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नई पीढ़ी नए बदलाव : इमोजी से रील्स तक

विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य की कक्षाओं की अपनी टिपिकल संस्कृति होती है—चरणस्पर्शी और बहुत छुईमुई।

इन कक्षाओं में प्रेमचंद, प्रेमचंद नहीं रहते, “प्रेमचंद जी” हो जाते हैं, “निराला जी”, “मुक्तिबोध जी” और नामवर सिंह “प्रोफ़ेसर नामवर सिंह”, रामचंद्र शुक्ल या तो “आचार्य रामचंद्र शुक्ल” के नाम से पुकारे जाते हैं, या “शुक्ल जी”। सिर्फ़ कक्षाएँ ही नहीं, हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रमों में शामिल आलोचना-पुस्तकों का भी यही हाल है।

ऐसे में हिंदी साहित्य के प्रोफ़ेसर जी अपने द्वारा बनाए गए किसी व्हाट्सऐप-ग्रुप में जब कोई सामग्री डालते हैं और उत्तर में ग्रुप में शामिल उनके विद्यार्थी उसके उत्तर में एक भी शब्द नहीं लिखते हैं, और सिर्फ़ थंब का इमोजी (👍) भेजते हैं, तो गुरू जी लोगों को कैसा महसूस होता है? मुझे नहीं लगता वे बहुत अच्छा महसूस करते होंगे।

लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि व्हाट्सऐप-ग्रुप में जब किसी लंबी सूचना के नीचे सिर्फ़ एक थंब का इमोजी (👍) दिखाई देता है, तो वह असम्मान नहीं है। यह नई पीढ़ी की भाषा है जिसमें सम्मान और असम्मान की बाइनरी उतनी मोटी नहीं है, जितनी कभी हुआ करती थी। 

इसे समतामूलक भाषा की दिशा में एक संकेत की तरह पढ़ा जा सकता है। 

अधिकांश गुरू जी तो शायद थंब इमोजी का मतलब नहीं जानते। 

नई पीढ़ी थंब इमोजी का इस्तेमाल सामान्यतः इन अर्थों में करती है : ‘‘ठीक है’’, ‘‘समझ गया’’, ‘‘सहमति है’’, ‘‘अच्छा है’’, ‘‘Received / Noted’’ और समर्थन के अर्थ में। डिजिटल बातचीत में यह इमोजी अक्सर “acknowledgement” का काम करती है—यानी सामने वाले की बात पढ़ ली और स्वीकार कर ली।

लेकिन गुरू जी को लगता है कि यह तो भयानक बदतमीज़ी है। चेले की यह औक़ात कि वह अँगूठा दिखाए! 😄

बहरहाल, नए माध्यमों पर इमोजी का प्रयोग एक संकेत है। संकेत इस बात का कि संवाद का रूप बदल रहा है—और उसकी संरचना भी। 

“जी सर, आपकी बात पूरी तरह समझ में आ गई” के स्थान पर नई पीढ़ी के लिए सिर्फ थंब इमोजी 👍 पर्याप्त है। 

इसी तरह, “धन्यवाद” 🙏 हो गया, “बहुत अच्छा” 🔥 या 💯। वाक्य शब्द में बदला, शब्द संकेत में। यह मात्र संक्षेप नहीं है, यह भाषा के सामाजिक व्यवहार में बदलाव है। प्रश्न यह नहीं कि भाषा छोटी हो रही है। प्रश्न यह है कि यह अच्छा हो रहा है या बुरा?

भाषा बहता नीर है। कभी पत्र चार-चार पन्नों के होते थे। फिर ई-मेल आए—दो पैराग्राफ के। अब संदेश दो पंक्तियों के हैं और कई बार एक इमोजी के।

हिंदी जाति, धर्म और लिंग संबंधी अनेक घृणित पूर्वग्रहों से ग्रसित है। इमोजी फ़िलहाल तो इनसे मुक्त लगती है, इसलिए हमारी हिंदी में उनका स्वागत है।

हम अभी भी विस्तार को विद्वता का प्रमाण मानते हैं। 

भारी-भरकम विस्तृत ब्योरे वाले उपन्यास, और ऐसे लेख जिनमें उद्धरणों की अधिकता तर्क, मौलिकता और विवेक की जगह ले लेती है; यह सब नई पीढ़ी को आकर्षित नहीं करता।

हम समझते हैं कि उद्धरण ही प्रमाण हैं।
हम विस्तार को ही विद्वता कहते हैं।
नई पीढ़ी इस दावे से सहमत नहीं है।
उसे तर्क चाहिए।
उसे मौलिकता चाहिए।
उसे सार चाहिए।

इसे सिर्फ़ अधैर्य कह देना आसान है। लेकिन यह अच्छा है कि अब कथ्य को संरचना से, और विचार को प्रस्तुति से अलग करके देखा-परखा जाए। इससे विद्वता के नाम पर फैला खर-पतवार नष्ट होगा।

ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी गहराई नहीं चाहती। वास्तव में वह गहराई को दूसरे रूप में खोज रही है।

हिंदी साहित्य की एक कक्षा में पूछने पर विद्यार्थियों ने मुझे बताया कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत कम फ़िल्में पूरी देखी हैं।

वे फ़िल्में या तो अधूरी देखते हैं या उसे फ़ास्ट-फ़ॉरवर्ड करके जल्दी ख़त्म कर देते हैं। वे रील्स देखते हैं—30 सेकंड, 60 सेकंड। अधिक हुआ तो 5–7 मिनट की शॉर्ट फ़िल्म... और सचमुच बहुत सारी शॉर्ट फ़िल्में कमाल की हैं।

देखने की आदत बदली है। पढ़ने की भी बदलेगी।

बहरहाल, भाषा घट रही है—या हमारी जड़ता उजागर हो रही है? 🤔

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