समकालीन पर उद्धरण
वर्तमान दौर के लिए भी
प्रासंगिक रहे और आधुनिक इतिहास के नियत परिप्रेक्ष्य से संबंधित रचनाओं से एक चयन।
समकालीनता की मारी आज की हिंदी आलोचना ने, कबीर को आध्यात्म-प्रेमी विदेशियों तथा उनके देशी सहयोगियों को सौंप दिया है, और तुलसीदास को 'जय श्रीराम' का नारा लगाने वाले शाखामृगों की मर्ज़ी पर छोड़ दिया है।
जो सार्थक है, वही समकालीन है—वह नया हो या पुराना।
आलोचना की समकालीनता का एक पक्ष यह भी है कि वह अतीत की महत्त्वपूर्ण रचनाओं की वर्तमान अर्थवत्ता की खोज करे।
हिंदी के लेखक अँधेरे में भले ही भटकते हों, किंतु यह नहीं कह जा सकता कि युग-धर्म की जो पहेलियाँ अपने विश्लेषण के लिए सामने उपस्थित हैं, उनकीओर हिंदी का साहित्य क्षेत्र उदासीन है।
आदमी की दुविधा, तनाव, पीड़ा, अभाव का समसामयिक अर्थ-संदर्भ—मुक्ति-बोध की कविता को समकालीन बनाता है।
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अपने यहाँ समकालीनता और आधुनिकता का सवाल उठाना, न तो समसामयिक है और न आधुनिक। क्योंकि यहाँ समकालीनता और आधुनिकता; सामाजिक स्तर पर सामूहिक जीवन के एक ही बिंदु पर, एक ही साथ और एक ही समय में अंकित होती है—उनके लिए अलग-अलग काल या व्यक्ति चुन पाना संभव नहीं हो सकता है।
कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है।
रूप, रंग और अर्थ के स्तर पर आज़ाद रहने की, सामने बैठे आदमी की गिरफ़्त में आने की एक तड़प, एक आवश्यक और समझदार इच्छा; जो आदमी को आदमी से जोड़ती है, मगर आदमी को दूसरे आदमी की जेब में या जूते में नहीं डालती, स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा और उसके लिए पहल तथा उस पहल के समर्थन में लिखा गया साहित्य ही—सम-कालीन साहित्य है।
यदि लेखक आज ईमानदार है, तो उसे अपने प्रति और अपने युग के प्रति अधिक उत्तरदायी होना होगा।
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प्रतिभाशाली ग्रंथकार या कवि; अपने काल, जाति और स्थिति की प्रकृति द्वारा निर्मित ही नहीं होता, वह उसका निर्माण भी करता है। वह केवल उनसे प्रभावान्वित होने वाला ही नहीं, उन पर प्रभाव डालने वाला भी है।
हिंदी में प्रेम के नाम पर लिखा बहुत कुछ जाता है पर उसका ताल्लुक़, ज़्यादातर, कर्तव्य, मोह या श्रद्धा से होता है
प्रत्येक सद्ग्रंथ में दो तरह की बातें हुआ करती हैं, एक सामयिक, नश्वर, देशविशेष और कालविशेष से संबंध रखनेवाली और दूसरी शाश्वत, अविनश्वर, सब कालों और देशों के लिए समान रूप से उपयोगी और व्यवहार्य।
समकालीन उपन्यासों ने पहचाना है कि माँ पोषक हो सकती है तो शोषक भी। समकाल के कई उपन्यासों में माँ की कुटिलता और क्षुद्रता का अद्भुत चित्रण मिलता है।
हमारे वर्तमान दार्शनिक अध्ययन का मुख्य उद्देश्य, कठमुल्लावादी विचार को दूर करना ही होना चाहिए।
आजकल ऐसा बहुत साहित्य लिखा जा रहा है जिसे मैं 'स्त्री-रिझाऊ’ कहता हूँ; जिसको सुन करके औरतें बुल-बुल हो जाती हैं कि देखिए! हमारे अधिकारों की बात की जा रही है।