आज़ादी पर उद्धरण
स्वतंत्रता, स्वाधीनता,
मुक्ति के व्यापक अर्थों में आज़ादी की भावना मानव-मन की मूल प्रवृत्तियों में से एक है और कविताओं में महत्त्व पाती रही है। देश की पराधीनता के दौर में इसका संकेंद्रित अभिप्राय देश की आज़ादी से है। विभिन्न विचार-बोधों के आकार लेने और सामाजिक-वैचारिक-राजनीतिक आंदोलनों के आगे बढ़ने के साथ कविता भी इसके नवीन प्रयोजनों को साथ लिए आगे बढ़ी है।
साहित्य-सृजेता को स्वतंत्र होना ही चाहिए, तभी उसका स्वर निर्भय और स्वतंत्र होगा। शासन का पिछलग्गू साहित्य, समाज को पतन की ओर ले जाएगा।
भक्त कवियों की दृष्टि में मानुष-सत्य के ऊपर कुछ भी नहीं है—न कुल, न जाति, न धर्म, न संप्रदाय, न स्त्री-पुरुष का भेद, न किसी शास्त्र का भय और न लोक का भ्रम।
हर उस चीज़ से सावधान रहो, जो तुम्हारी स्वतंत्रता छीन लेती है। जानो कि वह ख़तरनाक है और हर संभव तरीक़े से उससे बचो।
एक स्त्री पूज्य होने के बजाय स्वतंत्र रहना ज़्यादा पसंद करती है, लेकिन उसे यह कौन पूछेगा?
मुझे लगता है कि जीवन के हर आयाम में सत्ता, अनुक्रमों और राज करने की कोशिश में लगे केंद्रों को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए और उनको चुनौती देनी चाहिए। जब तक उनके होने का कोई जायज़ हवाला न दिया जा सके, वे ग़ैरक़ानूनी हैं और उन्हें नष्ट कर देना चाहिए। मनुष्य की आज़ादी की उम्मीद इससे ही बढ़ेगी।
स्वतंत्र होने की कोशिश में साहस निहित है। साहसिक कार्य आत्म-सम्मान का पोषण करता है और आत्म-सम्मान किसी भी जोखिम को लेने की इच्छा पैदा करता है। तो क्या अकेले रहने का साहस करने में जोखिम है? शायद, साहस का मतलब ही जोखिम है?
जो वरदान देता है, वह शाप भी दे सकता है।
प्रत्येक परीकथा वर्तमान सीमाओं को पार करने की क्षमता प्रदान करती है, इसलिए एक अर्थ में परीकथा आपको वह स्वतंत्रता प्रदान करती है, जिसे वास्तविकता अस्वीकार करती है।
स्वतंत्रता से भी अधिक शक्तिशाली एक और शब्द है—'अंतःकरण'।
क्या आपको नहीं लगता कि सब कुछ और हर किसी से छुटकारा पाकर बस किसी ऐसी जगह चले जाना अच्छा होगा जहाँ आप किसी व्यक्ति को नहीं जानते हैं?
हममें से हर किसी का कुछ न कुछ क़ीमती खो रहा है। खोए हुए अवसर, खोई हुई संभावनाएँ, भावनाएँ… जो हम फिर कभी वापस नहीं पा सकते। यह जीवित रहने के अर्थ का एक हिस्सा है।
मैंने स्वतंत्र होने के लिए अपने तरीक़े से प्रयास किया है।
मैं जब पढ़ती हूँ, तब मैं इतनी ख़ुशी और आज़ादी महसूस करती हूँ कि मुझे विश्वास हो जाता है कि अगर मेरे पास हर समय किताबें हों तो मैं अपने जीवन के प्रत्येक कष्ट को सह सकती हूँ।
पिता स्त्री की कुमारावस्था में, पति युवावस्था में तथा पुत्र वृद्धावस्था में रक्षा करता है। स्त्री को स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।
स्त्री के जीवन की अनेक विवशताओं में प्रधान, और कदाचित् उसे सबसे अधिक जड़ बनाने वाली—अर्थ से संबंध रखती है और रखती रहेगी, क्योंकि वह सामाजिक प्राणी की अनिवार्य आवश्यकता है।
मध्य-युग के जीवन की हल्की-सी समझ भी यह बताती है कि निर्बलों की पराधीनता को कितना प्राकृतिक समझा जाता था, और उनमें से किसी की समानता की इच्छा को कितना अप्राकृतिक।
जिसे आज 'स्त्री का स्वभाव' कहा जाता है, वह एक नक़ली चीज़ है और कुछ दिशाओं में बाध्यतापूर्ण दमन, और कुछ दिशाओं में अप्राकृतिक फैलाव का परिणाम है।
प्राची के सभी खंडहरों की तुलना में ‘भगवद्गीता’ कितनी अधिक महिमामयी है! मीनारें और मंदिर तो राजों-महाराजों की विलासिता-मात्र होते हैं। एक सरल और स्वतंत्र मन वाला व्यक्ति कभी किसी राजा या महाराजा का हुक्म नहीं बजाता। प्रतिभा किसी शहंशाह के आश्रम में नहीं पलती, बहुत मामूली सीमा के अतिरिक्त, इसकी सामग्री न चाँदी, न सोना, और न संगमरमर। मेहरबानी करके यह बताइए कि इतना अधिक पत्थर फोड़ने का लक्ष्य क्या है?
कोई भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि अगर स्त्रियों की प्रकृति को सहज रूप से विकसित होने दिया जाता, अगर उसे एक बनावटी स्वरूप देने के प्रयास न किए गए होते—तो भी स्त्री और पुरुष के चरित्र और क्षमता में कोई व्यावहारिक अंतर, या शायद कुछ भी अंतर होता।
जिन स्त्रियों की पाप-गाथाओं से समाज का जीवन काला है; जिनकी लज्जाहीनता से जीवन लज्जित है, उनमें भी अधिकांश की दुर्दशा का कारण अर्थ की विषमता ही मिलेगी।
प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता और बंधन दोनों चाहिए; स्वार्थ तथा परार्थ दोनों की आवश्यकता है, अन्यथा वह जीवन-मुक्त होकर भी किसी को कुछ नहीं दे पाता।
जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या न करे।
हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय; न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी।
पंख आज़ादी तभी देते हैं, जब वे उड़ान में खुले हुए होते हैं। किसी की पीठ पर लदे वे भारी वज़न ही हैं।
जो संप्रदाय में बद्ध हैं, वे चिरंतन साहित्यिक नहीं होते हैं। वे तो तात्कालिक साहित्यिक होते हैं। चिरंतन साहित्यिक तो वे होते हैं, जो सब पंथ, संप्रदाय वग़ैरह से भिन्न होते हैं, परे होते हैं।
समाज की दो आधार शिलाएँ हैं—अर्थ का विभाजन और स्त्री-पुरुष का संबंध। इनमें से यदि एक की भी स्थिति में विषमता उत्पत्र होने लगती है, तो समाज का संपूर्ण प्रासाद हिले बिना नहीं रह सकता।
विवश आर्थिक पराधीनता; अज्ञात रूप में व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है।
एक सफल विवाह में ऐसा कभी नहीं होता कि सभी अधिकार सिर्फ़ एक तरफ़ हैं, और सारी आज्ञाकारिता दूसरी तरफ। अगर कहीं ऐसा है तो वह एक असफल विवाह है और उससे दोनों को ही मुक्ति मिलनी चाहिए।
उन तमाम हानिकर प्रभुत्वों को हटा देना चाहिए, जो लोगों की न्यायोचित आकाँक्षाओं का दमन करते हैं और उनको बंधनों में जकड़ कर रखने में मदद देते हैं।
सूरसागर का गोपीकृष्ण-प्रेम, स्वछंद प्रेम है। इस प्रेम की दूसरी विशेषता है, उसका सहज क्रमिक विकास। गोपीकृष्ण-प्रेम के स्वाभाविक विकास क्रम को, सूर ने अत्यंत सतर्कता से चित्रित किया है।
तुम्हारे पास सब कुछ है, परंतु एक चीज़ है : पागलपन। एक इंसान को थोड़े पागलपन की आवश्यकता होती है, अन्यथा—वह कभी हिम्मत नहीं कर पाएगा—रस्सी काटने और स्वतंत्र हो जाने की।
जीवन की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता, सामाजिक प्राणियों के स्वतंत्र विकासानुकूल वातावरण की सृष्टि कर देना है।
घुमक्कड़-धर्म ब्राह्मण-धर्म जैसा संकुचित धर्म नहीं है, जिसमें स्त्रियों के लिए स्थान नहीं हो। स्त्रियाँ इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष।
ऐसा कोई भी सिद्धांत नैतिक नियमों की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मनुष्य को सामाजिक स्तर तक ही सीमित रखना चाहता हो।
समाज ने किसी ऐसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की, जिसमें स्त्री पुरुष से सहायता बिना माँगे हुए ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ सके।
समाज तुम्हें जो छवि देता है उसके बजाय, अपनी ख़ुद की छवि गढ़ने का निर्णय लेने के लिए बहुत साहस और स्वतंत्रता की ज़रूरत है, लेकिन जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ते जाते हो, यह आसान हो जाता है।
हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।
समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर, संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही कही जाने योग्य है। वह केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है, वरन् अर्थ के संबंध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बंधन में बंधी हुई है।
सभ्य संसार के प्रत्येक स्थान में, किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी रूप में स्वतंत्रता की व्यापकता का बोल-बाला अवश्य हुआ।
मैंने लंबे समय से स्वतंत्रता को जीवन का भव्य आशीर्वाद और हर गुण का आधार माना है; और मैं अपनी आवश्यकताओं को कम करके भी सदा स्वतंत्रता को सुरक्षित कर लूँगी, चाहे मुझे बंजर भूमि पर रहना पड़े।
इस बारे में कोई स्वतंत्रता नहीं है : दुनिया देती है, और आप वही लेते हैं जो आपको दिया जाता है, चुनने का कोई अवसर नहीं होता।
शरण या आज़ादी—और कोई रास्ता नहीं।
मैंने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, मुझे उस स्वतंत्रता के बिना कष्ट हुआ; भले ही मैं एक प्रेमपूर्ण विवाह में थी।
मुक्ति अकेले में अकेले की नहीं हो सकती। मुक्ति अकेले में अकेले को नहीं मिलती।
उस देश में शिक्षित व्यक्ति होना लगभग असंभव है, जहाँ स्वतंत्र मन के प्रति इतना अविश्वास है।
अगर आप किसी को अपने पूरे दिल से—यहाँ तक कि एक व्यक्ति से भी—प्यार कर सकते हैं, तो जीवन में मुक्ति है। भले ही आपकी उस व्यक्ति के साथ न बने।
जो हृदय संसार की जातियों के बीच अपनी जाति की स्वतंत्र सत्ता का अनुभव नहीं कर सकता, वह देशप्रेम का दावा नहीं कर सकता।
काश! मैं फिर से वह लड़की हो सकती—कुछ जंगली और खुरदरी, कठोर और आज़ाद।
स्वतंत्रता का कार्य किसी और को मुक्त करना है।
अस्पृश्यता के उन्मूलन और अंतर्जातीय भोज से ही हमारी सारी समस्याएँ ख़त्म नहीं होगी। न्यायालय, सेना, पुलिस और वाणिज्य जैसे तमाम सरकारी महकमों को हमारे लिए खोला जाना चाहिए। हमें हिंदू समाज को जातिवाद के उन्मूलन और समानता को, दो सिद्धांतों पर फिर से खड़ा करना होगा।'
-
संबंधित विषय : अस्पृश्यताऔर 2 अन्य
संबंधित विषय
- अभिव्यक्ति
- अस्पृश्यता
- अहंकार
- आज़ादी
- आत्म
- आत्म-चिंतन
- आत्मज्ञान
- आत्म-संयम
- आधुनिकता
- आनंद
- कबीर
- कवि
- केश
- कामकला
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- ग़ुलामी
- घर
- चयन
- चिंतन
- जीवन
- दुख
- देश
- धर्म
- नैतिकता
- पूँजीवाद
- प्रेम
- पुरुष
- प्रस्ताव
- पितृसत्ता
- भक्ति काव्य
- भेदभाव
- मुक्त
- मनुष्य
- मनुष्यता
- राजनीति
- रोग
- व्यक्ति
- विचार
- विडंबना
- विवाह
- शक्ति
- संघर्ष
- स्त्री
- स्त्रीवाद
- सफलता
- समय
- समस्या
- समाज
- स्वतंत्रता
- संस्कृति
- संसार
- साहित्य