यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?
एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।
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न संख्या-शक्ति, न धन, न पांडित्य, न वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।
मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।
हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा न करे, उसे कलंकित न करे और न उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी न करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।
मानव में रूप, गुण और यौवन के होते हुए भी यदि उदारता नहीं है, तो सभी विशेषताएँ निरर्थक हो जाती हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में एक पुरुष अपनी स्वभाव-सुलभ कठोरता से असफल रह सकता है, परंतु माता के सहज स्नेह से पूर्ण हृदय लेकर; जब एक स्त्री उसी उग्रता का अनुकरण करके अपने उत्तरदायित्व को भूल जाती है, तब उसकी स्थिति दयनीय के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।
वीरता से आगे बढ़ो। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे।
स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।
इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।
यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।
राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।
पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।
जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।
संसार को ऐसे लोग चाहिए, जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण है। वह प्रेम एक-एक शब्द को वज्र के समान प्रभावशाली बना देगा।
यदि स्वभाव में समता न भी हो, तो भी सबको समान सुविधा मिलनी चाहिए। फिर भी यदि किसी को अधिक तथा किसी को कम सुविधा देनी हो, तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करनी आवश्यक है।
सामान्य मनुष्य में जो त्याग, करुणा, सहानुभूति, परोपकार, साहस आदि होते हैं—उन्हीं पर यह दुनिया टिकी है।
मनुष्य से बड़ा कोई नहीं है। मनुष्य का जिससे कल्याण होता है, वही धर्म है। जो मनुष्य का हित करता है, वही साधु है। जो मनुष्य को ऊपर उठाता है, वही संत है। ईश्वर की सत्ता भी मनुष्य ने इसीलिए स्वीकार की है कि वह त्राता है, रक्षक है, लोक-हितकारी है।
हर राष्ट्र के लिए और हर व्यक्ति के लिए जिसको बढ़ना है, काम-काज और सोच-विचार के उन सँकरे घेरों को—जिनमें ज़्यादातर लोग बहुत अरसे से रहते आए हैं—छोड़ना होगा और समन्वय पर ख़ास ध्यान देना होगा।
सत्य ही मेरा ईश्वर है तथा समग्र विश्व मेरा देश है।
मैंने दो-एक बातें सीखी हैं : प्रेम और प्रियतम—तर्क, पांडित्य और वागाडंबर के बहुत परे।
मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।
जिन्होंने रक्त की जगह पसीना भी न बहाया हो, जो स्वयं निरंकुश हों और जिन्होंने करोड़ों भाई-बहनों को ग़ुलामी की बेड़ी से जकड़ रखा हो, उन्हें हाथ-पैर हिलाए और ऊँचे उठे बिना आशा भी नहीं रखनी चाहिए कि संसार कि संसार उन्हें मनुष्य भी समझेगा।
किसी धर्म का सिद्धांत कितना ही उदात्त एवं उसका दर्शन कितना ही सुगठित क्यों न हो, जब तक वह कुछ ग्रंथों और मतों तक ही परिमित है, मैं उसे नहीं मानता।
आनृशंस्य परम धर्म है।
संसार के मानव-समुदाय में वही व्यक्ति स्थान और सम्मान पा सकता है; वही जीवित कहा जा सकता है, जिससे हृदय और मस्तिष्क ने समुचित विकास पाया हो और जो अपने व्यक्तित्व द्वारा मनुष्य-समाज से रागात्मक के अतिरिक्त, बौद्धिक संबंध भी स्थापित कर सकने में समर्थ हो।
यदि कोई नैष्कर्म्य एवं निर्गुणत्व को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अपने मन में किसी प्रकार का जाति-भेद रखना हानिकर है।
सभी धर्म मेरे लिए पवित्र हैं।
बीस वर्ष की अवस्था में मैं अत्यंत असहिष्णु और कट्टर था। कलकत्ते में सड़कों के जिस किनारे पर थिएटर हैं, मैं उस ओर के पैदल-मार्ग से ही नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में मैं वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ और उनसे तिरस्कार का एक शब्द कहने का विचार भी मेरे मन में नहीं आएगा। क्या यह अधोगति है? अथवा मेरा हृदय विस्तृत होता हुआ मुझे उस विश्वव्यापी प्रेम की ओर ले जा रहा है, जो साक्षात् भगवान है?
मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है, जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊँचा आदर्श है, जिसके लिए वह अपने प्राण तक दे सके।
समाजोत्सव देखने के लिए बाहर से आए हुए आगंतुकों का पूजन, सत्कार, सम्मान करना चाहिए और विपत्ति में उनकी सहायता करनी चाहिए—यही समाज का मुख्य धर्म है।
धर्म के सिद्धांत संबंधी अंशों का उपदेश, आमतौर से जनता में दिया जा सकता है और सामुदायिक भी बनाया जा सकता है, पर उच्चतर धर्म सार्वजनिक रीति से प्रकट नहीं किया जा सकता।
चरित्र की ही सर्वत्र विजय होती है।
मज़हबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना, अपनी तथा मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है।
तमोगण से हमारा देश छाया हुआ है—जहाँ देखो वहीं तम; रजोगुण चाहिए, उसके बाद सत्व; वह तो अत्यंत दूर की बात है।
स्त्री के व्यक्तित्व में कोमलता और सहानुभूति के साथ साहस तथा विवेक का एक ऐसा सामंजस्य होना आवश्यक है, जिससे हृदय के सहज स्नेह की अजस्त्र वर्षा करते हुए भी, वह किसी अन्याय को प्रश्रय न देकर उसके प्रतिकार में तत्पर रह सके।
वैचारिक उदारता और सहनशीलता; अगर प्राचीन भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है, तो क्या हमें ख़ुद को इस महान विरासत का योग्य वारिस साबित करने की ज़रूरत नहीं है।
निरंकुश समाज मनुष्यता को समाप्त कर देता है।
ज्ञान के वास्तविक अर्थ में ज्ञानी; शिक्षा के सत्य अर्थ में शिक्षित वही व्यक्ति कहा जाएगा, जिसने अपनी संकीर्ण सीमा को विस्तृत कर, अपने संकीर्ण दृष्टिकोण को व्यापक बना लिया हो।
जहाँ तक आध्यात्मिकता का प्रश्न है; अमेरिका के लोग हमसे अत्यंत निम्न स्तर पर हैं, परंतु इनका समाज हमारे समाज की अपेक्षा अत्यंत उन्नत है। हम इन्हें आध्यात्मिकता सिखाएँगे और इनके समाज के गुणों को स्वयं ग्रहण करेंगे।
पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो—उसीसे भविष्य में कलह का बीजारोपण होगा।
यदि तुम शासक बनना चाहते हो, तो सबके दास बनो।
प्रत्येक व्यक्ति को कुलीनता और अकुलीनता के भाव को अलग रखकर, अपनी उन्नति का पूरा अवसर मिलना चाहिए। किसी राजा का कुलीन का स्वार्थ, किसी की उन्नति का बाधक न हो।
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हम एक शानदार युग में रह रहे हैं। जब हम सीमित करने वाले विचारों को छोड़ देंगे, तो सृजन के हर क्षेत्र में मानवता की सच्ची भव्यता का अनुभव करेंगे।
जो जाति एकमन होकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की साधना में लगी रहती है, उस जाति में किसी भी तरफ़ उपयुक्त मनुष्य का अभाव नहीं होता।
हमारी शिक्षा जहाँ तक संभव हो असांप्रदायिक, उदार तथा सस्ती होनी चाहिए।
वह शिक्षा शिक्षा कहलाने के योग्य है, जो हमें उदार तथा मनस्वी बनाती हो।
शिक्षा में किसी प्रकार की भी संकीर्णता, शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य का नाश कर देती है।
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