समस्या-उठाऊ शिक्षा क्रांतिकारी भविष्यता है।
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ख़ुद को किताब की समस्याओं में डुबाना प्यार के बारे में सोचने से बचने का अच्छा तरीक़ा है।
वास्तव में संकट इस तथ्य में है कि पुराना निष्प्राण हो रहा है और नया जन्म नहीं ले सकता।
जब दिल बोलता है, तब मन को उस पर आपत्ति करना अभद्र लगता है।
तुम्हारी समस्याएँ केवल मंदिर में प्रवेश से हल होने वाली नहीं हैं। राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा, धर्म—ये सभी इस समस्या के हिस्से हैं।
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महिला का दुखड़ा सुनना, पुरुष के लिए कई बार इतना ज़्यादा मुश्किल या दूभर होता है। जब वह किसी चीज़ पर निराश या दु:खी होती है; तो पुरुष को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह असफल हो गया हो।
अतीत की मुश्किलों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को छोड़ दें। आप ही इकलौते व्यक्ति हैं; जो उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं, जिसके आप हक़दार हैं।
जीवनकाल में अत्यधिक वृद्धि का पक्ष लेने वालों के पास कोई वास्तविक समाधान नहीं है। सिवाए यह कहने कि जब समस्याएँ हमारे सामने आएँगी, तो हम उनसे निपटना सीख लेंगे। कुछ ने कहा कि अगर हमारे सामने जीवनकाल बहुत बढ़ जाने से जनसंख्या की समस्या पैदा होगी, तो हमें एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाने के बाद, धरती छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर बस जाना चाहिए।
जब कोई पुरुष तनाव में होता है, तो वह सिर्फ़ एक ही समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित करता है और बाक़ी समस्याओं को भूल जाता है। दूसरी तरफ़; जब कोई महिला तनाव में होती है, तो वह अपनी समस्याओं को फैला लेती है और उनके बोझ से दबी हुई महसूस करती है।
हिंदी के लेखक अँधेरे में भले ही भटकते हों, किंतु यह नहीं कह जा सकता कि युग-धर्म की जो पहेलियाँ अपने विश्लेषण के लिए सामने उपस्थित हैं, उनकीओर हिंदी का साहित्य क्षेत्र उदासीन है।
जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।
अगर हम अपने समय की सबसे बड़ी चुनौतियों—जलवायु के संकट से लेकर एक-दूसरे के प्रति हमारे उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे आविश्वास तक—से निपटना चाहते हैं, तो मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत हमें मनुष्य के स्वभाव के बारे में, अपने दृष्टिकोण को बदलने के साथ करने की ज़रूरत है।
आत्मघाती प्रवृत्तियाँ अंततः अमानवीय सामाजिक परिस्थितियों की ही मानस-उत्पाद हैं।
प्यार की शुरुआत बसंत की तरह होती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा सुखी रहेंगे। हम अपने पार्टनर से बेइंतहा प्यार करते हैं और कल्पना भी नहीं कर सकते कि कभी ऐसा दिन भी आएगा, जब हम उससे प्यार नहीं करेंगे। यह मासूमियत का समय है। प्रेम अमर लगता है। यह जादुई समय होता है, जब हर चीज़ आदर्श दिखती है और बिना प्रयास के अच्छी तरह काम करती है। हमारा पार्टनर हमें आदर्श नज़र आता है। हम बिना प्रयास के एक लय में रहते हैं और अपनी ख़ुशक़िस्मती पर आनंदित होते हैं।
जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।
दुनिया की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय विश्वास, प्रेम, प्रचुरता, शिक्षा और शांति पर ध्यान व ऊर्जा लगाएँ।
मेरी मुश्किलें मेरी अपनी हैं।
मैंने जितनी भी मुश्किलें झेली हैं, वे मुझे एक भयानक दर्द के लिए तैयार करने की दिशा में केवल पूर्वाभ्यास थीं।
कठिनाइयों पर क़ाबू पाने से हममें साहस और स्वाभिमान आता है और हम ख़ुद को जान लेते हैं।
हम सभी—पुरुषों और स्त्रियों—के लिए मुख्य समस्या सीखना नहीं है, बल्कि सीखे हुए को भूल जाना है।
भ्रष्टाचार अगर अपने हाथ से हो, तो वह प्रजा के लिए हितकारी है। दूसरे के हाथ से भ्रष्टाचार हो, तो वह प्रजा के लिए दु:खदाई है। इसीलिए रैलियाँ निकालनेवाले, प्रदर्शन करने वाले ये दल चाहते हैं कि शासकीय भ्रष्टा-चार करने का अधिकार इन्हें मिल जाए। इनका भ्रष्टाचार इतना पवित्र होगा कि जनता अपने आप सुखी हो जाएगी।
डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या तब तक हल नहीं हो सकती, जब तक कि राजनीतिक सत्ता इस तबक़े के लोगों के हाथों में नहीं आएगी। डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या; मेरे ख़याल में सबसे पहले एक राजनीतिक समस्या है, और उसे राजनीतिक समस्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए।'
दरअसल विकास का कोई भी विचार; जो अपने समाज के बहुसंख्यक लोगों की ज़रूरतों को मद्देनज़र रखकर नहीं बनाया गया, कोई भी मॉडल जो मुट्ठी भर लोगों को आकांक्षाओं-भर को अभिव्यक्त करता है; अंततः ऐसी ही सड़क होगा, जिस पर विकास का ट्रैफ़िक जाम हो जाए।
अस्पृश्यता के उन्मूलन और अंतर्जातीय भोज से ही हमारी सारी समस्याएँ ख़त्म नहीं होगी। न्यायालय, सेना, पुलिस और वाणिज्य जैसे तमाम सरकारी महकमों को हमारे लिए खोला जाना चाहिए। हमें हिंदू समाज को जातिवाद के उन्मूलन और समानता को, दो सिद्धांतों पर फिर से खड़ा करना होगा।'
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महिला की बात सुनना किसी पुरुष के लिए मुश्किल होता है; क्योंकि वह ग़लती से तार्किक क्रम की उम्मीद करता है, जबकि महिला एक समस्या से दूसरी समस्या पर बिना किसी क्रम के कूदती रहती है।
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अपनी क्षमता को साबित करने का अवसर मिलने पर पुरुष अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को व्यक्त करता है। जब उसे महसूस होता है कि वह सफल नहीं हो सकता, तभी वह अपने पुराने स्वार्थपूर्ण तरीक़ों की ओर लौटता है।
इस पर हमेशा बहस की जाती है कि एक आर्टिस्ट को क्या सिर्फ प्रॉब्लम सामने रखनी चाहिए या उसके समाधान की ओर भी इशारा करना चाहिए। मुझे लगता है कि ये चीज़ों की तरफ़ बहुत बचकाने ढंग से देखने का तरीक़ा है। अगर आर्टिस्ट को समाधान सामने रखने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उसका स्वागत है। लेकिन अक्सर वह समस्या बताता है और मामले को वहीं छोड़ देता है। ये दोनों ही ट्रीटमेंट समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हम किसी एक पर आशावादी और दूसरे पर निराशावादी का लेबल नहीं लगा सकते हैं। केंद्रीय बिंदु यह है कि जो भी फ़िल्म की विषय-वस्तु और रचनाकार के दिमाग़ में से सहज रूप से विकसित होता है, वो पूरी तरह स्वीकार्य है। लेकिन जो भी उभरे, वो स्वतः होना चाहिए। सवाल यह है कि क्या वो आर्टिस्ट जीवन और इंसानों को लेकर पक्षपाती है या नहीं? अगर वो है, तो फिर ये प्रॉब्लम कभी नहीं होती।
मैं बूढ़ा हूँ और मैंने बहुत सारी मुसीबतों को जाना है, लेकिन उनमें से ज़्यादातर कभी घटित नहीं हुई हैं।
उधार या भाड़े पर लिया गया कोई भी ऐसा व्यक्ति; जो तुम्हारे वर्ग का नहीं है, वह लेशमात्र भी तुम्हारे हितों को नहीं साध सकता।
राष्ट्रीय विपदा पर कुछ रस्में निभाना ज़रूरी होता है, जैसे विवाह में सात फेरे फिरना होता है। अकाल की, बाढ़ की, भूकंप की रस्में तय हैं। पहली रस्म है—दृश्य-दर्शन!
जब कोई महिला तनाव में होती है; तो वह तुरंत अपनी समस्याओं का समाधान नहीं चाहती, बल्कि वह तो अपनी भावनाएँ व्यक्त करके और सामने वाले की समझ भरी प्रतिक्रिया से राहत पाना चाहती है।
ज़्यादातर लोग प्रेम देने के लिए भूखे ही नहीं होते, बल्कि इसके लिए लालायित रहते हैं। उनकी सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे यह नहीं जानते कि वे ख़ुद को कितने बड़े आनंद से वंचित रख रहे हैं।
चतुर सरकार मुँह पर कपड़ा डालकर, लचकती-फचकती फ़ूर्ती से कमीशन की गली से निकल जाती है, और उधर समस्याएँ हुड़दंग करती रहती हैं।
समस्याओं के लिए तकनीकों द्वारा तैयार हल, और भी अधिक अवास्तविक लगने वाली तकनीक महसूस होती हैं।
अगर आप दुनिया बदलना चाहते हैं, तो सर्कस से मत डरिए।
सड़क पर दंगा होता हो, तो चतुर आदमी गली में से निकल जाता है। कमीशन वह गली है, जिसमें से सरकार छिपकर निकल जाती क्योंकि आम सड़क पर समस्याएँ जमघट किए हैं।
लौंडो की दोस्ती, जी का जंजाल।
हम सब एक दिन ख़ुद को गले तक कीचड़ में फंसा पाएँगे। वह समय ज़ोर से गाने का; खुलकर मुस्कराने का, अपने आस-पास के लोगों को ऊपर उठाने का और उनमें आशा जगाने का है कि आने वाला कल बेहतर दिन होगा।
हम दुनिया को सीखने की इच्छा से देखें और अपनी समस्याओं को यथार्थ से जोड़ें।
समस्या-उठाऊ शिक्षा मनुष्यों को ऐसे प्राणी मानती है, जो संभवन की प्रक्रिया में है। अर्थात् वे अभी अधूरे हैं, अपूर्ण हैं, और ऐसे यथार्थ के अंदर तथा उसके साथ रहते हैं, जो उन्हीं की तरह अधूरा और संभव होता हुआ यथार्थ है।
किसी भी युग का काव्य तब ही जनमानस में उतरता है, जब वह जीवन का सांगोपांग चित्रण करता है। सृष्टि की मूल समस्या, समाज की व्यवस्था, प्रकृति, व्यक्ति, और समस्त वस्तुओं का चित्रण साहित्य का अधिकार है। इन सब का चित्रण जब भावपक्ष से सानिध्य स्थापित करता है, तब ही वह काव्य है।
जिनसे कोई भयभीत नहीं होता और जो स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होते तथा जिनकी दृष्टि में ये सारा जगत अपनी आत्मा के ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटों से तर जाते हैं।
समस्या-उठाऊ शिक्षा, उत्पीड़कों का हित साधन नहीं करती।
जीवन का असली अर्थ यही है कि हम इसकी समस्याओं का उचित हल ढूँढ़ने का दायित्व उठाएँ और उन सभी कामों को पूरा करें, जो जीवन ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए तय कर रखे हैं।
शहर में हर दिक़्क़त के आगे एक राह है और देहात में हर राह के आगे एक दिक़्क़त है।
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कार्यसाधन के समय उससे जो विपदा आएगी, उसके लिए राजी रहो। विरक्त या अधीर न होना, सफलता तुम्हारी दासी होगी।
भारत में हमारी असली समस्या राजनीतिक नहीं, सामाजिक है।
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किसान के बराबर सर्दी, गर्मी, मेह, और मच्छर-पिस्सू वगैरा का उपद्रव कौन सहन करता है?
अगर आप दुनिया बदलना चाहते हैं, तो सबसे बुरे समय में सर्वश्रेष्ठ बने रहिए।
लेखन के बारे में अच्छी बात यह है कि जब आप उपन्यास या कथा लिखते हैं; तो लोग देख सकते हैं कि एक क्षेत्र की समस्याएँ, दूसरे क्षेत्र की समस्याओं के समान हैं।
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