बॉम्बे जयश्री की संगीत यात्रा
राकेश कुमार मिश्र
08 मार्च 2026
मनुष्य होने के नाते हमारी स्मृतियाँ ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। इन्हीं स्मृतियों के सहारे हम अपने अतीत को अर्थ देते हैं, वर्तमान को समझते हैं और भविष्य की दिशा तय करते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस विश्वास के साथ जीवन में आगे बढ़े, तो स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न मन से टकराता है—आख़िर स्मृतियों के स्तर पर कोई इंसान कितना संपन्न हो सकता है? संगीत कलानिधि सम्मान (2023) से अलंकृत कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की विख्यात गायिका बॉम्बे जयश्री का The Museum of Performing Arts (MOPA) Foundation (Chennai) को दिया गया साक्षात्कार इसी प्रश्न का एक सजीव और मार्मिक उत्तर प्रस्तुत करता है। उस बातचीत को देखते हुए, ऐसा लगता है मानो स्मृतियों की अथाह गहराइयों में उतरने का दुर्लभ अवसर मिल गया हो—जहाँ अनुभव, अभ्यास, संघर्ष और प्रेम एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।
इस साक्षात्कार में बॉम्बे जयश्री जिस आत्मीयता से अपनी माँ और अपने उस्तादों को स्मरण करती हैं, वह केवल स्मृति का नहीं, बल्कि कृतज्ञता का सार्वजनिक उद्धघोष है। अपने गुरुओं को याद करते हुए उनके शब्दों में न तो औपचारिकता है, न ही कोई प्रदर्शन—बल्कि एक शुद्ध, विनम्र और सजग भाव है, जो यह बताता है कि गुरु-शिष्य परंपरा उनके लिए केवल संगीत की शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार रही है। प्रत्येक गुरु के साथ जुड़ी स्मृति उनके मन में इतनी स्पष्ट और सजीव है कि सुनने वाला भी उस यात्रा का सहभागी बन जाता है।
ये स्मृतियाँ पानी की तरह स्वच्छ हैं—जिनमें कोई मैल नहीं, कोई दुराव नहीं। साथ ही वे बरगद की छाँव जैसी हैं—शांत, भरोसेमंद और सुकून देने वाली। इन स्मृतियों में तपस्या भी है, अनुशासन भी, और वह करुणा भी, जो केवल लंबे समय तक साधना करने से जन्म लेती है। बॉम्बे जयश्री का यह साक्षात्कार हमें यह समझने में मदद करता है कि स्मृतियों से संपन्न होना केवल अधिक यादें जमा कर लेना नहीं है, बल्कि उन्हें सहेज कर, कृतज्ञता और विनय के साथ जीना है।
बचपन, बॉम्बे और उस्तादों की हिदायतें
जयश्री रामनाथ—जिन्हें पेशेवर रूप से बॉम्बे जयश्री के नाम से जाना जाता है—एक भारतीय कर्नाटक शास्त्रीय गायिका, पार्श्वगायिका और संगीतकार हैं। उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, हिंदी और अँग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं की फ़िल्मों में गीत गाए हैं। संगीतकारों के एक परिवार में जन्मी जयश्री अपने परिवार की संगीत-परंपरा की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका जन्म ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में हुआ जहाँ संगीत केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक भाषा था। उनके संगीतकार माता-पिता ने घर के वातावरण को सुर, लय और अभ्यास से समृद्ध बना रखा था। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जयश्री ने संगीत को पहले सुना, फिर समझा और उसके बाद जिया।
जब जयश्री मात्र तीन वर्ष की थीं, तब उनके माता-पिता कलकत्ता से मुंबई आकर माटुंगा इलाक़े में बस गए। यह स्थान आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और संगीत-संवेदनशीलता के निर्माण में विशेष भूमिका निभाता है। दुर्भाग्यवश, जब जयश्री केवल छह वर्ष की थीं, उनके पिता एन. एन. सुब्रमणियम का देहांत हो गया। यह परिवार के लिए गहरा आघात था, लेकिन इसी क्षण से उनकी माँ सीतालक्ष्मी सुब्रमणियम का संघर्ष और संकल्प और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आता है। पति के निधन के बाद सीतालक्ष्मी सुब्रमणियम ने न केवल परिवार को संभाला, बल्कि अपनी बेटी को संगीत की शुरुआती शिक्षा भी स्वयं दी। जयश्री और उनके दो भाइयों के भरण-पोषण और शिक्षा के लिए उनकी माँ ने माटुंगा की एक छोटी-सी चॉल में आस-पास की महिलाओं को संगीत सिखाना शुरू किया। वह स्थान केवल जीविका का साधन नहीं था, बल्कि संगीत की एक जीवंत पाठशाला था—जहाँ सीखना और सिखाना, दोनों साथ-साथ चलते थे। उसी सीमित जगह में जयश्री ने रियाज़ का अनुशासन, साधना का धैर्य और संगीत के प्रति आदर सीखा।
इस तरह बॉम्बे जयश्री का बचपन कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास [क्रमश: आज के कोलकाता, मुंबई और चेन्नई] जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहरों में बीता। हर शहर ने उन्हें अलग-अलग ढंग से गढ़ा—कलकत्ता ने विविधता का संस्कार दिया, बॉम्बे ने खुलापन और आधुनिकता सिखाई और मद्रास ने शास्त्रीय परंपरा की जड़ों से जोड़ा। बॉम्बे के माटुंगा इलाक़े में 1980 के शुरुआती दशक का वह समय भी उल्लेखनीय है, जब वहाँ की इमारतों के नाम अलग-अलग रागों पर रखे जाते थे। यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण था, जिसमें जयश्री का किशोर और युवा मन आकार ले रहा था।
किसी भी कलाकार के निर्माण में माता-पिता की भूमिका निर्णायक होती है, और जयश्री के जीवन में उनकी माँ की भूमिका असाधारण रही। उन्होंने समय के श्रेष्ठ गुरुओं तक अपनी बेटी की पहुँच सुनिश्चित की। हर गुरु ने जयश्री के संगीत व्यक्तित्व को अलग-अलग स्तरों पर समृद्ध किया—किसी ने तकनीकी स्पष्टता दी, किसी ने भावनात्मक गहराई, तो किसी ने मंचीय अनुशासन और आत्मविश्वास।
जयश्री के सभी उस्ताद अपने-अपने ढंग से अद्वितीय थे, और उन्होंने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर प्रत्येक गुरु को उनकी समग्रता में याद किया है। उनकी स्मृतियों में गुरु केवल शिक्षक नहीं, बल्कि दिशा देने वाले, साधना के सहयात्री और जीवन-मूल्यों के वाहक के रूप में उपस्थित हैं। यही कारण है कि बॉम्बे जयश्री का संगीत केवल अभ्यास का परिणाम नहीं, बल्कि स्मृतियों, संस्कारों और कृतज्ञता से निर्मित एक सतत साधना का रूप है।
गुरुओं का आत्मीय स्मरण
टी. आर. बालामणी : भीड़ में संगीत साधना
बॉम्बे जयश्री की पहली औपचारिक गुरु टी. आर. बालामणी [1936-2014] थीं, जो बॉम्बे (मुंबई) के माटुंगा इलाक़े में रहती थीं। अस्सी के दशक का माटुंगा एक अत्यंत भीड़भाड़ वाला, निरंतर चहल-पहल से भरा इलाक़ा था। उसी शोर और संकरेपन के बीच, एक बेहद छोटे-से कमरे में बालामणी का संगीत-संसार सिमटा हुआ था—पर उसी सीमित जगह में अनुशासन, साधना और गंभीर प्रशिक्षण की एक पूरी परंपरा जीवित थी। उनके विद्यार्थी उन्हें स्नेह से ‘टीचर’ कहकर पुकारते थे और इस संबोधन में ही उनके व्यक्तित्व का सार छिपा था। टीचर बालामणी में एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण मौजूद थे—कठोर अनुशासन, स्पष्ट अपेक्षाएँ और विद्यार्थियों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता। वे केवल गाना सिखाने तक सीमित नहीं थीं; उनका ज़ोर संगीत की बुनियादी समझ पर था। इसी कारण वह अपने शिष्यों से नियमित रूप से म्यूज़िक नोटेशन लिखवाती थीं। लिखित अभ्यास को वह संगीत-शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा मानती थीं। यदि कोई विद्यार्थी लिखने में ज़रा-सा भी आलस्य दिखाता, तो टीचर बालामणी उसे तुरंत टोकतीं—बिना संकोच और बिना नरमी के। उनके लिए स्पष्टता और अनुशासन, प्रतिभा से भी अधिक महत्त्वपूर्ण थे।
टीचर बालामणी अपने शिष्यों को बॉम्बे में होने वाली अनेक संगीत प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करती थीं। यह तैयारी केवल मंच पर गाने तक सीमित नहीं रहती थी; इसमें रियाज़, प्रस्तुति की मर्यादा और आत्मविश्वास—सब कुछ शामिल होता था। इन प्रतियोगिताओं में उनके विद्यार्थी लगातार पुरस्कार जीतकर लौटते थे, जो उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
मद्रास जाने से पहले बॉम्बे में रहते हुए बॉम्बे जयश्री ने लगभग बारह वर्षों तक बालामणी से संगीत सीखा। यह लंबा समय केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि एक गहरे गुरु-शिष्य संबंध का समय था—जहाँ सीखना धीरे-धीरे साधना में बदलता गया। बालामणी के शिष्यों में आगे चलकर प्रसिद्ध गायक और संगीतकार शंकर महादेवन जैसे नाम भी शामिल हुए, जो यह दर्शाता है कि उनकी कक्षा एक अर्थ में भविष्य के संगीतकारों की कार्यशाला थी।
बॉम्बे जयश्री की स्मृतियों में टीचर बालामणी केवल पहली गुरु नहीं, बल्कि संगीत के अनुशासन, गंभीरता और ईमानदारी की पहली पहचान हैं। उनके साथ बिताए वे वर्ष जयश्री के संगीत जीवन की आधारशिला बन गए—ऐसी नींव, जिस पर आगे चलकर एक समृद्ध और परिपक्व कला-यात्रा खड़ी हुई।
लालगुड़ी जयरमण : गुरु, दृष्टि और संगीत से परे की संवेदना
बॉम्बे जयश्री की संगीत-यात्रा में लालगुड़ी जयरमण [1930- 2013] का स्थान अत्यंत विशिष्ट और निर्णायक है। जयश्री उनसे पहली बार एक संगीत सभा में मिली थीं। मंच पर उनकी प्रस्तुति देखते ही उनके मन में यह तीव्र इच्छा जागी कि वह इस महान् संगीत साधक से अवश्य मिलें। यह उनकी संगीत-यात्रा का पहला अवसर था, जब उन्होंने अपनी माँ से आग्रह—बल्कि एक तरह का दबाव—किया कि वह लालगुड़ी जयरमण से बात करें और उनसे निवेदन करें कि क्या वह उन्हें संगीत सिखाने के लिए तैयार होंगे।
संयोग यह था कि लालगुड़ी जयरमण जयश्री के परिवार से पहले से परिचित थे। शायद इसी परिचय और उससे भी अधिक जयश्री की लगन को पहचानते हुए, उन्होंने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस स्वीकृति के साथ ही जयश्री के जीवन में संगीत-शिक्षा का एक नया और गहरा अध्याय आरंभ हुआ।
लालगुड़ी जयरमण के घर पर संगीत की शिक्षा प्रातः ठीक सात बजे शुरू हो जाती थी। यह वह समय होता था, जब घर में उनकी माँ की पूजा चल रही होती थी। पूजा के साथ-साथ श्रुति बॉक्स की स्थिर ध्वनि वातावरण को भर देती थी। इसी सात्विक और पवित्र परिवेश में गुरु लालगुड़ी जयरमण गाना शुरू करते। यह केवल रियाज़ नहीं होता था, बल्कि संगीत के माध्यम से एक प्रकार की साधना—जहाँ स्वर, लय और मौन सब एक-दूसरे में घुल जाते थे।
इसी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में जयश्री को कई बार ऐसा अनुभव होता कि उनके गुरु गाते-गाते अचानक अदृश्य हो गए हैं। मानो देह वहीं है, पर चेतना पूरी तरह संगीत में विलीन हो चुकी है। यदि गुरु भैरवी गा रहे होते, तो जयश्री को लगता कि कमरे में रखी हर वस्तु—दीवारें, फ़र्श, छत—सब भैरवी गाने लगी हैं। यह अनुभव उनकी संगीत-यात्रा के सबसे गहरे और अविस्मरणीय क्षणों में से एक रहा, जिसे वह विशेष रूप से रेखांकित करती हैं।
लालगुड़ी जयरमण अपने समय के उन विरले संगीत साधकों में थे, जिन्होंने हर प्रकार के संगीत को खुले मन से स्वीकार किया। उनके लिए संगीत की कोई संकीर्ण परिभाषा नहीं थी। चाहे ग़ज़ल हो, फ़िल्म संगीत हो या भजन—वह हर विधा पर सहजता और उत्साह के साथ बात करते थे। उनके भीतर का कलाकार किसी एक परंपरा में बंद नहीं था, बल्कि वह हर सच्ची कलात्मक अभिव्यक्ति को पहचानने और सराहने में सक्षम था।
जयश्री ने उनसे जुड़ा एक अत्यंत रोचक और अर्थपूर्ण प्रसंग साझा किया है। एक बार शाम को अपने रियाज़ के लिए जब वह गुरु के घर पहुँचीं, तो देखा कि लालगुड़ी जयरमण पूरी तन्मयता के साथ टीवी देख रहे हैं। वह इतने डूबे हुए थे कि पीछे से आती जयश्री को केवल इशारे से बैठने को कहा और उनसे भी टीवी देखने को कहा। टीवी पर माइकल जैक्सन का नृत्य चल रहा था। जयश्री का ध्यान टीवी स्क्रीन से अधिक अपने गुरु के चेहरे पर था। उनके चेहरे पर किसी बच्चे जैसा उत्साह और विस्मय था। उसी आवेग में, लगभग आनंद से भरकर, उन्होंने कहा— “यह आदमी ख़ुद अपने आप में नृत्य में बदल गया है। यह आदमी लय बन गया है।”
लालगुड़ी जयरमण का यह कथन केवल माइकल जैक्सन की प्रशंसा नहीं था; यह कला की गहरी समझ और खुलेपन का प्रमाण था। यह प्रसंग कला-आस्वादन (art appreciation) के बारे में सोचने के कई रास्ते खोलता है। यदि एक क्षण के लिए हम भूल जाएँ कि लालगुड़ी जयरमण एक महान् शास्त्रीय संगीतकार थे, तो जो बात सबसे प्रमुख होकर सामने आती है, वह है उनका नज़रिया और उनका उत्साह—जो केवल कलाकार होने के लिए ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मनुष्य होने के लिए भी अनिवार्य है।
इसी दृष्टि और अनुभव की पृष्ठभूमि में, हाल के वर्षों में कर्नाटक शास्त्रीय संगीतकार, एक्टिविस्ट और लेखक टी. एम. कृष्णा द्वारा कर्नाटक संगीत की पारंपरिक शिक्षण-परंपरा पर उठाए गए सवालों को भी एक व्यापक संदर्भ मिलता है। जयश्री ने स्वयं अपनी संगीत-यात्रा में, विशेषकर गुरु की भूमिका में उतरने के बाद, ऐसे कई प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया। उन्होंने अपने शिक्षण में कुछ मूलभूत परिवर्तन और प्रयोग किए—ताकि परंपरा जीवित रहे, जड़ न बने; और संगीत एक बंद संरचना नहीं, बल्कि निरंतर संवाद की प्रक्रिया बना रहे।
इस तरह लालगुड़ी जयरमण केवल जयश्री के गुरु नहीं रहे, बल्कि उन्होंने उन्हें यह सिखाया कि संगीत कैसे जिया जाता है—खुले मन, गहरी तन्मयता और अनंत जिज्ञासा के साथ।
‘लाइफ़ ऑफ़ पाई’, माइकल डैना का फ़ोन और वे सात दिन
बॉम्बे जयश्री द्वारा फ़िल्म ‘Life of Pi’ (2012) के लिए गाई गई तमिल लोरी को सुनना, मानो ममत्व के अथाह सागर में डूब जाना है। जिस तरह आकारहीनता और रंगहीनता जल को ‘जल’ बनाती है, उसी तरह लोरियाँ स्त्री को ‘माँ’ होने का अनुभव देती हैं। वे केवल ध्वनियाँ नहीं होतीं—वे स्पर्श हैं, आश्वासन हैं और जीवन के आरंभिक क्षणों में सुरक्षा का पहला वादा हैं।
भारत भाषाओं का अजायबघर है। लेकिन भाषा-जगत में भारत के प्रति जो विस्मय है, उसका कारण केवल भाषाओं की संख्या नहीं, बल्कि वे लोकगीत हैं जिनमें इन भाषाओं की असली सुगंध बसती है। और इन लोकगीतों की आत्मा हैं—अनाम भारतीय माताओं द्वारा गाई जाने वाली लोरियाँ। देश की अनगिनत भाषाओं में गूँजती ये लोरियाँ मात्र गीत नहीं, बल्कि अपनी संतान के लिए किसी साधारण भारतीय माँ की आत्मा की पुकार हैं—निश्छल, निरपेक्ष और संपूर्ण।
2012 में ‘लाइफ़ ऑफ़ पाई’ के रिलीज़ से पहले फ़िल्म के संगीत निर्देशक माइकल डैना का जयश्री के पास फ़ोन आया। पहली बातचीत में उन्होंने बताया कि वे यान मार्टेल की किताब ‘Life of Pi’ भेज रहे हैं और चाहते हैं कि फ़िल्म के लिए जयश्री की आवाज़ में तमिल भाषा की एक लोरी रिकॉर्ड की जाए। फ़िल्म की पृष्ठभूमि पुदुच्चेरी (पोंडीचेरी) में स्थित थी—ऐसे में तमिल लोरी उस भूगोल और सांस्कृतिक संदर्भ को और गहराई देती है।
फ़िल्म को ध्यान से देखें तो यह लोरी ‘पाई’ को उसकी माँ से जोड़ने वाली एक अदृश्य डोर की तरह काम करती है। यह लोरी पाई को माँ की ओर से मिला सबसे सुंदर और सबसे स्थायी उपहार बन जाती है—एक ऐसा उपहार, जो संकट और अकेलेपन के क्षणों में भी उसके साथ रहता है। इस लोरी के शब्द भी बॉम्बे जयश्री ने स्वयं लिखे थे, जिससे यह रचना और अधिक आत्मीय हो उठी।
रिकॉर्डिंग शुरू होते ही जयश्री की असली परीक्षा शुरू हुई। वह हर दिन अपना 100 प्रतिशत दे रही थीं। माइकल डैना को उनका समर्पण और साधना पसंद भी आ रही थी, लेकिन फिर भी कुछ था—जो अभी अधूरा था। छठे दिन, जब जयश्री गा रही थीं, माइकल ने उन्हें रोका और कहा—लोरी गाते समय यह याद रखना कि बच्चा केवल सो नहीं रहा है, बल्कि उस ध्वनि के भीतर अपने लिए एक गहरी सुरक्षा का भाव भी महसूस कर रहा है। यह टिप्पणी निर्णायक साबित हुई। सातवें दिन जब जयश्री रिकॉर्डिंग के लिए आईं और उन्होंने लोरी गाई, तो माइकल डैना को वह अंतर साफ़ महसूस हुआ—स्वर में अब केवल मधुरता नहीं, बल्कि संरक्षण और सुकून का भाव भी उतर आया था। उसी दिन इस लोरी की रिकॉर्डिंग पूरी हुई—और वही संस्करण दुनिया ने सुना।
बॉम्बे जयश्री की संगीत-यात्रा को देखते हुए यह कहना पर्याप्त नहीं लगता कि ‘लाइफ़ ऑफ़ पाई’ के लिए उन्हें ऑस्कर नामांकन मिला। इसी तरह यह कहना भी सतही लगता है कि 2021 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि पिछले लगभग तीन दशकों में उन्होंने अनगिनत शिष्यों को संगीत की शिक्षा दी है—और यह यात्रा आज भी निरंतर जारी है। उनके शिष्यों में उनके प्रतिभावान गायक पुत्र अमृत रामनाथ के अलावा विजयश्री विट्टल और कीर्तन वैद्यनाथन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
एक विशिष्ट उद्देश्य के तहत, वह ‘हितम ट्रस्ट’ के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित बच्चों को संगीत-शिक्षा प्रदान कर रही हैं। इन प्रयासों में दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाक़ों के बच्चों को केंद्र में रखा गया है। पाठ्यक्रम निर्माण, बच्चों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन और नई संगीत प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना—ये सभी पहल इस व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं।
यदि संगीत साधना है, तो बॉम्बे जयश्री ने उस साधना को जीते हुए उसे कई नए अर्थ दिए हैं—संवेदना, ज़िम्मेदारी और साझा भविष्य के अर्थ। उनकी आगे की संगीत-यात्रा के लिए अथाह शुभकामनाएँ।
बॉम्बे जयश्री का The Museum of Performing Arts (MOPA) Foundation (Chennai) को दिया गया साक्षात्कार इस लिंक पर देखा/सुना जा सकता है : Notes to Myself l Episode 3 l Season 1 l Bombay Jayashri l MOPA
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