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भाड़े के श्रोता और दाद का कारोबार

मैं उन दिनों बरेली में पढ़ रहा था। एक मुशायरा होने वाला था, जिसकी बड़ी धूम थी। हिंदी-उर्दू की मंचीय कविता के सारे बड़े नाम आमंत्रित थे। आयोजक पैसेवाले लोग थे, मुशायरे को शहर के इतिहास का सबसे बड़ा और कामयाब मुशायरा बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। दीपावली के आस-पास का वक़्त था, हर साल शहर में इन्हीं दिनों में एक अख़बार का बहुत बड़ा कवि-सम्मेलन या मुशायरा भी होता था—यह आज भी होता है। शायद आयोजक अख़बार के इस कार्यक्रम को पीछे छोड़ने के उद्देश्य से और ज़्यादा ज़ोर-शोर से लगे थे।

घटना में आगे बढ़ने से पहले मुशायरे या कवि-सम्मेलन के व्याकरण को समझ लीजिए। किसी भी मुशायरे की सफलता चार चीज़ों पर निर्भर होती है [थी]—साउंड-सिस्टम, श्रोताओं का सिटिंग-अरेंजमेंट (ख़ासकर शुरू की दो-तीन पंक्तियाँ), शाइर और श्रोता। एक सफल मुशायरे में इन चारों का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा होता है। आमतौर पर एक मुशायरा ख़राब होता है—सिटिंग-अरेंजमेंट और श्रोताओं की वजह से। अमूमन आगे की सीटों पर वीआईपी बैठ जाते हैं और वे न ताली बजाते हैं, न मुस्कुराते हैं—बेचारे कवियों-शाइरों के फेफड़े बाहर आ जाते हैं।

घटना पर वापस आते हैं—इस आयोजन में सारे बड़े और नामी कवि-शाइर थे, साउंड सिस्टम शानदार था ही, सिटिंग-अरेंजमेंट ठीक किया जा सकता था; लेकिन समस्या थी आगे की पंक्तियों में बैठे लोगों के रिस्पॉन्स न करने की। वैसे भी ठंड में कई बार लोग दुबक कर बैठ जाते हैं और अपने साथ मुशायरे को भी ले बैठते हैं।

इस समस्या का समाधान निकाला गया और न जाने किसकी सलाह पर आगे की पंक्तियों के लिए भाड़े पर श्रोता लाने का फ़ैसला हुआ। इन भाड़े के श्रोताओं को ‘दादिया’ अर्थात् दाद देने वाला कह सकते हैं। मंच के ठीक सामने एक बड़ा-सा गद्दा डाला गया और उस पर ये दादिये बिठाए गए, जो मूलत: दिहाड़ी मज़दूर थे और एक दिन की दिहाड़ी पर यह बोलकर लाए गए थे कि तालियाँ बजाते रहना, मुशायरा उठाए रहना। इन दादियों के दोनों तरफ़ सोफ़े पर वीआईपी टाइप के लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई थी।

मुशायरा शुरू हुआ, कुमार विश्वास संचालन कर रहे थे। जैसाकि योजना थी—दादिये आगे से दाद देंगे, तालियाँ बजाएँगे और तालियों का यह संक्रमण पीछे तक चला जाएगा। सब कुछ योजना के मुताबिक़ चल रहा था। समस्या सिर्फ़ यह थी कि दादियों को यह तो पता था कि दाद देनी है, लेकिन कहाँ और कितनी देनी है, इसकी कोई ट्रेनिंग उन्हें नहीं मिली थी तो वे अपने हिसाब जहाँ-जो-जैसा-जितना मन कर रहा था—आह-वाह कर रहे थे।

मैं इस आयोजन का चश्मदीद गवाह हूँ। उस रोज़ मैंने देखा कि दादियों ने ऐसी-ऐसी जगह दाद दी कि शाइर ज़िंदगी भर न भूल पाएँगे। मसलन किसी शे’र की पहली पंक्ति पर उछल-उछलकर दाद दी और दूसरी पंक्ति पर एकदम पिन-ड्रॉप-साइलेंस। कोई शाइर जब अगला शे’र पढ़ने के लिए पिछले शे’र को सिर्फ़ दुहरा रहा था, तब उस शे’र पर इतनी दाद दी जैसे उसने ये शे’र पहली बार अब सुनाया हो। किसी-किसी शाइर को बीच में रोककर उसकी आधी पंक्ति पर बे-इंतिहा दाद दी गई।

कुमार विश्वास मंचीय कुशलता से इन्हें साधने की लगातार कोशिश करते रहे और झल्लाकर इन दादियों के लिए शफ़ीक़ जौनपुरी का यह शे’र भी पढ़ा :

कश्ती का ज़िम्मेदार फ़क़त नाख़ुदा नहीं
कश्ती में बैठने का सलीक़ा भी चाहिए

अब सलीक़ा सीखने की तो बात ही क्या थी, वे बेचारे तो वही कर रहे थे जिसके लिए उन्हें पैसे मिले थे और अपनी समझदारी से वे बहुत अच्छा कर रहे थे। उन्होंने मुशायरा न सिर्फ़ उठा रखा था, बल्कि टाँग दिया था। हालाँकि मुशायरा टँगा हुआ है; यह बात सिर्फ़ मंच के लोगों को समझ आ रही थी, बाक़ी लोग तो पेशेवर दादियों को सहृदय और जानकार श्रोता समझकर उनकी शाइरी की समझ से रश्क कर रहे थे और तालियाँ बजा रहे थे। ख़ैर, इस घटना को आज लगभग पंद्रह साल हो गए हैं और इसमें कोई दो राय नहीं कि शहर में ऐसा आयोजन फिर कभी नहीं हुआ।

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रचित को और पढ़िए : दारा शुकोह, मैनेजर पांडेय और कुछ झूठ 'दुपहिया' की डायरेक्टर सोनम नायर से बातचीतजेन ज़ी का पॉलिटिकल एडवेंचर : नागरिक होने का स्वाद

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