ऐतिहासिक अनुभूति के द्वारा मनुष्य के अपने आयाम असीम हो जाते हैं—उसका दिक् और काल उन्नत हो जाता है।
जैसे उपन्यास का सच संसार के सच से ज़्यादा सच्चा होता है, उसी तरह हमारा पुराण-सत्य, हमारा मिथक-सत्य—आपके इतिहास-सत्य से कहीं ज़्यादा ऊँचा है।
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महाभारत कोई धर्मग्रंथ नहीं है। वह इस ज़मीन के बाशिंदों के अनुभवों का निचोड़ है और होमर या शेक्सपीयर की तरह का सार्वकालिक और पंथ-निरपेक्ष है।
ऐतिहासिक-अनुभूति वह कीमिया है, जो मनुष्य का संबंध सूर्य के विस्फोटकारी केंद्र से स्थापित कर देती है।
किसी दूसरे देश की आत्मा को जानने का सबसे अच्छा तरीक़ा उसका साहित्य पढ़ना है।
समग्रता में भाषा, रूपक की सतत प्रक्रिया है। अर्थ-मीमांसा का इतिहास, संस्कृति के इतिहास का एक पहलू है। भाषा एक ही समय में एक जीवित वस्तु, जीवन और सभ्यताओं के जीवाश्मों का संग्रहालय है।
संसार में जितनी बड़ी-बड़ी जीतें हुई हैं, बड़े-बड़े आक्रमण हुए हैं, सबको महान बनाया है माताओं, बहिनों और पत्नियों के त्याग ने। किस युद्ध में कितने पुरुषों ने रक्त दिया—यह इतिहास में लिखा हुआ है, लेकिन उसके समीप में यह नहीं लिखा है कि कितनी स्त्रियों ने अपना सुहाग दान किया, कितनी माताओं ने कलेजा निकाल कर दिया, कितनी बहिनों ने सेवाएँ अर्पित की।
इतिहास ने जिन स्त्री-पुरुषों को मानवता की सेवा का अवसर देकर समादृत किया है, उनमें से अधिकांश को विपरीत परिस्थितियों का अनुभव हुआ है।
उपन्यास भावनाओं को साँचा देते हैं, समय का ऐसा अनुमान देते हैं जिसे औपचारिक इतिहास नहीं दे सकता।
शब्दों, लेखन और पुस्तकों के बिना न कोई इतिहास होगा और न ही मानवता की कोई अवधारणा होगी।
मनुष्य जब मनुष्यता और उसके ऐतिहासिक रूपों की अंतर्वस्तु को अलग करने की ग़लती नहीं करता, तो चिंतन और कर्म उसके लिए अवश्य करणीय हो जाते हैं।
उत्पीड़ितों के लिए निहायत ज़रूरी है कि वे अपनी मुक्ति की सभी अवस्थाओं में, स्वयं को पूर्णतर मनुष्य बनने के सत्तामूलक तथा ऐतिहासिक कार्य में संलग्न मनुष्यों के रूप में देखें।
मध्य-युग के जीवन की हल्की-सी समझ भी यह बताती है कि निर्बलों की पराधीनता को कितना प्राकृतिक समझा जाता था, और उनमें से किसी की समानता की इच्छा को कितना अप्राकृतिक।
अगर कोई हिंदू रियासत शक्तिशाली, न्यायपूर्ण और आर्थिक रूप से ठोस होती थी; अगर बिना दमनकारी नीतियों के क़ानून और व्यवस्था बरक़रार रहती थी और अगर कृषि-क्षेत्र प्रगति पर और आम लोग संपन्न होते थे—तो चार में से तीन संभावनाएँ थीं कि उस रियासत पर किसी स्त्री का शासन हो।
भक्ति आंदोलन के विकास में तीन मुख्य सहायक तत्त्व है : उस काल के सामाजिक जीवन के नए परिवर्तन, आचार्यों का दार्शनिक चिंतन और भक्त कवियों की सृजनशीलता।
हम सहज ही भूल जाते हैं कि जाति-निर्णय विज्ञान में होता है, जाति का विवरण इतिहास में होता है। साहित्य में जाति-विचार नहीं होता, वहाँ पर और सब-कुछ भूलकर व्यक्ति की प्रधानता स्वीकार कर लेनी होगी।
वामपंथी से संकीर्णतावादी बना व्यक्ति, द्वंद्वात्मक ढंग से यथार्थ और इतिहास की व्याख्या करने के प्रयास में पूरी तरह भटक जाता है, और पतित होकर सारतः भाग्यवादी दृष्टिकोण अपना लेता है।
हम इतिहास के बीचोबीच पैदा हुए हैं, यार! न लक्ष्य, न ठिकाना। कोई युद्ध नहीं हमारे सामने। न कोई मंदी। हमारे सारे युद्ध अंदरूनी हैं, आध्यात्मिक हैं। हमारे लिए महान मंदी हमारा जीवन ही है। हम सबके बचपन टेलीविज़न देखते गुज़रे हैं—इस यक़ीन के साथ कि एक रोज़ हम भी भी लखपति होंगे, सिने-स्टार होंगे, रॉकस्टार होंगे; लेकिन नहीं होंगे हम। और धीरे-धीरे खुल रही है यह बात हमारे सामने। और हम नाराज़ हैं इस पर, बेहद नाराज़ हैं।
आप यादों को छुपा सकते हैं, लेकिन आप उस इतिहास को मिटा नहीं सकते जिसने उन्हें पैदा किया था।
व्यक्ति इतिहास में फँसे हुए हैं और इतिहास व्यक्तियों में फँसा हुआ है।
आदमी अकेला भी बहुत कुछ कर सकता है। अकेले आदमियों ने ही आदि से विचारों में क्रांति पैदा की है। अकेले आदमियों के कृत्यों से सारा इतिहास भरा पड़ा है।
ईसा और बुद्ध के काम के तल को मैं कहीं गहरा मानता हूँ। इतिहास पर इसलिए उसका परिणाम भी गंभीर है। मार्क्स और लेनिन के काम और विचार का स्तर सामाजिक था और उसका तल उपयोगिता का है। मानव-जीवन के परिपूर्ण संस्कार का प्रश्न उसमें नहीं समा जाता है। समाज क्रांति के अभी ही नए-नए सूत्र निकलने लगे हैं और उनकी अपेक्षा में मार्क्सवाद पुराना पड़ता लगता है।
दुनिया के इतिहास का पूरा हिस्सा अक्सर मुझे कुछ नहीं लगता बल्कि एक चित्र पुस्तक जो मानवता की सबसे शक्तिशाली और बेतुकी इच्छा को दर्शाती है—भूलने की इच्छा।
विजयी नस्लें मानती रही हैं कि पराजितों पर राज करना उनका प्रकृति प्रदत्त अधिकार है, या यह कि निर्बल और शांत नस्लों को साहसी और पराक्रमी नस्लों के आगे झुकना ही चाहिए।
सारा इतिहास वर्तमान है, सभी अन्याय किसी न किसी स्तर पर, दुनिया में कहीं न कहीं जारी रहते हैं।
मनुष्य हर विवेक से ऊपर है—एक चेतना, जो प्रकृति का नहीं बल्कि इतिहास का उत्पाद है।
कबीरपंथ में कबीर के विचारों की दुर्गति के इतिहास से साबित होता है कि कोई क्रांतिकारी विचारधारा विरोधियों की आलोचनाओं से नहीं मरती, वह इतिहास-प्रक्रिया से बेख़बर अनुयायियों की अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्त्वाकांक्षा से मरती है।
इतिहास दिखाता है कि मनुष्य का स्वभाव बाहरी प्रभावों के कितने ज़्यादा नियंत्रण में है; और ठोस-से-ठोस समझा जाने वाला सामाजिक सत्य भी मौक़ा आने पर कैसे एक बिल्कुल दूसरा रंग अख़्तियार कर लेता है, पर इतिहास में भी यात्रा की तरह मनुष्य वही देखता है, जो वह देखना चाहता है। बहुत कम लोग इतिहास से सबक़ लेते हैं।
अमेरिकी इतिहास उससे कहीं अधिक लंबा, विशाल, विविध, सुंदर और भयानक है; जैसा कि लोगों ने इसके बारे में कभी कहा है।
यक़ीनन आधुनिक इतिहास में तो ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती, जिसकी अंग्रेज़ों के सत्ता छोड़ने के काम से तुलना की जा सके।
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इतिहास मानव-स्वभाव का एक क्रूर अनुभव पेश करता है।
विज्ञान का इतिहास भी भूलों से ख़ाली नहीं, किंतु विज्ञान को इन भूलों की कड़ियों से निर्मित नहीं मान सकते।
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दक्षिणपंथी संकीर्णतावादी के लिए अतीत से जुड़ा हुआ 'आज' एक प्रदत्त और अपरिवर्तनीय-सी चीज़ होता है, जबकि वामपंथी संकीर्णतावादी के लिए 'आने वाला कल' पहले से ही नियत होता है—अटल रूप से पूर्वनिर्धारित होता है। ऐसे दक्षिणपंथी और ऐसे वामपंथी, दोनों प्रतिक्रियावादी होते हैं; क्योंकि इतिहास की अपनी-अपनी मिथ्या दृष्टि से चल कर दोनों कर्म के ऐसे रूप विकसित करते हैं, जिससे स्वतंत्रता का निषेध होता है।
दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।
कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है।
हमारे इतिहास में—चाहे युद्धकाल रहा हो, या शांतिकाल—राजमहलों से लेकर खलिहानों तक गुटबंदी द्वारा ‘मैं’ को 'तू' और ‘तू' को 'मैं' बनाने की शानदार परंपरा रही है।
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प्राचीन काल में बहुत-सी चीज़ें अच्छी भी थीं और बुरी भी। उत्तम वस्तुओं की रक्षा करनी होगी, किंतु Ancient India (प्राचीन भारत) से Future India (भावी भारत) अधिक महत्त्वपूर्ण होगा।
पशु अनैतिहासिक होते हैं, क्योंकि वे अपने लिए कोई निर्णय नहीं ले सकते; स्वयं को और अपनी गतिविधि को अपने चिंतन की वस्तु नहीं बना सकते; अपने लिए कोई उद्देश्य निर्धारित नहीं कर सकते; वे एक ऐसे विश्व में 'डूबे' रहते हैं, जिसे वे कोई अर्थ नहीं दे सकते; वे एक ऐसे सर्वाश्लेषी वर्तमान में रहते हैं, जिसमें कोई 'आज' या 'कल' नहीं होता।
धर्म एक आंतरिक रूपांतरण है, एक आध्यात्मिक परिवर्तन है, हमारे अपने स्वभाव के विसंवादी स्वरों सामंजस्य लाने की क्रिया है—और उसका यह रूप इतिहास के आरंभ से ही मिलता आया है, यही उसका मूल स्वरूप है।
एक इतिहासकार का मापदंड घटनाप्रधान होता है, डॉक्टर का मापदंड शरीर प्रधान होता है, और जो रचनाकार होते हैं, उनका मापदंड अघटन-घटना-पदीयसी माया प्रधान होता है।
सबसे अधिक सुखी राष्ट्रों की तरह सबसे अधिक सुखी स्त्रियों का कोई इतिहास नहीं होता।
इतिहास की दुनिया में आदर्श नाम की कोई चीज नहीं होती, वहाँ केवल तथ्य होते हैं; सत्य नाम की कोई चीज नहीं होती, वहाँ केवल तथ्य होते हैं।
प्रत्येक देश और समाज के मुहावरे उसकी सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक-भौगोलिक, स्थिति की उपज हैं। पर अँग्रेज़ी की नक़ल में भी हमें इसका भी ध्यान नहीं रहता।
इतिहास का प्रयोजन वर्तमान समय और उसके अनुसार कर्तव्य को महत्त्व देना है।
इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। इतिहास मनुष्य का अपनी परंपरा में आत्म-विश्लेषण है।
मनुष्य का ज्ञान कितना कालसापेक्ष और स्थितिसापेक्ष है—यह चिंतन के इतिहास से जाना जा सकता है।
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प्रत्येक युग अपनी सामाजिक-ऐतिहासिक स्थिति की अनुभूत आवश्यकता के अनुसार, अपना साहित्य-निर्माण किया करता है।
अगर मेरे दिमाग़ में लिखे हुए इतिहास और कमोबेश जाने हुए वाक्यों के चित्र भरे हुए थे, तो मैंने अनुभव किया कि अनपढ़ किसान के दिमाग़ में भी एक चित्रशाला थी, हाँ! इसका आधार परंपरा, पुराण की कथाएँ और महाकाव्य के नायकों और नायिकाओं के चरित्र थे। इसमें इतिहास कम था, फिर भी चित्र काफ़ी सजीव थे।
हम जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक आवर्त में रह रहे हैं—उन सबका प्रभाव हमारे हृदय का संस्कार करता है।
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कल्पना सत्य की बड़ी बहन है। स्पष्टतः जब तक किसी ने कहानी नहीं कही थी तब तक संसार में कोई नहीं जानता था कि सत्य क्या है। अतः यह सबसे प्राचीन कला है, यह इतिहास की जननी है।
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