योगी जानते हैं कि संसार के सभी भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं।
साधना मस्तिष्क को शांत कर देती है, विचारों को नियंत्रित करने में मदद करती है और शरीर में स्फूर्ति भर देती है।
प्रारंभिक विचारकों ने देखा था कि वे केंद्र से जितनी दूर जाते हैं, वैचित्र्य और विभिन्नताएँ उतनी ही अधिक होती जाती हैं, और वे केंद्र के जितने निकट आते हैं, उतने ही वे एकत्व के निकट आते हैं।
(परमेश्वर के स्वरूप के) ध्यान की अपेक्षा कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है।
जब ध्यान में वस्तु का रूप या बाहरी भाग परित्यक्त हो जाता है, तभी समाधि-अवस्था आती है।
जब कोई अपनी समस्त शक्तियों का संयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही संयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही संयम कर रहा है।
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ज्ञान की अपेक्षा (परमेश्वर के स्वरूप का) ध्यान श्रेष्ठ है।
श्वास, आसन आदि योग में सहायक होते हैं, लेकिन वे मात्र शारीरिक उपाय हैं। असली तैयारी तो मानसिक होती है। सबसे पहली आवश्यकता एक शांत और सुखमय जीवन है।
संसार में शक्ति के जितने विकास देखे जाते हैं, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते हैं।
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तल्लीनता के साथ शून्य ध्यान में मग्न हो जाना यही असली ध्यान है।
जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।
आत्मिक साधना का एक अंग है, जड़ विश्व के अत्याचार से आत्मा को मुक्त करना।
ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।
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ध्यान के द्वारा जब चित्तवृतियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब सूक्ष्म संस्कार बच जाते हैं।
योगाभ्यास करने पर जो चिह्न योगियों में प्रकट होते हैं, देह की स्वस्थता उनमें प्रथम है।
प्रेम का क्या अर्थ है, यह पता लगाने के लिए आपको अपना पूरा जीवन देना होगा, वैसे ही जैसे यह पता लगाने के लिए कि ध्यान क्या है एवं सत्य क्या है, आपको अपना पूरा जीवन देना पड़ता है।
सारे ज्ञान-ध्यान का लक्ष्य सही कर्म है।
ईश्वरीय पुकार दुर्लभ है परंतु वह हृदय जो उस पर ध्यान देता है, दुर्लभतर है।
तप का तात्पर्य है तत्व के साक्षात् दर्शन करने का सच्चा प्रयत्न।
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमा नहीं होता है, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हु योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।
जब मन को देह के भीतर या उसके बाहर; किसी स्थान में कुछ समय तक स्थिर रखने के निमित्त प्रशिक्षित किया जाता है, तब उसको उस दिशा में अविच्छिन्न गति से प्रवाहित होने की शक्ति प्राप्त होती है—इस अवस्था का नाम है ध्यान।
धारणा, ध्यान और समाधि—इन तीनों को एक साथ मिलाकर संयम कहते हैं।
ध्यान में हमें पहला बोध जिस बात का होता है वह यह है कि खोजने का कोई मूल्य नहीं है; क्योंकि प्रायः वही चीज़ आपकी खोज का विषय बन जाती है जिसकी आप इच्छा ओर कामना करते हैं।
यदि आपका ध्यान सिर्फ़ एक व्यक्तिगत मामला है, अर्थात् एक ऐसी चीज़, जिसमें आप व्यक्तिगत तौर पर आनंद लेते हैं, तो यह ध्यान का निहितार्थ हैः मन और हृदय का संपूर्ण आमूल परिवर्तन।
ध्यान प्रत्यक्ष अतिचेतना है। पूर्ण एकाग्रता में आत्मा, वास्तव में स्थूल शरीर के बंधनों से मुक्त हो जाती है, और स्वयं को उसके वास्तविक स्वरूप में जान लेती है। जो कुछ भी चाहा जाता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है।