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क़ानून पर उद्धरण

कोई भी क़ानून तब तक हमारे जीवन का हिस्सा नहीं हो सकता, जब तक कि वह हमारी सोच और हमारी भावनाओं का हिस्सा हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

जो व्यक्ति किसी सत्ता के जितना ज़्यादा अयोग्य होता है, जिसे दूसरों पर किसी क़िस्म के अधिकार प्राप्त होने की जितनी कम संभावना होती है—वहीं कानून और परंपराओं का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग करके, हाथ में आई शक्ति पर अपना क़ब्ज़ा बढ़ाने की कोशिश करता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

स्त्रियों के मामले में भौतिक अधिकार ने क़ानूनी अधिकार की शक्ल नहीं ली; इस तथ्य ने और साथ ही इस मामले के सभी विशिष्ट और यौनात्मक पहलुओं ने, यह निश्चित कर दिया कि जहाँ 'सबसे ताक़तवर के अधिकार' वाली यह शाख़ा अपना बर्बर रूप सबसे पहले त्यागेगी, वहीं दूसरी तमाम शाख़ाओं के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा देर तक जीवित रहेगी।

जॉन स्टुअर्ट मिल

ऐसे किसी क़ानून की कहाँ ज़रूरत है जो एक पक्ष को राजा और दूसरे को प्रजा के कटघरे में खड़ा कर दे, और कहे कि राजा द्वारा दी जा रही सभी स्वतंत्रताएँ एक तरह का उपकार हैं, और कभी भी वापस ली जा सकती हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

बिना किसी झिझक के यह कहा जा सकता है कि ताक़त के क़ानून के तहत जितना ज़्यादा अंतर स्त्री के मूलभूत चरित्र में आया है, उतना किसी भी दूसरे दमित वर्ग के चरित्र में नहीं आया।

जॉन स्टुअर्ट मिल

अपने देश का क़ानून पक्का है—जैसा आदमी, वैसी अदालत।

श्रीलाल शुक्ल

जहाँ क़ानून ख़त्म होता है, वहाँ से धर्म शुरू होता है। क़ानून ज़रूरी है। वह हमें अराजकता से उबारता है, हमारे अधिकारों की रक्षा करता है। लेकिन समाज को ऊपर उठाता है—धर्म।

अमृतलाल वेगड़

सभी के लिए एक क़ानून है अर्थात् वह क़ानून जो सभी क़ानूनों का शासक है, हमारे विधाता का क़ानून, मानवता, न्याय, समता का क़ानून, प्रकृति का क़ानून, राष्ट्रों का कानून।

एडमंड बर्क

क़ानून निर्धन को पीसते हैं और धनवान क़ानून पर शासन करते हैं।

ओलिवर गोल्डस्मिथ

मैं गाय की भक्ति और पूजा में किसी से पीछे नहीं हूँ; लेकिन वह भक्ति और श्रद्धा, क़ानून के ज़रिए किसी पर लादी नहीं जा सकती।

महात्मा गांधी

पश्चिमी सभ्यता की सभी चीज़ों में से पश्चिमी राष्ट्र ने हमें जो बहुत उदारता से दिया है, वह है क़ानून व्यवस्था।

रवींद्रनाथ टैगोर

क़ानून के पंडित कुछ भी कहें, वे मनुष्यों के मन पर राज नहीं कर सकते।

महात्मा गांधी

आवश्यकता कोई क़ानून नहीं जानती।

पब्लिलियस साइरस

क़ानून मनोविकार से मुक्त तर्क है।

अरस्तु

अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो, उसे मानना नामर्दगी है तो हमें किसी का भी ज़ुल्म बाँध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है।

महात्मा गांधी

क़ानून आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। क़ानून पर हमें रुकना नहीं है। उससे आगे बढ़कर धर्म के शिखर को भी छूना है।

अमृतलाल वेगड़

क़ानून कहता है—चोरी करो, डकैती करो। पर क़ानून यह नहीं कह सकता कि दान करो, त्याग करो। क़ानून कहेगा—ख़ून करो, हत्या करो। पर क़ानून यह नहीं कह सकता कि दूसरों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दो। यह तो धर्म ही कह सकता है।

अमृतलाल वेगड़

क़ानून कहता है—बुरा काम मत करो। धर्म कहता है—इतना काफ़ी नहीं है, कुछ अच्छा काम करो।

अमृतलाल वेगड़

अधिकतर तो हम कानून का पालन इसलिए करते हैं कि उसे तोड़ने पर जो सजा होती है, उससे हम डरते हैं।

महात्मा गांधी

तुम्हारे क़ायदा-कानून जानने से कुछ नहीं होता। जानने की बात सिर्फ़ एक है कि तुम जनता हो और जनता आसानी से नहीं जीतती।