समस्या-उठाऊ शिक्षा क्रांतिकारी भविष्यता है।
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ख़ुद को किताब की समस्याओं में डुबाना प्यार के बारे में सोचने से बचने का अच्छा तरीक़ा है।
वास्तव में संकट इस तथ्य में है कि पुराना निष्प्राण हो रहा है और नया जन्म नहीं ले सकता।
जब दिल बोलता है, तब मन को उस पर आपत्ति करना अभद्र लगता है।
अतीत की मुश्किलों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को छोड़ दें। आप ही इकलौते व्यक्ति हैं; जो उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं, जिसके आप हक़दार हैं।
दुनिया की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय विश्वास, प्रेम, प्रचुरता, शिक्षा और शांति पर ध्यान व ऊर्जा लगाएँ।
मेरी मुश्किलें मेरी अपनी हैं।
कठिनाइयों पर क़ाबू पाने से हममें साहस और स्वाभिमान आता है और हम ख़ुद को जान लेते हैं।
मैंने जितनी भी मुश्किलें झेली हैं, वे मुझे एक भयानक दर्द के लिए तैयार करने की दिशा में केवल पूर्वाभ्यास थीं।
हम सभी—पुरुषों और स्त्रियों—के लिए मुख्य समस्या सीखना नहीं है, बल्कि सीखे हुए को भूल जाना है।
मैं बूढ़ा हूँ और मैंने बहुत सारी मुसीबतों को जाना है, लेकिन उनमें से ज़्यादातर कभी घटित नहीं हुई हैं।
लौंडो की दोस्ती, जी का जंजाल।
जिनसे कोई भयभीत नहीं होता और जो स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होते तथा जिनकी दृष्टि में ये सारा जगत अपनी आत्मा के ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटों से तर जाते हैं।
समस्या-उठाऊ शिक्षा मनुष्यों को ऐसे प्राणी मानती है, जो संभवन की प्रक्रिया में है। अर्थात् वे अभी अधूरे हैं, अपूर्ण हैं, और ऐसे यथार्थ के अंदर तथा उसके साथ रहते हैं, जो उन्हीं की तरह अधूरा और संभव होता हुआ यथार्थ है।
समस्या-उठाऊ शिक्षा, उत्पीड़कों का हित साधन नहीं करती।
जीवन का असली अर्थ यही है कि हम इसकी समस्याओं का उचित हल ढूँढ़ने का दायित्व उठाएँ और उन सभी कामों को पूरा करें, जो जीवन ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए तय कर रखे हैं।
शहर में हर दिक़्क़त के आगे एक राह है और देहात में हर राह के आगे एक दिक़्क़त है।
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भारत में हमारी असली समस्या राजनीतिक नहीं, सामाजिक है।
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लेखन के बारे में अच्छी बात यह है कि जब आप उपन्यास या कथा लिखते हैं; तो लोग देख सकते हैं कि एक क्षेत्र की समस्याएँ, दूसरे क्षेत्र की समस्याओं के समान हैं।
भाषण अनेक बार हमारे आचरण की ख़ामियों का दर्पण होता है। बहुत बोलने वाला कदाचित् ही अपने कहे का पालन करता है।
किसान के बराबर सर्दी, गर्मी, मेह, और मच्छर-पिस्सू वगैरा का उपद्रव कौन सहन करता है?
अपनी उपलब्धियों से संतुष्टि का अनुभव हमें हमारे चारों ओर मौजूद खतरों का अवलोकन करने से रोकता है।
दो तरह के लोग पैदा होते हैं; जो मुश्किलों का सामना करने के बाद नरम दिल बन जाते हैं और प्यार बांटते हैं, और एक जो पहले से भी ज्यादा क्रूर हो जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक ढंग से देखें, तो भाषा की समस्या लगभग सबसे बड़ी समस्या है।
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जब तक समस्याओं का ढेर नहीं लग जाता और वे बहुत सी गड़बड़ी पैदा नहीं करने लग जातीं, तब तक उन्हें हल करने का प्रयत्न न करना और प्रतीक्षा करते रहना ठीक नहीं। नेताओं को आंदोलन के आगे रहना चाहिए, उसके पीछे नहीं।
ऊधम मचाना एक तरह का नशा है। न मचा सकने से तकलीफ़ होती है, हुड़क-सी आने लगती है।
हमारे सामने आने वाली हर समस्या, हर कठिनाई और हर दर्द, हमें स्वार्थी होने से बचाते हैं और हमें प्यार और करुणा बांटना सिखाते हैं।
हर परिस्थिति अपने अनूठेपन के कारण ही सबसे अलग होती है और उस परिस्थिति द्वारा सामने रखी गई समस्या का केवल एक ही उचित हल होता है।
बहुत सारी समस्याएँ थीं, जहाँ भी देखो दुष्टता अपना सिर उठा रही थी।
कला की बहुत-सी समस्याएँ केवल अज्ञान के कारण पैदा की जाती हैं, जबकि असल में वे होती नहीं, हो नहीं सकतीं।
शासन अक्सर एक समस्या ही है। यह या तो आवश्यकता से अधिक होता है अथवा शक्तिहीन होकर अराजकता का कारण बन जाता है। विडंबना यह है कि शासन का आवश्यकता से अधिक होना भी विरोध का कारण बन जाता है और अराजकता पैदा होती है।
कसौटी पर कसे गए बिना जीवन की परख नहीं होती।
दर्शनशास्त्र : असाध्य समस्याओं के अबोधगम्य उत्तर।
आस्तिकता मुश्किलों को आसान कर देती है, यहाँ तक कि उन्हें ख़ुशगवार भी बना सकती है।
किसी भी समस्या पर विचार करते समय, हमें वास्तविक स्थिति को आधार बनाकर शुरुआत करनी चाहिए—न कि परिभाषाओं को आधार बनाकर।
किसी भी समस्या पर विचार करते समय, हमें वास्तविक स्थिति को आधार बनाकर शुरुआत करनी चाहिए—न कि परिभाषाओं को आधार बनाकर।
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