धूल चाटने वाले लोग संगीतशास्त्र की रचना नहीं कर सकते, वे गणित के फेर में नहीं पड़ सकते और उन्हें दर्शनों की बात नहीं सूझ सकती।
धर्म, कर्म का स्वतंत्र पुरुषार्थ है तो नीति से भिन्न है—नीति उपाय-कौशल है, और कोई भी वस्तु, चाहे जड़ हो या चेतन, चाहे मनुष्य ही क्यों न हो, सभी उसके लिए उपाय बन सकते हैं। धर्म में पर को उपेय समझना चाहिए, उपाय नहीं।
हम केवल यही चाहते हैं कि अपनी दशा न भूलें, मृगतृष्णा हमें पथ से भ्रष्ट न करे और हममें न्याय और अन्याय; साधु और असाधु के अंतर का ज्ञान, इसलिए जाग्रत रहे कि हम धोखा खाकर जातीय चरित्र और उन्नति का नाश न करते रहें।
स्वतंत्रता से भी अधिक शक्तिशाली एक और शब्द है—'अंतःकरण'।
बालकों व मूर्खों की तो गिनती क्या, महान लोगों की भी चित्तवृत्ति सदा एकाग्र नहीं रहती।
जिसकी चेतना बंदी होती है, विश्व के साथ यथार्थ साहित्य-लाभ में उसकी दुर्बलता, उसकी कल्पनादृष्टि का अंधापन, उसकी बाधा बन जाती है।
कला जड़-चेतन के बीच भी एक पुल बनाती है, और जड़ को भी अपनी ओर से एक चेतना प्रदान करती है।
पशु अनैतिहासिक होते हैं, क्योंकि वे अपने लिए कोई निर्णय नहीं ले सकते; स्वयं को और अपनी गतिविधि को अपने चिंतन की वस्तु नहीं बना सकते; अपने लिए कोई उद्देश्य निर्धारित नहीं कर सकते; वे एक ऐसे विश्व में 'डूबे' रहते हैं, जिसे वे कोई अर्थ नहीं दे सकते; वे एक ऐसे सर्वाश्लेषी वर्तमान में रहते हैं, जिसमें कोई 'आज' या 'कल' नहीं होता।
मेरे सामने जब कोई असत्य बोलता है तब मुझे उस पर क्रोध होने के बजाए स्वयं अपने ही ऊपर अधिक कोप होता हैं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि अभी मेरे अंदर-तह में-असत्य का वास है।
योगी एक देह में क्रियाशील रहते हुए भी, अन्य किसी मृत देह में प्रवेश करके उसे गतिशील कर सकते हैं।
अंतःकरण का दंश मनुष्यों को दंशन सिखाता है।
प्रगतिशीलता से मेरा तात्पर्य परिवेश के प्रति उस सचेतनता से है कि जो सचेतनता उसे वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध ले जाती है।
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मनुष्य की अचेतन क्रिया की यंत्रवत कारीगरी और यांत्रिक साधन ही आगे चलकर स्वतंत्र कलाओं में परिणत होते गए।
आत्म-चेतना को विकास के प्रश्न की दृष्टि से देखा जाए, तो यह कहना होगा कि शमशेर आत्मपरक साहित्य की यूरोपीय परंपरा से काफ़ी प्रभावित हैं।
मौन कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसका आप अभ्यास कर सकते हैं या जिसकी आप साधना कर सकते हैं। जब आप जीवन के आरंभ को, इसके संपूर्ण ढाँचे को तथा जीने की प्रक्रिया को समझ जाते हैं तभी इस मौन का जन्म होता है।
उस मनुष्य का किसी बात में विश्वास न करो जो हर बात में अंतःकरण वाला नहीं है।
मनुज चेतना को किसका डर?
विधवा माता, चील से भी अधिक जागरूक होती है। प्रसंग आने पर वह हिंस्त्र भी बन सकती है।
जगत और जीवन के प्रति सचेत और जागरूक होकर, वैविध्यपूर्ण महान् गुणों से युक्त; जन-साधारण के जीवन से जो व्यक्ति सचेत है—वही सच्चा आत्म-चेतस् है।
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जहाँ कोई क़ानून नहीं होता, वहाँ अंतःकरण होता है।
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ईश-तादात्म्य की आरंभिक अवस्थाओं (सविकल्प समाधि) में साधक की चेतना परमतत्त्व में विलीन हो जाती है, उसकी प्राणशक्ति शरीर से खिंच जाती है और शरीर निश्चल और कड़ा या ‘मृत’ प्रतीत होता है।
हम ध्यान द्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मन से परमात्मा के स्वरूप का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु वाणी द्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते, क्योंकि मन के द्वारा ही मानसिक विषय का ग्रहण हो सकता है और ज्ञान के द्वारा ही ज्ञेय को जाना जा सकता है।
आज का कवि तब तक अपनी चेतना का संस्कार नहीं कर सकता, तब तक वह वस्तुतः आत्म-चेतस् हो ही नहीं सकता—जब तक वह विश्व-चेतस् न हो।
परंपरा के संबंध में सबसे बड़ी भ्रांति उसे जड़ और अपरिवर्तनशील मानना है।
जीवित मनुष्य के लिए दुष्ट अंतःकरण की यंत्रणा तो नरक है।
प्रेम का अभाव भी एक मात्रा में विद्वेष का ही एक रूप है, क्योंकि प्रेम चेतना का पूर्ण रूप है।
क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा अंतःकरण तुम्हारे अंदर विराजमान अन्य लोग हैं, अन्य कुछ नहीं ?
भय एकमात्र ‘चैतन्य’ का रखें, इस बात की चिंता रखें कि जो चौबीस घंटे निरंतर हमारी चौकसी करता है कहीं उसे ठेस नहीं पहुँचती।
दीपशिखा का प्रकाश उसी का मार्गदर्शक होगा, जिसके नेत्र खुले हों।
मानवीय शरीर की भाँति संस्कृति का शरीर भी जड़ और चेतन के संयोग से निर्मित होता है।
उपवास करने से चित्त अंतर्मुख होता है, दृष्टि निर्मल होती है और देह हलकी बनी रहती है।
राम और कृष्ण के मिथक संकल्प और संवेग के चैतन्य स्रोत हैं।
अपने वक्षस्थल में स्वर्गीय अग्नि की उस चिंगारी को सजीव रखने का प्रयत्न करो जिसे अंतःकरण कहते हैं।
अंतःकरण हम सबको कायर बना देता है।
बस आप जानिए कि असावधान हैं; इस तथ्य के प्रति चुनावरहित रूप से सजग रहिए कि आप असावधान हैं, और हैं तो क्या हुआ? यानी इसके लिए चिंता मत कीजिए एवं असावधानी की इस अवस्था में, असावधानी के इन क्षणों में, यदि आप कुछ कर बैठें–तो उस क्रिया के प्रति सजग रहिए।
अंतःकरण प्रत्येक व्यक्ति के चरित्र का सार है।
पशु-पक्षी का चैतन्य मुख्यतः अपनी जीविका में आबद्ध होता है। मनुष्य का चैतन्य विशेष मुक्ति का पथ तैयार करता है, विश्व में स्वयं को प्रसारित करता है—साहित्य उसी का एक विराट रास्ता है।
मनुष्य का अंतःकरण देववाणी है।
सत्पुरुषों की महानता उनके अंतःकरण में होती है, न कि लोगों की प्रशंसा में।
चेतना जब आत्मा में ही विश्रांति पा जाए, वही पूर्ण अहंभाव है।
जड़ से चेतन की उत्पत्ति होती हो और चेतन से जड़ की उत्पत्ति होती हो—ऐसा अनुभव कभी किसी को नहीं होता।
मानव-चेतना, वस्तुतः मानव-संबंधों से निर्मित तथा उससे उद्गत चेतना है।
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मनुष्य की आत्मा ही राजनीति है, अर्थशास्त्र है, शिक्षा है और विज्ञान है, इसलिए अंतरात्मा को सुसंस्कृत बनाना ही सबसे अधिक आवश्यक है। यदि हम अंतरात्मा को सुशिक्षित बना लें तो राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा और विज्ञान के प्रश्न स्वयं ही हल हो जाएँगे।
धर्म का विनाश संभव है, लेकिन मनुष्य जाति की पुराण-चेतना का विनाश आज तक संभव नहीं हुआ।
सांसारिक मोर्चे पर जब देश पराजित हो गया, तो उसके बुद्धिवादी लोग आध्यात्मिक बन गए और औसत लोग रूढ़िवादी हो गए। चोर का ख़तरा होने पर हमने अपने सांस्कृतिक दरवाज़े कसकर बंद कर दिए, बच्चों को बाहर झाँकने से मना किया और दम साधकर बैठ गए। इससे हमारी रक्षा तो हो गई। लेकिन हज़ार साल तक साँस रोके बैठने से हम बदल चुके हैं। हम वे नहीं हैं, जो हम खुले दरवाज़ों के ज़माने में थे। चोर चले गए, लेकिन हमारे दरवाज़े बंद हैं। रोशनी से हमारी आँखें चौंधियाती हैं और खुली हवा में हमें ज़ुकाम होता है।
व्यापक चेतना की प्राप्ति के लिए हमें अपने अंतर की चेतनता से, विश्व की असीम चेतना का समभाव स्थापित करना है।
समाज जड़ नहीं होता, गत्यात्मकता संस्कृति की प्रकृति में अंतर्निहित होती है।
मानव-हृदय पर संगीत का इतना प्रबल पड़ता है कि यह क्षण-भर में चित्त की एकाग्रता ला देता है।
सूरदास की सौंदर्य-चेतना और नैतिक चेतना में कोई अंतराल नहीं है। उनका काव्य, नैतिकता के उपदेश का काव्य नहीं है।
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