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देश पर उद्धरण

देश और देश-प्रेम कवियों

का प्रिय विषय रहा है। स्वंतत्रता-संग्राम से लेकर देश के स्वतंत्र होने के बाद भी आज तक देश और गणतंत्र को विषय बनाती हुई कविताएँ रचने का सिलसिला जारी है।

अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, लेकिन भारत मानवता की जन्मभूमि है।

जयशंकर प्रसाद

जब देश में कोई विशेष नियम प्रतिष्ठित होता है, तब वह एक ही दिन में नहीं, बल्कि बहुत धीरे-धीरे संपन्न हुआ करता है। उस समय वे लोग पिता नहीं होते, भाई नहीं होते, पति नहीं होते-होते हैं केवल पुरुष। जिन लोगों के संबंध में वे नियम बनाए जाते है, वे भी आत्मीया नहीं होती, बल्कि होती हैं केवल नारियाँ।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

अपने देश के प्रति मेरा जो प्रेम है, उसके कुछ अंश में मैं अपने जन्म के गाँव को प्यार करता हूँ। और मैं अपने देश को प्यार करता हूँ पृथ्वी— जो सारी की सारी मेरा देश है—के प्रति अपने प्रेम के एक अंश में। और मैं पृथ्वी को प्यार करता हूँ अपने सर्वस्व से, क्योंकि वह मानवता का, ईश्वर का, प्रत्यक्ष आत्मा का निवास-स्थान है।

खलील जिब्रान

जिस देश में आपने जन्म लिया है, उसके प्रति कर्त्तव्य पालन करने से बढ़कर संसार में कोई दूसरा काम है ही नहीं।

महात्मा गांधी

दया और क्षमा भी मानव के धर्म हैं, तो शक्तिवान होना और उपयुक्त समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करना भी धर्म है।

हरिकृष्ण प्रेमी

हम अपने देश का ‘पुनर्निर्माण’ बिना उसकी भाषा के पुनर्निर्माण के नहीं कर सकते। लोगों के बात करने का लहजा बदलिए और देखिए कि आपने उनके व्यवहार को बदल दिया है।

हुआन रामोन हिमेनेज़

मैं नहीं चाहता कि मेरे लिए कोई स्मारक बनवाया जाए, या मेरी प्रतिमा खड़ी की जाए। मेरी कामना केवल यही है कि लोग देश से प्रेम करते रहें और आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए प्राण भी न्यौछावर कर दें।

गोपाल कृष्ण गोखले

जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिए।

वेदव्यास

अगर केवल सही व्यक्ति को देश छोड़ना होता, तब बाक़ी सभी लोग देश में रह सकते थे।

हेर्टा म्युलर

हमें यह मान लेना चाहिए कि कोई किसी दूसरे देश में इसलिए विदेशी बन जाता है, क्योंकि वह अंदर से पहले से ही विदेशी होता है?

जूलिया क्रिस्तेवा

आज मैं देश से बाहर हूँ, देश से दूर हूँ, परंतु मन सदा वहीं रहता है और इसमें मुझे कितना आनंद अनुभव होता है।

सुभाष चंद्र बोस

धीर और मनस्वी मनुष्य के लिए क्या अपना देश है और क्या विदेश है? वह तो जिस देश में जाता है, उसी को अपने भुजा-बल से अपने वश में कर लेता है।

विष्णु शर्मा

दान देना अपना कर्त्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर प्रत्युपकार करने वाले के लिए दिया जाता है, वह सात्त्विक दान है।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : दान

देशभक्त स्वदेश के लिए जीता है क्योंकि उसे जीना ही चाहिए, स्वदेश के लिए ही मर जाता है क्योंकि देश की यह माँग होती है।

श्री अरविंद

देश का अर्थ मिट्टी नहीं है। देश का अर्थ जन-समुदाय है।

गुरजाड अप्पाराव

देश की रक्षा राजा की सेना नहीं करती! देश की प्रजा करती है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र

बड़े राष्ट्र की पहचान यही है कि अपने समाजों में साथ-साथ रहने-पहनने का चाव और स्वीकारने-अस्वीकारने का माद्दा जगाता है।

रघुवीर सहाय

आजकल समता का सिद्धांत जो प्रचलित हो रहा है, उससका आधार प्रेम नहीं, यही संपत्ति और प्रभुत्व है। वैज्ञानिकों के ज्ञान और नीतिज्ञों की नीति—दोनों का लक्ष्य इसी सपत्ति और प्रभुत्व की वृद्धि है। उसी के कारण जीवन में संघर्ष है और देश में युद्ध है।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छह ऋतु, संवत्सर और कल्प इन्हें 'काल' कहते हैं तथा पृथ्वी को 'देश' कहा जाता है। इनमें से देश का तो दर्शन होता है किंतु काल दिखाई नहीं देता। अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिए।

वेदव्यास

अद्भुत सहनशीलता है इस देश के आदमी में! और बड़ी भयावह तटस्थता! कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले, तो वह दान का मंत्र पढ़ने लगता है।

हरिशंकर परसाई

बाहरी चमक-दमक होते हुए भी कोई देश भीतर से खोखला हो सकता है।

सैमुअल स्माइल्स

बदसूरती आम हिंदुस्तानी आँख को दिखाई ही नहीं देती।

कृष्ण बलदेव वैद

इस देश में लड़की के दिल में जाना हो, तो माँ-बाप के दिल की राह से जाना होता है।

हरिशंकर परसाई

शरीर के महत्त्व को, अपने देश के महत्त्व को समझने के लिए बीमार होना बेहद ज़रूरी बात है।

राजकमल चौधरी

अपने देश या अपने शासक के दोषों के प्रति सहानुभूति रखना या उन्हें छिपाना देशभक्ति के नाम को लजाना है, इसके विपरीत देश के दोषों का विरोध करना सच्ची देश-भक्ति है।

महात्मा गांधी

मेरे स्नेही देश! तुम्हारी दुखी कुटिया में स्वर्ग की शांति है। ऐसी प्रीति, सहज प्राणस्पर्शी भाषा और सेवा का महिमामय त्याग, मैं कहाँ पाऊँगी?

नलिनीबाला देवी

जिस किसी भी देश में जाए, जहाँ कहीं भी आदर पा लोग जो कुछ भी कहें, तू अपनी भारत भूमि का यशोग गाकर अपनी जाति का मान अखंड रख।

रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव

इस्लाम ने भारतीयता की स्थूलता को एक हज़ार वर्ष में छिन्न-भिन्न किया तो उसे ही सूक्ष्म स्तर पर पहले ईसाइयत ने और बाद में साम्यवादी-दर्शन ने गत पचास वर्षों में संपन्न किया।

श्रीनरेश मेहता

देशभक्ति मूल रूप से यह विश्वास है कि एक विशेष देश, दुनिया का सबसे अच्छा है क्योंकि आप उसमें पैदा हुए हैं।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

देश जिनका देवता है, उसकी सेवा जिनका धर्म है, दासता से उसकी मुक्ति जिनका ध्येय है और जो काल को मार्कण्डेय के समान जीत लेते हैं—आओ, हम उनकी आरती गाएँ।

यशवंत दिनकर पेंढरकर

यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति पाए, लेकिन झाँकी सजाए लघु उद्योगों की। दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं।

हरिशंकर परसाई

चौबीस घंटे देश की दुर्दशा की बात होती है। सत्तावन करोड़ आदमी करते है। पर बात से कहीं देश सुधरता है? आप पाँच मिनिट बात कर लेंगे तो देश का क्या फ़ायदा होगा?

हरिशंकर परसाई

देश के धुरंधर नेताओं का यशोगान इस प्रकार से कर जिससे देश का वैभव बढ़े और देश का नाम उज्ज्वल हो।

रायप्रोलु वेंकट सुब्बाराव

अगर एक मुल्क अपने कहानीकारों को खो देता है, तो वह अपना बचपन खो देता है।

पीटर हैंडके

हम हिंदुस्तानी सब कुछ अधूरे अनमने ढंग से क्यों करते हैं—काम, आराम, रियाज़, प्यार, नफ़रत, लड़ाई, दया, खोज, शोध, ऐश, इबाद, सख़ावत, सयासत... सब कुछ।

कृष्ण बलदेव वैद

कोई इंगलिश कोई जर्मन कोई रशियन कोई टर्की, मिटाने वाले हैं अपने हिंदी जो आज हमको मिटा रहे हैं।

अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ाँ

हमारे इस विशाल भारत देश में नेता वही होता है जो ज़ोर से बोले या खिलाए-पिलाए।

हरिशंकर परसाई

जो देश का काम करता है, उसे थोड़ी बदतमीज़ी का हक़ है। देश सेवा थोड़ी बदतमीज़ी के बिना शोभा नहीं देती।

हरिशंकर परसाई

यह देशांतर-भ्रमण बहुत बड़े साहस का काम है। इसमें सुख का कदाचित् ही दर्शन होता है। हमारे सभी विशिष्ट गुणों की कसोटी यात्रा की इन विपत्तियों में हो जाती है। अनेक प्रकार की परिस्थितियों और परिचयों के झमेले में अपने को प्रगल्भ बनाना पड़ता है। कष्ट भोगने की तो अंतिम सीमा हो जाती है। धन के लोभी बनियों के पास खाने-पीने की चीज़ें ख़रीदने के लिए इसी समय अधिकाधिक जाने का अवसर आता है। अधिक क्या कहा जाए, यदि देश भ्रमण के बाद सकुशल लौट आने का सुअवसर जाए तो उसे दूसरा जन्म समझना चाहिए। मैं तो अब इस देशांतर जाने की इच्छा को नमस्कार करता हूँ।

जल्हण

इस देश में जो जिसके लिए प्रतिवाद है, वही उसे नष्ट कर रहा है।

हरिशंकर परसाई

इस देश के आदमी की मानसिकता ऐसी कर दी गई है कि अगर उसका भला भी करो, तो उसे शक होता है कि किसी और का भला किया गया है।

हरिशंकर परसाई

इस देश का आदमी मूर्ख है। अन्न खाना चाहता है। भूखमरी के समाचार नहीं खाना चाहता है।

हरिशंकर परसाई

राष्ट्र की रक्षा कोरे शास्त्र से नहीं हो सकती। शस्त्र रक्षित राष्ट्र में ही शास्त्र जन्म लेता है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र