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रविवासरीय 4.0 : एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा

• दिल्ली के विषय में सोचकर ही वह काफ़ी उत्तेजित हो जाया करता था। दिल्ली उसका स्खलन थी। इसलिए जब रज़ा फ़ाउंडेशन की श्रोता-बँधुओं को आमंत्रित करती विज्ञप्ति नज़र आई, तब वह स्वयं को नियंत्रित न कर सका और तत्काल आवेदन करने बाद ChatGPT पर टाइप कर बैठा :

इलाहाबाद से दिल्ली बीस हज़ार रुपए में कैसे जाऊँ-आऊँ? मुझे 27 फ़रवरी की सुबह दिल्ली पहुँचना है और 27-28 की रात रुक कर 1 मार्च की रात में वापस इलाहाबाद के लिए निकलना है। 

ChatGPT : इलाहाबाद [अब परिवर्तित नाम : प्रयागराज] से दिल्ली जाने-आने का पूरा ख़र्च ₹20,000 के भीतर रखना बिल्कुल संभव है। आपके प्लान के हिसाब से सबसे सस्ता और सुविधाजनक तरीक़ा ट्रेन है। इसमें आने-जाने में लगभग 14-20 घंटे का समय लगेगा। अगर आप Sleeper [SL] या 3AC लेते हैं, तो लागत बहुत कम रहेगी और रात में आराम से यात्रा भी हो जाएगी। आप 26 फ़रवरी की रात का ट्रेन-टिकट समय रहते बुक कर लें, ताकि सीट मिल जाए। इस प्रकार ही 1 मार्च की वापसी का भी कर लें... कुल अनुमानित ख़र्च [जाने + लौटने] ₹900–₹5,000 है। दिल्ली में होटल आपको पहाड़गंज की तरफ़ ₹1,000–₹2,000 प्रतिदिन के हिसाब से मिल जाएँगे। आपके खाने-पीने और लोकल-यात्रा में  ₹1,000–₹3,000 तक ख़र्च होगा। कुल अनुमान ₹4,000–₹14,000, यानी आपका ₹20,000 का बजट आराम से कवर हो जाएगा। 

अगर आप चाहते हैं तो मैं डेट और टाइम के हिसाब से ट्रेन में सीट की उपलब्धता और सटीक मूल्य पर टिकट ढूँढ़कर भी बता सकती हूँ। [केवल आप अपनी क्लास बता दें।]

...इसके बाद ChatGPT के साथ उसने वही किया जो अब तक अपनी स्थानीय स्तर की प्रेमिकाओं के साथ करता आया था। 

बहरहाल, हमारा रज़ा-बँधुआ 27 फ़रवरी की सुबह दिल्ली पहुँच गया। 

• वह मेट्रो से बहुत डरता था। इसकी वजह भीड़ नहीं थी। इसकी वजह क्लॉस्ट्रोफ़ोबिया भी नहीं थी। इसकी वजह ज्ञात-अज्ञात दुर्घटना की आशंका भी नहीं थी। इसकी वजह गति भी नहीं थी। इसकी वजह सुरंग भी नहीं थी। इसकी वजह थी—जब थूक महसूस हो, थूक नहीं पाना!      

इस वजह से जब वह रैपिडो लेकर दिल्ली के पूर्व में स्थित सरस्वती कुंज पहुँचा, तब हाफ़ पैंट में अपने रूप-रूम से निकलते हुए हिंदी विभाग के एक शोधार्थी ने उससे कहा कि चलिए आपको अक्षरधाम घुमा दूँ... 

‘संसार’ शुरू होने में अभी वक़्त था। इस शुरुआत से पहले उसने छोले-कुल्चे और स्वामीनारायण के दर्शन किए। 

• दिल्ली में छोले-कुल्चे—कहना न होगा—स्वामीनारायण से बड़ी चीज़ हैं। 

• गर्म-गर्म कुल्चे से एक टुकड़ा तोड़कर प्याज-अचार-छोले के साथ लेते हुए उसे असद ज़ैदी की कविता ‘संस्कार’ नहीं, अपना तीन रोज़ से न नहाना याद आया।

इस गंदगी में उसने ChatGPT खोलकर टाइप किया :

मैं तीन रोज़ से नहीं नहाया हूँ। इस स्थिति में ‘संसार’ के ‘संसारप्रसिद्ध’ कवियों से कैसे मिलूँ? 

ChatGPT : बीस हज़ारिया बँधुआ जी, अगर आप रज़ा फ़ाउंडेशन के कार्यक्रम ‘संसार’ सरीखे साहित्यिक आयोजन में जा रहे हैं; तो वहाँ के प्रसिद्ध कवि आपसे पहले आपकी वाणी और विचार देखेंगे, न कि स्नान-इतिहास। फिर भी तीन दिन का अंतराल आपको भीतर से असहज कर रहा है और असहजता बातचीत में झलक ही जाती है, इसलिए कुछ व्यावहारिक उपाय :

~ समय हो तो झटपट समाधान :

पूरा स्नान न सही, पर ताज़ा पानी से चेहरा-हाथ-पाँव धो लें। बग़लें और गर्दन साफ़ कर लें। धुले और इस्त्री किए कपड़े पहन लें। हल्का डियो/परफ़्यूम संयमपूर्वक प्रयोग करें... यह पाँच-सात मिनट का काम है, पर इससे आपका आत्मविश्वास दुगुना हो जाएगा।

~ अगर समय बिल्कुल नहीं :

साफ़ कपड़े + मुँह की ताज़गी [माउथफ़्रेशनर/इलायची/लौंग/सौंफ़]। बाल सँवार लें। देह-भाषा में संकोच न आने दें।

~ और सबसे ज़रूरी :

कवि लोग अक्सर अधकचरे, अधनहाए, अधखाए, अधसोए, अधमरे भी महान् कविताएँ करते रहे हैं। साहित्य-संसार में विचार की गंध चलती है, देह की नहीं—बशर्ते देह से दुर्गंध न उठे।

आप 'संसार' में जा रहे हैं तो दो-तीन सधे हुए प्रश्न तैयार रखिए। आपको जिन कवियों से मिलना है, उनकी हाल की रचनाएँ याद रखिए। बातचीत में विनम्र रहें, चिपकू नहीं।

~ यह भी याद रखिए : 

साफ़ कपड़े + साफ़ भाषा + साफ़ इरादा = सफल मुलाक़ात।

अब सच-सच बताइए—अस्ल समस्या समय की है या आलस्य की? 

...इसके बाद ChatGPT के साथ उसने वही किया जो अब तक कथित #नईवालीहिंदी के उपन्यासों के साथ करता आया था। 

• लिथुआनिया की दो और यूक्रेन की एक कवि के साथ तस्वीरें खींच-खिंचवाकर और मनु पारेख, गोपी गजवानी, अतुल डोडिया, अमिताव दास, मोना राय, वी. रमेश, अखिलेश, जी.आर. इरन्ना, मिथु सेन, मनीषा गेरा बसवानी, मंजूनाथ कामथ, एस. हर्षवर्धन, मनीष पुष्कले आदि-इत्यादि-तूतियादि की चित्राकृतियों और रसरंजन से उज्बक की तरह गुज़रकर जब वह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर से सरस्वती कुंज के लिए रैपिडो बुक करने लगा, नहीं हुई।  

• दिल्ली अंतवंचित भटकावों का नगर है... कोई गूगल-मैप तुम्हें यहाँ बचा नहीं सकता।   

• दिल्ली में एक बार भटक जाने वाला बार-बार भटकता ही जाता है। वह भी यहाँ भटकते-भटकते न जाने कैसे गूगल-मैपानुसार नेहरू प्लेस जा निकला! वह हताशा से बैठ चुका था। ‘संसार’ की पहली रात भारतीय समयानुसार साढ़े दस बजा रही थी। इतने में ही एक व्यक्ति उसके पास आया जो उसे और उसकी हताशा दोनों को ही नहीं जानता था। उनके बीच से एक-दो ज़रूरी-ग़ैरज़रूरी वाक्य अशोक वाजपेयी और संजीव कु. चौबे की तरह गुज़रे। वे दोनों अंतरराष्ट्रीय कविता को नहीं जानते थे, इन दोनों को जानते थे। इस बहाने अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह को जानते थे। वे दोनों साथ-साथ चलने लगे। वे दोनों साथ-साथ चलने को नहीं जानते थे, बस में चढ़ने को जानते थे। उस व्यक्ति ने उसे बस में चढ़ते हुए पीछे से अप्राकृतिक ढंग से स्पर्श किया। उसे कुछ महसूस नहीं हुआ। वह बेहद निर्लिप्त-सा, ख़ुद में खोया और रोया हुआ-सा लग रहा था। उसके आस-पास असंख्य महत्त्वाकांक्षाएँ थीं और बेशुमार ख़ुश आँखें, ख़ुश होंठ, ख़ुश वक्ष थे। उसे देखना रात में छुई-मुई को देखना था। सब तरफ़ होली की प्रतीक्षा थी। उसके रंग नष्ट हो चुके थे। क़ुतुब मीनार, लाडो सराय, मालवीय नगर, प्रेस एन्क्लेव, हौज़ रानी, खिड़की गाँव, चिराग़ दिल्ली, मस्जिद मोठ, पम्पोश एन्क्लेव से नेहरू प्लेस आकर तारीख़ की आख़िरी 534 अपने टर्मिनल आनंद विहार की तरफ़ भागती चली जा रही थी—कालकाजी मंदिर, मोदी मिल, सुखदेव विहार, होली फ़ैमिली, भारत नगर, न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी, तैमूर नगर, महारानी बाग़, गुरुद्वारा बाला साहिब, सराय काले ख़ाँ, निज़ामुद्दीन पुल, नोएडा मोड़, अक्षरधाम, समसपुर जागीर, मदर डेयरी क्रॉसिंग, धर्मा अपार्टमेंट, मंगलम, प्रेस अपार्टमेंट, सरस्वती कुंज...

• दिल्ली की व्यस्ततम जगहों पर गन्ने का रस पीते, पपीते के टुकड़े और उबले चने खाते हुए उसने सोचा मेरे जन सुखी, सुंदर व शोषण-मुक्त कब होंगे! 

‘संसार’ की दूसरी सुबह दिल्ली के प्रत्येक मोड़ पर बिक रहे रसों-पपीतों-चनों की तरह नक़ली थी। वह वहाँ से थोड़ी-थोड़ी देर में फ़ेसबुक-लाइव करता रहा। वह वहाँ से थोड़ी-थोड़ी देर में फ़ेसबुक-पोस्ट करता रहा। वह वहाँ से थोड़ी-थोड़ी देर में फ़ेसबुक-सीन करता रहा—चार घंटे में छह लाइक। वह वहाँ से थोड़ी-थोड़ी देर में सातवाँ लाइक करता रहा। वह वहाँ से थोड़ी-थोड़ी देर में ख़ुद के ही अँगूठे से ख़ुद को पसंद करता रहा। इस बार उसका उत्साह इतना प्रबल था कि वह लोधी गार्डन में भी रज़ा-‘संसार’ का पट्टा डालकर घूमता रहा!

• हिंदी में विदेशियों के प्रति एक विशिष्ट आकर्षण है। उनका होना ही उनका श्रेष्ठ होना है। जबकि हमारी महानताएँ ज़िंदा रहते ही नहीं; मरकर भी कैसे-कैसे स्कैनर्स से गुज़रती रहती हैं, डंडे-झंडेबाज़ उन्हें सब जगहों पर सब तरफ़ आजीवन रोकते रहते हैं। लेकिन विदेशियों के प्रति हिंदी जाति के रक्त में एक अप्रश्नेय और निर्विवाद स्वीकार्य-भाव है। विदेशी उँगलियों या श्रीमुख से उद्धृत होकर लद्धड़ से लद्धड़ पंक्तियाँ भी महाकाव्य हो उठती हैं। वे हिंदीवाले जिन्हें ‘संसार’ की कोई भी भाषा ठीक से नहीं आती, हिंदी भी नहीं, वे भी सीरिया या स्लोवीनिया से आए कवि की पंक्तियों का आसमान से उतरीं आयतों की तरह आस्वादन करते हैं।

• ‘संसार’ की तीसरी और अंतिम शाम तक आते-आते वह अँधेरे में काफ़ी जल चुकी मोमबत्ती की तरह हो चुका था। उसने अपनी बची-नुची रौशनी के साथ एक पृष्ठ-संचालक से पूछा कि क्या तुम भी अविनाश मिश्र के साथ हो? पृष्ठ-संचालक ने कहा कि कविताएँ सुनना आपका काम है, लेकिन आपको कविताएँ सुनने से रोकना अविनाश मिश्र का काम नहीं है।  

• दिल्ली छोड़ने से कुछ घंटे पहले उसे याद आया कि उसके ‘संसार’ की थैली कहीं छूट गई है। एक टूटी टाँग, एक फूटी आँख, एक झूठी अक़्ल, एक जूठी जिह्वा, एक समुचित व्यवस्था, एक परिचित सिहरन, एक द्वितीयक नागरिकता, एक तिर्यक इच्छा, एक चतुर्दिक विवशता से हुई मुलाक़ात कहीं छूट गई है। एक आयोजक, एक उसका भाई, एक उसका प्रबंधक, एक उसका भाई, एक उसे भाई बोलने वाली कहीं छूट गई है। अब उसके पास हैं केवल डेढ़ हज़ार रुपये! वह कहाँ जाए! यहाँ सारी जगहों का अपना अतीत है और वर्तमान... 

अजमेरी गेट, पंचकुइयाँ रोड, सदर बाज़ार, पहाड़ी धीरज, करोल बाग़, अजमल ख़ाँ रोड, गफ़्फ़ार मार्केट, बापा नगर, आनंद पर्वत, सराय रोहिल्ला, गुलाबी बाग़, इंद्रलोक, शास्त्री नगर, जेजे कॉलोनी, पीतमपुरा, पीरागढ़ी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी, नांगलोई, सावदा घेवरा, बवाना, वज़ीराबाद, सोनिया विहार, उस्मानपुर, भजनपुरा, सीमापुरी, झील, खुरेजी, गीता कॉलोनी, गांधी नगर, राजघाट, मोरी गेट, सिविल लाइंस, राजपुर रोड, विधानसभा, रोशनआरा रोड, घंटाघर, शक्ति नगर, कमला नगर, आज़ाद मार्केट, पुल बंगश, मलका गंज, कमला नगर, मुखर्जी नगर, आज़ादपुर, सफ़दरजंग, एम्स, मोती बाग़, चाणक्यपुरी, ओख़ला, सरिता विहार, तिगड़ी, संगम विहार, ख़ानपुर, बदरपुर, जनकपुरी, उत्तम नगर, नजफ़गढ़... 

वह और जानना चाहता था तुम्हें—तुम्हारे नाम और रूप से आगे—तुम्हारी उदासी तक, लेकिन उसके शब्द उसकी आकांक्षा में निहित अर्थों को निरर्थकता तक घसीटकर ले गए! यूँ वह भाषा के विभ्राट से गुज़रा—कभी पैर-पैर, कभी चलती बसों और ट्रेनों के पाएदानों पर खड़ा—तुम्हारे विषय में सोचते हुए... दिल्ली! 

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रविवासरीय : 4.0 का प्रारंभ यहाँ पढ़िए : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’

 

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