आवाज़ पर उद्धरण
वाणी, ध्वनि, बोल, पुकार,
आह्वान, प्रतिरोध, अभिव्यक्ति, माँग, शोर... अपने तमाम आशयों में आवाज़ उस मूल तत्त्व की ओर ले जाती है जो कविता की ज़मीन है और उसका उत्स भी।

दूसरों की राय और उन आवाज़ों की परवाह न करें। अपने लिए धरती पर सबसे कठिन काम करें। अपने लिए काम करें। सच्चाई का सामना करें।

अगर तुम्हारे भीतर से एक आवाज़ आती है कि तुम चित्र नहीं बना सकते, तब किसी भी तरह से तुम्हें चित्र बनाने चाहिए; और फिर वह आवाज़ शांत हो जाएगी।

मुझसे पहले की पीढ़ी में जो अक़्लमंद थे, वे गूँगे थे। जो वाचाल थे, वे अक़्लमंद नहीं थे।


एक कीड़ा होता है—अँखफोड़वा, जो केवल उड़ते वक़्त बोलता है—भनु-भनु-भन्! क्या कारण है कि वह बैठकर नहीं बोल पाता? सूक्ष्म पर्यवेक्षण से ज्ञात होगा कि यह आवाज़ उड़ने में चलते हुए उसके पंखों की है।

कोयल के कूकने और गेट के भीतर अख़बार के गिरने की आवाज़ एक साथ आए तो सबसे पहले क्या—कान या आँख?

यदि आपका कोई नैतिक संदेश है तो कविता में उसे अंतर्निहित होना चाहिए, मुखर नहीं।

वह इस डर से बोलता रहता है कि चुप हुआ तो फिर शायद उसे भी यह याद न आए कि कभी उसके पास भी एक आवाज़ हुआ करती थी।