नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।
जहाँ कोई क़ानून नहीं होता, वहाँ अंतःकरण होता है।
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क्या निजी भाषा के नियम, नियमों की प्रतिच्छाया हैं?—जिस तुला पर प्रतिच्छाया को तोला जाता है, वह तुला की प्रतिच्छाया नहीं होती।
जब देश में कोई विशेष नियम प्रतिष्ठित होता है, तब वह एक ही दिन में नहीं, बल्कि बहुत धीरे-धीरे संपन्न हुआ करता है। उस समय वे लोग पिता नहीं होते, भाई नहीं होते, पति नहीं होते-होते हैं केवल पुरुष। जिन लोगों के संबंध में वे नियम बनाए जाते है, वे भी आत्मीया नहीं होती, बल्कि होती हैं केवल नारियाँ।
बुद्धि से धन प्राप्त होता है और मूर्खता दरिद्रता का कारण है—ऐसा कोई नियम नहीं है। संसार चक्र के वृत्तांत को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं, दूसरे लोग नहीं।
दुनिया के महानतम शिक्षकों ने हमें बताया है कि आकर्षण का नियम, दुनिया का सबसे शक्तिशाली नियम है।
लड़कियों को जानने की ज़रूरत है कि वे नियम तोड़ सकती हैं।
आकर्षण का नियम नैसर्गिक नियम है। यह निष्पक्ष है और अच्छी या बुरी चीज़ों में भेद नहीं करता है। यह आपके विचारों को आपके जीवन में साकार कर देता है।
आकर्षण का नियम सृजन का नियम है।
यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योगसाधना सिद्ध न होगी। यम और नियम में दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरंभ कर देते हैं।
साहित्य की वेगवती सरिता, नियमों की अवहेलना कर स्वछंदतापूर्वक बहने में ही प्रसन्न रहती है।
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सत्य होता है नियमस्वरूप। उसे मानने पर उसके सारे बंधनों को मानना पड़ता है।
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यह प्रकृति का राजनीतिक नियम है कि जो लोग किसी आदिम मूल सत्ता के अधीन होते हैं, वे शुरू में ख़ुद उस सत्ता का विरोध करने के बजाय, सिर्फ़ उसके क्रूरतम पहलुओं का विरोध करते हैं।
मनुष्य जब एक नियम तोड़ता है तो दूसरे अपने आप टूट जाते हैं।
जितने बँधे-बँधाए नियम और आचार हैं उनमें धर्म के अटता नहीं।
जैसे भौंरा धीरे-धीरे फूल एवं वृक्ष का रस लेता है, वृक्ष को काटता नहीं और जैसे मनुष्य बछड़े को कष्ट न देकर धीरे-धीरे गाय को दुहता है, उसके थनों को कुचल नहीं देता, उसी प्रकार राजा को कोमलता के साथ राष्ट्र रूपी गौ का दोहन करना चाहिए, उसे कुचलना नहीं चाहिए।
क़ानून निर्धन को पीसते हैं और धनवान क़ानून पर शासन करते हैं।
जब मैं विदेश में रहता हूँ, तो मेरा यह नियम है कि अपने देश की सरकार की आलोचना या उस पर प्रहार नहीं करता। जब मैं स्वदेश वापस आता हूँ तो खोए समय की कमी पूरी कर लेता हूँ।
युग-युग में नीति बदलती रहती है।
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नियम और नमूने प्रतिभा व कला का नाश करते हैं।
जन्म और मृत्यु का मामला एकदम प्रकृति का नियम है।
जो संपूर्ण प्राणियों के लिए हितकर और अपने लिए भी सुखद हो, उसे ईश्वरार्पण बुद्धि से करे, संपूर्ण सिद्धियों का यही मूल मंत्र है।
ईश्वर को नाम की ज़रूरत नहीं। वह और उसके, नियम दोनों एक ही हैं। इसलिए ईश्वरीय नियमों का पालन ही ईश्वर का जप है।
कल्पना विश्व पर शासन करती है।
युवक नियमों को जानता है परंतु वृद्ध मनुष्य अपवादों को जानता है।
अनुभव और इतिहास बताता है कि लोगों और सरकारों ने इतिहास से न कभी कुछ सीखा और न इतिहास से निकले नियमों के अनुसार कार्य किया।
कृतज्ञता हमसे वह सब कुछ करा लेती है, जो नियम की दृष्टि से त्याज्य है। यह वह चक्की है, जो हमारे सिद्धांतों और नियमों को पीस डालती है।
जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाए हैं। हमने इस खेल के नियम भी ख़ुद नहीं बनाए और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिए जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परंतु हम खेल को बढ़िया ढंग से या ख़राब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता हे कि कुशल खिलाड़ी के पास ख़राब पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल में जीत जाए। यह भी संभव है कि किसी ख़राब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतंत्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है।
आपको अपने नियमों और सिद्धांतों पर भरोसा करना चाहिए, लेकिन दूसरों के सिद्धांतों पर अपने सिद्धांतों को कभी नहीं थोपना चाहिए।
अगर वैर का बदला लेना मुनासिब हो तो वह हुकूमत ही के जरिए हो सकता है, हर एक आदमी के जरिए हरगिज़ नहीं।
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धर्म वह नहीं है, जिसे धर्म का नाम दे दिया जाता है। धर्म वह है, जो धर्म-प्रज्ञा की अभिव्यक्ति हो—इस प्रज्ञा को नियमों में बाँधा नहीं जा सकता।
पराधीन जातियों में मानसिक दासत्व क्रमशः बढ़कर इतना व्यापक हो जाता है कि शासित लोग, शासकों की नक़ल करने में ही अपने जीवन की कृतकृत्यता समझते हैं।
जीवन के नियम, मूल्य और आदर्श—जीवन सापेक्ष होते हैं और जीवन सामाजिक स्थितिसापेक्ष होता है।
लंबे वाक्य या छोटे वाक्य सिर्फ़ नियम हैं।
नीति उसी वक्त तक धर्म रह सकती है जब तक कि उसे चलाया जाए, उसके बाद नहीं।
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या एक अन्य क़ानून जो प्रदर्शित नहीं किया गया है और जिसे हमने अभी तक सोचा भी नहीं है, जो यह कहता है कि आप एक ही स्थान में दो बार अस्तित्व में नहीं हो सकते?
इन नियमों को बिना देरी तोड़ देना बेहतर है, बजाय इसके कि आप कुछ बिल्कुल बेहूदा या अमानवीय कहें।
यही स्वर्णिम नियम है कि स्वर्णिम नियम होते ही नहीं हैं।
नियम में स्थिर रहकर मर जाना अच्छा है, न कि नियम से फिसल कर जीवन धारण करना।
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