शरीर एक बदलता हुआ प्रवाह है और मन भी। उन्हें जो किनारे समझ लेते है, वे डूब जाते है।
तीन रात तक संयम धारण करने के बाद; पति को एकांत स्थान केलिगृह में पत्नी के पास जाकर, मीठी-मीठी मनोरञ्जक बातें और स्पर्श आदि मृदु उपचारों से नवविवाहिता वधू में विश्वास पैदा करने और उसकी लज्जा दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। उस समय संयत भाव से कोमलता एवं मधुरता का व्यवहार करने की आवश्यकता होती है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने से कटुता बढ़ती है और दाम्पत्य जीवन दुःखमय बन जाता है। इसलिए पत्नी की इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिए।
हमारे भीतर बुद्धिमानी का ज़्यादातर हिस्सा तीस साल पार करने के बाद आता है। उसके बाद हम अपने तौर-तरीक़ों में ढलते जाते हैं और बुद्धिमान होने के साथ-साथ, प्रतिक्रियावादी होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
जो नायक नवविवाहिता कन्या को अत्यंत लज्जावती समझकर उसकी उपेक्षा करता है, स्त्रियों के अभिप्राय को न समझने वाला वह पुरुष—पशुओं के समान तिरस्कृत होता है।
हर अच्छी कविता की तरह सूर की कविता भी, श्रद्धा से अधिक समझ की माँग करती है।
मेरे विचार से जिस आदमी में थोड़ा-सा भी विवेक होता है, वह हमेशा अपनी परिस्थितियों को तर्कसंगत ढंग से समझना चाहता है।
जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।
यदि किसी उत्तम काव्य या चित्र की विशेषता न समझने के कारण; हम कवि या चित्रकार पर श्रद्धा न कर सके, तो यह हमारा अनाड़ीपन है—हमारे रुचि-संस्कार की त्रुटि है।
जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।
यदि आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा नहीं; तो विज्ञान द्वारा ही सही, मनुष्य को यह दार्शनिक सत्य समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत् नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उसका ताना-बाना भी केवल भ्रम है, माया है।
मनुष्य जितना समझता है, उससे कहीं अधिक जानता है।
पुरुष स्वतंत्र होने के अधिकार के लिए तर्क देते हैं, जबकि महिलाएँ नाराज़ होने के अधिकार के लिए तर्क देती हैं। पुरुष कभी-कभी दूरी चाहते हैं, जबकि महिलाएँ चाहती हैं कि उन्हें समझा जाए।
हर नवीन अनुसंधान करनेवाला विद्रोही होता है, वह प्रकृति से विद्रोह करता है। प्रकृति हर चीज़ को ज़मीन की ओर खींचती है।
महिला को याद रखना चाहिए कि पुरुष जब छोटी-छोटी चीज़ें करना भूल जाता है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह उससे प्यार नहीं करता।
इसमें क्या ग़लत है कि अगर दुनिया में कोई आदमी ऐसा हो जिसे आपको समझने की कोशिश करना अच्छा लगता है?
समझ और प्रेम अलग-अलग चीजों से बने होते हैं। समझदारी लोगों को गांठों में बांध देती है और इसमें कोई ख़तरा नहीं लेता है, लेकिन प्यार में कई उलझनें हैं और इसमें हर तरह के ख़तरे हैं।
अगर आप पुरुष हैं, तो मेरा सुझाव है कि अगले सप्ताह जब भी कोई महिला बोले, तो आप सुनने का अभ्यास करें। वह किस स्थिति से गुज़र रही है, उसे सम्मानपूर्वक समझने के एकमात्र इरादे के साथ सुनें। जब भी आपके मन में समाधान सुझाने या उसके अहसास को बदलने की इच्छा जाग्रत हो, तो दाँतों तले जीभ दबा लें। ऐसा करने पर वह आपकी इतनी क़द्र करेगी कि आप हैरान रह जाएँगे।
चरित्र को जल्दी भाँप लेने की क्षमता—जिस क्षेत्र में स्त्रियाँ प्रामाणिक तौर पर पुरुषों से आगे हैं—उन्हें स्वाभाविक रूप से सत्ता की योग्य अधिकारिणी बना देता है।
उधार या भाड़े पर लिया गया कोई भी ऐसा व्यक्ति; जो तुम्हारे वर्ग का नहीं है, वह लेशमात्र भी तुम्हारे हितों को नहीं साध सकता।
संबंधों में महिलाओं की सबसे बड़ी शिकायत यह रहती है—"मुझे यह महसूस ही नहीं होता कि सामने वाले ने मेरी पूरी बात सुनी है।"
सहमति या असहमति की बात केवल तब उठती है, जब आप चीज़ों को समझते हैं। अन्यथा यह एक अंधी असहमति होती है, जो किसी भी सवाल को लेकर एक सुसंस्कृत तरीक़ा नहीं हो सकता।
-
संबंधित विषय : जवाहरलाल नेहरू
स्त्री को कौन समझ सकता है।
गृहस्थी चलाने के लिए समझदारी की नोक तोड़ देनी चाहिए। आख़िरकार यह मान कर चलना चाहिए कि इस ज़माने में संबंध सिर्फ़ वे ही निभा सकते हैं, जो मूर्ख हैं।
जो प्राकृतिक दृश्यों को केवल कामोद्दीन की सामग्री समझते हैं, उनकी रुचि भ्रष्ट हो गई है और संस्कारसापेक्ष है।
जब महिला का मूड अचानक बदलता है, तो पुरुष को लगता है कि इसके लिए उसका व्यवहार ही ज़िम्मेदार है। यह बहुत स्वाभाविक है, क्योंकि जब वह ख़ुश होती है, तो वह इसका श्रेय लेता है और जब वह दु:खी होती है, तो वह इसके लिए भी ज़िम्मेदार महसूस करता है। इससे वह बहुत कुँठा महसूस कर सकता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि इस परिस्थिति को सही कैसे करे। एक मिनट तो वह ख़ुश नज़र आती है, इसलिए पुरुष को यह यक़ीन होता है कि वह उसे संतुष्ट कर रहा है, लेकिन अगले ही मिनट वह दु:खी हो जाती है। यह देखकर पुरुष को सदमा लगता है, क्योंकि वह तो यह सोच रहा था कि वह उसे संतुष्टि और ख़ुश करने में कामयाब हो रहा था।
अशिक्षा या अज्ञान में ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वह किसी मनुष्य को, मानवीयता की सौतेली संतान के नाम से संबोधित करे।
कोई-कोई पुरुष समझता है कि वह स्त्रियों को बहुत अच्छी तरह से जानता है, क्योंकि वह उनमें से बहुतों के साथ प्रेम-संबंध बना चुका है।
प्राचीन ग्रंथों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि शब्द और यथार्थ के तात्कालिक संबंध को ऐतिहासिक दृष्टि से समझा जाए।
सच, कर्म और चरित्र को क्रांति के बाद की चीज़ नहीं समझना चाहिए। इन्हें तो क्रांति के साथ-साथ चलना चाहिए।
क्रूर और नीच मनुष्य यदि कभी आकर नम्रता प्रकट करे तो उसे बहुत डर की बात समझना चाहिए।
यह बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि सिर्फ़ वही दो व्यक्ति एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह से जान सकते हैं, जो अंतरंग तो हों ही, साथ ही बराबर भी हों।
तत्त्वज्ञ पुरुष को चाहिए कि वह अपमान को अमृत के समान समझकर उससे संतुष्ट हो और विद्वान मनुष्य सम्मान को विष के तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे।
मेरी डाक में आने वाले खतों में कुछ खत तो गालियों से ही भरे होते हैं। उन गालियों का तो मेरे ऊपर कोई असर नहीं होता, क्योंकि मैं इन गालियों को ही स्तुति समझता हूँ, परंतु वे लोग गालियाँ इसलिए नहीं देते कि मैं उनको स्तुति समझता हूँ बल्कि इसलिए कि मैं जैसा उनकी निगाह में होना चाहिए वैसा नहीं हूँ। एक वक़्त वह था जब वे मेरी स्तुति भी करते था। इसलिए गालियाँ देना या स्तुति करना तो दुनिया का एक खेल हूँ।
शिक्षक सब कुछ जानता है और छात्र कुछ भी नहीं जानते।
एक व्यक्ति जो दूसरों के विचार या राय को नहीं समझ सकता है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उसका दिमाग़ और संस्कृति सीमित है।
नायक द्वारा नायिका की प्रकृति के अनुकूल, देशाचार के अनुकूल तथा नायिका की अभिरुचि से पशु-पक्षियों के भावों के अनुसार, रतिक्रीड़ा का प्रयोग किए जाने पर—नायक के प्रति नायिका का स्नेह, अनुराग और सम्मान बढ़ता है।
लेखक को समझना, अपने पालतू कुत्ते को समझने के मुक़ाबले ज़्यादा महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य है।
जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों, योग्यताओं की सफलता पर विचार करता है, उसी प्रकार सरलता से वश में होने वाली स्त्रियों की प्रकृति को भी समझना चाहिए।
सत्य के थोड़े से हिस्से को ही समझना और ज़िंदगी में उसे अमल में लाना, कुछ न समझने और अस्तित्व के रहस्य को खोज पाने की बेकार कोशिश में, इधर-उधर भटकने के मुक़ाबले में बेहतर है।
-
संबंधित विषय : जवाहरलाल नेहरूऔर 2 अन्य
स्वभावतः सूक्ष्म होने के कारण, अत्यंत लोभ के कारण, स्वभाव से अज्ञानी होने के कारण—स्त्रियों की काम-भावना को समझना बड़ा कठिन है।
बिना विचारे अतिशीघ्रता से काम करने का फल, मरणपर्यंत हृदय को जलाता है और कंटक के समान खटकता है।
जीवन एक ऐसी अनूठी पुस्तक है, जो अंत तक मनुष्य का साथ देती है, परंतु इसके कठिन पृष्ठों को समझने के लिए बुद्धि की आवश्यकता है।
आतंक के आलावा सामूहिक निर्णय का बल और उसके आगे झुकने की विवशता भी बच्चों के समझ के बाहर की चीज़ है।
भास, कालिदास आदि के पालन करने वाले भास्कर कोश-गृहों को समझने में कठिन वेद रूपी पर्वत से निकलकर बहनेवाली निर्मल नदियों, उन्नत उपनिषद देवताओं के मंदिरों, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष वाले पौधों के खेतों, यशस्वी आर्यों के जयस्तम्भ श्रेष्ठ पुराणो! तुम्हें मेरा प्रणाम!
पति को जो वास्तव में धर्म समझकर, परलोक की वस्तु समझकर ग्रहण कर सकी है, उसके पैरों की बेड़ी चाहे तोड़ दी और चाहे बंधी रहने दी, उसके सतीत्व की परीक्षा अपने-आप हो ही गई, समझ लो।
संबंधों में सफल होने के लिए हमें प्रेम के विभिन्न मौसमों को समझना और स्वीकार करना होगा।
स्वभाव, रुचि, अभ्यास, संगति, संप्रदाय और विवेक बुद्धि के न्यूनाधिक विकास के अनुसार सबको सब चीज़ें एक सी हृदयंगम नहीं होतीं।
जिस गाँव में गुण-अवगुण को सुनने व समझने वाला कोई नहीं है और जहाँ अराजकता फैली हुई है, हे राजिया! वहाँ रहना कठिन है।
संगति और सामंजस्य ऐसी चीज़ नहीं हैं जो सतत कायम रह सके।
कई बार समय समझदारी पैदा करता है।
संबंधित विषय
- अनुभव
- आकांक्षा
- आँख
- आज़ादी
- आधुनिकता
- आलोचना
- उदारता
- एहसास
- कुत्ते
- कर्म
- क्रूर
- क्रांति
- कविता
- कामकला
- गाली
- गाँव
- चेतना
- ज्ञान
- जवाहरलाल नेहरू
- जिज्ञासा
- जीवन
- डर
- डाक
- तर्क-वितर्क
- देह
- धर्म
- नायिका
- पत्र
- पति
- प्रकृति
- प्रेम
- प्रशंसा
- पुरुष
- पुरुष
- बचपन
- बुद्धिजीवी
- भक्ति काव्य
- मनुष्य
- मनुष्यता
- यथार्थ
- वेद
- व्यक्ति
- व्यवहार
- विचार
- विडंबना
- विद्रोह
- विवाह
- विश्लेषण
- शब्द
- शिक्षक
- सेक्स
- सच
- स्त्री
- स्त्रीवाद
- संबंध
- समझना
- समय
- समस्या
- समाज
- संवेदनशीलता
- संवेदना
- सवाल
- सहारा
- साहित्य