कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।
आँख वाले प्रायः इस तरह सोचते हैं कि अंधों की, विशेषतः बहरे-अंधों की दुनिया, उनके सूर्य प्रकाश से चमचमाते और हँसते-खेलते संसार से बिलकुल अलग हैं और उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ भी बिलकुल अलग हैं और उनकी चेतना पर उनकी इस अशक्ति और अभाव का मूलभूत प्रभाव है।
सच पूछिए तो करुण को एक-रस कहने के पीछे एक जगत्-दृष्टि या संवेदना है—जिसे ट्रैजिक या दुःखमयी संवेदना कह सकते हैं।
जो कोई भी मैकियावेली को ध्यान से पढ़ता है, वह जानता है कि दूरदर्शिता इसी बात में है कि कभी किसी को धमकी न दी जाए, बिना कहे कर गुज़रा जाए; दुश्मन को पीछे हटने के लिए बाध्य तो किया जाए पर कभी, जैसाकि कहते हैं, साँप की दुम पर क़दम न रखा जाए; और अपने से नीची हैसियत के किसी भी व्यक्ति के अभिमान को चोट पहुँचाने से हमेशा बचा जाए। किसी व्यक्ति के हित को, चाहे वह उस समय कितना भी बड़ा क्यों न हो, पहुँची चोट कालांतर में क्षमा की या भुलाई जा सकती है; लेकिन अभिमान और दंभ को लगा घाव कभी भरता नहीं है, कभी भुलाया नहीं जाता। आत्मिक व्यक्तित्व भौतिक व्यक्तित्व से ज़्यादा संवेदनशील, या यूँ कहें कि ज़्यादा सजीव होता है। संक्षेप में, हम चाहे जो भी करें, हमारा आंतरिक व्यक्तित्व ही हमें शासित करता है।
जब तक समष्टि-रूप में हमें संसार के लक्ष्य का बोध नहीं होता; और हमारे अंतःकरण में सामान्य आदर्शों की स्थापना नहीं होती, तब तक हमें श्रद्धा का अनुभव नहीं होता।
हृदय के मर्मस्थल का स्पर्श तभी होता है; जब जगत् या जीवन का कोई सुंदर रूप, मार्मिक दशा या तथ्य मन में उपस्थित होता है।
जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।
जैसे प्रतिमा के बिना मंदिर किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है, उसी प्रकार स्नेहशून्य मनुष्य किसी भी पशु की श्रेणी में रखा जा सकता है।
‘प्रेम’ को बीजभाव माननेवालों की दृष्टि; उसके मूल वासनात्मक रूप ‘राग’ की ओर रहती है, जो मनुष्य की अंतःप्रकृति में निहित रहकर संपूर्ण सजीव सृष्टि के साथ, किसी गूढ़ संबंध की अनुभूति के रूप में समय-समय पर जगा करता है।
इतिहास और अनुभव गवाह हैं कि बहुत संवेदनशील व्यक्ति, कर्तव्यपालन के मामले में बहुत दृढ़ होते हैं।
भावरस का आनंद लेने के लिए हमारे हृदय में एक लोक सदा बना ही रहता है।
कविता भरे हुए हृदय की भावनाओं का साहित्यिक रूप है।
संवेदना और अनुभूतियों का मूल रूप अमूर्त होता है, और उस अरूप संवेदना तथा अनुभूति के रूपात्मक बोध से ही कला का प्रादुर्भाव होता है।
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मनुष्य जाति की चित्तवृत्तियाँ अनित्य होती हैं, एक बार टूटने पर भी फिर संबंध जुड़ सकता है।
काव्य का अनुशीलन करने वाले मात्र जानते हैं कि काव्यदृष्टि सजीव सृष्टि तक ही बद्ध नहीं रहती। वह प्रकृति के उस भाग की ओर भी जाती है, जो निर्जीव या जड़ कहलाता है।
भावोद्रेक से उक्ति में जो एक प्रकार का बाँकपन आ जाता है, तात्पर्यकथन के सीधे मार्ग को छोड़कर वचन; जो एक भिन्न प्रणाली ग्रहण करते हैं, उसी की रमणीयता काव्य की रमणीयता के भीतर आ सकती है।
एक युग, साहित्यिक आंदोलन और एक रचना-प्रवृत्ति के रचनाकारों में, संवेदनशीलता के स्तर पर समानताएँ होती हैं।
मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।
बाहरी दुनिया से अधिक बाधाएँ आदमी के दिल में होती हैं।
सान्निध्य और संपर्क की प्रबल प्रवृत्ति जगानेवाली दशा, जिसे आसक्ति कहते हैं—माधुर्य भावना के संचार से ही प्राप्त होती है।
उधार या भाड़े पर लिया गया कोई भी ऐसा व्यक्ति; जो तुम्हारे वर्ग का नहीं है, वह लेशमात्र भी तुम्हारे हितों को नहीं साध सकता।
जीवन केवल इच्छाओं या भावनाओं से उत्पन्न आचरणों को सेना के समान कवायद सिखा देने में ही सफल नहीं हो जाता, वरन् उन इच्छाओं के उद्गमों को खोजकर, उनसे मनुष्यता की मरुस्थली को आर्द्र करके पूर्णता को प्राप्त होता है।
आँख न हो मनुष्य हृदय से देख सकता है, पर हृदय न होने से आँख बेकार है।
मनुष्य में भी जब रस का आविर्भाव नहीं होता, तब वह जड़ पिंड हो जाता है।
यह आवश्यक नहीं है कि ‘महान्’ आलोचक संवेदनशील हों।
संवेदनशीलता युगसापेक्ष होती है।
वृक्ष जब बढ़ रहा होता है, वह कोमल होता है; पर उसकी मृत्यु तभी हो जाती है, जब वह सूखकर कठोर हो जाता है।
हृदय पर नित्य प्रभाव रखने वाले रूपों और व्यापारों को भावना के सामने लाकर; कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अंतःप्रकृति का सामंजस्य घटित करती हुई, उसकी भावात्मक सत्ता के प्रसार का प्रयास करती है।
पश्चिम का कलाकार रूप (फ़ार्म) की खिड़की से देखकर वस्तु को संवेद्य बनाता है, उसका संप्रेषण करता है। भारत का कलाकार प्रतीक की खिड़की से वस्तु को नहीं, वस्तु के पार वस्तु-सत् को संवेद्य बनाता है।
संवेदनात्मक उद्देश्यों को देख-परखकर ही यह पहचाना जा सकता है कि लेखक किस प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है।
फ़ोटोग्राफ़ के साथ फ़ोटो खींचने वाले का संबंध पूरा-पूरा नहीं होता है—पहाड़ देखा, कैमरा खोला, फ़ोटो खिंच गया; किंतु फ़ोटोग्राफ़र के हृदय के साथ पहाड़ का कोई संबंध ही नहीं बना।
सच्चा संवेदनशील कलाकार, अपने को बाह्म प्रभावों को ग्रहण करने के लिए छुट्टा छोड़ देता है, या उसे छोड़ देना चाहिए।
शुभकामना से अर्थशास्त्र के नियम नहीं बदलते, विलाप से अन्याय समाप्त नहीं होता, क्योंकि वहाँ हृदय है ही नहीं।
कामकाजी दृष्टि मनुष्य के स्वार्थ के साथ दृश्य वस्तु को जोड़कर देखती है और एक भावुक की दृष्टि अधिकतर निःस्वार्थ भाव की वस्तुओं का स्पर्श करती है।
निरंकुशता का स्रोत वे नहीं होते; जो अत्याचारों के शिकार होते हैं, उसके स्रोत होते हैं निरंकुश अत्याचारी।
आँख में आँसू उन्हीं अकुटिल सीधे सत्पुरुषों के आता है, जिनके सच्चे सरल चित्त में कपट और कुटिलाई ने स्थान नहीं पाया है।
अत्यधिक संवेदनशीलता हीन भावना की अभिव्यक्ति है।
स्त्रियों का काम हृदय का काम है। उन्हें हृदय देना होता है और हृदय अपनी ओर खींचना होता है—इसलिए उनका काम बिल्कुल सीधा-सपाट, कटा-छँटा होने से नहीं चलता।
हममें ऐसे उन्मुक्त संवेदनशील संसार का निर्माण करने की ललक होनी चाहिए कि संसार का कोई भी व्यक्ति; स्वेच्छा से कर्नाटक वाला बन सके और उसी तरह कर्नाटक का कोई व्यक्ति संसार के किसी भी प्रदेश वाला बन सके।
बैंकीय शिक्षा; छात्रों की सृजनात्मक शक्ति को न्यूनतम कर देती है या समाप्त कर देती है, और झट से विश्वास कर लेने की प्रवृत्ति को बढ़ाती है।
विज्ञान का सत्य शीघ्र बदलता है, काव्य का सत्य उतनी शीघ्र नहीं बदलता; क्योंकि काव्य का मानव के अन्तःस्थ जगत से संबंध है और विज्ञान का जगत के बाह्यरूपों से।
कठोरता और बल मृत्यु के साथी हैं, कोमलता और लचीलापन अस्तित्व की ताजगी के प्रतीक हैं।
जगत-जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समाई हुई मार्मिक आलोचना-दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है।
कवि की संवेदना को अनुभवसिद्ध होना आवश्यक है, वरना बिना कीमत चुकाए मुफ़्त की कविताई यशस्वी नहीं हो सकती।
जिसमें समाज की गतिविधि में संवेदनात्मकता अधिक बढ़ जाती है, वही कवि हो जाता है और कवि का छोटा होना, बड़ा होना भी इसी संवेदनात्मक ग्राह्य शक्ति पर निर्भर होता है।
केवल जानने से ही मनुष्य के जीवन में, उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में उन्नति नहीं होती। जाने हुए स्वरूप की ओर जब हृदय आकर्षित होता है, और उस स्वरूप तक पहुँचने के लिए व्यक्ति का स्वरूप उसके मेल में होने लगता है—तभी जीवन की साधना का आरंभ होता है।
जो बेकलेजे हैं; उनकी बैल-सी बड़ी-बड़ी आँखें केवल देखने ही को हैं, चित्त की वृत्तियों का उन पर कभी असर होता ही नहीं।
कविता के लिए पाठक की संवेदना और सहानुभूति उसी तरह घातक है, जिस तरह बिजली के धक्के से होश खाते आदमी को पानी पिलाना। कविता में साझेदारी ज़्यादा सही है, और हो सके तो एक आवेगहीन शब्द —शाबास!
व्यावहारिकता में एक व्यक्ति को दूसरे के लिए जो त्याग करना पड़ता है, उसके उपयुक्त मानसिक स्थिति उत्पन्न कर देना; आध्यात्मिकता का कार्य और आध्यात्मिकता में जिस यथार्थता का स्पर्श हम भुला देते हैं, उसे स्मरण कराते रहना व्यावहारिकता का लक्ष्य है।
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