सच पर उद्धरण

मेरा डर मेरा सच एक आश्चर्य है।

रघुवीर सहाय

स्वप्नद्रष्टा या निर्माता वही हो सकता है, जिसकी अंतर्दृष्टि यथार्थ के अंतस्तल को भेदकर उसके पार पहुँच गई हो, जो उसे सत्य समझकर केवल एक परिवर्तनशील अथवा विकासशील स्थिति भर मानता हो।

सुमित्रानंदन पंत

जो लोग कविता से निरी कलात्मकता की अपेक्षा करते हैं, वे कविता के वस्तु-सत्य को गौण रखना चाहते हैं।

ऋतुराज

हम इनसान हैं, मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे।

मंगलेश डबराल

सचाई कहाँ है—मैं आज तक नहीं समझ पाया।

धर्मवीर भारती

प्रमाद में मनुष्य कठोर सत्य का भी अनुभव नहीं कर सकता।

जयशंकर प्रसाद

समस्त सत्य केवल मात्र मानवीय सत्य है, उसके बाहर या ऊपर किसी भी सत्य की कल्पना संभव नहीं है।

सुमित्रानंदन पंत

मूर्खता सरलता का सत्यरूप है।

जयशंकर प्रसाद

मानव-एकता के सत्य को हम मनुष्य के भीतर से ही प्रतिष्ठित कर सकते हैं, क्योंकि एकता का सिद्धांत अंतर्जीवन या अंतश्चेतना का सत्य है।

सुमित्रानंदन पंत

मैं ऐसे छोटे-छोटे झूठ बोलता हूँ जिनसे दूसरों को कोई नुक़सान नहीं होता। लेकिन उनसे मेरा नुक़सान ज़रूर होता है।

मंगलेश डबराल

झूठ से सच्चाई और गहरी हो जाती है—अधिक महत्त्वपूर्ण और प्राणवान।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सत्य इतना विराट है कि हम क्षुद्र जीव व्यवहारिक रूप से उसे संपूर्ण ग्रहण करने में प्रायः असमर्थ प्रमाणित होते हैं।

जयशंकर प्रसाद