सी आ गई थी, जब मैंने महसूस किया कि वक़्त बहुत आगे आ चुका है; लेकिन ग़ुलामी में आश्वासन, आत्मीयता और आँसू अब तलक बरक़रार हैं। 

मैं कैसी भी नौकरी कर लेता, अगर उसे नौकरी की तरह लेता तो... लेकिन मैं सेवा का अर्थ समझने वाला व्यक्ति हूँ, इसलिए... 

इसके बाद मैंने वे नौकरियाँ कीं जिनमें मेरे और मेरी किताब के बीच, मेरे और मेरे लेखन के बीच, मेरे और मेरे महसूस करने के बीच हिंदी-साहित्य-संसार ने आना शुरू किया। इसके ‘कलाकार’ बिल्कुल सीधे मेरे और मेरी किताब के बीच, मेरे और मेरे लेखन के बीच, मेरे और मेरे महसूस करने के बीच नहीं आ सकते थे; इसलिए वे मेरे रोज़गार के रास्ते आने लगे। वे कृष्ण [कल्पित] को सारथि बनाकर आने लगे। मेरे ख़िलाफ़ लिखने वाले फिर भी कभी मेरे ख़िलाफ़ ठीक से लिख नहीं पाए! वे कभी अपना अकाउंट-अस्तित्व डीएक्टिवेट करके लुप्त हो जाते, कभी मुझे अनफ़्रेंड या ब्लॉक कर देते, कभी अपनी प्रोफ़ाइल लॉक कर लेते, कभी अपनी पोस्ट्स थोड़ी देर के लिए पब्लिक करके फिर ओनली फ़्रेंड्स या ओनली मी या डिलीट कर लेते। मेरे ख़िलाफ़ लिखे की एडिट-हिस्ट्री तो पूछिए ही मत! वह मेरे ख़िलाफ़ एक बात को बेशुमार बार संपादित करते।

मेरे ये मित्र एक-दूसरे से मिल, जुड़ और परस्पर संवाद आदि करके मेरे ख़िलाफ़ लिखते; लेकिन अफ़सोस मेरे ख़िलाफ़ लिखने वाले कभी मेरे ख़िलाफ़ ठीक से लिख नहीं पाते।

मेरे जैसे व्यक्ति को—जिसका लिखा हुआ सब कुछ जन-संस्कृति को समर्पित होने के कारण सदा पब्लिक-मोड में रहता—यह बात बहुत निराश करती कि मुझ पर हमलावर मेरे दोस्त मेरे ख़िलाफ़ लिखने के लिए अफ़वाह, झूठ और ग़फ़लत का आश्रय लेते। 

मैंने क्या किया?

अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि अविनाश मिश्र ने क्या किया—जब उसके ख़िलाफ़ लिखने वाले उसके ख़िलाफ़ ठीक से लिख नहीं पाए?


अलमुस्तफ़ा ने कहा कि तब अविनाश मिश्र ने ख़ुद अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़ लिखा।


मैंने सिर उठाया और तुम सबकी तरफ़ देखा... अब तुम सब लगभग शांत हो चुके हो... इसलिए अब सुनो, तुम्हारा सारथि ग़लत है—उसने तुम्हें डुबो दिया, जैसे एक-दो मौक़ों पर मुझे भी। कृष्ण-चरित्र आधुनिक मूल्य नहीं है। इसलिए कृष्ण नामधारी व्यक्तियों को ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति को इस कलिकाल में द्वापरयुगीन आचरण से बचना चाहिए। 

कृष्ण कल्पित एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी ज़्यादातर बातें ‘क्या कहा जाए’ के आस-पास इस क़दर घूमी हुई हैं कि आज उनका सारा चरित्र ही ‘क्या कहा जाए’ हो गया है। यह अपनी ही मेधा का ऐसा तिरस्कार है कि क्या कहा जाए!   

यह मेधा कुचर्चाओं और मूर्च्छाओं की इस क़दर भूखी और प्यासी है कि रात में नौ बजे ही नहीं किसी भी वक़्त किसी पर भी थूक सकती है, रवि-शशि पर भी और इस तरह ख़ुद पर भी। सहस्रों सतही आत्मचित्रों के नीचे दबे इस आत्ममुग्ध आत्मविश्वास ने कृष्ण कल्पित को इस क़दर अधम कर दिया कि आज वह बस जेल जाने से बचे हुए हैं। उन पर आरोप बेहद संगीन हैं—इस क़दर संगीन कि उन्हें अब हिंदी साहित्य के गटर में भी जगह नहीं मिलेगी, क्योंकि वहाँ भी उनसे बेहतर प्राणी होंगे। हिंदी साहित्य के पर्यावरण में वह अब एक बहुत संदिग्ध, दूषित और विषाक्त व्यक्ति हैं। 

वास्तव में, हिंदी साहित्य का सार्वजनिक स्पेस—जहाँ सारी लैंगिकताएँ, कुंठाएँ और असहमतियाँ साथ-साथ उठती-बैठती हैं—कविता [या किसी भी कला-अनुशासन का] कोई फ़ॉर्म नहीं है कि जिसके नियम तोड़ने पर आपको वाहवाही मिलेगी। मुझे दुःख है कि कभी कृष्ण कल्पित पर सबसे बेहतर मैंने लिखा और कोई दुःख नहीं है कि आज उन पर सबसे ख़राब लिख रहा हूँ। मैं साहित्य में प्रकाशित को अप्रकाशित करने की कला नहीं जानता हूँ; वरना आज तक मैंने जहाँ-जहाँ कृष्ण कल्पित लिखा है, वहाँ-वहाँ कालिख पोत देता। मुझे इस बात की तसल्ली है कि कृष्ण कल्पित को हिंदी की सत्ता-शक्ति-संरचनाओं ने नष्ट नहीं किया, वह अपने ही हाथों और अपने ही कारणों से नष्ट हुए। जून 2025 [पटना] के बाद से उनका वह कवि-व्यक्तित्व बुरी तरह पिचक गया है, जिस पर उनके मुझ जैसे चंद प्रशंसक फूले रहते थे। यहाँ इस प्रकार की भी आशंकाएँ उपस्थित हैं, जिनके पाठ से गुज़रकर लगता है कि वह सदा से ऐसे ही थे, मैं ही उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाया... कितना चालू वाक्य है ये!—बहुत घृणित, घटिया और घिसा हुआ... मानो मैंने ठेके उठा रखे हैं—सबको पहचानने के! ध्यान से देखिए—मैं ख़ुद को भी कहाँ पहचान पाया! इसलिए अपने ख़िलाफ़ लिखने के लिए, मुझे कृष्ण कल्पित के ख़िलाफ़ लिखने की ज़रूरत महसूस हुई है।


मैं शर्मिंदा हूँ, क्योंकि कवि कह गया है :


आपके हिस्से की शर्म भी 

आप क्यों उठाएँ
उसे मैं ही उठा लेता हूँ


मैंने क्या देखा?

अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि इसके बाद अविनाश मिश्र ने क्या देखा?


अलमुस्तफ़ा ने कहा कि अविनाश मिश्र ने इसके बाद देखा कि ज़्यादातर ज़ाहिर हक़ीक़त से मुख़्तलिफ़ होता है।


मैं अब इस दृश्य के कुछ चेहरों को तथ्यों की इस क़दर तंग और चुस्त पोशाक पहनाने जा रहा हूँ कि उन्हें अब आगे चलने में सदा समस्या होगी। 

हिंदी-साहित्य-संसार में पटना की घटना के बाद कृष्ण कल्पित के सबसे विशाल समर्थक उदय प्रकाश के साथ पीड़िता/सर्वाइवर का कविता-पाठ [25 मार्च 2026, वसंत सभागार, वसंत महिला महाविद्यालय, राजघाट, वाराणसी, उत्तर प्रदेश] और कृष्ण कल्पित को जेल में और उनके समर्थकों को भाषा से बाहर देखने का दावा करने वाले क्रांतियुक्त कवि विहाग वैभव [संदर्भ : 29 जून 2025 की फ़ेसबुक-पोस्ट] के हाथों इस आयोजन का संचालन और उदय प्रकाश के सबसे विशाल प्रकाशक [इन दिनों भयावह रूप से दक्षिणपंथोन्मुख] के यहाँ से पीड़िता की प्रथम पुस्तक का प्रकाशन [15 अप्रैल 2026]... देखिए, विचित्र विरोधाभासों की वरुणा बह रही है जिसमें उत्पीड़ित, उत्पीड़क के समर्थक, उत्पीड़ित के समर्थक सब एक साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। 

इस सबके बावजूद मैं पीड़िता/सर्वाइवर के साथ हूँ और वह सब कुछ करने के लिए तैयार हूँ, जिससे मेरी यह बात महज़ बात न लगे। 

मैं कृष्ण कल्पित और उदय प्रकाश को आज से अपने जीवन और अपनी भाषा से सदा के लिए बाहर करता हूँ।  

मेरा क्या होगा?

अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि अब अविनाश मिश्र क्या होगा?


अलमुस्तफ़ा ने कहा कि अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़ अब फिर क्षेत्ररक्षण सजाया जाएगा और इसमें अर्धबुद्धि, मनहूस और दयास्पद क्षेत्ररक्षक उतारे जाएँगे। इस बार वे बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों और उनके हिंदी विभागों से आएँगे—एक सवर्ण हिंदू ट्रेनिंग के साथ—सारी क्रांतियों को असंभव करते हुए।


मैं क्षेत्ररक्षकों को अपनी तरफ़ से कुछ ट्रेनिंग देना चाहता हूँ, ताकि वे मेरे ख़िलाफ़ ठीक से क्षेत्ररक्षण कर सकें। मैं मेरे मार्फ़त हो चुकीं कुछ चीज़ें बताता हूँ... आख़िर वे कब तक ‘घंटा’-टाइप-उद्धरण और नोक-झोंक भरे हल्के फ़ेसबुक-कमेंट्स और अननोटिफ़ाइड कविताओं के स्क्रीन-शॉट्स से काम चलाएँगे! इस प्रकार का तो मुझसे संबद्ध काफ़ी कुछ है। लेकिन मैं उन्हें कुछ ठोस सामग्री देता हूँ, लीजिए :


• ‘अज्ञातवास की कविताएँ’ [साहित्य अकादेमी, प्रथम संस्करण : 2017] में शामिल कविता ‘शादी के कार्ड’।

• ‘चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान : कामसूत्र से प्रेरित’ [राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2019] में शामिल कविताएँ—‘नखक्षत’, ‘दंतक्षत’, ‘एकपुरुषाभियोग’, ‘आहार्य राग’, ‘पोटारत’, ‘कन्याविस्रम्भण’, ‘घटानिबंधन’, ‘छायाचुंबन’, ‘एकचारिणी’, ‘स्त्रीपुरुषशीलावस्थापन’, ‘नखविलेखन’।

• ‘वर्षावास’ [हिन्द युग्म, प्रथम संस्करण : 2022] में पृष्ठ : 102 और 114. 

• ‘समालोचन’ पर 28 मार्च 2015 को प्रकाशित ‘दस उच्छ्वास’ के मुख्य शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित दस कविताएँ—‘असूर्यम्पश्या’ [जन्म : 1960], ‘प्रगल्भा’ [जन्म : 1970], ‘क्षमाशीला’ [जन्म : 1980], ‘लज्जाप्रिया’ [जन्म : 1985], ‘आक्रामिका’ [जन्म : 1990], ‘रूपगर्विता’ [जन्म : 1992], ‘अभिसारिका’ [जन्म : 1994], ‘मानवती’ [जन्म : 1996], ‘समर्पिता’ [जन्म : 1998], ‘निर्लज्जप्रिया’ [जन्म : 2000]। 

इन कविताओं को पढ़कर विष्णु खरे ने मुझे एक ईमेल किया था; जिसे आज से पहले कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, पर अब पढ़िए :


“मैं हिंदी कविता और आलोचना का एक पाखंड और एक विडंबना समझ नहीं पाता हूँ—एक तरफ़ स्वयं हम कवि पाठकों के कविता से दूर होते जाने का परस्पर सियापा करते हैं, उसके लिए कवियों और कविता की परस्पर निंदा करते हैं, दूसरी ओर ऐसी कविताओं की ऐसी ताईद करते हैं!


ये कविताएँ सिवा कवियों और कवयित्रियों और समीक्षकों के... किसी और के लिए न हैं, न हो सकती हैं। यहाँ हर ‘कविता’ के पीछे कोई वास्तविक या काल्पनिक कवयित्री है। इन्हें poèmes à clef भी कह सकते हैं। इनमें कवयित्रियों को ‘पहचानने’ की कोशिश की जा सकती है। स्वयं कवि की sexuality और gendrality इनमें है। दरअस्ल, यह एक तरह की scandal-mongering है।

जब तक बिल्कुल दुर्निवार न हो, मुझे कविता और कवियों पर कविताएँ लिखने-पढ़ने से बहुत नफ़रत है—dedicatory रचनाओं की बात अलग है। मैं ऐसा मानता हूँ कि जो कवि ऐसा करते हैं, वे नष्ट-समाप्त हो रहे हैं, या आत्ममोहग्रस्त हैं, या शुद्ध कुंठित हैं... वे तीनों भी हो सकते हैं।

यह बिल्कुल ठीक है कि कवि को हर तरह की, ख़राब भी, कविताएँ लिखने का हक़ है और उस तर्क के हिसाब से ये कविताएँ नई, दिलचस्प और पठनीय हैं; लेकिन फिर वह अपनी ‘दूसरी’ तरह की कविताएँ और अपनी लिखी हुई समीक्षाएँ भी देखे और बताए कि इन सबमें अन्विति कहाँ है?

फिर दुर्भाग्यवश यह दिल्ली के ईर्ष्यालु Literaturpolitik की बेटियाँ और औलादें हैं। इनसे व्यापक हिंदी-पाठक-जगत को कुछ भी हासिल नहीं होता।

तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में...


विष्णु [खरे] जी को इस पर मैंने यह Reply दिया था :


“मैं भी आपकी बिगड़ी हुई औलाद हूँ। आप विश्वास कीजिए एक दिन ज़रूर सुधरूँगा।

सदा आपका कृतज्ञ!”


इस पर विष्णु जी का Reply था :


“तुमसे मुझे बहुत ज़्यादा उम्मीदें हैं। गड़बड़ियाँ और घपले मत करो और मेरी नाक मत कटवाओ—उसके लिए व्योमेश [शुक्ल] ही काफ़ी है।”


• ‘समालोचन’ पर 9 अप्रैल 2020 को प्रकाशित ‘नवस्तुति’ के मुख्य शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित नौ कविताएँ—‘शैलपुत्री’, ‘ब्रह्मचारिणी’, ‘चंद्रघंटा’, ‘कूष्माण्डा’, ‘स्कंदमाता’, ‘कात्यायनी’, ‘कालरात्रि’, ‘महागौरी’, ‘सिद्धिदात्री’। ये कविताएँ वागीश शुक्ल की भूमिका के साथ प्रकाशित हुई थीं और इन पर बहुत भारी बहस के बीच मंगलेश डबराल के बहुत सारे कमेंट्स में से एक कमेंट यह था :


“आस्थावानों-कर्मकांडियों के लिए अवश्य विचारणीय आलेख; लेकिन जो नवदुर्गा की धारणा और बहुत बाद में धर्मतंत्र में प्रविष्ट होने वाले चैत्र नवरात्र को समस्याग्रस्त करते हैं, उनके लिए कुछ भी नया नहीं।”


• ‘नवाँ दशक : नवें दशक की हिंदी कविता पर एकाग्र’ [राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2024] में शामिल दो आलेख—‘असहमति का आयतन’ [संजय चतुर्वेदी की कविता-सृष्टि पर] और ‘परंपरा का आवारापन’ [कृष्ण कल्पित की कविता-सृष्टि पर] जो क्रमशः 2016 और 2018 में ज्ञानरंजन द्वारा संपादित ‘पहल’ के दो अंकों में प्रकाशित हुए।

• मेरे ब्लॉग ‘द र अ स ल’ पर 4 अगस्त 2014 को प्रकाशित ‘भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार समारोह’ की रपट—‘पैंतीस वर्ष कम नहीं होते बेवक़ूफ़ियों के लिए’।


सात बिंदुओं से युक्त इस ‘अविनाशमिश्रविरुद्धसूक्त’ के माध्यम से अविनाश मिश्र को सहजता से हिंदी की संकीर्ण पट्टी में इन चौदह ‘उपाधियों’ से लांछित किया जा सकता है—स्त्रीविरोधी, मर्दवादी, सेक्सिस्ट, नारी-निंदक, परंपरावादी, रीतिकालीन, रूपवादी, कलावादी, सांप्रदायिक, अस्मितावादविरोधी, ब्राह्मणवादी, कुंठित, हिंसक, बदतमीज़।

~

पुनश्च :


मैंने क्या कहा?


अलमुस्तफ़ा से अलमित्रा ने पूछा कि फिर अविनाश मिश्र ने और क्या कहा?


अलमुस्तफ़ा ने कहा कि उसने कहा : वे अपीलें मत करो जो बेअसर हो जाएँ और अगर करो तो बाद में उनकी बेअसरी पर शर्म से डूब मरो!


...और अब जो मैं कहने जा रहा हूँ, उसे भी आप अब से ही और भविष्य में भी मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकते हैं... मैंने कहा...


•••


इस स्तंभ में प्रयुक्त अलमुस्तफ़ा-अलमित्रा-संवाद-शैली के लिए रविवासरीयकार ख़लील जिब्रान और उनकी जगप्रसिद्ध पुस्तक The Prophet के प्रति आभार व्यक्त करता है। यहाँ प्रस्तुत कविता-पंक्तियाँ—आपके हिस्से की शर्म भी / आप क्यों उठाएँ / उसे मैं ही उठा लेता हूँ—मनमोहन के कविता-संग्रह ‘ज़िल्लत की रोटी’ [राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2006] से ली गई हैं। अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़िए : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़ | साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है | सेवासूक्त | पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान

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