Font by Mehr Nastaliq Web

चेतना पर उद्धरण

ऐतिहासिक अनुभूति के द्वारा मनुष्य के अपने आयाम असीम हो जाते हैं—उसका दिक् और काल उन्नत हो जाता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

जहाँ कोई क़ानून नहीं होता, वहाँ अंतःकरण होता है।

पब्लिलियस साइरस

अंतःकरण आत्मा की आवाज़ है, मनोवेग शरीर की आवाज़ हैं।

रूसो

अंतःकरण हम सबको कायर बना देता है।

विलियम शेक्सपियर

मनुष्य का अंतःकरण देववाणी है।

लॉर्ड बायरन

मनुष्य की आत्मा ही राजनीति है, अर्थशास्त्र है, शिक्षा है और विज्ञान है, इसलिए अंतरात्मा को सुसंस्कृत बनाना ही सबसे अधिक आवश्यक है। यदि हम अंतरात्मा को सुशिक्षित बना लें तो राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा और विज्ञान के प्रश्न स्वयं ही हल हो जाएँगे।

जूली कागावा

अंतःकरण प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र का सार है।

सैमुअल स्माइल्स

हमारे हिंदू गुणों-अवगुणों को नई दिशा में कौन मोड़ेगा? हमारी एक बाँह को लकवा मार गया है और दूसरी बाँह में रक्त बह रहा है। क्या ऐसा कोई उपाय है, जिसके द्वारा हमारी बेकार बाँह भी रक्तप्रवाह के नियम सीख सके?

राजेंद्र माथुर

ख़ुशी का अनुभव करते हुए हमें उसके प्रति चेतन होने में कठिनाई होती है। जब ख़ुशी गुज़र जाती है और हम पीछे मुड़कर उसे देखते और अचानक से महसूस करते हैं—कभी-कभार आश्चर्य के साथ—कितने ख़ुश थे हम।

निकोस कज़ानज़ाकिस

शरीर एक बदलता हुआ प्रवाह है और मन भी। उन्हें जो किनारे समझ लेते है, वे डूब जाते है।

ओशो

सत्पुरुषों की महानता उनके अंतःकरण में होती है, कि लोगों की प्रशंसा में।

थॉमस ए केम्पिस

जहाँ अंतःकरण का राज्य प्रारंभ होता है, वहाँ मेरा राज्य समाप्त हो जाता है।

नेपोलियन बोनापार्ट

स्वतंत्रता से भी अधिक शक्तिशाली एक और शब्द है—'अंतःकरण'।

सैमुअल स्माइल्स

अंतःकरण का दंश मनुष्यों को दंशन सिखाता है।

फ़्रेडरिक नीत्शे

अंतःकरण तो कायरों द्वारा प्रयुक्त शब्दमात्र है, सर्व-प्रथम इसकी रचना शक्तिशालियों को भयभीत रखने के लिए हुई थी।

विलियम शेक्सपियर

राष्ट्र को छोड़िए, लेकिन अवचेतन को समाप्त करके कोई व्यक्ति तक होश, समझदारी और पहचान नहीं पा सकता।

राजेंद्र माथुर

उस मनुष्य का किसी बात में विश्वास करो जो हर बात में अंतःकरण वाला नहीं है।

लॉरेंस स्टर्न

आत्मा के लिए अच्छा अंतःकरण वैसा ही है जैसा शरीर के लिए स्वास्थ्य।

थॉमस एडिसन

जीवित मनुष्य के लिए दुष्ट अंतःकरण की यंत्रणा तो नरक है।

जॉन केल्विन

अपने वक्षस्थल में स्वर्गीय अग्नि की उस चिंगारी को सजीव रखने का प्रयत्न करो जिसे अंतःकरण कहते हैं।

जॉर्ज वॉशिंगटन

क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा अंतःकरण तुम्हारे अंदर विराजमान अन्य लोग हैं, अन्य कुछ नहीं ?

लुइजी पिरांडेलो

मानवीय शरीर की भाँति संस्कृति का शरीर भी जड़ और चेतन के संयोग से निर्मित होता है।

वासुदेवशरण अग्रवाल

चेतना और रूचि का फलक बड़ा होना ही चाहिए।

कृष्ण बिहारी मिश्र

मनुष्य हर विवेक से ऊपर है—एक चेतना, जो प्रकृति का नहीं बल्कि इतिहास का उत्पाद है।

अंतोनियो ग्राम्शी

परंपरा को जड़ और विकास को गतिमान मानना, हमारी विचार प्रक्रिया में रूढ़ हो गया है।

श्यामाचरण दुबे

अच्छा अंतःकरण सर्वोत्तम ईश्वर है।

थॉमस फ़ुलर

शरीर तट है, मन है। उन दोनों के पीछे जो चैतन्य है, साक्षी है, द्रष्टा है, वह अपरिवर्तित नित्य बोध मात्र ही वास्तविक तट है। जो अपनी नौका की उस तट से बाँधते है, वे अमृत को उपलब्ध होते है।

ओशो

प्रेम और जो कुछ उससे उत्पन्न होता है, क्रांति और जो कुछ वह रचती है और स्वतंत्रता और जो कुछ उससे पैदा होता है, ये परमात्मा के तीन रूप हैं और परमात्मा सीमित और चेतन संसार का अनंत मन है।

ख़लील जिब्रान

कवि को अपने कार्य में अंतःकरण की तीन वृत्तियों से काम लेना पड़ता है—कल्पना, वासना और बुद्धि। इनमें से बुद्धि का स्थान बहुत गौण है। कल्पना और वासनात्मक अनुभूति ही प्रधान है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

उपवास करने से चित्त अंतर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है।

काका कालेलकर

धर्म का विनाश संभव है, लेकिन मनुष्य जाति की पुराण-चेतना का विनाश आज तक संभव नहीं हुआ।

राजेंद्र माथुर

हमारा काम तभी अंतरात्मा से प्रेरित हो सकता है जब अपने-आप में वह स्वच्छ हो, उसका हेतु स्वच्छ हो और उसका परिणाम भी स्वच्छ हो।

महात्मा गांधी

पशुबल अस्थाई है और अध्यात्मबल या आत्मबल या चैतन्यवाद एक शाश्वत बल है।

महात्मा गांधी

ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

ओशो

समाज में गीत-वाद्य, नाट्य- नृत्य का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, ये बड़ी मनोहर और उपयोगी कलाएँ हैं। पर हैं तभी, जब इन के साथ संस्कृति का निवास-स्थान पवित्र संस्कृत अंतःकरण हो। केवल 'कला' तो 'काल' बन जाती है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार

वह सबको शरण देने वाला है, दाता और सहायक है। अपराधों को क्षमा करने वाला है, जीविका देने वाला है और चित्त को प्रसन्न करने वाला है।

गुरु गोविंद सिंह

आत्म-चेतना को विकास के प्रश्न की दृष्टि से देखा जाए, तो यह कहना होगा कि शमशेर आत्मपरक साहित्य की यूरोपीय परंपरा से काफ़ी प्रभावित हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध

हम ध्यान द्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मन से परमात्मा के स्वरूप का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु वाणी द्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते, क्योंकि मन के द्वारा ही मानसिक विषय का ग्रहण हो सकता है और ज्ञान के द्वारा ही ज्ञेय को जाना जा सकता है।

वेदव्यास

जगत और जीवन के प्रति सचेत और जागरूक होकर, वैविध्यपूर्ण महान् गुणों से युक्त; जन-साधारण के जीवन से जो व्यक्ति सचेत है—वही सच्चा आत्म-चेतस् है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रगतिशीलता से मेरा तात्पर्य परिवेश के प्रति उस सचेतनता से है कि जो सचेतनता उसे वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध ले जाती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

मनुष्य की अचेतन क्रिया की यंत्रवत कारीगरी और यांत्रिक साधन ही आगे चलकर स्वतंत्र कलाओं में परिणत होते गए।

विजयदान देथा

बालकों मूर्खों की तो गिनती क्या, महान लोगों की भी चित्तवृत्ति सदा एकाग्र नहीं रहती।

कल्हण

जिसकी चेतना बंदी होती है, विश्व के साथ यथार्थ साहित्य-लाभ में उसकी दुर्बलता, उसकी कल्पनादृष्टि का अंधापन, उसकी बाधा बन जाती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

मेरे सामने जब कोई असत्य बोलता है तब मुझे उस पर क्रोध होने के बजाए स्वयं अपने ही ऊपर अधिक कोप होता हैं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि अभी मेरे अंदर-तह में-असत्य का वास है।

महात्मा गांधी

जिस प्रकार स्वयं मनुष्य की देह और उसकी चेतना को टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता, उसी प्रकार मनुष्य से सम्बन्धी विज्ञान कलाओं को भी परस्पर विच्छिन्न नहीं किया जा सकता।

विजयदान देथा

विश्वजगत में मनुष्य का जो इंद्रिय-बोधगम्य था, उसे ही समस्त देशों के, समस्त युगों के मनुष्यों की बुद्धि ने ज्ञान के योग से अपने विशेष अधिकार में ले लिया।

रवींद्रनाथ टैगोर

मनुष्य जब इतना सचेत और जागृत हो जाता है कि आविर्भाव की संपूर्णता को चाहने लगता है, तो फिर वह साधारण सुख को सुख नहीं कहता।

रवींद्रनाथ टैगोर

जीवन चाहे वह किसी व्यक्ति का हो, समूह का हो या फिर किसी राष्ट्र या समाज का हो—उसे आवश्यक रूप से गतिशील, परिवर्तनीय और सतत बढ़ते रहने वाले होना चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू

हिंदी एक भाषा के अलावा एक चेतना का भी नाम थी जिसका रिश्ता राष्ट्रवाद की उठान से बैठ गया था। कालांतर में रिश्ता एक फंदा बन गया।

कृष्ण कुमार

धन जोड़कर भक्ति का दिखावा करने से कोई लाभ नहीं क्योंकि ऐसा करने से मन में वासना और भी बढ़ती जाएगी। जिनका चित्त वासनाओं में फँसा हुआ है, उन्हें अंतरात्मा के दर्शन कैसे हो सकते हैं?

संत एकनाथ