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बालकृष्ण भट्ट

1844 - 1914 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

भारतेंदुयुगीन प्रमुख निबंधकार, गद्यकार और पत्रकार। गद्य-कविता के जनक और ‘प्रदीप’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत।

भारतेंदुयुगीन प्रमुख निबंधकार, गद्यकार और पत्रकार। गद्य-कविता के जनक और ‘प्रदीप’ पत्रिका के संपादक के रूप में समादृत।

बालकृष्ण भट्ट की संपूर्ण रचनाएँ

संस्मरण 1

 

आलोचनात्मक लेखन 1

 

निबंध 4

 

उद्धरण 45

आँख हो मनुष्य हृदय से देख सकता है, पर हृदय होने से आँख बेकार है।

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चरित्र पालन सभ्यता का प्रधान अंग है। कौम की सच्ची तरक्की तभी कहलावेगी, जब हर एक आदमी उस जाति या कौम के चरित्र-संपन्न और भलमनसाहत की कसौटी में कसे हुए अपने को प्रगट कर सकते हों।

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मन के पवित्र या अपवित्र करने का द्वार नेत्र है।

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आँख में आँसू उन्हीं अकुटिल सीधे सत्पुरुषों के आता है, जिनके सच्चे सरल चित्त में कपट और कुटिलाई ने स्थान नहीं पाया है।

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मन जब अकलुषित और स्वस्थ है, तभी विविध ज्ञान उसमें उत्पन्न होते हैं—व्यग्र हो जाने पर नहीं।

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व्यंग्य 3

 

पुस्तकें 5

 

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