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विद्रोह पर उद्धरण

विद्रोह की अपनी एक जनपक्षधरता

भी होती है। इस आशय में कविता विद्रोह का संकल्प लेती भी रही है और लोगों को इसके लिए जागरूक भी करती रही है। यहाँ प्रस्तुत है—विद्रोह विषयक कविताओं से एक विशेष चयन।

कुछ उद्देश्य है कि लोग परिवर्तनकामी हों, वे सड़ी-गली व्यवस्था से विद्रोह करें। शोषक-वर्ग, सामान्य जन का बेखटके शोषण करता रहे। यह एक देशव्यापी षडयंत्र है—जिसमें राजनीतिज्ञ, सरमायेदार, बुद्धिजीवी आदि शामिल हैं।

हरिशंकर परसाई

हर नवीन अनुसंधान करनेवाला विद्रोही होता है, वह प्रकृति से विद्रोह करता है। प्रकृति हर चीज़ को ज़मीन की ओर खींचती है।

हरिशंकर परसाई

मीरा का विद्रोह एक विकल्पविहीन व्यवस्था में, अपनी स्वतंत्रता के लिए विकल्प की खोज का संघर्ष है।

मैनेजर पांडेय

यदि कहीं पाप, अन्याय है; अत्याचार है, तो उनका फल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना लोकरक्षा का कार्य है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

जब हम विद्रोह करते हैं तो यह किसी विशेष संस्कृति के ख़िलाफ़ नहीं होता है। हम सिर्फ़ इसलिए विद्रोह करते हैं, क्योंकि कई कारणों से, हम अब साँस नहीं ले सकते।

फ्रांत्ज़ फ़ैनन

परंपरा और विद्रोह, जीवन में दोनों का स्थान है। परंपरा घेरा डालकर पानी को गहरा बनाती है। विद्रोह घेरों को तोड़कर पानी को चोड़ाई में ले जाता है। परंपरा रोकती है, विद्रोह आगे बढ़ना चाहता है। इस संघर्ष के बाद जो प्रगति होती है, वही समाज की असली प्रगति है।

रामधारी सिंह दिनकर

प्रेम स्वभाव से ही सत्ता विरोधी और स्वतंत्र होता है।

मैनेजर पांडेय

हर बड़ा सिस्टम अपने दुश्मनों के आकार को घटाकर, आंतरिक आलोचक बना लेता है और उन्हें अपनी अंत:वृत्त में रखकर निर्णय करता है और विरोधों, उनके प्रतिरोध में से कुछ को सामान्य, तार्किक और न्यायोचित तथा कुछ को असामान्य, पागलपन और अवैध क़रार देता है।

आशीष नंदी

महापुरुष मूल रूप से विद्रोही होता है, विद्रोही हुए बिना वह महान् हो ही नहीं सकता। भीतर विद्रोह की यह ज्वाला जितनी बलवती होगी, उतना ही महान् उसका जीवन होगा।

हरिशंकर परसाई

मीरा का विद्रोह अंधे के हाथ लगा बटेर नहीं है।

मैनेजर पांडेय

मुझे नहीं लगता कि हमारे देश में किसी के पास विरोध की बात करने की हिम्मत है।

ऋत्विक घटक

सांस्कृतिक विद्रोह की परिघटना; जो परिचालक होकर लाक्षणिक होती है, सर्वाधिक दिखाई पड़ती है।

एरिक हॉब्सबॉम

जब हमारे साथी हमारा प्रतिरोध करते हैं; तो ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि हमारी टाइमिंग या नीति ग़लत थी।

जॉन ग्रे

चुनौती है—व्यवस्था के आभूषण नहीं बनने का, असहमत रहने का।

आशीष नंदी

असहमति का स्वर कभी भी पारदर्शी नहीं होने चाहिए।

आशीष नंदी

प्रकृति, आदर्श, जीवन-मूल्य, परंपरा, संस्कार, चमत्कार—इत्यादि से मुझे कोई मोह नहीं है।

राजकमल चौधरी

भक्ति आंदोलन मुख्यतः धार्मिक आंदोलन ज़रूर था, लेकिन यह भी सच है कि वह लोकोन्मुख आंदोलन था। सभी भक्तकवियों में जो बात समान मिलेगी—वह है लोकोत्तर, असामान्य को सामान्य धरातल पर लाकर प्रतिष्ठित करना।

विश्वनाथ त्रिपाठी

अर्थहीन अकारण विप्लव की चेष्टा में रक्तपात होता है, और कोई फल प्राप्त नहीं होता। विप्लव की सृष्टि मनुष्य के मन में होती है, केवल रक्तपात में नहीं। इसी से धैर्य रखकर उसकी प्रतीक्षा करनी होती है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

मीरा का विद्रोह कबीर के विद्रोह की तरह ही साधन है, साध्य नहीं।

विश्वनाथ त्रिपाठी

यदि क्रांति सफल हो पाए तो इतिहासकार उसे 'विप्लव' और 'विद्रोह' के संबोधन प्रदान कर देता है। वस्तुतः सफल विद्रोह ही क्रांति कहलाता है।

विनायक दामोदर सावरकर

झुकने वाला व्यक्ति तड़प सकता है और विद्रोह कर सकता है, पश्चात्ताप तो निर्बल व्यक्ति करते हैं।

लॉर्ड बायरन

विद्रोह की भावना भक्ति कविता का सार था।

गणेश देवी

आत्म-पूर्ति के लिए विद्रोह आवश्यक है। जब एक बच्चा जन्म लेता है, तो उसकी चीख ही उस बंधन के विरुद्ध विद्रोह होती है, जिसमें वह जकड़ा हुआ होता है।

सुभाष चंद्र बोस

जो लोग यह समझते हैं कि संसार में और सब कामों के लिए तैयारी की आवश्यकता होती है, केवल विप्लव ही ऐसा काम है जिसमें तैयारी का कोई आवश्यकता नहीं होती—उसे प्रारंभ कर देने से ही काम चल जाता है, वे चाहे और जितना कुछ जानें विप्लव तत्त्व के विषय में कुछ नहीं जानते।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

जहाँ बहुत सारी ग़ुलामी होती है, वहाँ आज़ाद रचनात्मक विचारों के लिए जगह नहीं होती और केवल विनाश के विचार और प्रतिशोध के फूल वहाँ खिल सकते हैं।

मैक्सिम गोर्की

किसी वस्तु के अंश ही जब समग्र की तुलना में बड़े हो उठते हैं, तब उसे असंयम कहा जाता है। इसी को कहते हैं, 'एक के विरुद्ध अनेक का विद्रोह।'

रवींद्रनाथ टैगोर

हमारे प्रत्येक आचरण, कर्म या विचार केवल वृत्त का निर्माण ही करते हैं।

श्रीनरेश मेहता

सच्चे विद्रोही, सच्चे प्रेमियों की तरह दुर्लभ होते हैं और दोनों ही मामलों में—बुख़ार को जुनून समझ लेने की ग़लती व्यक्ति के जीवन को नष्ट कर सकती है।

जेम्स बाल्डविन