माया पर उद्धरण
‘ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या’—भारतीय
दर्शन में संसार को मिथ्या या माया के रूप में देखा गया है। भक्ति में इसी भावना का प्रसार ‘कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम’ के रूप में हुआ है। माया को अविद्या कहा गया है जो ब्रह्म और जीव को एकमेव नहीं होने देती। माया का सामान्य अर्थ धन-दौलत, भ्रम या इंद्रजाल है। इस चयन में माया और भ्रम के विभिन्न पाठ और प्रसंग देती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।
स्वर्ग-नरक तथा आकाश के परे, राज करने वाले शासकों से संबद्ध अनेक कथाओं अथवा अंधविश्वासों के द्वारा मनुष्य को भुलावे में डालकर, उसे आत्मसमर्पण के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाता है। इन सब अंधविश्वासों से दूर रहकर, तत्वज्ञानी वासना के त्याग द्वारा जान-बूझकर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।
आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।
जब मनुष्य संसार की समस्त वासनाओं में; यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी क्षण भर के लिए यह भाव स्फुरित होता है कि यह संसार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है।
‘कर्तव्य’ में मैं विश्वासी नहीं हूँ, कर्तव्य तो संसारियों के लिए एक अभिशाप है—संन्यासियों का कोई कर्तव्य नहीं है।
जिसे हम साधारणतः जीवन कहते हैं, वह तो असल जीवन की भ्रूण-अवस्था मात्र है।
जिस प्रकार इन्द्रियों का प्राकृतिक बोध—ज्ञान नहीं—बल्कि एक भ्रान्त प्रतीति है—उसी प्रकार इंद्रियों द्वारा अनुभूत प्रत्येक आनन्द वास्तविक और सच्चा आनन्द नहीं है।
जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत्; सूक्ष्म जगत् की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र हैं।
संसार में बहुत अधिक समय तक लिप्त रहने से दुर्बुद्धि का होना स्वाभाविक है।
अपने ही मन को फँसानेवाले रंगीन कुहरीले सपनों या भावों या विचारों की महान परंपरा पहले भी थी और आज भी है; किंतु अपना ही मन सोद्देश्य रूप से फँस जाता है और वे भी सोद्देश्य रूप से फँसा लेते हैं—मानो दोनों, फँसने-फँसाने के लिए तैयार बैठे हों।
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हर वस्तु माया और सत्य के द्वित्व से पूर्ण है।
दुनिया एक रहस्यमय और उलझन भरी जगह है। अगर तुम उलझन में नहीं पड़ना चाहते, तो तुम बस किसी और के दिमाग़ की नक़्ल बन जाते हो।
हमारा अतीत एक व्याख्या है, और हमारा भविष्य एक भ्रम है।
प्रभु ने कहीं पुरुष बना दिए तो कहीं नारियाँ—ये सारे भी छल रूप हैं, जो इस पति-पत्नी वाले संबंध के छल से भ्रमित होकर नष्ट हो रहें।
हे मन! मायाजाल में मत फँसो, काल अब ग्रसना ही चाहता है।
यथार्थ और भ्रम के अपने-अपने आकर्षण हैं। यथार्थ को जानते हुए भ्रम में रहना एक तीसरा रास्ता है, और उसके आकर्षण कम नहीं।
जिन्हें शरीर होने पर भी, शरीर-रहित दशा वर्तती है, उन ज्ञानी के चरणों में अगणित बार वंदन हो।
जिन्होंने अपने अंतर में सांसरिक मोह को त्याग दिया है, वे सतिगुरु से मिलकर मुक्त हो गए।
जो अमृत रूपी मदिरा का व्यापारी होता है, वह तुच्छ सांसारिक मद से क्यों प्रेम करे?
ये सारा जगत है तो छल, पर यही छल सभी जीवों को प्यारा लग रहा है, शहद की तरह मीठा लग रहा है, इस तरह यह छल सारे जीवों को डुबो रहा है।
जब सारा जगत झूठन समान अथवा स्वप्न समान जानने में आए, तब ज्ञानीपना प्रगट हुआ—ऐसा कहा जाता है। इनके अतिरिक्त सभी को कहने मात्र का ज्ञान है।
जितना भी मोह, प्रेम एवं स्वाद है—ये सभी हमारे मन को लगे हुए कालिख के केवल दाग़ ही हैं।
इस जगत में कहीं इन राजाओं के शामियाने व महल हैं, ये भी छल रूप हैं और इनमें रहने वाला राजा भी छल ही है।
माया से द्वैत भाव; जगत् के चित्त में आकर बस जाता है। काम, क्रोध, अहंकार से होता है विनाश।
सभी वहम ख़ूबसूरत नहीं होते।